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Friday, May 21, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- माँ

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { दोहा छन्द }
विषय--माँ
शीर्षक--माँ ममता की मूर्ति है
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माँ ममता  की  मूर्ति  है , होता  शब्द अनूप ।
माँ है  सागर  स्नेह  की , जीवन  सेवा  रूप ।।१।।
माँ शीतल-सी  छाँव  है , है मंगल की खान ।
माँ ईश्वरमय   शब्द   है , जीवनदायक जान ।।२।।
माँ पर्वत  है  त्याग  की , भरा  प्रेम का भाव ।
माँ करुणा की  धाम  है , रहा विनम्र सुभाव ।।३।।
माँ पोषण   दे  उदर  में , रखती भारी ध्यान ।
माँ खानपान  को   रखे , संयमित सदा मान ।।४।।
माँ नव  माह   गर्भ  धरे , सारे   पीड़ा   झेल ।
माँ - सा  रखना पेट  में , नहीं हँसी का खेल ।।५।।
माँ प्राणी  को  जन्म  दे , पीड़ा  झेल  अपार ।
माँ ही  लाये  जीव   को , दिखलाये   संसार ।।६।।
माँ का दुग्ध अमृत  रहा , गढ़ता  देह सुजान ।
माँ से   पायें   शक्ति   है , देती  वह सद्ज्ञान ।।७
माँ करती   सन्तान  को , जी जान से  दुलार ।
माँ है  रक्षा  कवच - सी , होती       पहरेदार ।।८।।
माँ जाती  लड़  मौत से , करे नहीं  मन भीत ।
माँ जैसे   इस   विश्व  में , नहीं  रहे   हैं  मीत ।।९।।
माँ साजसवाँर    करती , लगी रहे  दिन-रात ।
माँ का  आशीष  करता , सुख की है बरसात ।।१०।।
माँ ही  होती  प्रथम गुृरु , रही   ज्ञान   दातार ।
माँ का  गुण अनलेख है , नभ  जैसे  विस्तार ।।११।।
माँ का आँचल सुखद है , देता   सदैव   छाँव ।
माँँ का  पद 'ठाकुर' रहा , स्वर्ग  देव का ठाँव ।।१२।।
                      ०×××××××०
दि.२१.०५.२१

Thursday, May 20, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- दोहन करना छोड़ो

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { सार छन्द }
शीर्षक--दोहन करना छोड़ो                    
                       ०××××××०
प्रेम  प्रकृति से  करना  प्यारे , नाता   उनसे  जोड़ो ।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।

मानव  मिलके  निर्दयता  से , निचोड़ दी धरती को ,
तेरा   लालच   खा  जायेगा , निश्चय ही जगती को ।
संतुलन  को  कायम  रखना , सीमाएँ   मत   तोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।१

सारी  धरती  उजाड़   डाली , तू  ने   बिना  विचारे ,
दूरदृष्टि    है    नहीं   तुम्हारी , उससे  किया किनारे ।
देखा   केवल   वर्तमान  को , भूत तरफ मुख मोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।२

पेड़ - पौध   को  काटा   तूने , नष्ट किया  हरियाली ,
भावी  पीढ़ी  के  जीवन  को , विनाश है कर डाली ।
उनके खातिर  लता - वृक्ष है , प्राणवायु  तो  छोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।३

विशुद्ध जल भी  पीने को  है , उनके लिए  बचा दो ,
संसाधन  के  नित  दोहन  में , प्यारे  रोक लगा  दो ।
आगत  पीढ़ी की हित  साधो , स्वयं हेतु मत जोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।४

भरा  प्रदूषण  इस  धरती  में , पर्यावरण    बिगाड़ा ,
तू  वैज्ञानिक  विकास  का है , निश्चय  झण्डा गाड़ा ।
करना  विचार  मन में  सोचो , भविष्य को  है ताड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।५

जितने  विकास  होगा उतना , विनाश  बढ़ जायेगा
जग में  समीप  बिगाड़ होगा , अति  संकट छायेगा ।
प्रकृति संग 'ठाकुर' कहता है , प्यारे   नाता   जोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।६
                          ०××××××०
व्याख्या--प्रकृति के दोहन का दुष्परिणामपर प्रकाश
              डाला गया है ।

Tuesday, March 2, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- पलाश

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले',
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग } ,
विषय--पलाश ,
विधा--कविता { दोहा छन्द } ,
शीर्षक--पलाश ।         
                   ०××××××०
गाँव - नगर  से   दूर   में , देखो खड़ा  पलाश ।
वट-पीपल  इसको  तजे , होता   नहीं  हताश ।।१।।
पीपल- पलाश-वट  हुये , प्रकट एक ही साथ ।
पर वट-पीपल तज इन्हें , खींच  लिए  हैं हाथ ।।२।।
पद्मपुराण    कहे     इसे , वर्णित है  आख्यान ।
क्रोध   हुईं  जब  पार्वती , की थीं  श्राप प्रदान ।।३।।
वट - पीपल  को  पूजते , श्रद्धा  समेत   लोग ।
जड़ में जल  ले चढ़ाकर , पूज  रहें   दे   भोग ।।४।।
वन्य क्षेत्र  पलाश  खड़ा , मन में  नहीं विकार ।
आते  समय  बसन्त  के , शोभित  लगे अपार ।।५।।
लाली  अम्बर  ओढ़  के , लगता  शोभा  मान ।
देता  आनन्द   दृग   को , सुन्दरता  की  खान ।।६।।
सजता ज्यों  दुल्हन लगे , भाये छवि अतिरेक ।
कुढ़ जाते ज्यों अन्य तरु , लगता पलाश नेक ।।७।।
शोभा  इसकी  देख  को , कुंठित तरुवर अन्य ।
पास खड़े  तरुवर  सभी , खुद को  माने धन्य ।।८।।
दिखता  पलाश   दूर  से , दृग को  लेता खींच ।
मानो   हर्षित   हो   रहा , अन्य  वृक्ष के  बीच ।।९।।
एक  कहावत  तक बना , पलाश  के  ही नाम ।
तीन  पात  हैं   ढाक  के , कहते  लोग  तमाम ।।१०।।
पर पलाश  कमतर नहीं , करना  सोच-विचार ।
पत्ते   का    पत्तल   बने , लोग    करें   आहार ।।११।।
पूजा   में   काष्ठ  उसकी , आते   रहती   काम ।
शिव रीझें सूखे  पुष्प  से , जो हैं  मंगल - धाम ।।१२।।
कई व्याधि  को  नष्टकर , करता  रोग  विनाश ।
कह  'ठाकुर' आते   रहा , अनेक  काम पलाश ।।१३।।
                       ०×××××××०

Monday, March 1, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- कानन

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , 
विधा--कविता { मुक्तक }
शीर्षक--कानन
दि.०१.०३.२१
                   ०××××××××०
कानन सुंदर लगता भारी जंगल में  मंगल होता है ।
पशु-पक्षी का  कानन  में ठौर-ठौर  दंगल  होता है ।।
तीतर-बटेर-मोर-पपीहा खंजन-तोता-कपोत-मैना ।
कई जीव के आश्रयदाता धरती में  जंगल  होता है ।।१
बाघ-लोमड़ी-सांभर-भालू बंदर-खरहा करे  बसेरा ।
बाघ-नेवला-सियार-हाथी चीता-वनभैंसा  का डेरा ।।
चीतल-बराह-बारहसिंघा रहती है गिलहरी सयानी ।
विपिन श्वान हैं झुण्ड बनाये चलते सारे रखके घेरा ।।२
पादप-पौधे  अनेक  सारे  कानन भीतर  पाये जाते ।
सागौन-साल-बीजा-तेन्दू-बेल-चार-महुवा हैं  भाते ।।
अर्जुन-कोसम-साजा-धौंरा हर्रा भी आँवला-बहेड़ा ।
जड़ी-बूटियाँ औषधि देके  बीमारी  को  दूर भगाते ।।३
कानन धरती की शोभा हैं जंगल  पानी  बरसाते हैं ।
हराभरा जंगल  देखे से  आँखों को  भी ये  भाते हैं ।।
कंदमूल फल के ये  दाता शुद्ध  वायु के  रहे प्रदाता ।
जन्म दिया सरिता-नाले को पानी दे तृषा बुझाते हैं ।।४
कानन वीरान हुए सारे हम सबने ही किया सफाया ।
भारी स्वार्थी मानव होते काट-काटके जंगल खाया ।।
पर्यावरण  बिगाड़ा हमने अपने  पैर  मार कुल्हाड़ी ।
बना प्रदूषण  संकट भारी जग में पानी घटते आया ।।५
कानन उजड़ रहे धरती के बढ़ते रही समस्या भारी ।
ओजोन परत में छेद बढ़ा धरा हमारी जलती सारी ।। 
आज हमें है  मिलके भाई जंगल रक्षा  करना होगा ।
कहता 'ठाकुर' वरना प्यारे नहीं  बचेगी धरा हमारी ।।६
                      ०×××××××०

Friday, February 26, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- सरो

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { दोहा छन्द }
शीर्षक--सरो तरुवर
दिनाँक--२६.०२.२१
                      ०×××××०
होता   है   तरुवर   सरो , शीतल      छायादार ।
आनन्द   प्रदान   करता , रहता   यह  छतनार ।।१।।
शोभा  यह  कश्मीर का , लगता  बहुत ललाम ।
बनझाऊ    कहते    इसे , रहा  अपर  है   नाम ।।२।।
सरो  बाग में यदि  खड़ा , लगाकर   चाँद  चार ।
भाता  भारी   हृदय  को , नयना  सुखी  अपार ।।३।।
वृक्ष   मध्य   रहके  सरो , शोभित  होता   खूब ।
आन वृक्ष की छवि बढ़ा , रहता   उसमें     डूब ।।४।।
बन  जायें हम  सरो तरु , पर हितकर स्वीकार ।
सबका कष्ट  हरण  करो , बन  जा  सुखदातार ।।५।।
हितैषी  बनों   वृक्ष - सा , पर  का   हरना  पीर ।
अपना  सेवा   धर्म  कर , सार्थक  मनुज शरीर ।।६।।
सीख  लें  सरो   पेड़  से , रखना   ऊँचा   भाव ।
ऊँचा  बन  रखना  सदा , विनम्र सरल स्वभाव ।।७।।
सरो   वृक्ष   ऊँचा    रहें , किन्तु नहीं अभिमान ।
उससे  ज्ञान  ग्रहण  करें , तज घमण्ड बुधवान ।।८।।
मन  का  सारा  छोड़  दें , गर्वित  भाव  विचार ।
तरुवर  सा  मन ठान के , कर    लें  परोपकार ।।९।।
सीधा-सच्चा  सरल बन , करें   भलाई    काम ।
यदि  कोई   गिरता उसे , उठा   हाथ  से  थाम ।।१०।।
मन-मन्दिर के  बाग को , करना   शोभा  मान ।
झुको  नहीं  अन्याय  से , रहना    सीना   तान ।।११।।
कहता 'ठाकुर' तरु सरो , धीरज  का  है  खान ।
आँधी -  तूफान  सहता , मानो   ले    मुस्कान ।।१२।।
                       ०××××××०
व्याख्या--सरो वृक्ष के गुणों को मनुष्य को भी
              सीखकर अपने धन्य करना चाहिए ।

Monday, February 15, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- बसंत पंचमी

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विषय--बसन्त पञ्चमी
विधा--दोहा छन्द 
शीर्षक--आयी बसन्त पञ्चमी
                    ०×××××××०
आयी  बसन्त  पञ्चमी , सुखद  रही अपार ।
सुभग जन्मदिन है रहा , सरस्वती  अवतार ।।१।।
ज्ञान   प्रदाता   मातुश्री , हरे  मन  अँधकार ।
उज्ज्वल करती चेतना , माता    करुणागार ।।२।।
मूरख  को  ज्ञानी  बना , करे  माँ  चमत्कार ।
वरदानी    माता    रही , जीवन  करे  उबार ।।३।।
माया  मोह  हरण  करे , भर   देती  संस्कार ।
हर    लेती    अज्ञानता , करे   ज्ञान   संचार ।।४।।
हृदय-भवन में  मातुश्री , कर  देती उजियार ।
शुभ  वर  दात्री माँ रही , देती  श्रेय   विचार ।।५।।
बुद्धि चक्षु को  खोलती , लाती सदा निखार ।
करती  विवेक  में सदा , मातेश्वरी      सुधार ।।६।।
राग   रागिनी  दायिका , करती  स्वर संचार ।
बाधा    हरती   मूर्खता , देती  जन्म   सँवार ।।७।।
दिव्य चक्षु दे मनुज को , देखे   सब   संसार ।
वर्तमान  सह  भूत  को , भावी  सके  निहार ।।८।।
दया - धर्म मन  में  भरे , समानता   उपकार ।
सारे  अवगुण  दूर  कर , भरती गुण भण्डार ।।९।।
विद्या   दायक   शारदा , विनम्रता      शृंगार ।
उससे  मिलती  पात्रता , धनसंचय  का  द्वार ।।१०।।
धन पाये से  सुख मिले , उससे खुश परिवार ।
सरस्वती   पीछे    रमा , बनके   चले   उदार ।।११।।
धर्म-कर्म  तब नर  करे , मातु  दया  अनुसार ।
मूरख 'ठाकुर' नित करे , माँ की जयजयकार ।।१२।।
                      ०××××××०
व्याख्या--माता सरस्वती के कृपा के प्रभाव का
              सरल शब्दों में वर्णन ।

Thursday, January 28, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- छेरछेरा

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--सार छन्द { छत्तीसगढ़ी }
शीर्षक--छेरछेरा
                    ०××××××०
आगे   परब   छेरछेरा   के , बड़े  बिहनिया बेरा ।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले  झट  हेरा ।।

नान -नान लैका  बन संगी , पहुँचेन सब  दुवारी ,
साकंभरी  ह  जनमे   हावै , इही दिन म महतारी ।
तेखर खातिर  आयेन जमे , कूटे    ल    छेरछेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले  झट  हेरा ।।१।।

दाई  साकंभरी   भरे  हावै , तुँहरे   कोठी   ढाबा ,
सुपली-सुपली अन दे देवा , धरके  काबा-काबा ।
हरसित   होके  देवा   दाई , दान  करे   के   बेरा ।। 
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।२।।

जतके दिहा  ओतके पाहा , परब  दान के  भारी ,
दान पुण्य के महिमा भारी , करिहा सब  चिंहारी ।
जलदी  दे  दा  देबो  जाके , दूसर   घर  के  फेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।३।।

रोज-रोज नइ आवन  दाई , माँगे    तुँहर   दुवारी ,
आथन जब एक बछर पूरे , सुनला बिनय हमारी ।
नोहन हमन मँगन जोगी हे , नोहन  भाट - सँपेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।४।।

छोटे - छोटे  मिलके  लैका , आये   हावन    दाई ,
तुँहर दान के बिसा कुरकुरे , खाबो -  मुर्रा - लाई ।
झन करव बिलम मोरे माई , होवत    हवै  अबेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।५।।

सुनके लैका  मन के बोली , दाई   हाँसत   आके ,
सुपली-सुपली धान लानके , बाँटे  सब  लैका के ।
पाइन 'ठाकुर' जभे  तभे हे , टोरिन   लैका   घेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।६।।
                        ०×××××××०
व्याख्या--छेरछेरा परब का छत्तीसगढ़ी में यथा
              सम्भव वर्णन किया गया है ।

Friday, January 15, 2021

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- मल्लाह

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--सरसी छन्द
शीषर्क--मल्लाह
                     ०×××××०
पानी में  भी  पंथ  बनाता , देता    उतार     पार ।
पार लगाये  मल्लाह  सदा , देता    घाट     उतार ।।
एक  किनारा  से  है  लेके , पहुँचाये   तट   अन्य ,
दोनों तट का  स्वामी होता , जीवन  उसका धन्य ।
सतत्  लगा है  पर सेवा में , रखता  शुभ्र  विचार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।१।।

मोह तजे वह जीवन का है , पर का रखता ध्यान ,
जिन्दा को  वह  पार उतारे , भुजा खूब  बलवान ।
मन में अदम्य साहस होता , हाथों    में   पतवार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।२।।

सरिता-सागर - झीलों में है , पानी   भरा  अथाह ,
भय मुक्त रहे मल्लाह सदा , करे    नहीं   परवाह ।
उसके  आगे पूर्ण  बाढ़ की , झुक  जाती  है  धार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।३।।

मानव-पशु-पक्षी सबको है , करता   पार   तुरन्त ,
उसका  आश्रय  लेते आये , साधक-सन्त -महन्त ।
नेता - मंत्री - अधिकारी  हैं , जनता  सह सरकार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।४।।

ईश्वर   मृत्यु   बाद  है  तारे , सजीव को  मल्लाह ,
उसको प्रबल-प्रखर धारायें , नित  देतीं   हैं   राह ।
सम्भव उसके बिना नहीं है , दुनिया   में  व्यापार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता   घाट     उतार ।।५।।

माली हालत खराब इनकी , है   काफी  कमजोर ,
सबको  है  पार  उतारे  जो , दुःख   झेलता   घोर ।
पार करे 'ठाकुर' वही  यहाँ , फँस जाता  मँझधार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।६।।
                           ०××××××०
व्याख्या--इस छन्द में मल्लाह के गुणों का वर्णन
             करने का यथाशक्य प्रयास किया गया
             है ।

Saturday, January 2, 2021

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- शहद

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--शहद 
                 ०××××××०
शहद अमृत समान रहा , गुण  से   है   भरपूर ।  
इसका सेवन  नित करें , करे   रोग   को    दूर ।।१।।
शहद  बने  मकरंद   से , मधु  प्रसून का  सार ।
करे सुदृढ़ यह  देह  को , होता       बलदातार ।।२।।
शहद दूध  प्रातः  मिला , जो  करता  है   पान ।
माँस  वृद्धि मधुरस करे , रहा   परीक्षित  जान ।।३।।
शहद संग है जल मिला , करते    प्रातः   पान ।
अति   मोटापा  दूर   हो , करता  वसा  निदान ।।४।।
शहद अगर  सेवन  करे , कोई   औषधि   संग ।
औषधि का है  गुण बढ़े , लगता   खाना   अंग ।।५।।
शहद पान जो नित करे , चमके  तन  का  चर्म ।
सुन्दरता   बढ़ता   सदा , इसका शुभ गुण धर्म ।।६।।
शहद करे मन बुद्धि का , निश्चय  सदा विकास ।
शरीर  भी   चंचल  बने , हरता  मन  का  ह्रास ।।७।।
शहद  बढ़ाये  दृष्टि  की , सदैव   भारी   शक्ति ।
आँखों   में  अंजन  करे , यदि  है कोई  व्यक्ति ।।८।।
शहद संग में गरम जल , करता    कोई    पान ।
विष बन जाता है शहद , पहुँचाता     नुकसान ।।९।।
शहद का  गुण  गरम है , कहता        आयुर्वेद ।
इसका  सेवन तब  करें , जाने    प्रयोग     भेद ।।१०।।
शहद बने  परसाद  भी , ईश्वर     लेते     भोग ।
हरण करे  निश्चय शहद , तन - मन का है  रोग ।।११।।
शहद  नींद  लाया  करे , रजनी  में   कर  पान ।
अति गुणकारी यह रहा , कह  'ठाकुर'  नादान ।।१२।।
                     ०××××××०
व्याख्या--शहद के कुछेक गुणोंपर प्रकाश डालने
              का प्रयास किया गया है ।

Monday, December 21, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले की रचना- ममता

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--ममता मीठी मोदक जैसी
                  ०××××××××०
ममता महके  माँ के मन में , जगती  का  आधार ।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।

ममता महान  गुण होती है , ममता   रही  अनन्त ,
ममता बिन प्राणी का प्यारे , हो    जायेगा  अन्त ।
ममता से ही  पोषण  होता , प्राणी    की   उद्धार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।१।।

ममता से शिशु पल पाते हैं , दुनिया  चलाय मान ,
ममता रखती है  जीवों को , जग  में  रही  प्रधान ।
ममता गढ़ती जगती को है , रही  यह शिल्पकार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगर ।।२।।

ममता से कायम  है जगती , यह जीवन का डोर ,
ममता ही   रखते  आई   है , हराभरा  चहुँ   ओर ।
ममता माँ के उर  बसती है , ममता  जग में  सार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।३।।

ममता बसती सब प्राणी में , चाहे  कीट  -  पतंग ,
ममता बिना  नहीं   जीतेंगे , जीवन  का  है  जंग ।
ममता ही  जीवन  देती  है , खुद  को  है  दे  वार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।४।।

ममता होती  जग में  प्यारे , सारे  सुख  का  मूल ,
ममता ही तो  हर  लेती  है , मन  का  सारा  शूल ।
ममता बिन है दुनिया सारी , होगी   खूब   असार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।५।।

ममता का है  गुण गा पाना , नहीं  विश्व में  शक्ति ,
ममता के  आगे जग  बौना , ममता श्रद्धा - भक्ति ।
ममता होती  'ठाकुर' मानो , करुणा   का   श्रृंगार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।६।।
                       ०××××××०
व्याख्या--ममता की विशेषता का यथासंभव वर्णन
              करने का प्रयास किया गया है ।

Friday, December 18, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- संत शिरोमणि गुरु घासीदास

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विषय--छत्तीसगढ़ के सन्त
शीर्षक--सन्त शिरोमणि गुरु घासीदास
                    ०××××××०
ललना  महँगूदास  के , अमरौतिन के लाल ।
बाबा   घासीदास   हैं , सन्तों के  ज्यों भाल ।।१।।
धरती  छत्तीसगढ़ की , बाबा  महान   सन्त ।
अवतारी  सज्जन रहे , महिमा  रही अनन्त ।।२।।
सत्यनाम के  पंथ  का , किये  प्रचार-प्रसार ।
जोते थे हल बैल बिन , किये   थे  चमत्कार ।।३।।
अग्नि बिना  है आपने , भोजन  कर  तैयार ।
चमत्कृत किये वे कई , रहा   सत्य   आधार ।।४।।
समाज सुधार वे किये , दिये  विचार अनेक ।
सारे   मानव   एक  हैं , सब का स्वामी एक ।।५।।
सत्य-अहिंसा है  दया , करना     परोपकार ।
माँसाहार तज  दें सब , लें  सात्विक आहार ।।६।।
यथा अन्न करते ग्रहण , वैसे   बने    विचार ।
बढ़े माँस भक्षण किये , मन में  खूब विकार ।।७।।
आये   मानस   मूढ़ता , कुण्ठित होता ज्ञान ।
जीव मात्र में प्रभु बसे , करें  जीव का  मान ।।८।।
जीवोंपर  करना  दया , हत्या  करना  छोड़ ।
नशा पान  करना नहीं , इससे  है  मुँह मोड़ ।।९।।
सदा सत्य  वाणी कहें , सत्य  जगत में सार ।
असत्य बोल कहें नहीं , झूठ  नर्क  का द्वार ।।१०।।
गौ हत्या  बन्द  करना , पशु बलि  देना पाप ।
वास करें  हर जीव  मेंं , राम  ब्रह्ममय  आप ।।११।।
छोड़  मूर्ति पूजन करें , ईश   प्रभु  निराकार ।
रूप रहित 'ठाकुर' रहे , धरें    नहीं   आकार ।।१२।।
                      ०××××××०
व्याख्या--प्रस्तुत रचना में सन्त शिरोमणि गुरु-
             घासीदास के चमत्कार एवम् उनके
              उपदेशपर प्रकाश डालने का यथा
              सम्भव प्रयास किया गया है ।

Thursday, December 17, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- चिंतन कविता का आधार

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विषय--क्या होती है कविता
विधा--कविता
शीर्षक--चिन्तन कविता का आधार 
             *******************
कविता होती  है निश्चय  ही , विचार   का   उद्गार ।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।

अथवा मन  हर्षित होता  है , छा   जाता  आनन्द ,
तभी जन्म  कविता लेती है , बन  जाते   हैं  छन्द ।
हर्ष  -  वेदना  ही   लेते   हैं , कविता का आकार ।।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।१।।

मन को घटना  मथ देती  है , करें  जब   दृष्टिपात ,
करुणा जागृत  होती मन मेंं , मिलते जब आघात ।
मुरदे  में  कर  देती  कविता , जीवन   का  संचार ।।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।२।।

भरी  वीरता  कविता  मेंं  है , देश   करे   आजाद ,
जंजीर   गुलामी  की   तोड़े , करे   वतन  आबाद ।
टिके नहीं  कविता के आगे , तोप - तीर -तलवार ।।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।३।।

नवाचार  कविता   लाती है , मिटा    अंधविश्वास ,
अंधकार मन  का  हरती  है , भरती नवल उजास ।
जागृति कविता से आती  है , लाती हृदय निखार ।।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।४।।

कविता  भावों की  धारा  है , पावन    गंगा   नीर ,
सदा आनन्द  मन मेंं  भरती , हर   लेती   है  पीर ।
कवि के  अंतर्मन मेंं  उछले , खेलती हृदय - द्वार ।।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।५।।

कविता ताप  मिटा  देती  है , मन  में   भरे  उमंग ,
दिल में  है तुरंत  बस जाती , बढ़ता   खूब   तरंग ।
छाप छोड़ती 'ठाकुर'मन में , कविता मन का हार ।।
रहा  शोक से  उसका नाता , चिन्तन  है   आधार ।।६।।
                        ०×××××××०
व्याख्या--इस छन्द में अति संक्षेप में कविता की
             विशेषतापर प्रकाश डालने का प्रयास
             किया गया है ।

Saturday, November 14, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- दीपावली

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
शीर्षक-- दीपावली
विधा--सार छन्द 
दि.--१४.११.२०
                       ०××××××०
ऐसा   दीपोत्सव   है  प्यारे , आओ सभी मनायें ।
प्रेम-स्नेह का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।

देश-प्रेम के  मृदु  मिट्टी का , होगा  दिया बनाना ,
श्रद्धा-समता-सहिष्णुता के , उसमें  तेल लगाना ।
सद्विचार-करुणा  की बाती , प्यारे  सभी लगायें ।।
प्रेम-स्नेह का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।१।।

माचिस  ममता-मर्यादा की , लें  अपने  हाथों  में ,
रखें सावधानी  दिये  जला , दीपपर्व    रातों   में ।
हिंसा-द्वेष -घृणा- निर्दयता , छल-दुष्कर्म मिटायें ।।
प्रेम-स्नेह का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।२।।

आतंकवाद-नक्सल तम हैं , होगा   इसे  मिटाना ,
एकता तथा अखण्डता का , होगा  दीप जलाना ।
सेवा-सहभागी  भाव  जगा , मन में दीप जलायें ।।
प्रेम-स्नेह का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।३।।

महँगाई  की  अंधकार  को , हमें  मिटाना  होगा ,
नये - नये  रोजगार  का  है , दिया जलाना होगा ।
भूखमरी  की अंधकार  को , तुरन्त  इसे  मिटायें ।।
स्नेह-प्रेम का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।४।।

राष्ट्रीयता-दीप  घर - घर में , होंगे    हमें  जलाने ,
सीमापर है  पहुँचके हमको , होंगे  शीश  कटाने ।
नित आलोकित हों सीमाएँ , ऐसी  रश्मि जलायें ।।
प्रेम-स्नेह का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।५।।

बलिदानी   शूरवीर   अपने , करें  देश  रखवाली ,
इनके  कारण  हम मना रहे , नित होली-दीवाली ।
अगुवाई  में  'ठाकुर'  इनके , दीपक सदा सजायें ।।
प्रेम-स्नेह का  दीपक  लेके , मन के द्वार जलायें ।।६।।
                         ०×××××०
व्याख्या--नवीन विधान से दीपावली मनाने का
              आह्वान किया गया है ।

Tuesday, September 8, 2020

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- माँ

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'माँ के सामने कम पड़ेंगे'
दिनाँक--०८.०९.२०
                       ०××××××०
हम   सारे  कहते  आये   हैं , माँ के  नाम  एक शाम ।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग  आठों  याम ।।
उनके लिए अगर  कर  देंगें , जीवन के हरपल त्यक्त ,
निश्चय मानो  कमतर  होगा , जितना  भी सारा वक्त ।
सृष्टि के समय  जितने सारे , इकट्ठा   करेंगे    तमाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
माँपर ये  वक्त  खर्च कर  दें , होगें  निश्चय  ही  अल्प ,
सारे   विश्व  में   ढूँढ़   देखो , माँ  का नहीं है विकल्प ।
प्रथम गुरु माँ  कहलाते रही , होती  है  वह  गुणधाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
अपनी आँचल भीतर से माँ , पिलाती  सुधा-सा क्षीर ,
पालनपोषण   करने  में   है , होती न कदापि अधीर ।
सन्तानपर  नित  ध्यान देती , करते रहती  सब काम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
अपने सारे  सुख-सुविधा है , माँ  कर  देती  है  त्याग ,
कष्ट  अनेक  उठाया करती , सन्तानोंपर      अनुराग ।
माँ की ममता अनमोल रही , होती  गुणों  में  ललाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग  आठों   याम ।।
विकास चाहती  सन्तान की , मन  से   सदैव  उत्कर्ष ,
उनकी माँ सुनके किलकारी , होती   है   अपार   हर्ष ।
रखती कल्याण की भावना , माँ  होती  पूरण   काम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
वात्सल्य की सिन्धु होती है , भरा  करुणा  अनुपमेय ,
वेद-शास्त्र-गीता-कुरान-सा , माँ  का  जीवन  है  गेय ।
ऐसी  माँ  को  'ठाकुर'  देना , लगता गलत एक शाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग  आठों   याम ।।
                      ०××××××०
व्याख्या--माँ के नाम सारे युगों के समय को अर्पित
             कर दिया जायेगा तो भी माँ के गुणगान
             में कम पड़ जायेगा ।

Saturday, August 22, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- गणेश वंदना

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--रायगढ़
विधा--दोहा छन्द
शीर्षक--'गणेश-वन्दना'
                   ०××××××०
गौरी-सुत  गणराज प्रभु , लम्बोदर    गणनाथ ।
विघ्नहर्ता   -  सुखकर्ता , करो जग को सनाथ ।।
शंकर -  सुवन  वरदाता , हे रिद्धि-सिद्धि कन्त !
प्रथम पूज्य प्रभु दयाला , सोह मुख  एक दन्त ।।
विद्या - बुद्धि   के  दाता , करते  हरण  अज्ञान ।
अन्तर्मन   प्रकाश   भरें , ज्योति  करना प्रदान ।।
अन्धे   को   आँख  देते , करके   दया   अपार ।
निर्धन को धन दिये तुम , कुबेर -  सा  भण्डार ।।
रहित सन्तान  को  दिये , सुता - सपूत  ललाम ।।
अंग  दिये  दिव्यांग  को , स्वामी  करुणा धाम ।।
आज देश का हाल प्रभु , हुआ    खूब   बेहाल ।
त्रस्त किया है  विश्व को , कोरोना   बन  काल ।।
नेता  -  मंत्री  सभी  को , जकड़ रखा है आज ।
त्राहि-त्राहि मचा जग में , सारा  मनुज  समाज ।।
नाथ     देखते  -  देखते , लीला   लाखों जान ।
इस  रोग  से  बचने  का , मिलते  नहीं  निदान ।।
बच्चे -  बूढ़े  किसी  की , करे   नहीं   पहचान ।
नर-नारी-जवान  सहित , सब की  लेता  जान ।।
भारी  संकट  आ   पड़ा , ग्रसित आज  संसार ।
करके  दया  उमा  तनय , करो   इससे   उबार ।।
वरना मानव  जाति  का , हो    जायेगा   अन्त ।
फिर  तेरे  जन्मदिन  का , होगा  बन्द   बसन्त ।।
मनुज बिन  'ठाकुर' तेरी , पूजा   होगी     बन्द ।
कोरोना   का  अन्त  कर , नाथ    आनन्दकन्द ।।
                       ०××××××०
व्याख्या-- रचना में गजानन स्वामी से देश हालत
              एवं कोरोना से बचाने के लिए विनय
              किया गया है ।

Tuesday, August 11, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- कृष्ण

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'श्रीकृष्ण बाललीला'
           ०××××××०
नीलोत्पल सम श्याम सलोना , 
    सुन्दर   नंदलाल  हैं ।
सुरक्त बिंब फल सम लावण्य , 
    ओंट  दोनों  लाल हैं ।।
श्याम   मेघ   जैसी   है  चोटी , 
    फबती काली-काली ।
कृष्ण मेघ  समान  कृष्ण लट , 
    गोपाल  के  बाल  हैं ।।१।।
राधा  रानी   साथ   कृष्ण  के , 
    मन चित्त को मोहती ।
शरदपूर्णिमा  सम  मुखड़ा  है , 
    धवल जगती  वारती ।।
मृग   जैसे   हैं   चंचल    नैना , 
    अलि समान कजरारे ।
एकटक   मीन    जैसे    राधा , 
    कान्हा को  निहारती ।।२।।
वृन्दावन   वन    धेनु    चरावैं , 
    कृष्ण  मुरली बजाते ।
राधे   -   राधे    नाम    पुकारे , 
    कान्हा नित पुकारते ।।
मुरली   धुन   सुन  सारी   गयें , 
    धेनु  समीप  धावतीं ।
कदम्ब   डार  'ठाकुर'  विराजे , 
    श्रीकृष्ण  पुचकारते ।।३।।
           ०×××××०
व्याख्या--पद क्रमांक १ एवं २ में उपमा
              अलंकार है ।

Monday, August 3, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- रक्षाबंधन

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'रक्षाबन्धन'
                    ०×××××××०
पवित्र रिश्ता  होता जग में , भाई-बहन का प्यार ।
रेशम के  दो  ताग में  भरा , प्यार का है  भण्डार ।।
भाईकी  रक्षा की  कामना , करे बहन रखे ध्यान ,
रक्षासूत्र में  नित छुपा रहा , रक्षा की है  पहचान ।
प्यार-स्नेह के  इस धागे में , बन्धा  हुआ  संसार ।।
सबूत है  बहन के प्रेम का , रक्षाबन्धन  का डोर ,
सबको बाँटता भारी खुशी , बिखेरे   चारो  ओर ।
बहना की सुरक्षा की भाई , संकल्प ले  हर  बार ।।
इस पर्व में  भाई-बहन का , उमड़े  प्रेम का भाव ,
एक-दूजे के शुभ सोच का , इसमें निहित वर्ताव ।
रिश्ते की महत्व को ताजा , करता रक्षा  त्यौहार ।।
बहन  भाई की  कलाई में , स्नेह का  बान्धे ताग ,
यह उत्सव दोनों के मन में , बढ़ाता  है  अनुराग ।
रोली-चन्दन की  टीका  दे , खिलाती  मिष्ठाहार ।।
सदियों  से  है  देते  आया , यह  त्यौहार  आनंद ,
पवित्र प्रेम का प्रवाह प्रथा , कभी नहीं हुआ मंद ।
सुरक्षा हित सदैव भाई की , बहना  करे  मनुहार ।।
रक्षासूत्र  पहना के  बहना , जाती खुशी में  खूब ,
भाई भी  राखी  बँधवा के , खुशी  में जाता  डूब ।
हमेशा  रक्षाबन्धन 'ठाकुर', करता   हर्ष   संचार ।।
                     ०××××××०
व्याख्या--प्रस्तुत रचना में रक्षाबन्धन के महत्व एवं
             भाई-बहन के पवित्र प्रेमपर प्रकाश डालने
              यथा सम्भव प्रयास किया गया है ।

Saturday, July 25, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- गाँव

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
शीर्षक--'बलि चढ़गे मोर गाँव'
              ०×××××××०
बिकास के बलि चढ़गे  देखव मोर गाँव ।
नोहर  होगे  बर - पीपर-लीम  के  छाँव ।।
परेवा  के   गुटुर -  गूँ  नइ  सुनावै  गोठ ।
गुड़ेरा अँगना म  कौंआँ  के  काँव-काँव ।।१
मिटगे हरियाली सब  रूख डारिन काट ।
देखव  बड़  भठरंग   हावै  तरिया  घाट ।।
देवरास  ठन के  हे  काट  खाइन  रूख ।
छैंहाँ के  बिना  अब  तरसैं  मरघट-हाट ।।२
गांव  के  बाहिर  लम्बा-चाकर  मइदान ।
गउ चरागन भाँठा ह लुका गइस मितान ।।
गाय-गरुवा के  चारा  तक  डारिन  लूट ।
गाँव - गाँव  म  लुकागे  गोठान - दैहान ।।३
बैला  -  भैंसा  के   गाड़ी  नँदागे  आज ।
औ सियानमन के पैलगी लाज-लिहाज ।।
कोनो ल हे  नइ भावै  सियान के  सीख ।
आज गाँव म  चलथे मनबढ़हा के  राज ।।४
चारो  कोती  के  हरियाली  गइस  भाग ।
पक्की सड़क औ घर उगलत हावैं आग ।।
का कहौं  सँगवारी आगे  कलिजुग घोर ।
बारो महीना गाँव  म  माते  रहिथे फाग ।।५
टूरामन  चूँदी  रखयँ  'स्टाइल' अनलेख ।
साधु ह गिर  परहि  टूरी के  फैसन देख ।।
नँदा  गइस 'ठाकुर' नाचा  पेखन गम्मत ।
बैहा  बनगिन सब 'मोबाईल-टीवी' देख ।।६
              ०×××××××०
व्याख्या--ये कविता म मैं ह गाँव के वरतमान हाल
              ल बताये के परयास करे हवँ ।

Friday, July 24, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- संस्कार

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
शीर्षक--'भरते थे गुरुवर संस्कार'
                        ०×××××××०
वैदिककाल में  देश  अपना , रहा   था  गुणागार ।
आश्रम मेंं  गुरुवर  छात्रों  में , भरते  थे   संस्कार ।।
तब  सारे   देश  में  रहा  था , जैसे स्वर्णिम काल ,
बच्चों को माँ-पिता ज्ञान दी , घरों में  पाँच  साल ।
पालनपोषण  सब  करते थे , देकर  खूब   दुलार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते   थे  संस्कार ।।१
उन्हें सेवार्थ गुरु  चरणों  की , पहुँचाते    बुधवान ,
आचार्यवर  वहाँ  शिष्यों को , देते   थे   सद्ज्ञान ।
भरते   आदर्श  भाव   उनमें , करुणा  नेह अपार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते   थे  संस्कार ।।२
आश्रम समेत  गुरु की  सेवा , करते थे  दिन-रात ,
सिरोधार्य   सदैव   करते  थे , गुरु माता  की बात ।
वर्ष पचीस आयु  तक बच्चे , पढ़ते  गुरु अनुसार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते   थे  संस्कार ।।३
सेवा  भाव  मन   में  जगाते , श्रमपर   देते   जोर ,
सत्य-अहिंसा-दया-क्षमा  से , मन मारता  हिलोर ।
रग-रग  में  भरते  शिष्यों के , सदैव श्रेष्ठ  विचार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते  थे   संस्कार ।।४
लोभ - तृष्णा  से  बचाते  थे , वैभव का  है त्याग ,
ईश्वरमय  विश्व  को   बताये , जीवोंपर   अनुराग ।
शिष्यों का  जीवन  गढ़ते थे , ज्यों  कोई कुम्हार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते  थे   सस्कार ।।५
आज जमाना बदल  गया है , बदले  सोच तमाम ,
विद्यालयों  से  संस्कार  का , मिटा  दिये  हैं नाम ।
जिससे  बढ़ा  दुष्कर्म-हत्या , छाया      भ्रष्टाचार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते  थे   संस्कार ।।६
संस्कार को है  आज मन में , मानें सब  बकवास
तब तो 'ठाकुर' देश में  बढ़ा , नैतिकता का  ह्रास ।
रही  है   शिक्षानीति  हमारी , सह दोषी  सरकार ।।
आश्रम में  गुरुवर  छात्रों  में , भरते  थे   संस्कार ।।७
                           ०×××××××०
व्याख्या--प्राचीन एवम् अर्वाचीन परिवेश में सं

Saturday, July 18, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना:- फिन आ गया हरेली

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'फिन आ गइस हरेली'
                    ०××××××××०
हरियर-हरियर  भुइँया लागै , दुल्हन  नयी   नवेली ।
बरसा  करते  हरियाली  के , फिन आ गइस हरेली ।।
खेती - खार  जमा  बोवागे , डीपा  -  बहरा  डोली ,
करैं किसान  बियासी-रोपा , लेके   नाँगर    जोली ।
झारा  -  घास  करैं  निंदाई , बनिहारिन  अलबेली ।।
बरसा  करते  हरियाली  के , फिन आ गइस हरेली ।।१
उमड़-घुमड़ के बादर बरसे , चारों  मुड़ा  म  पानी ,
राति  बेद पढ़ैं  कस मेचका , बोलयँ   गुरतुर  बानी ।
पानी  म  हे  केंकरा- घोंघी , खेलत   हें  अठखेली ।।
बरसा  करते  हरयाली   के , फिन आ गइस हरेली ।।२
डोली पार म कोकड़ा घला , देखव   ग    मेछरावैं ,
मछरी-कोतरी ल धरधर के , जब  चाहैं  तब  खावैं ।
अमुआ डार  कोयली बोलै , लगै  मीठ  .गुर  भेली ।।
बरसा  करते  हरियाली  के , फिन आ गइस हरेली ।।३
आड़-हथियार  हे  खेती के , किसान मन धो-धाके ,
नाँगर - जूड़ा - कोपर-राँपा , लिपे  ठौर म  मँढ़ाके ।
सिंदूर-पिसान  घोल  छापा , देथें    उँकर   सहेली ।।
बरसा  करते  हरियाली  के , फिन आ गइस हरेली ।।४
हरेली   दाई  ल   हे  चीला , नरिहर   घला  चढ़ावैं ,
गेंड़ी चढ़ के खोल म लैका , देखव   खूब   लड़ावैं ।
गिरैं-परैं फिन  चढ़के  गेंड़ी , करथें   ठेला  -  ठेली ।।
बरसा  करते  हरियाली  के , फिन आ गइस हरेली ।।५
रेंगयँ सारस  कोकड़ा  सहीं , बिदरै   काखर  दाढ़ी ,
कोहनी   काखरो   छोलावै , काखर  फूटय  माड़ी ।
सब तिहार संग 'ठाकुर'कहै , नन्दा   गइस    हरेली ।।
बरसा  करते  हरियाली  के , फिन आ गइस हरेली ।।६
                      ०×××××××०
व्याख्या--हरेली तिहार के मति अनुसार बखान करेके
              परियास करे हँव ।

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...