निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { दोहा छन्द }
विषय--माँ
शीर्षक--माँ ममता की मूर्ति है
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माँ ममता की मूर्ति है , होता शब्द अनूप ।
माँ है सागर स्नेह की , जीवन सेवा रूप ।।१।।
माँ शीतल-सी छाँव है , है मंगल की खान ।
माँ ईश्वरमय शब्द है , जीवनदायक जान ।।२।।
माँ पर्वत है त्याग की , भरा प्रेम का भाव ।
माँ करुणा की धाम है , रहा विनम्र सुभाव ।।३।।
माँ पोषण दे उदर में , रखती भारी ध्यान ।
माँ खानपान को रखे , संयमित सदा मान ।।४।।
माँ नव माह गर्भ धरे , सारे पीड़ा झेल ।
माँ - सा रखना पेट में , नहीं हँसी का खेल ।।५।।
माँ प्राणी को जन्म दे , पीड़ा झेल अपार ।
माँ ही लाये जीव को , दिखलाये संसार ।।६।।
माँ का दुग्ध अमृत रहा , गढ़ता देह सुजान ।
माँ से पायें शक्ति है , देती वह सद्ज्ञान ।।७
माँ करती सन्तान को , जी जान से दुलार ।
माँ है रक्षा कवच - सी , होती पहरेदार ।।८।।
माँ जाती लड़ मौत से , करे नहीं मन भीत ।
माँ जैसे इस विश्व में , नहीं रहे हैं मीत ।।९।।
माँ साजसवाँर करती , लगी रहे दिन-रात ।
माँ का आशीष करता , सुख की है बरसात ।।१०।।
माँ ही होती प्रथम गुृरु , रही ज्ञान दातार ।
माँ का गुण अनलेख है , नभ जैसे विस्तार ।।११।।
माँ का आँचल सुखद है , देता सदैव छाँव ।
माँँ का पद 'ठाकुर' रहा , स्वर्ग देव का ठाँव ।।१२।।
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दि.२१.०५.२१