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Saturday, June 13, 2020

छत्तीसगढ़ के सरगुजा से अर्चना पाठक 'निरंतर' की रचना- विडंबना

रचनाकार- अर्चना पाठक 'निरंतर'
जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़ 
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक-विडंबना
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विडंबना
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नारी ही नारी की दुश्मन,
सास बनी कभी बहू थी। 
तीव्र तीखे व्यंग्य वाणों से,
जार -जार बही लहू थी। 

नारी पचा नहीं पाती सुख,
दूसरी किसी प्यारी का।
आँखों की किरकिरी लगे,
जतन गिराने की तैयारी का। 

पुत्री के लिए कोमल हृदय ,
बन जाता पाषाण पलभर में।
पुत्र वधु की मृदु वाणी भी,
विष लगती हर घर में। 

अपना दुख छुपाये रखी,
वधु कभी सुता न बनी।
भाव हृदय में दबाये रखी,
अव्यक्त रही जतला न सकी। 

गृह युद्ध की महामारी,
है विडंबना अति भारी।
किसी और को क्या कहें, 
नारी ही नारी पर भारी। 

अर्चना पाठक 'निरंतर'
 

Wednesday, June 3, 2020

छत्तीसगढ़ के सरगुजा से अर्चना पाठक 'निरंतर' की रचना- तीसरी आँख

रचनाकार-अर्चना पाठक 'निरंतर'
जिला -सरगुजा,छ.ग.
विधा -मुक्तक
शीर्षक-तीसरी आँख
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तीसरी आँख 
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जब होता हो तेरी इज्जत पर हमला।
 जब रोए यदि  तेरी किस्मत ले बदला।
 भर क्रोध आग और खोल तीसरी आँख,
 भूलकर भी नारी को न समझो अबला ।

अब तक बहुत बजाया मानकर तबला। 
अब तक बहुत सताया जानकर कुचला ।
देखो खुलने लगी है तीसरी आँख,
 तैयार हो जाओ करने मुकाबला।

मुझे अपनी अपार शक्ति दो जरा।
पापियों का तांडव अंत कर खरा।
सौंपो ऐसी तीसरी आँख  मुझे,
कि भर जाये  वो घाव जो है हरा।

 फैसले शीघ्र करा न्याय में नई जान देना।
 हौसलों को बुलंद करके ऊँची शान देना।
 यदि आँख दिखाए दुश्मन कभी दुर्बल जानकर ,
चीर कर रख दूँ ,मुझे भुजाएँ बलवान देना।

जब तुझे भी चील बाज नोंच खाएँगे। 
अब कुचलकर तुझे ये रास्ते जाएँगे। 
तुम पर भिनभिनाएँगी ये मक्खियाँ तब
दुर्गंधित सड़ रहे भ्रूण याद आएँगे। 



अर्चना पाठक "निरंतर"
 अम्बिकापुर

Tuesday, June 2, 2020

छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर से अर्चना पाठक 'निरंतर' की रचना- प्रेम

रचनाकार-अर्चना पाठक 'निरंतर'
अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ 
विषय--प्रेम
शीर्षक-प्रीत की चाह
विधा-गीत
रस - संयोग श्रृंगार रस पर आधारित रचना 

 *प्रीत की चाह* 
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प्रीत की चाह में आज तुमसे मिले। 
तार वीणा के सरगम सुनाने लगे।
भीड़ में खो गई जब सुनहरी महकद
मौके भौरों को अब रिझाने लगे। 
प्रीत.....

सूनी आँगन खिली बहार आ गई ।
तुलसी चौरों पे अब चमक छा गई।
गीत गाने चली है फिर गुलमोहर 
घन मगन हो गगन चमचमाने लगे। 
प्रीत..... 

भावनाओं ने कोमल उर को छुआ।
कल्पना के पंखों पे उड़ता हुआ।
स्वप्न सिंदूरी ले अंगड़ाईयाँ।
द्रुतगति से सब हमको मिलाने चले ।

प्रीत की.....

मन की वीणा झंकृत तरंगें उठी।
लालिमा मुख की तेज उमंगे उठी। 
हौसलों ने दिया है मन को उड़ान
जिसको पाने में हमको जमाने लगे।
प्रीत....

रश्मियों  ने कहा अप्सरा सी लगी ।
पास आते ही धड़कन यूँ बढ़ने लगी ।
थरथराने लगे काँपते ये बदन 
होंठ अचंभित चुप कँपकँपाने लगी ।

प्रीत ...

प्रेम तो श्याम है मैं हुई राधिका।
मन की वीणा झंकृत हुई साधिका।
कोई शर्त नहीं प्रेम में प्राप्ति की ।
खो अस्तित्व तुझ में समाने लगे ।

प्रीत...

अर्चना पाठक निरंतर 
अम्बिकापुर

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...