जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक-विडंबना
****************
विडंबना
-----------
नारी ही नारी की दुश्मन,
सास बनी कभी बहू थी।
तीव्र तीखे व्यंग्य वाणों से,
जार -जार बही लहू थी।
नारी पचा नहीं पाती सुख,
दूसरी किसी प्यारी का।
आँखों की किरकिरी लगे,
जतन गिराने की तैयारी का।
पुत्री के लिए कोमल हृदय ,
बन जाता पाषाण पलभर में।
पुत्र वधु की मृदु वाणी भी,
विष लगती हर घर में।
अपना दुख छुपाये रखी,
वधु कभी सुता न बनी।
भाव हृदय में दबाये रखी,
अव्यक्त रही जतला न सकी।
गृह युद्ध की महामारी,
है विडंबना अति भारी।
किसी और को क्या कहें,
नारी ही नारी पर भारी।
अर्चना पाठक 'निरंतर'