निवास--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--सार छन्द { छत्तीसगढ़ी }
शीर्षक--छेरछेरा
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आगे परब छेरछेरा के , बड़े बिहनिया बेरा ।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।
नान -नान लैका बन संगी , पहुँचेन सब दुवारी ,
साकंभरी ह जनमे हावै , इही दिन म महतारी ।
तेखर खातिर आयेन जमे , कूटे ल छेरछेरा ।।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।१।।
दाई साकंभरी भरे हावै , तुँहरे कोठी ढाबा ,
सुपली-सुपली अन दे देवा , धरके काबा-काबा ।
हरसित होके देवा दाई , दान करे के बेरा ।।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।२।।
जतके दिहा ओतके पाहा , परब दान के भारी ,
दान पुण्य के महिमा भारी , करिहा सब चिंहारी ।
जलदी दे दा देबो जाके , दूसर घर के फेरा ।।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।३।।
रोज-रोज नइ आवन दाई , माँगे तुँहर दुवारी ,
आथन जब एक बछर पूरे , सुनला बिनय हमारी ।
नोहन हमन मँगन जोगी हे , नोहन भाट - सँपेरा ।।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।४।।
छोटे - छोटे मिलके लैका , आये हावन दाई ,
तुँहर दान के बिसा कुरकुरे , खाबो - मुर्रा - लाई ।
झन करव बिलम मोरे माई , होवत हवै अबेरा ।।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।५।।
सुनके लैका मन के बोली , दाई हाँसत आके ,
सुपली-सुपली धान लानके , बाँटे सब लैका के ।
पाइन 'ठाकुर' जभे तभे हे , टोरिन लैका घेरा ।।
करौ दान अन के दाई माँ , कोठी ले झट हेरा ।।६।।
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व्याख्या--छेरछेरा परब का छत्तीसगढ़ी में यथा
सम्भव वर्णन किया गया है ।
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