Thursday, January 28, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- छेरछेरा

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--सार छन्द { छत्तीसगढ़ी }
शीर्षक--छेरछेरा
                    ०××××××०
आगे   परब   छेरछेरा   के , बड़े  बिहनिया बेरा ।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले  झट  हेरा ।।

नान -नान लैका  बन संगी , पहुँचेन सब  दुवारी ,
साकंभरी  ह  जनमे   हावै , इही दिन म महतारी ।
तेखर खातिर  आयेन जमे , कूटे    ल    छेरछेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले  झट  हेरा ।।१।।

दाई  साकंभरी   भरे  हावै , तुँहरे   कोठी   ढाबा ,
सुपली-सुपली अन दे देवा , धरके  काबा-काबा ।
हरसित   होके  देवा   दाई , दान  करे   के   बेरा ।। 
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।२।।

जतके दिहा  ओतके पाहा , परब  दान के  भारी ,
दान पुण्य के महिमा भारी , करिहा सब  चिंहारी ।
जलदी  दे  दा  देबो  जाके , दूसर   घर  के  फेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।३।।

रोज-रोज नइ आवन  दाई , माँगे    तुँहर   दुवारी ,
आथन जब एक बछर पूरे , सुनला बिनय हमारी ।
नोहन हमन मँगन जोगी हे , नोहन  भाट - सँपेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।४।।

छोटे - छोटे  मिलके  लैका , आये   हावन    दाई ,
तुँहर दान के बिसा कुरकुरे , खाबो -  मुर्रा - लाई ।
झन करव बिलम मोरे माई , होवत    हवै  अबेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।५।।

सुनके लैका  मन के बोली , दाई   हाँसत   आके ,
सुपली-सुपली धान लानके , बाँटे  सब  लैका के ।
पाइन 'ठाकुर' जभे  तभे हे , टोरिन   लैका   घेरा ।।
करौ दान अन के  दाई माँ , कोठी  ले   झट  हेरा ।।६।।
                        ०×××××××०
व्याख्या--छेरछेरा परब का छत्तीसगढ़ी में यथा
              सम्भव वर्णन किया गया है ।

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