निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { दोहा छन्द }
शीर्षक--सरो तरुवर
दिनाँक--२६.०२.२१
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होता है तरुवर सरो , शीतल छायादार ।
आनन्द प्रदान करता , रहता यह छतनार ।।१।।
शोभा यह कश्मीर का , लगता बहुत ललाम ।
बनझाऊ कहते इसे , रहा अपर है नाम ।।२।।
सरो बाग में यदि खड़ा , लगाकर चाँद चार ।
भाता भारी हृदय को , नयना सुखी अपार ।।३।।
वृक्ष मध्य रहके सरो , शोभित होता खूब ।
आन वृक्ष की छवि बढ़ा , रहता उसमें डूब ।।४।।
बन जायें हम सरो तरु , पर हितकर स्वीकार ।
सबका कष्ट हरण करो , बन जा सुखदातार ।।५।।
हितैषी बनों वृक्ष - सा , पर का हरना पीर ।
अपना सेवा धर्म कर , सार्थक मनुज शरीर ।।६।।
सीख लें सरो पेड़ से , रखना ऊँचा भाव ।
ऊँचा बन रखना सदा , विनम्र सरल स्वभाव ।।७।।
सरो वृक्ष ऊँचा रहें , किन्तु नहीं अभिमान ।
उससे ज्ञान ग्रहण करें , तज घमण्ड बुधवान ।।८।।
मन का सारा छोड़ दें , गर्वित भाव विचार ।
तरुवर सा मन ठान के , कर लें परोपकार ।।९।।
सीधा-सच्चा सरल बन , करें भलाई काम ।
यदि कोई गिरता उसे , उठा हाथ से थाम ।।१०।।
मन-मन्दिर के बाग को , करना शोभा मान ।
झुको नहीं अन्याय से , रहना सीना तान ।।११।।
कहता 'ठाकुर' तरु सरो , धीरज का है खान ।
आँधी - तूफान सहता , मानो ले मुस्कान ।।१२।।
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व्याख्या--सरो वृक्ष के गुणों को मनुष्य को भी
सीखकर अपने धन्य करना चाहिए ।
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