Friday, February 26, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- सरो

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { दोहा छन्द }
शीर्षक--सरो तरुवर
दिनाँक--२६.०२.२१
                      ०×××××०
होता   है   तरुवर   सरो , शीतल      छायादार ।
आनन्द   प्रदान   करता , रहता   यह  छतनार ।।१।।
शोभा  यह  कश्मीर का , लगता  बहुत ललाम ।
बनझाऊ    कहते    इसे , रहा  अपर  है   नाम ।।२।।
सरो  बाग में यदि  खड़ा , लगाकर   चाँद  चार ।
भाता  भारी   हृदय  को , नयना  सुखी  अपार ।।३।।
वृक्ष   मध्य   रहके  सरो , शोभित  होता   खूब ।
आन वृक्ष की छवि बढ़ा , रहता   उसमें     डूब ।।४।।
बन  जायें हम  सरो तरु , पर हितकर स्वीकार ।
सबका कष्ट  हरण  करो , बन  जा  सुखदातार ।।५।।
हितैषी  बनों   वृक्ष - सा , पर  का   हरना  पीर ।
अपना  सेवा   धर्म  कर , सार्थक  मनुज शरीर ।।६।।
सीख  लें  सरो   पेड़  से , रखना   ऊँचा   भाव ।
ऊँचा  बन  रखना  सदा , विनम्र सरल स्वभाव ।।७।।
सरो   वृक्ष   ऊँचा    रहें , किन्तु नहीं अभिमान ।
उससे  ज्ञान  ग्रहण  करें , तज घमण्ड बुधवान ।।८।।
मन  का  सारा  छोड़  दें , गर्वित  भाव  विचार ।
तरुवर  सा  मन ठान के , कर    लें  परोपकार ।।९।।
सीधा-सच्चा  सरल बन , करें   भलाई    काम ।
यदि  कोई   गिरता उसे , उठा   हाथ  से  थाम ।।१०।।
मन-मन्दिर के  बाग को , करना   शोभा  मान ।
झुको  नहीं  अन्याय  से , रहना    सीना   तान ।।११।।
कहता 'ठाकुर' तरु सरो , धीरज  का  है  खान ।
आँधी -  तूफान  सहता , मानो   ले    मुस्कान ।।१२।।
                       ०××××××०
व्याख्या--सरो वृक्ष के गुणों को मनुष्य को भी
              सीखकर अपने धन्य करना चाहिए ।

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