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Thursday, July 30, 2020

सूरजपुर से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- ज्ञान

रचनाकार:- डॉ ओमकार साहू "सर्द" 
प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
विधा :- कुकुभ छंद 16/14, पदांत 222
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         *ज्ञान की महिमा*
  

*गहन तिमिर है जड़ मानव में, चेतन दीप जलाओ री।*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री।।*

ज्ञान सदा ही पूजनीय है, जो सद्कर्म सिखाती है।
सज्जन-दुर्जन भेद कराये, परहित मर्म सिखाती है।
लिंग भेद की गर्त मिटाकर, मानुष चर्म दिखाती है।
बड़े बुजुर्ग का मान बढ़ाये, बोली नर्म बनाती है।।

*ज्ञानी कबीर सा भवसागर से, नैय्या पार लगादो री....*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री।।*

ज्ञान सदा अस्तेय पदारथ, नहीं चोर अपनायेगा।
खरचै बुद्धि अंश जो कोई, नित-नित बढ़ता जायेगा।
शिक्षा धन ना जाये अकारथ,कष्ट-गरल हर जायेगा।
ज्ञान चक्षु संधान करें यही, क्लिष्ट-सरल कर जायेगा।

*कठिन डगर है ज्ञानी मिलकर, दीपक ज्ञान बढ़ाओ री....*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री।।*

बुद्ध-विवेका-महावीर सम, ज्ञानी संत समाज मिले।
मीरा-सूर ने भक्ति गायी, तानसेन का साज मिले।
ज्ञान कुंड की तपोभूमि से, कुंदन राम सुराज मिले।
सरस्वती की कृपादृष्टि से, मधुर कंठ आवाज मिले।

*दूजा पुण्य नहीं है ऐसा, शिक्षा दान कराओ री...*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री..! 

Thursday, June 18, 2020

सूरजपुर से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- प्रेम

डॉ ओमकार साहू "सर्द"
प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
शीर्षक :- आओ प्रेम करें
विधा   :- छंद मुक्त
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नहीं कोई भेद करें, आओ प्रेम करें।

1. सुशील नारी संग उपेक्षित गणिकाओं से
   जीवंत प्रतिपल क्षणिकाओं से।
   एकलव्य की बहुमुखी प्रतिभाओं से,
   और मुखरित मणिकार्णिकाओं से.....
   नहीं कोई भेद करें, आओं प्रेम करें।....

2. आओ प्रेम करें हम देश से,
    सामान्य सहित व्यक्तिविशेष से।
    बैरियों के मनः राग द्वेष से,
    और आलोचननाओं के ठेस से ......
    नहीं कोई भेद करें, आओं प्रेम करें....

3. आओं प्रेम करें वीर बलिदान से,
     चाँद पर चलते अनुसंधान से।
     मज़दूर खेतिहर किसान से,
     और अतुल्य हिंदुस्तान से ....
     नहीं कोई भेद करें, आओं प्रेम करें....

4.  प्रेम की मौन अभव्यक्ति से,
     नारी के अतुल्य सहनशक्ति से।
     मीरा की अनन्य भक्ति से,
     और अनुसुइया की अनुरक्ति से .....
     नहीं कोई भेद करें, आओं प्रेम करें ....

5.  आओ प्रेम करें  कवियों के शुद्ध विचारों से
      संगम में गिरती धारों से।
      प्रेम अनुरागी यमुना के किनारों से,
     और चौरासी लाख जीव प्रकारों से ......
     नहीं कोई भेद करें, आओं प्रेम करें.....
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       डॉ ओमकार साहू "सर्द"
     प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
          

Saturday, June 13, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- बारिश

रचनाकार :- डॉ ओमकार साहू "सर्द"
विषय :- बारिश
विधा  :- मुक्तक
1222  1222 1222 1222
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1.
चली आयी जहाँ पावस, लगी वसुधा वहाँ गाने,
बड़ी बारिश लुभावन है,लताएँ चल पड़ी छाने।
मयूरी देख के बादल, अमन से नृत्य करती है,
गरज कर ताल देते हैं, बरसते मेघ के गाने।।

2.
कभी बादल गरजते हैं, धरा से नेह जतलाने,
कभी धरती तड़पती है, गगन को नेह समझाने।
चटख आयी धरा की गोद से, नवकोपले देखो,
चली आरोहणी बनकर, बिछोही प्रेम को पाने।।

3.
चली अब मेघ की बूँदें, नदी के नेह को पाने,
नदी के नेह को पाकर, चली सागर समा जाने।
नियम धरती बनाती है, इसे ना छेड़ना प्यारों,
नहीं बारिश मिलेगी ना, कभी बादल न पैमाने।।

व्याख्या :- पावस ऋतु का महत्व और बखान।

  डॉ ओमकार साहू "सर्द"
 प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0

Friday, June 12, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- कर्मज्ञान

रचनाकार :- डॉ ओमकार साहू "सर्द"
निवास :- प्रेमनगर, सूरजपुर,छ0ग0
विधा   :- सायली छंद
शीर्षक :- कर्मज्ञान
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            हे 
       पार्थ सुनों,
कर्मभूमि की कहानी
        लागै हरि,
         बखानि।

        स्वप्न,
      ना बुनों,
रणभूमि में जवानी,
      माँग रही,
     बलिदानी।

          उठो,
       कर्म चुनों,
धर्मभूमि की कहानी,
      केवल कर्म,
         निशानी।

         जागो,
    वीर धनंजय,
जन्मभूमि में  गांडीव,
       जाती रहे,
        पहचानी।

     बृहन्नला,
  फूँफकार भरो,
रणभूमि में चाहे,
      पड़े शव,
      बिछानी।

व्याख्या :- मोह बंधन में बंधकर जब मानव धर्मपथ से विमुख होता है, तब-तब कर्मज्ञान ही 
सद्मार्ग प्रशस्त करती है।

Thursday, June 11, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- प्रकृति

रचनाकार:- डॉ ओमकार साहू"सर्द"
प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
विधा :- छंद मुक्त
शीर्षक :- प्रकृति की पुकार
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*है प्रलयंकारी मार सुनों,
*अब दसों दिशा चीत्कार सुनों
*हाँ वसुधा ने अंगड़ाई भरी
*प्रकृति की ये टंकार सुनों.....

1.  धरा शेषफन डोल रही,
     विध्वंसक भाषा बोल रही।
     *कोरोना का कहर टूटा ही नहीं
     *अम्फान की  फूँफकार सुनो ..... है प्रलयंकारी

2.  जब वायु वेग प्रचंड हुआ,
      मानो धरणी को दंड हुआ।
      *जब वसुंधरा संतुलित नहीं,
      *किसी ओर नवेगा भार सुनो.... है प्रलयंकारी

3.  जब मेघों का आवेश बढ़ा,
     कलपुर्जों का समावेश बढ़ा।
     *श्रमिकों को बेरोज़गार किया,
     *क्या लगी श्रमिकों की हाय सुनो....*है प्रलयंकारी

4.  ना पारिस्थितिक तंत्र रहा,
      ना जीवन कोई स्वतंत्र रहा।
     *अंकुर जिसका आहार नियत
     *कहता खुद को मांसाहार सुनो....*है प्रलयंंकारी

5.  जलमग्न धरा किस हाल में है,
     अब धरा मौत के गाल में है।
     *जागो मानस के राजहंस
     *धरती की करुण पुकार सुनो.... है प्रलयंकारी

व्याख्या :- वर्तमान परिदृश्य में  जनमानस के द्वारा धरती और वातावरण का जो दोहन हो रहा है, कहीं कहीं ना कहीं मौन संदेश है हमारी सजगता बढ़ाने के लिए, प्रकृति को बचाने के लिए।

 डॉ ओमकार साहू  "सर्द"  
 प्रेमनगरसूरजपुर,छ0ग0

Monday, June 8, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- हाइकु

रचनाकार:- डॉ ओमकार साहू "सर्द"
निवास:- प्रेमनगर, सूरजपुर
विधा  :- हाइकु
विषय :- छत्तीसगढ़
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छत्तीसगढ़,
सुघ्घर अड़बड़,
का गोठियांव।

खनिज धर,
डोंगरी हरियर,
का गोठियांव।

बदरा पानी,
उन्हारी के किसानी,
का गोठियांव।

धान कटोरा,
तिज़ा अउ पोरा,
का गोठियांव।

दफड़ा बाजै,
रऊत जब नाचै,
का गोठियांव।

लागै चौपाल,
बांधे ठेका-त्रिताल,
का गोठियांव।

माटी मटासी, 
वो गम्मत के हांसी,
का गोठियांव।

बहुँटा साँटी,
चटनी मा बासी,
का गोठियांव।।

 डॉ ओमकार साहू "सर्द"
प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
       

Thursday, June 4, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- वीरता

रचनाकार:- डॉ ओमकार साहू "सर्द"
निवास :- प्रेमनगर, सूरजपुर
विषय  :- वीरता का सम्मान
विधा   :- काव्य
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आज युद्ध हुआ क्रुद्ध, धरती माँ का लाल बुद्ध,
सपूतों का ऐसे ही निर्वाण होना चाहिए।

सर्जिकल के शिकार, हो गये जो तार-तार,
प्रहार था तो इसका भी प्रमाण होना चाहिए।

बार-बार का संहार, भारती कहे पुकार,
तीक्ष्ण धार अबकी बार पार होना चाहिए।

रक्त का उबाल कहे, बेटियों का भाल कहे,
बेटी गर लक्ष्मी है, ख़याल होना चाहिए।

लाल को निहाल करो, सीमा देखभाल करो,
काटा सर कौसे ये, सवाल होना चाहिए?

सर्जिकल बदला था, सोचा हुआ हमला था,
रणबांकुरों का तो सम्मान होना चाहिए।

शीश देके जो जवान, कर रहे बलिदान,
शीश गिन नेताओं को ध्यान होना चाहिए।

खोज रहे थे प्रमाण, चंद चार बदजुबान,
बदज़ुबानी की ये गाथा, सरेआम होना चाहिए।

कुर्सियों में बैठे रहे, भ्रस्ट पैसे ऐंठे रहे,
इनका हश्र ठीक, आशाराम होना चाहिए।....

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व्याख्या :- वर्तमान परिदृश्य में वीरता का उपहास करने वालों का
परिणाम और वीरता को सम्मान यही कवि अभिलाषा है।
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    डॉ ओमकार साहू "सर्द"
  प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0,      
        

Wednesday, June 3, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- अहंकार की गति

रचनाकार :- डॉ ओमकार साहू "सर्द"
निवास     :- प्रेमनगर, सूरजपुर,छ 0ग0
शीर्षक     :- *अहंकार की गति
विधा       :-  गीत 



*मानुष नश्वर तन पाया है, धर गीता का ज्ञान,
*रे पगले$$$ मत कर तू अभिमान।

अभिमान मन  घर कर जाता,
अतिविश्वास बुद्धि हर जाता।
*अहंकार के प्रेमफाँस में (2)
*निश्चय अवनति जान रे पगले $$$...

रावण ज्ञान ब्रम्हांड बढ़ा तब,
समग्र कुल अभिमान चढ़ा तब।
*एक-एक आनन भूमि गिरते (2)
*अमृत ना बचायें प्राण रे पगले $$$...

कितने शासक मद में डूबे,
भारतवर्ष को लुटे-ख़सूटे।
*प्राण तज़ा अभिमानी सिकंदर (2)
*पाकर आत्मज्ञान रे पगले $$$...

असुरों का तप जग में बड़ा था,
अहंकार तब वर से बड़ा था।
*देव मनुज़ संग तांडव करते(2)
*खींच नोंच ले जान रे पगले $$$...

माटी का तन माटी होगा,
अटल सत्य परिपाटी होगा।
*तेरा मेरा नश्वर काया (2)
*ज्ञान का कर संधान रे पगले $$$...





व्याख्या :- अहंकार कि दुर्गति सदैव विनाश के मुहाने जाकर ही थमती है। चल और अचल संपदा ही अभिमान मुख्य कारक हैं जो निमित्त मात्र भौतिक सुख के साधन हैं। नश्वर प्राणियों  के ज्ञान को स्मरण में और अहंकारियों को इतिहास में उदाहरण के स्थान मिलता है।

#काव्य संसद

Tuesday, June 2, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर से डॉ ओमकार साहू "सर्द" की रचना- प्रेम

रचनाकार - डॉ ओमकार साहू "सर्द"
प्रेमनगर,जिला - सूरजपुर, छ0ग0
विषय :- प्रेम
विधा :- काव्य 
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*गणिका का किया उद्धार, कहीं जूठे बेरों से प्यार,*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
*तोड़ी छुआछुत दीवार, पहुँचे स्वयं भीलनी द्वार,*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*

यहाँ सब स्वार्थ के धंधे हैं,
यहाँ सब धरम में चंदे हैं,
यहाँ रिश्तों के फँदें है,
*केंवट प्रीति अपार, कहे जो गुहा को सरकार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*

सती अनुसुइया शक्ति को,
कभी मीरा की भक्ति को,
कभी राधा अनुरक्ति को।
*नमन है उनको बारम्बार, हलाहल कर दिया जो रसधार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*

शक्ति कभी जननी होती है,
शक्ति कभी भगिनी होती है,
शक्ति कभी पत्नी होती है।
*लुटाए ममता और दुलार, नारी ही शक्ति का अवतार...*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*

वतन में जान लुटाते हैं
देश का मान बढ़ाते हैं,
भाल भूमि में नवाते हैं।
*हंसकर झूल गये रखवार, दिया है आज़ादी उपहार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*

प्रेम भावों का भूखा है,
निहित सद्ज्ञान अनूठा है,
अमर तृष्णा का बूटा है।
*समझों प्रेम जगत आधार, कहे है "सर्द" साहू ओमकार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*

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         #काव्यसंसद#
व्याख्या :- प्रेम भावनाओं का वह सेतु है जो किसी भी जातिविशेष, धर्म और बंधन से परे है। देश से हो तो देशप्रेम, रिश्तों में हो तो मोह, भक्त को हो तो भक्ति और सती का ही तो शक्ति, जाने कितने रूपों में विद्यमान है जगत में।

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...