प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
विधा :- कुकुभ छंद 16/14, पदांत 222
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*ज्ञान की महिमा*
*गहन तिमिर है जड़ मानव में, चेतन दीप जलाओ री।*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री।।*
ज्ञान सदा ही पूजनीय है, जो सद्कर्म सिखाती है।
सज्जन-दुर्जन भेद कराये, परहित मर्म सिखाती है।
लिंग भेद की गर्त मिटाकर, मानुष चर्म दिखाती है।
बड़े बुजुर्ग का मान बढ़ाये, बोली नर्म बनाती है।।
*ज्ञानी कबीर सा भवसागर से, नैय्या पार लगादो री....*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री।।*
ज्ञान सदा अस्तेय पदारथ, नहीं चोर अपनायेगा।
खरचै बुद्धि अंश जो कोई, नित-नित बढ़ता जायेगा।
शिक्षा धन ना जाये अकारथ,कष्ट-गरल हर जायेगा।
ज्ञान चक्षु संधान करें यही, क्लिष्ट-सरल कर जायेगा।
*कठिन डगर है ज्ञानी मिलकर, दीपक ज्ञान बढ़ाओ री....*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री।।*
बुद्ध-विवेका-महावीर सम, ज्ञानी संत समाज मिले।
मीरा-सूर ने भक्ति गायी, तानसेन का साज मिले।
ज्ञान कुंड की तपोभूमि से, कुंदन राम सुराज मिले।
सरस्वती की कृपादृष्टि से, मधुर कंठ आवाज मिले।
*दूजा पुण्य नहीं है ऐसा, शिक्षा दान कराओ री...*
*वस्तु अमोलक ज्ञान पदारथ, शिक्षा अलख जगाओ री..!