नाम - माधवी गणवीर
राजनादगांव
विषय - *अलख हरी की माया कही धूप तो कहीं छाया*
अलख हरि की माया कहीं धूप कहीं छाया,
आज वैभव आया तो अपना पराया सब है भाया।
कल हम लाचार थे अपनों के ही प्यासे थे,
तरस रहे थे प्यार को, पिता ने छोड़ा जब छाए छाया।
नहीं था कोई ठोर ठिकाना,तब दिया मौसी ने सहारा,
अभाव और तंगी ने वक्त की कीमत समझाया।
मेहनत का मोल पाया, जिंदगी ने साथ निभाया,
सुख, संपत्ति,समृद्धि अपार पाया।
आज वक्त के फेर ने कैसा भरमाया,
जिनके लिए कभी तरसते थे उन्होंने बढ़कर गले लगाया।
प्रभु की है यही माया, क्या क्या दिन दिखाया,
अपना पराया सब होता है,जब सुख सम्पदा आया।
अलख हरि की माया कहीं धूप कहीं छाया
आज वैभव है आया तो अपना पराया सब है भाया।
माधवी गणवीर
राजनादगांव
