जिला: रायगढ़
रचनाकारः आनंद कुमार त्रिवेदी
शीर्षकः "दिहाड़ी मजदूर"
विधाः छंदमुक्त कविता
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दो पग से निज नाप लिया,
जिसने है भारत सारा।
वह गरीब नारायण आखिरकार,
कोरोना से है हारा।।
नित नये कुएँ खोद,
खुद का प्यास बुझाता है।
रोज कमाओ तो पाओ,
मधुर गीत वह गाता है।।
"बुभुक्षितं किं न करोति पापं",
संतों ने है बखानी।
इसका अर्थ पलट दिया,
धीरज से श्रमदानी।।
न गिले न शिकायत,
न किया पत्थरबाजी।
भूखे रहकर चलता गया,
खाने अपने घर का भाजी।।
छोड़ महलों का छप्पन भोग,
घर को हुआ उन्मुख।
पहुँचते-पहुँचते लूट लिया,
अब कोरोना उसका सुख।।
सो गई माँ चिरनिद्रा में,
मासूम अपने छोड़कर।
सुनती नहीं नाद आर्त अब,
सो रही मुख मोड़कर।।
हे!विधाता दूसरों की करनी,
क्यों पड़ रही है भरनी।
दूसरों की करतूतें हैं,
जिनसे रो रही है धरनी।।
निर्दोष पूरे हैं ये बेचारे,
अब तो तनिक तरस खाओ।
झेल चुके हैं दुखों का पहाड़,
और कहर न बरपाओ।।
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व्याख्या- देहाड़ी मजदूरों की वर्तमान स्थिति का बखान कविता में किया गया है।उनके धीरज और मेहनतकश गुणों के साथ हर आफत का असर उन्हीं पर अधिक पड़ता है ,इस बात को इंगित किया गया है।
आनंद कुमार त्रिवेदी"आनंद"