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Saturday, May 30, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- दिहाड़ी

जिला:   रायगढ़
रचनाकारः आनंद कुमार त्रिवेदी
शीर्षकः "दिहाड़ी मजदूर"
विधाः छंदमुक्त कविता
......   ......   ..........

दो पग से निज नाप लिया,
           जिसने है भारत सारा।
वह गरीब नारायण आखिरकार,
                 कोरोना से है हारा।।

नित नये कुएँ खोद,
         खुद का प्यास बुझाता है।
रोज कमाओ तो पाओ,
          मधुर गीत वह गाता है।।

"बुभुक्षितं किं न करोति पापं",
             संतों ने है बखानी।
इसका अर्थ पलट दिया,
          धीरज से श्रमदानी।।

न गिले न शिकायत,
          न किया पत्थरबाजी।
भूखे रहकर चलता गया,
        खाने अपने घर का भाजी।।

छोड़ महलों का छप्पन भोग,
           घर को हुआ उन्मुख।
पहुँचते-पहुँचते लूट लिया,
         अब कोरोना उसका सुख।।

सो गई माँ चिरनिद्रा में,
           मासूम अपने छोड़कर।
सुनती नहीं नाद आर्त अब,
          सो रही मुख मोड़कर।।

हे!विधाता दूसरों की करनी,
         क्यों पड़ रही है भरनी।
दूसरों की करतूतें हैं,
          जिनसे रो रही है धरनी।।

निर्दोष पूरे हैं ये बेचारे,
       अब तो तनिक तरस खाओ।
झेल चुके हैं दुखों का पहाड़,
          और कहर न बरपाओ।।

.....      .........     ...........

व्याख्या- देहाड़ी मजदूरों की वर्तमान स्थिति का बखान कविता में किया गया है।उनके धीरज और मेहनतकश गुणों के साथ हर आफत का असर उन्हीं पर अधिक पड़ता है ,इस बात को इंगित किया गया है।

              आनंद कुमार त्रिवेदी"आनंद"

Thursday, May 28, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- जीवन


रचनाकारः आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः रायगढ़
शीर्षकः  "जीवन "
विधाः छंद मुक्त 
.....   .....    .....    .......

अपना-अपना नजरिया है,
अपनी-अपनी परिभाषाएँ।
जीवन तो कागज है कोरा,
जो जैसे चाहें  लिख जाएँ।।

मीरा के लिए प्रेम ही जीवन,
तो राणा के लिए संघर्ष।
भीष्म के लिए प्रतिज्ञा है,
रावण के लिए अहं उत्कर्ष।।

कुण्डलिनी जागृति योगी का जीवन,
गोपियों के लिए कृष्ण मिलन।
कामी के लिए वासना तृप्ति ,
भोगी के लिए है संग्रहन।।

कोई दुख संताप जनाए,
कोई सेवा ही जीवन बतलाए।
कोई परहित जीवन बिताए,
तो मोक्ष प्राप्ति कोई समझाए।।

.....   .......    .......   ........

व्याख्या ः   जीवन एक जटिल और रहस्यमयी विषय है जिसको लोग अपने अपने दृष्टिकोण के मुताबिक परिभाषित करते हैं और तद्नुरूप ही जीते हैं।
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरति देखहिं तिन तैसी।
   प्रस्तुत पद्य में यही संदेश दिया गया है।

आनंद कुमार त्रिवेदी

Wednesday, May 27, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- वट सावित्री


रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः-रायगढ़
विषयः  पर्यावरण
शीर्षकः.. "वट सावित्री"
विधाः   छंद मुक्त
......   ......   ......   ...।.।...।

सुहागिनों को करते वट की पूजा,
       देख बच्चे ने किया सवाल।मम्मा क्यों पूजती हो तुम पेड़ों  को,
    झुलते वट के एक छोटे डाल।।

मगन थीं वे निज आराधन में,
   इसलिए कुछ न दिया जवाब।
मैंने भाँप बच्चे की जिज्ञासा,
   कहा तनिक इधर आओ जनाब।।

पर्यावरण पारिस्थितिक तंत्र का,
  उसको फिर खूब पाठ पढ़ाया।
उत्पादक पेड़ों की महत्ता और
  उपभोक्ता हैं जीव समझाया।।

सबके सब एक दूजे पर निर्भर,
     खाद्य श्रृंखला बनाते हैं।
जल वायु मृदादि जुड़कर इसमें,
     पर्यावरण कहलाते हैं ।।

पूर्वजों ने समझा था इसको,   इसीलिए पूजन कर देते सम्मान।
पर्यावरण के हर घटक का,
  बड़ा महत्व है यह ले जान।।

.....   .....   .......   ......

व्याख्या ः।  पर्यावरण अंतर्गत पारिस्थितिकी ,खाद्य श्रृंखला और हर जीव जंतु के एक दूसरे पर निर्भरता को प्रस्तुत पद्य में समाविष्ट किया गया है।
    जिसकी महत्ता को स्वीकारते हुए पेड़ों व जीवों का पूजन हमारी परंपराओं में शामिल किया गया।

आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद"

Tuesday, May 26, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- रति

रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः-रायगढ़
विषयः- रति स्थायी भाव आधारित आनुप्रासिक कविता
शीर्षक ः-  "रति "
विधाः- छंद मुक्त कविता

......    ........   ...........   

रति ने रतिभाव रचाकर के,
  काम से हर काम करा ही लिया।
रतिभाव रमे रमणी तन में,
रच व्यूह रितुराज जगा ही दिया।।

धर कैकसी रुप रति ने मुनिश्रेष्ठ,
विश्रवा कामातुर बना ही लिया।
मेनका नयनों की कटाक्ष से तप,
विश्वामित्र का भंग करा ही दिया।।

उपकार से सृष्टि सृजन रति के,
प्रेम  सनेह  श्रृंगार  धरा  पर।
लाती रुप वासनामय विकृति,
रह जाती न ये अविकारी बराबर।

रमे रति-काम रवा मन में,
हर जीव जगत हर कन-कन में।
रस रुप रमे श्रृंगार रतन,
रजनीश रमे ज्यों तारा गन में।।

......   .....।।..   .................

व्याख्या ः-  प्रस्तुत कविता में श्रृंगार रस के स्थायी भाव  रति  को आधार मानकर ।रति और काम की हर प्राणी में उपस्थिति और उनका सृष्टि सृजन में महत्ता को बताया गया है जबकि रति का दूसरा रुप विकृति उत्पन्न करता है।
 साहित्य में श्रृंगार रस सबका राजा बतलाया गया है।पौराणिक गाथाओं को उदाहरणार्थ समाविष्ट किया गया है।
आदि और अंत में कविता  आनुप्रासिक बनाने का प्रयास है।

आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद "

Saturday, May 23, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना

रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी 
जिलाः-रायगढ़
शीर्षक ः- "भयाक्रान्त "
विधाः- छंदमुक्त

......   ......   ............

भयाक्रांत सारा जग ,
      कोरोना महामारी से,
जैसे कंस डरा हुआ,
     किशन कन्हैया से।

उठते बैठते सोते,
     जागते हर बखत,
भय एक व्यापे है,
      अदृश्य बर्रैया से।।

कब कहाँ किसको है,
    मार देगा निज डंक,
आते मन खयाल ही,
    देह सिहरता है ।

हर एक आगंतुक ,
     शक के निगाह में है,
इंसान-इंसान को है,
     देख के डरता है ।।

बार-बार हाथ पैर,
    साबुन से है धो रहा,
पता नहीं विषाणु ये,
     बाट कहाँ जोहता।

खौफ का मंजर ऐसा,
    दरो और दीवारों पे,
लिये हाथ निज लेंस,
    दुश्मन को खोजता ।।

डर है जरुरी आज,
    रखना है सावधानी,
घर से निकलते ही,
    खो न जाए जिंदगानी।

भय बिन न हो प्रीत,
   कहते दास तुलसी,
इसीलिये डरो प्यारे !
   करो न मनमानी ।।

......    .........    .........

व्याख्या ---विश्वव्यापी कोरोना महामारी से यद्यपि डरने की जरुरत नहीं सावधानी पूर्वक लड़ने की जरुरत है।तथापि यह सत्य है कि पूरे विश्व में इसका खौफ हर व्यक्ति के मन में समाया है।एक पहलु से यह आवश्यक भी है क्योंकि भय न होने से हम लापरवाह हो जाते हैं और नियमों को ताक में रख देते हैं।उक्त कविता में यही बात कही गयी है।

आनंद कुमार त्रिवेदी"आनंद"

Friday, May 22, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- विरासत


रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः- रायगढ़, छ.ग.
शीर्षक ः- "साझा विरासत"
विधाः- छंद मुक्त
......    ......      ......  .....  

आज सुबह जब मैं,
बाड़ी में घासों की,
उखाड़ रहा था जड़ें।

  एक उखाड़ता दिखता दूसरा,
   दूसरा उखाड़ता तीसरा ,
   जितना उखाड़ता दिखता और गड़े।

परेशान हुआ उखाड़-उखाड़,
मिट्टी ही खतम होने लगीं,
जड़ें उखड़ने से रहीं।

फिर शांत भाव विचार किया,
मृदा के संबंध में बच्चों को,
कक्षा में जो बातें मैंने कहीं।।

ये तो मृदा के अवयव हैं,
घास-फूस ,पादप जड़,
जिनसे है इसका अस्तित्व।

जब यही सब उखाड़ दूँ तो,
बच जाएगा केवल कंकड़,
जैसे थार राजा का व्यक्तित्व।।

कुछ लोग आज दिखते हैं,
बस यही काम करते हुए,
बैठे इंडिया वाटिका में।

कौन आर्य कौन द्रविड़,
कौन हिंदू कौन मुसलमान,
अभिनय करते संस्कृति नाटिका में।।

कवि जन कहते शब्द ये,
उर्दू का है परहेज़ करो,
मिट जाएगी हिन्दी।

जबकि उनके ही माथे पे,
चमक रहे होते हैं,
उर्दू अरबी की बिंदी।।

आनुवांशिकी जाँच कर,
दिखाओ हर भारतीय  का,
क्या है वह आज विशुद्ध  ?

वक्त के प्रवाह में बहकर,
सभी जन हैं आज के,
केवल हिंदुस्तानी हे!प्रबुद्ध।।

.......     ........     ............

व्याख्या ः-  हमारी सांस्कृतिक विरासत सनातन है।वक्त के प्रवाह के साथ स्वयमेव वर्तमान स्वरुप धारण किये हुए है।इसमें आर्य 
द्रविड़ ,मूल निवासी एवं न जाने कितने संस्कृति और परंपराएँ समन्वित हैं ।
      आज कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी निहित स्वार्थवश जड़ों को कुरेदने में लगे हैं जिससे सामाजिक वैमनस्यता का बीजारोपण हो रहा है।
    रचनाकार का सोच यह है कि आज हमें अपने इस महान विरासत को लेकर ही भविष्य में प्रवेश करना चाहिए।रुढ़िवादिता को तज कर और यथार्थ को साथ लेकर ताकि एक नये और सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो।

     आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद "

Thursday, May 21, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचन्- अद्भूत बलिदान

रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः-रायगढ़, छत्तीसगढ़
शीर्षक ः- "अद्भुत बलिदान"
विधाः- छंदमुक्त कविता

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उत्तर-पूर्व भारत,
 का मोर्चा था भयानक,
  आजाद हिंद फौज के,
    सामने अंग्रेज थे।
         स्वाधीनता संग्राम का,
           अनोखा एक जंग था,
            फौज में थी बहादुरी,
              दुश्मन निस्तेज थे।।

शूरमा आजादी के वे,
  दाँत खट्टे कर गये,
   ब्रिटिशों की हार लगी,
    अब हुई निश्चित।
            एकाएक आ पहुँचा,
             टैंको की बटालियन,
              माथे पर सैनिकों के,
               शिकन थे किंचित।।

किंतु नहीं हार मान,
  डटे रहे मोर्चे पर,
   जीती हुई बाजी अब,
    हाथों से था जा रहा।
        अकस्मात चमत्कार,
           हुई अविस्मरणीय,
            उड़ता गया टैंक था,
              सामने जो आ रहा।।

आसमाँ में बिखरते,
  परखच्चे उड़-उड़,
   एक-एक कर देख,
    विस्मित हुए सब।
        अंगरेजी अफसर,
          भी बड़े चकित अब,
            देखकर हटा लिए,
              सैनिक निज तब।।

जयहिंद!जयहिंद!
 गगनभेदी नारों की,
  रणक्षेत्र आसमान,
   सुगंधों से भरा था।
        देख शौर्य पराक्रम,
         आजाद हिंद वीरों की,
           डोला दिल्ली सिंहासन,
            फिरंगी भी डरा था।।

हकीकत अचंभे का,
  पता जब किया गया,
    पिघल गया दिल भी,
     सबका ही जान के।
        नन्हें-नन्हें बालक थे,
         देशभक्ति सराबोर,
    .     नहीं परवाह कर,
            अपने तो जान के।।

पीठ पर बाँधकर,
 बड़े-बड़े बम को वे,
  चढ़ गये थे पेड़ों में,
    वीर हिंदुस्तान के।

        जब-जब बढ़ता था,
          टैक हिंद सेना ओर,
           कूद कर उड़ा देते,
             वे ईंगलिश्तान के।।

बलिदान अद्भुत ए,
 अवाक रहा जानकर,
   हर एक जन सीना,
    फूला आन बान से।
         भारत के सपूतों को,
           नेताजी दिये आकर,
             श्रद्धाँजलि अश्रुपूर्ण,
               वीर जो महान थे।।
......    .......   .......   ........

व्याख्या ः--स्वाधीनता की बलिवेदी पर अपने जीवन को कुर्बान करने वाले वीर शहीदों को याद कर नई पीढ़ी को उनके बलिदानों की गाथा सुनाना और देशभक्ति की प्रेरणा देना हम सबका परम् कर्तव्य है।कलम का धर्म भी यही है।
राष्ट्र प्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत भारत के वीर बालकों की बलिदानों को ,जो वे आजाद हिंद फौज के साथ अंग्रेजों से युद्ध करते समय दिये थे ,एक सच्ची श्रद्धाँजलि है।
   इस युद्ध में एक अप्रत्याशित घटना घटी थी जिसे किसे ने नहीं सोचा था और उस घटना ने युद्ध की दशा और दिशा बदल दी थी।

आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद"

Wednesday, May 20, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- हँसगुल्ले


रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः-रायगढ़
विषयः- स्थायी भाव हास्य आधारित रचना।
शीर्षक ः- "हँसगुल्ले "
विधाः- छंद मुक्त कविता

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बड़ा महत्व है,
    मिष्ठान्न में रसगुल्ले का।
और बड़ा महत्व है,
    जिंदगी में हँसगुल्ले का।।

गर जिंदगी में हँसगुल्ले न हो,
  तो जीवन हो जाता रेगिस्तान।
हँसी खुशी रौनकता दफन हो,
  बन जाता जीवन कब्रिस्तान।।

मुस्कुराना ही जीवन है प्यारे!
    इसी से है आबाद जहान।
हँसाना बहुत कठिन लोगों को,
    रुलाना तो है बड़ा आसान।।

एक वाकया सुनाता आपको,
   आए हँसी तो हँस लेना।
आभार की है नहीं जरुरत,
  दूसरों को बाँट बस देना ।।

मित्र सो रहे थे गहरी नींद में,
   अपने इकलौते पिता के साथ।
हँसगुल्ले सपने देख-देख,
   चला रहे थे निज पैर-हाथ।।

अचानक पिताजी किये रसीद,
    एक थप्पड़ उसके गाल पर।
सपने टूटकर बिखर गये सब,
    मायूस हुआ देख हाल पर।।

दरअसल सपने में प्रिय मित्र,
    रेस में बाइक चला रहे थे।
एक्सिलेटर दबा रहा हूँ समझ,
   कान पिता का हिला रहे थे।।

सपने भी होते हैं अजीब,
    कभी अमृत पिला देते।
राजा से रंक बना देते,
  कभी थप्पड़ खिला देते।।

............।।। .............

व्याख्याः---प्रस्तुत रचना में जीवन में मुस्कुराहट की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता को एक हास्य प्रसंग के साथ बताया गया है।
    यदि मानव हँसे-मुस्कुराए नहीं तो उसके जीवन में रौनकता नहीं रहती और वह उदास रहता है।
    इसी के साथ सपने की विचित्र दुनिया का भी एक संदेश दिया गया ,मानव मन की सुसुप्तावस्था एक अनसुलझी पहेली है।

    आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद "

Tuesday, May 19, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- विषाणु


रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः-- रायगढ़
विषयः-रौद्र रस आधारित सृजन
शीर्षक ः-  "विषाणु "
विधाः- कविता
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विषाणु क्या बिगाड़ेगा ,
जब विश्वास से भरा हर मन हो।
विषाणु क्या हराएगा ,
प्रतिरोधक क्षमता से हर तन हो।

मानवता को पीड़ित करता,
अँधेरे का दूत तीनों कालों में।
परोक्ष रुप से मित्र सचेतक,
कुटिल भी है निज चालों में।।

वेश बदल लेता दनुज सा,
छद्म रुप में रहता है।
हर मौसम हर वातावरण में,
छिप-छिप वार करता है।।

मानव रुप भी धर लेता यह,
नालंदा तबाह कर देता है।
जयचंद कभी मीरजाफर बन,
विजयी अट्टहास कर लेता है।।

हे!मनुज रहना सचेत तुम,
विषाणुओं के आघातों से।
मानवता जिंदा रखना है,
अप्रत्यक्ष इन उल्कापातों से।।

.....................................

व्याख्या ः---प्रस्तुत पद्य में सामयिक कोरोना वायरस जैसी विपदाओं से मानव को सदैव सचेत रहकर,स्वयं को मजबूत बनाकर रखने और इससे निडर होकर रहने का संदेश दिया गया है।साथ ही हमारे समाज में भी विषाणु रुपी मनुष्य हैं उनसे भी सचेत रहने की आवश्यकता पर ध्यानाकर्षित किया गया है।

आनंद कुमार त्रिवेदी"आनंद"

Saturday, May 16, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना

रचनाकारः- आनंद कुमार त्रिवेदी 
              "आनंद"
जिला... रायगढ़
विधा....गीत (छत्तीसगढ़ी)
शीर्षक..."मया के ताज "
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अमर करे पियार हमर,
   एक महल बनाबो जी।
नई पाबो संगेमरमर,
  माटी के भीथी उठाबो जी।।
.......    ।......   ।.......

जमना नई हावय गाँव त,
   नरवा-झोरखी तीर सही।
ताज कस नई सकबो,
   त कच्चा झोपड़ी ही वो रही।।
डोली के धान लू के,2
      ओ म खदर छवाबो जी।
अमर करे.....

महल भीतर म झरना,
   मया-पियार के झरही जी।
नोनी अउ बाबू हमर,
   मन के ओ म तैरही जी।।
फोटो रही दूनों झन के,2
   अइसन टाटी धराबो जी।
अमर करे.....

अँगना म बिही-बोईर के,
    बिरथा ल लगाबो जी।
आमा डाही म एक,
    झूलवा घलो धराबो जी।।
गाँ भर के बाल गोपाल,2
  झूलवा म झूलाबो जी।
अमर करे....

घर के दीवार मया के,
   छापा ल छपवाबो जी।
मई दुआर म हमन,
 "पियार के घर "लिखवाबो जी।
मया के ताजमहल,2
        दुनिया ल देखाबो जी।
अमर करे....

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व्याख्या .....दू परेमी (नायक-नायिका) अपन के मया पिरीत ल अमर बनाय खातिर मिल के सज मढ़ात हाँवय।
ताजमहल कस तो नी बनाय सकें फेर ताज ले कम नी ए ऊँकर कलपना के घर।जेकर टाटी,दीवार, घर,अँगना जमो कति मया के कहर हर बगरत हवय।
   गाँव के परिवेस म जो संसाधन उपलब्ध हावय वही म लोग 
लईका गाँव परिवार संग रके दूनो परानी के बरोबर सहभागिता करत हावँय दूनों प्रेमी,गीत म इ भाव ल कहे के परयास किये गय हे।

                        _आनंद कुमार त्रिवेदी

Friday, May 15, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- सदासुहागन

रचनाकारः- आनंद कुमार त्रिवेदी
                सोण्डका, खरसिया
शीर्षक ः-  "सदासुहागन  "
विधाः-    कविता

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हे! धर्मपथ अनुगामिनी,
   सुशोभित हर घर आँगन।
प्रकृति पुरुष की भामिनी,
   जय हो तेरी सदासुहागन।।

भीषण ग्रीष्म हो चाहे ऋतु,
     या हो पावस घनघोर।
कड़कड़ाती शीत में भी रहतीं,
   शांत प्रमुदित सबओर ।।

कैंसर हो या खाँसी खराश,
    मधुमेह का भी करती उपचार।
धवल गुलाबी रंग सुमन का,
   धरती रुप हो आठ प्रकार।।

बारुद को बिखराती तुम हो,
    करती शुचि पर्यावरण।
ज्यों सती की सत शक्ति,
   होती गृह सुरक्षा आवरण।।

हे!सुमुखी हे!सदाबहार ,
   हे! नयनतारा हे!गुलबहार।
रहना तुम निज धर्म-कर्म रत् ,
करना सदा मानव पर उपकार।।

        आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद"

व्याख्या ---

     उक्त कविता में हर घर आँगन में मिलने वाली सदाबहार पुष्प का 
स्तवन किया गया है।सदाबहार पुष्प की उपमा साक्षात् प्रकृति स्वरुपा लावण्यमयी सद्गुणी स्त्री से की गई है।
     जिस प्रकार एक सगुणी नारी सब प्रकार के ऋतुओं(दुख-सुख) को झेलते हुए हमेशा हँसमुख और धीर रहकर अपने परिवार को मजबूती प्रदान करती है उसी प्रकार यह बहुगुणी पौध भी हमें कैंसर मधुमेह जैसे अनेक रोगों से बचाती है ।
   यह आठ प्रकार की होती है और सदाबहार, नयनतारा आदि अनेक नामों से जानी जाती है।
    

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...