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Saturday, June 12, 2021

ग़ज़ल : पुष्पा पटनायक "पुष्प"

रचयिता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- ग़ज़ल 
शीर्षक - "क़ज़ा-ए-इश्क़"
***********************
उनसे जब इश्के वाले हाना था ,
वो जमाना भी क्या जमाना था ।

वो न आए न उनको आना था ,
जाकर आना तो इक बहाना था l

हाय वो दौरे आशिकी ये दोस्त,
ख्वाब था या कोई फसाना था ।

बिजलियों को पनाह दी जिसने,
वो  हमारा  ही आशियाना  था ।

दे  दिया आसरा तेरे  गम  ने,
वर्ना अपना कहां ठिकाना था ।

उनकी पहली नजर ने लूट लिया,
मेरा  दिल ही  मेरा खज़ाना  था ।

जहर आलूद आज क्यों है फ़िजा,
कल  तो  मौसम बड़ा  सुहाना था ।

कोई  रुसवा हुआ  सरे महफ़िल,
आपको  यूं  न  मुस्कुराना  था ।

Friday, June 11, 2021

हम कविता क्यों लिखते हैं? : पुष्पा पटनायक "पुष्प"

रचयिता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- आलेख 
शीर्षक -" हम कविता क्यूँ लिखते हैं ?"
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      कविता शब्दों का एक ऐसा समूह होता है जो किसी भाव को लिए हुए होता है जो लय, तुक या छंद बद्ध लिखा जाता है। 
                   कविता लिखने वाला कई उद्देश्यों से कविता लिखता है ।वह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कविता लिखता है। वह समाज को प्रेरित करने के लिए कविता लिखता है या फिर वह मनोरंजन के लिए कविता लिखता है ।कई प्रकार की भावनाएं एक कवि अथवा कवियत्री के मन मस्तिष्क में निहित होती हैं। 
              भावों के शब्द जब लय, तुक और काव्य गत व्याकरणों से सजते हैं तो  भावों की उपादेयता को बढ़ा देते है। इसलिए समान्य बात भी बड़ी अच्छी लगती है और अच्छी बात दिलों पर राज करती है। कवि की कल्पना भी जब कागजों पर उतरती है तो समाज मे तहलका मचा देती है,और दूसरी ओर बड़ी और काम की बातें पन्नों में दबी रह जाती हैं। 
               कविताए कई उद्देश्यों को लेकर लिखी जाती हैं पर उद्देश्यों को हासिल कुछ ही कवि कर पाते हैं। कविता के माध्यम से अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना एक कवि की खूबी होती है ,परन्तु कभी कवि अपनी सही बात श्रोता तक नहीं पहुचा पाता और कभी श्रोता ठीक से समझ नहीं पाता है। 
            
"अपने भावों को शब्दों में पिरोता           
कवि, कविताओं से कहता है 
शायद इसीलिए कविता लिखता है। "

Thursday, June 10, 2021

कैफियत : पुष्पा पटनायक "पुष्प "

रचयिता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- आलेख 
शीर्षक -" कैफ़ियत"
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            शब्द ये कैफ़ियत उर्दू का बड़ी शान से अपनी उल्फत कहता है,  समझने में देर नहीं लगती ग़र खैरियत पूछने वाला अदीब-बे-नज़्म पढ़ता है। 
           गम जदा  को हर फ़िजा खजां लगती है।ऐसे में कोई अक्श खैरियत पूछ ले तो खजां में खजालत सी महसूस होती है। आदम ए फितरत इसके हुनर से वाकिफ है ।अल्फाजों में बड़ी ताकत है,लग जाये तो छूटती नहीं और उतरे तो चढ़ती नहीं।
           कैफियते अस्ल कहीं न कहीं खस्ता ए को खास बख्श देती है। यहीं, इसकी नियतें कायल  हो जाया करती हैं और दिलो दिमाग को करार मिल जाया करती है।

Tuesday, June 8, 2021

पुष्पा पटनायक की रचना- व्यवहार

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- कविता
शीर्षक -"व्यवहार"
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अच्छा रखो व्यवहार 
सबसे  करो  प्यार 
तुम्हें  चाहेंगे  लोग 
जीत लोगे  संसार ।

कोई नहीं पराया 
सभी  तुम्हारे अपने
सभी के हो जाओ 
तुम्हारा होगा सेहार।

कर्म करते जाओ 
चिंता नहीं चिंतन करो  
नेक रखो विचार
सुधरेगा आचार ।

चाची,मामी,मौसा
दो हाथ करताल
रिश्तो  का  प्यार
मिले     बेशूमार ।

दिल साफ रखो 
दिल में माफ़ रखो
मिलेगा करार
जीवन होगा गुलजार।

पुष्पा की सलाह 
मान लो जरा 
सहारा बन बेसहारों का 
कर लो इजहार।

Wednesday, June 2, 2021

पुष्पा पटनायक कृत लघुकथा- परामर्श

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- लघु-कथा 
शीर्षक -"परामर्श"
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परामर्श से परेशानियां कम होती हैं। दो जुड़वा भाई थे ,दोनों के रंग रूप,कद काठी एक जैसी थी एक भाई खूब पढ़ा और दूसरा ज्यादा पढ़ न सका। ज्यादा पढ़ा-लिखा ना होने के कारण पहला खुद को दूसरे भाई से श्रेष्ट समझने लगा और एक दिन वह अपने निवास स्थान से दूर अच्छे काम की तलाश में चला गया और वापस नहीं लौटा।इधर दूसरा भाई गांव में ही अपने बुजुर्गों से सलाह लेकर व्यापार शुरु किया। सदा कुछ करता तो बड़ों से परामर्श अवश्य लेता। एक समय आया कि वह नामी सेठ बन गया। एक बार सेठ अपने परिवार को लेकर छुट्टी मनाने किसी हिल स्टेशन में गए और फाइव  स्टार होटल में रुके उन्होंने रुम सर्विस वाले को फोन करके खाना मंगाया थोड़ी देर में रूम की बेल बजी और उन्होंने दरवाजा खोला तो वे स्तब्ध रह गए । दरवाजे पर उनका वही भाई खड़ा था जो सालों पहले घर छोड़कर निकल गया था। 
समय- समय पर परामर्श लेने से सही रास्ता सही मंजिल तक अवश्य पहुंचाती है बशर्ते कि परामर्शदाता निश्छल हो।

Monday, May 31, 2021

पुष्पा पटनायक की रचना- प्रहरी

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- कविता  
शीर्षक -"प्रहरी"
****************
सीमा में खड़ा प्रहरी, 
देश का अभिमान है।
वह नहीं तो देश नहीं, 
देश का नुकसान है।

क्या धूप  क्या वर्षा,
सह कर रहता खड़ा।
मर मिटने को  सदा,
देश  पर  तैयार  है ।

बंदूक  रहे  हाथ   में,
अपनों का ना साथ है।
मजबूत मन है फिर भी, 
मन  में  ना मलाल  है ।

तिलक लगा माथे पर,
मन में एक उबाल है ।
जान हथेली धर निकला,
कर्तव्य का सदा भान है।

Saturday, May 29, 2021

पुष्पा पटनायक की ग़ज़ल

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- ग़ज़ल
शीर्षक -"तूफां-ए-ज़िन्दगी"
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हमारे भी नहीं आते, तुम्हारे भी नहीं आते।
अगर तूफां को आना है ,किनारे भी नहीं आते ।

गर हमदर्द छोड़ दे तो,जहां भी छोड़ जाता है।
आलम किसी से ना कहें,जो ख्वाब टूट जाते हैं।

हमारे भी नहीं आते, तुम्हारे भी नहीं आते।
अगर तूफां को आना है ,किनारे भी नहीं आते।

दिल को जो भाते हैं ,वो मौसम बदल जाते हैं ।
वो मंजर क्यूँ दामन पकड़े, जो हाथों से छूट जाते हैं।

हमारे भी नहीं आते, तुम्हारे भी नहीं आते ।
अगर तूफां को आना है ,किनारे भी नहीं आते

हंसकर माफ कर देंगे ,गर कह दें हम उनके हैं ।
मग़र अफ़सोस कि, ये मंज़र दामन नहीं आते।

हमारे भी नहीं आते, तुम्हारे भी नहीं आते ।
अगर तूफां को आना है, किनारे भी नहीं आते।

यूँ तड़पाना ख़ाक हो जाएगा, एक दिन क़फ़न में
उनके वजूद हैं इतने मजबूत, कि जहन से नहीं जाते।

हमारे भी नहीं जाते, तुम्हारे भी नहीं जाते।
अगर तूफां को आना है ,किनारे भी नहीं आते ।

Friday, May 28, 2021

पुष्पा पटनायक कृत आलेख- निष्काम मोह

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- आलेख
शीर्षक -"निष्काम मोह"
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              मोह भी कैसी चीज है किसी से लग जाए तो उतरती नहीं और उतर जाए तो चढ़ती नहीं । मन का मोह  एक अद्भुत एहसास होता है , जो इस मोह को अनुभव कर लेता है, उसका जीवन ही देवत्व प्राप्ति की राह पकड़  लेता है ।
          मैं एक बात बता दूं कि मैं निस्वार्थ,निष्काम मोह की बात कर रही हूं जो इतना अधिक हो जाता है कि अपनी सुध भी नहीं रहती है जैसे बालक ध्रुव का ईश्वर के प्रति मोह, मीरा का कृष्ण के प्रति मोह ,और शबरी का राम के प्रति मोह ,इसी तरह भरत का अपने भाई राम के प्रति मोह ।
       मानवीय मोह, संसाधन के मोह से भिन्न होता है पर कहीं ना कहीं मानवीय मोह में भौतिकता का समावेश हो ही जाता है लेकिन जब ह्रदय के मोह के बीच कोई वस्तु  नहीं आती तो वह मोह सर्वोत्कृष्टता को प्राप्त कर लेता है फिर वहां पर दो आत्मा दो ह्रदय आपस में इस तरह जुड़ जाते हैं कि किसी अन्य का जरा भी भान  नहीं रहता ।
परंतु आज मोह भी छला जाता है वस्तुओं के जैसे तोला जाता है ।इसकी गरिमा उछल रही है । सरेआम नीलाम किया जाता है ।
        इस कलियुग में कोई निष्काम मोह करे तो उसे बदनाम किया जाता है ।आज सिर्फ भौतिक संसाधन के प्रति मानव का मोह दिखता है ।आज मानव सोने -चांदी के लिए अपनों को बेंच देता है । बड़ी  दुख की बात लगती है मुझे कि मोह ,मोहनी बन मोह को ही डस लेता है ।

Tuesday, May 25, 2021

मानसून पर पुष्पा पटनायक "पुष्प " के दोहे

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान- बनाई, तमनार जिला रायगढ़।
विधा- कविता (छंद-दोहा )
शीर्षक- "मानसून"
**********************     
चुनरी बूंदे ओढ़ के, बादल आये पास ।
नाचे बादल झूमके, मौसम ऐसा खास।।

सारा आलम सूखता,धरती खोई आस।
मानसून चलते बने, पानी तरसे मास।।

मानव अब तो समझ जा, पौधे करते बात ।
मानसून जो बरसते , देते दुखको मात ।।

पौधे लागे सुख है, बात यह तू जान ।
उमंग भरभर नीव हो, ईश्वर जाये मान ।।

Monday, May 24, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " के दोहे - जीवन

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान- बनाई, तमनार जिला रायगढ़।
विधा- कविता (छंद-दोहा )
शीर्षक- "जीवन"
**********************     
जीवन जीते शान से, लेते प्रभु का नाम।
माथा टेकें चरण में , पायें प्रभु का धाम ।। 

पानी- पानी हो गया, सबका देखो मान ।
जीवन डूबा आज जो, सबका डोला प्राण ।।

आना-जाना भी थमा, फीकी- फीकी शाम ।
कैसा दिन है आ गया, सूरज जलता नाम ।।

चीखें पड़ी कान में , धरती रोये धार।
कैसा जीवन आज है, ये कैसी है मार।।

Saturday, May 22, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " कृत आलेख- प्रखर-प्रवाह

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान- बनाई, तमनार जिला रायगढ़।
विधा- आलेख
शीर्षक- "प्रखर-प्रवाह"
**********************     
         प्रवाहमान वायु, प्रवाहमान नदी या फिर प्रवाह की प्रखरता लिए हुए मानव मन हो ,उन्माद से भरे हो तो वह शिखर पर पहुंच भी जाए तो जमींदोज होने में समय नहीं लगता है।  प्रवाह की प्रखरता के संग प्रवाहित हो जाना सही नहीं उसके साथ तालमेल लाना आवश्यक होता है, पर कभी-कभी तालमेल सामने वाले की समझ से परे हो तो खुद को संभाल लेना बेहतर हो जाता है ।
        आवेग और उन्मुक्तता लिए हुए आजकल धारा की प्रवाह इतनी प्रखर और प्रभावोत्पादक होती जा रही है कि कीट पतंगों के संग पूरे काफिले बह जाते हैं ।वे इतने दूर निकल जाते हैं कि पूर्व स्थिति भूल कर भी याद नहीं रख पाते और ना ही भविष्य की उज्जवलता दिखाई देती  है ।
         प्रवाह प्रखर और निश्छल हो तो वह बहने वालों को साथ लेकर इस तरह बहती है की राह में रोड़ा अटकाने वालों की  भरमार होती चली जाती है। बातों के प्रवाह में बहकने वालों की संख्या बहकाने वालों से अधिक मिलती है । दुनिया बदलती जा रही है एक उदाहरण देती हूं -: भूत के पांव की व्याख्या करने वाले  लेखक ने कई लोगों को डर के हवाले कर दिया,और दूसरा उदाहरण  बिंदास और अपने कर्म क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली  महिला को समाज की बुरी नज़रों ने घेर लिया ।ऐसे कितने उदहारण मिल जाएंगे समाज की प्रवाहित गंदी भावनाओं में।     
        प्रवाह ना हो तो जल से बदबू आती है और अधिक प्रखरता हो तो समाज को डूबा देती है ।अतः धरा की धड़कन तभी चलेगी जब प्रवाह कितनी भी  प्रखर हो लोग अपनी सोच समझ के साथ बहें, अन्यथा उन्हें डूबने से कोई नहीं बचा सकता ।

Friday, May 21, 2021

पुष्पा पटनायक की रचना- माँ

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छंद मुक्त कविता
शीर्षक -"माँ"
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मां तो मां होती है,
इसके जैसा नहीं कोई दूजा।

हर लड़की एक दिन मां बनती है,
सो इसकी करो हमेशा पूजा।

मातृशक्ति यदि नहीं बची तो,
बाकी यहां रहेगा कौन ?

प्रसव वेदना लालन-पालन,
सब दुख दर्द सहेगा कौन ?

मानव हो तो दानवता को त्यागो
फिर यह उत्तर दो ।

एक नन्ही सी गुड़िया के दुश्मन को,
इंसान कहेगा कौन?

Wednesday, May 19, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प" की रचना- हौसला-ए-जिन्दगी

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
स्थान- बनाई, तमनार जिला रायगढ़।
विधा- कविता 
शीर्षक- "हौसला-ए-जिन्दगी"
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मन  के  जीते  जीत 
मन  के  हारे   हार 
यहां  पाता  वही  जो 
नेक  रखे      विचार ।

जीवन का क्या यहां 
हर जीवित जी लेता है 
सार्थक वही करता है 
जो इसे समझ पाता है ।

देखना है बस कौन ?
कितना यहां सहता है 
जीवन के संघर्ष को 
सहर्ष स्वीकार लेता है ।

मेरी मानें खुलकर जियो 
जीने में हर सुख मिलता है 
क्या गम क्या खुशी सीने से लगा 
जीवन निरंतर चलता है ।

पहाड़ भी टूटेगा गर 
मानव बाहें फैलाता है 
देखना पहाड़ की कठोरता 
कैसे उसे फौलादी बनाता है ।

प्रलयंकारी तूफानों में 
जो कभी गिर जाता है 
साहस सदैव रखे तो 
पतवार बन किनारे लग जाता है ।

बड़े-बड़े दुख आते 
जिगर को ना कुचल पाते हैं 
मानव जो  ठान ले तो 
दुखों के पहाड़ भी चढ़ जाता है ।

सोच कर भी सोच 
बदलती नहीं जब कभी 
जहां मानव सदा 
सकारात्मक हो जाता है ।

और कहना चाहती है पुष्पा 
पूरे मानव समाज से 
कि रखना हौसला जिंदगी का 
हिम्मत-ए-मरदां तो मदद-ए-खुदा हो जाता है।
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Friday, April 9, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " की रचना- पुष्प की कूक

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -"पुष्प की कूक"
***********************
बसंत बहार है आई 
मादकता है लाई,
आम्र तरूओं ने 
देखो ली है अंगड़ाई ।

रंग- बिरंगे फूलों में 
तितलियां मंडराईं,
पर्यावरण में फिर से 
कादंबरी की कुक सुनाई।

हरित श्रृंगार कर धरा 
सुंदरता को पाई,
प्रसन्नता से सारी प्रकृति 
मंद-मंद मुस्काई।

'पुष्प' बन कादम्बरी 
आज कूक है लगाई,
काव्य संसद परिवार का 
मिलन होगा बड़ा सुखदाई।

Thursday, April 8, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " की रचना- चार

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -"चार-चिरौंजी"
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छोट-छोट रुख हावे
चना एईसन फरे हजार 
करिया होके पाके अउ
अबड़ मीठ लागे चार।

चार कइथें फर ला
आंठू ला कइथें चिरौंजी
चिरौंजी ला भैइदा बेचे
अउ चार खाए भौजी।

चिरौंजी के लाड़ू बने
खाए मा अबड़ सुवाद जी
गुर मा पागे मोर दाई
संगी अबड़ मिठास जी।

चिरौंजी के अबड़ मांग
छत्तीसगढ म एकर भरमार 
दूसर राज्य घलो भेजें
हमर छत्तीसगढ़  सरकार।

चार के टोंगरी म बैइठ के 
करथों मेंहर, एकर परचार
आइहो छत्तीसगढ़ त जरूर खाइहो
पुष्पा करथे तुमनला जुहार।

Wednesday, April 7, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " की रचना- संगम

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -" संगम"
***********************
पहाड़ों से होता है 
सदा उद्गम नदी का 
जब संगम,सागर में हो 
तभी पूर्ण मानी जाती ।

इच्छा जहां प्रगाढ़ हो 
निःस्वार्थ से परिपूर्ण हो
वहां वियोग की 
मति मारी जाती ।

भले ना मिलें आकाश वसुधा 
क्षितिज के पार 
रहते साथ सदा 
हो जाता संगम जुबानी।

भक्ति की पराकाष्ठा ही 
भक्त को ईश से मिलाती 
साधु हो जाता विलीन देव में 
यही सच्ची संगम की निशानी।

Wednesday, March 31, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " की रचना- सरहद

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -"सरहदें"
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ज़मी पर लकीरें कितनी भी खींच दें
दिलों में दरारें ना आने पाए ।

इल्तजा है 'पुष्पा' की सरहदों से
रिश्तों को प्यार से सजाए।

गर कोई लांघ भी जाये सरहदें
अपनेपन से क्यूं न हम फूल बरसाएं।

सरहदें बांध देती खुले चमन को 
भूल कर भी बांधें ना मन को ।

स्वच्छंद उड़ना पार सरहदों के 
सबको गले से भी लगाना ।

सरहदें नाम की हो जाएंगी 
दिलों के मिलने से टू जाएंगी ।

याद रखें, बनाने वाले हम ही थे 
सरहदों को, मिटाएंगे भी हम ही ।

Wednesday, March 10, 2021

पुष्पा पटनायक "पुष्प " की रचना- विनाह

रचियता- पुष्पा पटनायक "पुष्प "
बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- छन्द मुक्त कविता
शीर्षक -"विनाह"
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जीवन की तलाश खत्म 
कभी नहीं होती है 
एक दिन राही को
मंजिल मिलती जरूर है ।

नियति भी बदल ही
जाती है  वहां, जहां 
कूप मेंढक की 
बात होती है ।

विनाह लगे कूप में 
गुजार देता सारा जीवन है 
नहीं कोई ध्यान मेढकी को 
मस्त मौला जीवन क्या है 

विनाह के बिनाद पर 
बंदिश भले लगा लें 
बेशक याद रखना पड़ेगा कि 
घटा चीरती किरणें  हैं।

Tuesday, March 2, 2021

पुष्पा पटनायक की रचना- पलाश के फूल

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- कविता  
शीर्षक -"पलाश के फूल"
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पलाश के फूलों से
डालियाँ सजती हैं
मानो प्रकृति भी
सुर्ख लबों से मुस्काती है।

पलाश के फूलों का 
सुर्ख लाल रंग 
पागल सा कर देता 
मुझे भी अपने संग  ।

होली के रंगों से मिल
पलाश का  सुर्ख रंग 
उनके हाथों से जब
भीगता था अंग-अंग।

पलाश का लाल रंग 
मन को उद्वेलित करता
प्रियतम की राह में मन
दौड़ने को मजबूर होता ।

भीनी सी खुशबू उनकी
अब तक याद मुझे आती
वह दिन कहां आएंगे 
अब रो-रो आंसू बहाती ।

पलाश के फूलों को
जब मैं निहारती 
लगता मानो प्रियतम
छिपकर बैठा पलाश की डाली।

Tuesday, February 23, 2021

पुष्पा पटनायक की रचना- तरकीब

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- कविता 
शीर्षक -"तरक़ीब"
***********************
तरक़ीब से तकदीर को 
बदलते देखा है,
मेहनत से मुकाम को 
क़रीब आते देखा है ।
सपने साकार ऐसे 
ही नहीं होते,
शक़्स को आजिमे 
ख़िदमत करते देखा है।
आशियाने में आराम 
ना करना कभी,
आफ़त से आँखें 
लड़ाके बात करना।
एक दिन आफ़ताब
जरूर चमकेगा, 
ज़ेहन जाहिरा जब 
जान जाएगी ।
तरक़ीब तोफाये
तस्लीम इख़्तिया होगा,
नासुते नुसर्त नासमझी 
तब  मान जायेगी।

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...