स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
शीर्षक--'भरते थे गुरुवर संस्कार'
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वैदिककाल में देश अपना , रहा था गुणागार ।
आश्रम मेंं गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।
तब सारे देश में रहा था , जैसे स्वर्णिम काल ,
बच्चों को माँ-पिता ज्ञान दी , घरों में पाँच साल ।
पालनपोषण सब करते थे , देकर खूब दुलार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।१
उन्हें सेवार्थ गुरु चरणों की , पहुँचाते बुधवान ,
आचार्यवर वहाँ शिष्यों को , देते थे सद्ज्ञान ।
भरते आदर्श भाव उनमें , करुणा नेह अपार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।२
आश्रम समेत गुरु की सेवा , करते थे दिन-रात ,
सिरोधार्य सदैव करते थे , गुरु माता की बात ।
वर्ष पचीस आयु तक बच्चे , पढ़ते गुरु अनुसार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।३
सेवा भाव मन में जगाते , श्रमपर देते जोर ,
सत्य-अहिंसा-दया-क्षमा से , मन मारता हिलोर ।
रग-रग में भरते शिष्यों के , सदैव श्रेष्ठ विचार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।४
लोभ - तृष्णा से बचाते थे , वैभव का है त्याग ,
ईश्वरमय विश्व को बताये , जीवोंपर अनुराग ।
शिष्यों का जीवन गढ़ते थे , ज्यों कोई कुम्हार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे सस्कार ।।५
आज जमाना बदल गया है , बदले सोच तमाम ,
विद्यालयों से संस्कार का , मिटा दिये हैं नाम ।
जिससे बढ़ा दुष्कर्म-हत्या , छाया भ्रष्टाचार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।६
संस्कार को है आज मन में , मानें सब बकवास
तब तो 'ठाकुर' देश में बढ़ा , नैतिकता का ह्रास ।
रही है शिक्षानीति हमारी , सह दोषी सरकार ।।
आश्रम में गुरुवर छात्रों में , भरते थे संस्कार ।।७
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व्याख्या--प्राचीन एवम् अर्वाचीन परिवेश में सं
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