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Thursday, June 4, 2020

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से सीमा अष्टमी साहू की रचना- भुइंया

सीमा अष्टमी साहू 
सुभाष नगर दुर्ग
शीर्षक मोर छत्तीसगढ़ के भुइंया


धन धन हे मोर सोन चिरैया
धन धन हे छत्तीसगढ़ भुइयां
 धन धन हे हमर धान कटोरा
       सूरज करें  निस दिन आरती
       गंगा जमुना चरण पखारे
       हाथ जोड़ मेहा खड़े हो
      निस दिन में करंव आरती
धन धन हे मोर सोन चिरैंया
धन धन मोर छत्तीसगढ़ भुइंया।।१
हरियर  -हरियर लुगरा पहने 
खेती खार हरियर दिखें
गेहूं  बाली झूम झूम नाचे
धन धन मोर सोन चिरैंया
धन धन मोर छत्तीसगढ़ भुइंया।।
  मोर मुकुट पहने महतारी
कर्मा ददरिया गावत नारी
 साजा परसा पंख  हलावयैं
धन धन मोर सोन चिरैंया
धन धन मोर छत्तीसगढ़ भुइयां।।
किसनहा बेटा तोर पांव पखारें
छत्तीसगढ़ के चिन्हारी आवें
वंदे मातरम के गाना गावें
जय हिंद जय भारत के नारे लगावैं।।
धन धन मोर सोन चिरैया
धन धन हे मोर छत्तीसगढ़ भुइंया।।
 
     सीमा अष्टमी साहू
       सुभाष नगर दुर्ग

Monday, June 1, 2020

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से सीमा साहू की रचना-

सीमा अष्टमी साहू 
 सुभाष नगर दुर्ग छत्तीसगढ़ 
शीर्षक_मेरा देश महान।


मेरा देश महान,मेरा देश महान,
जन्में जहां श्री राम कृष्ण और, महावीर हनुमान।।
इसी भूमि में जन्म लिए,श्री सूर और तुलसी दास जी,
मीरा गौतम बुद्धदेव,नानक कबीर और व्यास जी,
अमृत वाणी से करते वे,हम सबका कल्याण।।
वीर शिवा राणा प्रताप,लक्ष्मी विरांगना जन्म लिए,
तात्या टोपे और भगतसिंग,अपने आपको धन्य किये,
मां के हित निज आन-बान,तज हुए हैं वे कुर्बान।। मेरा देश।।
गांधी नेहरू लाल बाल,नायडू और बोस जवान थे,
अनहोनी को होनी कर दी,सत्य अहिंसा बान से,
तन मन धन सब अर्पण कर दी रखे हैं माँ की शान।।मेरा देश।।
पंद्रह अगस्त सैंतालिस को हैं,यह भारत आजाद हुआ
पुण्य दिवस राष्ट्रीय पर्व पर,हम सबकी हैं यही दुआ
शांति प्रदान करो हे प्रभुवर,जय हो कृपानिधान।।मेरा देश।।
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम,सरहद तक हम यहीं कहेंगे,
हम सब भाई एक ही माँ के,भारत के संतान।।मेरा देश।। 
वंदे मातरम्

Wednesday, May 27, 2020

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से सीमा अष्टमी साहू की रचना- पर्यावरण

सीमा अष्टमी साहू
सुभाष नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
पर्यावरण


वनस्पतियाँ  निज हित करती
प्रफुल्लित पल्लवित होता मन।
सूरज संग प्राणवायु देती हैं
अन्तस तन-मन पावन होता।
    विविध विधा के पुष्प बिखरकर
चहुं ओर खुशबू बिखरती है।
सुमन सुरभि संग-संग तितली
 पुष्प को  चुम्बन देती हैं।
अन्न पोषित करती , राष्ट्र को उर्जा
से भरती
जन-जन की पालनकारी अन्नकुमारी।
    जीव जंतु का रक्षंण करते,गौरी भी पोषित होती
दुग्ध प्रदान हमें करती हैं।
धृत से करते हम यज्ञ-हवन
कल्याण होता हैं,प्राणी मन।
 वनस्पति से औषधि मिलता
स्वस्थ होता है तन-मन जन।
कोरोना से हम रक्षा कर पाते।
पंताजलि  हमें सिखाता है जंग।।
स्वस्थ भारत अभियान,देती हैं
हमें ज्ञान।
सर्वदा मौन रहकर,रसोई का करो काम।
हाथ- मुंह,धोकर करों भजन-भोजन।
 तन से प्राण निकल जाने पर
वनस्पति ही उसे जलाती हैं।
कल्पवृक्ष हैं यह वनस्पति
मन प्राणों में समा जाती हैं।
पर्यावरण प्रकृति से हम जीवन
जीतें वृक्ष लगाए अनेको बार।
मोक्ष मार्ग की दिशा बताती 
सभी के लिए है अनुपम उपहार
आइए  बंसत का करें ,हम स्वागत
ज्ञान -विज्ञान, संस्कार से, व्यवहार से
जन्मदिन में पेड़ लगाके, संरक्षण करें
जल संरक्षण करके, जीवन को खुशियों से भरें
देश की उन्नति के लिए,कृषक के लिए।
इतिहास रचे स्वच्छता अभियान के सिपाही बनकर
देश के लिए कुछ करें ,जय जवान जय किसान ।
✍️सीमा साहू स्वच्छता की सिपाही🙏

Tuesday, May 26, 2020

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से सीमा अष्टमी साहू की रचना

सीमा अष्टमी साहू 
सुभाष नगर दुर्ग
शीर्षक-आँखों में छायी हैं


आँखो में छायी हैं,उनकी ये सूरत,
दिल में बैंठे हैं,जी उनकी मूर्ति
कैसे भुलाऊं मैं कैसे भुलाउँ।।
रात सुहानी मैं बन गयी दीवानी
रातरानी बनकर,मैं खुशबू बिखराऊँ।
जिंदगी सूरज सा ,ढलता जायें
उम्र की दहलीज, भी बढ़ता जायें
मैं  सदाबहार फुल बन जाऊँ।।
याद आती है,वह बेला,न कोई झमेला
कैंसे भुलाऊं मैं, कैसे भुलाऊं।।
   काट रही हूं मैं जिंदगी के पल
नैंन मिलते थे,हर क्षण  हर पल
अब न आतें मेरे,प्रितयतम 
बहार बनकर, पतझड़ बनकर
नैंन तरसती है,जलधारा बनकर
कैसे भुलाऊं मैं, कैसे भुलाऊं।।
     आँखे मेरे दिल के दो सितारे
मेरे जीवन के पथ में करते सहारे
प्यार, तड़प,मिलन, सब कुछ जानती हैं आँखे।
कैसे भुलाऊं मैं कैसे भुलाऊं।।
सीमा

Saturday, May 16, 2020

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से सीमा अष्टमी साहू की रचना- तेरे नयना

नाम-सीमा अष्टमी साहू
राज्य-छत्तीसगढ़ सुभाष नगर दुर्ग
शीर्षक-तेरे नयना करें इशारा


तेरा नयना करें इशारा,तो क्यों न कोई प्यार करें
जब दोगें हमें सहारा, तो क्यों न हम तुम्हारा काजल बनें।।
कया जाने जग वाले,प्यार क्या होता है
दिल में कुछ -कुछ होता है,मन बहुत रोता है।।
समझता हूं तेरे इशारे को,जब जब पायल झनकार करें
पायल की झनक कह रही है,आओ प्रिये हम कही बगिया में चलें।।
उलझे उलझे लट हैं, श्याम घटा बन कर अंधेरे
मन का घन मयूर सा नाचे,बदरा छाए पंख फैलाए खुशी से नाचें
नील गगन में चंदा प्यासा, क्यों है चकोरी को उसकी आशा
आओ प्रिया प्यास बुझादे, आकर मुझसे गले लगा लें।।
झुक गई नैना,शरमाई निगाहें
दिल की तड़प से निकली आहें।।
पल दो पल में कट गयी बातें,
फिर भी कुछ बच जाती हैं बातें।।
दिल से तेरी तस्वीर न जाये
कैसे कहूं तेरे बिना रह नहीं जायें
तू ही मेरा अरमान है,तू ही मेरी जान
तू ही मेरे जीवन का सुखमय संसार है।।
तू प्रकृति का सुंदर उपहार हैं
मैं इस उपहार का सम्मान करूं।।
तेरा नयना करें इशारा तो क्यों न कोई प्यार करें
                     सीमा

Friday, May 15, 2020

छत्तीसगढ़ के दुर्ग से सीमा साहू की रचना- गीत

रचनाकार-सीमा साहू
जिला-दुर्ग छत्तीसगढ़
शीर्षक-हैं अकेले आज क्यूं-------(गीत)


   १- भीड़ में वो क्यूं अकेले और अलग से आज हैं-२
जो हमारी जिंदगी के गीत की आवाज है- 2
 जिन से जुड़ी बचपन की सुबह, और रंगी शाम हैं------
मां-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी नाम हैं।
२- हमको हंसता खेलता बस देखने के वास्ते-२
रोए हम तो,हम को खुशियां-बाटने के वास्ते-२
राजा कभी रंक बने, इनके निराले काम हैं----
मां पिता -------------------।
३- मंदिरों की घंटियां बजती हैं,कयूं ये कया पता?
और कया होती है,तीरथ यात्रा ये क्या पता?
अब तक इन्होंने पाला हमको,अब ये अपना काम हैं.......
मां-पिता, और दादा-दादी, नाना-नानी नाम हैं।
      सीमा अष्टमी साहू

Wednesday, May 13, 2020

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- अर्थशास्त्र

सीमा साहू
सुभाष नगर दुर्ग
छत्तीसगढ़
अर्थशास्त्र




राशन,दूध,सब्जी, बच्चों की फीस
मकान का किराया,नमक,तेल, लकड़ी माता-पिता की बिमारी
बहन का आपरेशन,पत्नी की फर्माइश,वेतन में कैसे हो समाधान तब आया मुझे ध्यान
अर्थशास्त्र को इसलिए कहते हैं
'धन का विज्ञान, सरकार सोच सोच कर हो रही है परेशान
दाता के दरबार में चावल मिल रहा है ,
मांग और पूर्ति  कैसे करें, अपनी शक्ति को कैसे पहचानें आज हम
आत्मबल का अनुसंधान करे हम
मनुष्य की आवश्यकता होती है
अनन्त अब फोकस करें,श्री को श्री हरे , शेषफल बस चावल से बने व्यंजन में संतृष्ट रहें,
परिवार-स्नेह का सच्चा समाधान
घर पर रहें , सुरक्षित रहे बस यही
मांग है ,यही अर्थशास्त्र सरकार की प्राथमिकता हैं, आत्मबल
आत्मशक्ति से जंग जीत जायेंगे!
 सीमा साहू सुभाष नगर दुर्ग

Tuesday, May 5, 2020

छत्तीसगढ़ से सीमा अष्टमी साहू की लघुकथा

कवयित्री-सीमा अष्टमी साहू
शीर्षक-काकी 
राज्य-छत्तीसगढ़

      काकी -
गांव में मैं काकी को बड़ी फुर्ती से काम करती देखती थी।पनघट से पानी भरती हुई,सकरी गली से गुजरती हुई,आंचल से सर ढककर,सगरी काकी चहकती रहती थी। सखियों के साथ गगरी में पानी ले जाती हुई, गगरी की सुंदर नक्काशी बहुत सुंदर ,कलाई में सुंदर लाल रंग की चुडियां, खनकती पायल की छम-छम से आंगन में सर सर झाड़ू के साथ काकी की सुरली आवाज कर्णप्रिय लगते थे, कभी दिवाल पर पीला रंग की छुही से दिवाल की लिपाई-पोताई करती थी, सुंदर कसीदाकारी जैसे दिखती थी!
मानो स्केल से सुंदर नाप करके रेखा बना ली हों , लगता था गणित की शिक्षिका हों..कभी  सुंदर गोल गोल परसा की मोटा रोटी बनाती,घी के साथ ,टमाटर की चटनी की खुशबू से घर महक उठती थी,रसोई घर में प्यार का रस घोल देती थी ।
बैल का जोड़ा ,हल अपने कंधे में रखकर चलती अपने खेत की ओर  बैल की जोड़ी शेरु-वीरु को तुतारी से  हों---हों....तो --तो  की आवाज जंगल में गुंज उठता था,वह हल से खेत की जुताई करती थी।धान बुआई,गोबर  खाद-पानी से लेकर धान कटाई,कर्मा ददरिया के गीत गाती, कटाई के बाद भारा बांधकर बैलगाड़ी में भरकर सखियों के साथ खलिहान तक लाती थी।
बैलगाड़ी में बैठकर रात में किसान भाइयों के साथ मिलकर मिजाई करती, कोचिया के पास धान बेचकर रूपया को ग्रामीण बैंक में जमा करती थी।
मेरे साथ कभी तपती धूप में भी ,तालाब के किनारे आम के पेड़ में चढ़कर अकोशी से आम तोड़ती थीं और कहती थी ----
छोटी मालकिन! आप के हाथ के अथान का अचार अच्छा लगता हैं। मुझे देना मैं बासी के साथ  खाऊंगी, मैं उसे आम का अचार देती ,तब काकी बहुत खुश हो जाती थी।
    मैं  एक दिन काकी से बोली-बस काकी ! आप सभी में सर्वगुण संपन्न हो ,बस थोड़ी सी कुछ कमी हैं ?
वह हैं शिक्षा की कमी! 
लें स्वीकार करते हुए  तपाक से बोली...... हां छोटी मालकिन!
"काला अक्षर भैंस बराबर'' -----कहते हुए बहुत दुखी हो गई।
मैंने कहा_चिंता मत कर काकी मैं आपको पढ़ाऊंगी-रात में सब काम निपटा के ९बजे आना, काकी और सभी सखियां पढ़ना सीख गई, और सभी एक-दूसरे को पढ़ाने लगी , सभी बहनें साक्षर हो गए थे ....
        वक्त ने करवट बदली , मां पापा जी , गुरु जी, परिवार समाज के आशीर्वाद से मेरा विवाह दुर्ग में हो गयी... अपने परिवार का दायित्व निभाते- निभाते बीस वर्ष हो गए, बहुत दिनों के बाद मैके जाना हुआ,मन हुआ काकी से मिलने का उनके घर गई , वहां सब कुछ बदल सा गया था ,उनका स्वर्ग सा घर चार दीवारों में बट चुका था।
मैं आवाज लगाई -"सगरी काकी-सगरी काकी---!"मेरी सगरी काकी बुढ़ी हों गयी थी,कमर झुकी हुई,बाल पक गए थे,वह लाठी टेकती हुई बहार निकली---
आंखें धुंधली, मेरी आवाज़ को परखने की कोशिश कर रही थी।
  मैंने कहा-"काकी! मैं आपकी छोटी मालकिन "
वह मुझे पहचान गई, मेरे बाहों में लिपट गई-ओह मेरी.....नोनीं । 
   मैंने  बातचीत की शुरुआत की 
और "काकी! आप अपने घर में संतृष्ट हैं?
काकी बोली _" नोनी पहले मैं संतृष्ट थी लेकिन अब नहीं!
मैंने कहा क्यों काकी?
" जब मेरे चारों बेटे मेरे ऊपर निर्भर थे तब मैं संतृष्ट थी।अब मैं उनपर आश्रित हूं। मैंने बच्चों को पढ़ा लिखाकर बड़ा किया, सभी नौकरी में हैं,घर में सब कुछ हैं, लेकिन प्यार नहीं,सब कुछ रेस्टोरेंट हो गया है, कौन आता कौन जाता है, मुझे कुछ समझ नहीं आता हैं,बहुए समाजसेवीका है, दुसरी नारी निकेतन की अध्यक्ष, तीसरी वृद्धाश्रम की संचालिका, चौथी हृयूमन राइट्स की सक्रिय कार्यकर्ता सब अपने में मस्त 'दिया तले अंधेरा है' छोटी मालकिन.....!
 कभी खाने को मिलता है, कभी भूखे रहना पड़ता हैं, परिवार में सभी बेटे मेरे पालन-पोषण के लिए महिना बंधवा लिए हैं ,हर महीने एक-एक बेटा के घर जाती हूं, कुछ कह नहीं पाती हूं , मेरी गठरी इस घर से उस घर,  सुबह दवाई पानी खिलाते हैं,टेबल में पानी रख के चले जाते हैं, प्यास लगती है तो पानी पीने के लिए ,जब हाथ बढ़ाती हूं, पानी भी कपकपी हाथ से छूट जाता हैं,नाती पोते को आवाज लगाती हूं, आज कल के बच्चे भी मोबाइल में व्यस्त हो जाते हैं, कुछ सुन नहीं पाते हैं, मैं प्यासे ही रह जाती हूं। 
बस रोती हूं , कोई सुनने वाला नहीं -नोनी!
बस जीवन का क्रम चलता हैं,
मैं अपने आप को कोसती हूं कि 
हे भगवान! आप ने "मेरी कया दशा कर दी है। जिसके चार पुत्र हो उसको दो वक्त की रोटी नसीब नहीं।"
कहती हुई काकी पुनः फफकर रो पड़ी।
        मैं अपने आचल से उनकें आंसू पोछते हुई बोली-मत रो काकी!
भगवान के घर देर हैं,अंधेर नहीं मैं  समझ गई ,  सचमुच एक मां अपने चार बेटे को पाल सकती हैं, लेकिन चार बेटे एक मां को नहीं पाल सकता।
अंततः भाव विभोर होकर मैं भी रो पड़ी  ।

सीमा साहू सुभाष नगर दुर्ग

Monday, April 27, 2020

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- गौरैया चिड़ियां

सीमा साहू 
छत्तीसगढ़ 
रचना -गौरैया चिड़ियां


चिड़ियों की चहचहाहट से दिन की शुरुआत
मेरी छत में चिड़ियां रानी आती है
दाना चुनती है, पानी पीकर उड़  जाती है,
मेरे घर में हर साल घोंसला बनाती है, मैंने भी उसके हिस्से का घर छोड़ दिया है।
कभी  जाम के पेड़ में चढ़ती है, कभी तार में झुला झुलती है,
अपने घोंसले बनाने के लिए,रात दिन मेंहनत करती हैं।
चिड़िया रानी ने तीन चूजों को जन्म दिया है 
एक बेटा और दो बेटी को
तीनों  बच्चों को लेकर छत में आती हैं, अपने साथियों के साथ
पूरा चिड़ियों का समाज चहकता है
मेरे बगिचें में, मैं रोज देखती हूं इन्हे निहारती हूं दूर से
तीनों बच्चों को लेकर आती है गौरैया
उनमें से एक बेटा है,दो बेटियां 
सपरिवार दाना चुनते हैं, लेकिन मैं देखती हूं , चिड़िया रानी का बेटा
बहुत आलसी है, चिड़िया की दो बेटी बहुत चंचल 
वे दोनो बहनें चावल चोंच से खाती हैं, फुर्र से उड़ती है,कभी गमला के नीचे छांव में कभी जाम के पेड़ में , कभी लटकते हुए तार
में झुला झुलती है, कभी पड़ोसी के मीठा नीम के पेड़ में फल का रस पीती है।
लेकिन बेटा चुजा दिनभर मां के पास रहता है, मां दाना खिलाती है
खाता है, पानी पीता है गमले के पास रहता हैं
दोनों बहनें घुम के आ जाती है, चूं जा बहनें के साथ खेलने की कोशिश करता है , बहनें चोंच से मारकर भगाती है
चूंजा चिड़िया पुनः मां के पास आता है,इस बार वह अपने चोंच से दाना चुनता है
फिर से अपनी दोनों बहन के पास जाता हैं।
दोनों बहनें खुशियां से चहकती है, और आसमान की ओर देखती है
और चहक उठता है,उनका परिवार और चिंव चिंव करते उड़ते हैं आसमां की ओर स्वतंत्र रूप से  न कोई शोर है आज  बहुत खुश हैं चिड़िया उड़ान भरने के लिए,


सीमा

Monday, April 13, 2020

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- महामारी

सीमा साहू 
छत्तीसगढ़ 
शीर्षक - महामारी 


सीता राम सीता राम सीता राम कहिए
जब तक काली घटा न हटे ,तब तक घर में रहिए
छींक, खांसी आए तो मुंह में रूमाल ढकिए
हर समय अपना हाथ धोते रहिए
तुलसी,आवला,गिलोय को चबाते रहिए
चाहे मिले संगी साथी  नमस्ते किजिए
सीता राम सीता राम.....
जब तक.....
देखिए रामायण महाभारत परिवार में संस्कार भरिए
घर में बैठकर सांस बहु पापड़ बड़ी बनाइए
सीता राम....
जब तक......
बहुत किया समाज सेवा,अब परिवार के साथ खुशियां लुटाइए
डॉ,नर्स, सिपाही की सहायता किजिए
भारत के किसान के जय-जयकार
किजिए
सीता राम.....
जब तक......।।
देश की सेवा घर में बैठकर किजिए
कुछ दिन ताला में रहकर, संसार से दूर रहिए
खुशियों के चाबी खुल जायेंगे
सीता राम सीता राम सीता राम कहिए
जब तक काली घटा न हटे तब तक घर में रहिए।। ✍️सीमा

Friday, March 27, 2020

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- आ अब लौट चलें

सीमा साहू
 सुभाष नगर दुर्ग
 छत्तीसगढ़ 
आ अब लौट चलें ----


एक सूचना दर्ज है, नोटिस बोर्ड पर 
वह सूचना है बड़ी विस्फोटक
जिसने मेरी चेतना को झकझोर कर रख दिया
मां पिता संत महात्मा कह कर थक गए
बच्चों संस्कारी बनो, घर में रहो ,मांस मत खाओ
बहार का खाना मत खाओ
अपने ही देश की रक्षा करों, जितनी चादर उतना पांव फैलाओ
क्यों दौड़ रहे हो भौतिक सुख के लिए
बेटे अपने अध्यात्मिक ज्ञान को धिरे धिरे बढ़ाओ
देश में शांति, वात्सल्य,प्रेम, भाईचारा आयेगा
क्यों आदमी , आदमी को पहचान नहीं रहा है
आज प्रकृति अपना रुप दिखा रहा है
सहम सा गया है, आदमी  आज मां के बनाये हुए रोटी याद आ रही है
मां अपने बच्चे को वात्सल्य प्रेम लुटा रही है
देश में भाई चारा का भाव दिख रहा है
अपने घर में परिवार में बैठकर गीता रामायण पढ़ रहा है आदमी
छलक रहा है माता-पिता के आंसू
सारे परिवार को एक साथ देखकर, संस्कार भारती भारत में लौट आया है 
आज मानव अपना मूल्यांकन, अपने परिवार के घोंसले में बैठ कर कर रहा है

Wednesday, January 29, 2020

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- सरस्वती

सीमा साहू 
सुभाष नगर दुर्ग
भिलाई 
हे मां सरस्वती


अर्थ ,अंलकार,रस, वाणी से 
शब्द,दोहा, चौपाई,सोरठा से
अन्तस की वेदना व्यथित को
भाव और भक्ति से भर दे मां
  अबोध बालक हूं मैं की मैं
मां को पहचान सकूं 
संस्कार और कर्म से
सद्वविचारो से मेरा कोष
भरा रहे मेरी मां सुख दुख
के दो किनारों में रहकर
प्रेम का वात्सल्य भर दे मां
झंकृत जब वीणा करें मेरी
चेतना की तरंग स्वयंम जागृत हो
लय स्वंयम परिभाषित हो मेरी मां
स्पर्श कर सकूं लय युक्त अक्षर को
देश के लिए कलम मेरी चलती रहे
मेरे शब्द से न  किसी सज्जन को
हो दर्द बस संत, सिपाही, शक्ती
और भक्ती  मेरे मयूर मन में बसंत पंचमी की तरह इंद्रधनुषी रंग भर दे मां लयपूर्ण कृति की जिज्ञासा
मेरे तन,मन,धन, सर्व अर्पण कर दूं मां ज्ञान का दीप धर लूं मां
हंस वाहिनी मेरी मां,मेरी प्यारी मां
मेरी प्यारी मां २🙏🦚 सीमा

Friday, December 6, 2019

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- बेटी

नाम सीमा साहू
सुभाष नगर दुर्ग
छत्तीसगढ़
मो नं 

बेटी एक तोफा है
मोहब्बत का प्यार का
स्नेह का ममता का
त्याग का तपस्या का
जप का तप का श्रृंगार का
कन्यादान का पुण्य का
पिता का पति का सम्मान
चेहरे पे मुस्कान बिखेरती है
मां की दुआ,भाई की कलाई का
आंगन की रंगोली, हाथों की मेहंदी
आंगन की देहरी,पायल की झंकार
चुड़ियों की खनक,सिंदुर की दमक, नदियों की अठखेलियां
पेड़ में चढ़ कर खट्टी मीठी आम इमली ,करमा ददरिया पंथी सुआ
नृत्य करती, पनघट की गगरी
छलकाती हुई सुंदर सी बेटी
नभ में उड़ान भरती तितलियां
हर घर में एक प्यारी सी बेटी
विधाता ने बेटी बनाया होगा
स्वर्ग से धरा पर छोड़ने आया होगा।

Wednesday, November 27, 2019

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- वन्दे मातरम्

सीमा साहू
छत्तीसगढ़ भिलाई
शीर्षक- वन्दे मातरम्

मां भारती का यश गान है,यह गीत वन्दे मातरम।
अलग अलग प्रांत,धर्म,जाति है
हम सभी एक हैं वन्दे मातरम्।।
जब क्रांतिकारी सैनानियों देश
के रक्षक ,युवा पीढ़ी कहते हैं वन्दे मातरम्।।
इस देश के रोम रोम में देश प्रेम की भावना।
उस वंदना का सूर है,यह गीत वन्दे मातरम्।।
चैतन्य और सामर्थ्य का सार है वन्दे मातरम्।
गौरव ध्वजा फहरा रहा गीत वन्दे मातरम्।।
सुजल सुफल मलयज शीतल सस्य श्यामलये धरा
सम्बोधन है भारत मां के लिए वन्दे मातरम्।।
कुंकुम ,कलश,आम्रपल्लव, वंदना
है वन्दे मातरम्।।
हर भारतीय के दिल में समाहित है वन्दे मातरम्।
युगों युगों तक हम सभी भारतीय गाते रहेंगे
भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, की तरह हम भी बन जाये
क्रांति के  झंडा फहराया, ऊंचा रहे तिंरगा वन्दे मातरम्।।
आंतकवाद, भ्रष्टाचार , रिश्र्वत खोल, जातिभेद को मिटाकर
सभी मिलकर प्रेम का संविधान बनाये वन्दे मातरम्।।
देश की धरती, मां भारती को
के स्वपन को साकार करें वन्दे मातरम्।।
सीमा साहू दुर्ग भिलाई

Wednesday, November 6, 2019

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- मोबाईल की बीमारी

सीमा साहू
छत्तीसगढ़
मो नं
शीर्षक-मोबाईल की बीमारी



चारों ओर महामारी , मोबाइल की बीमारी
सोने से पहले, उठने के बाद  बस
रातों की नींद हराम दिन भर
उंगलियों से काम ,मां बाप
बच्चों से परेशान।।
नारी भी मोबाइल की प्यारी है
रंग बिरंगी साड़ी पहनकर ए मतवाली है, ए भी मोबाइल की
बीमारी से पीड़ित हैं।।
बेटियां के कया गुण गाए
वह भी हेयरस्टाइल की दिवानी
फेसबुक,टिक टाक में फेमस
दिन भर कमैंट की कतार
यही मोबाइल हैं उसके
जीवन का आधार
हे प्रभु !मेरा कर दो उद्दार
इन माहामारी रूपी मोबाइल से
बेटा भी कम नहीं हैं जनाब
दिन भर मोबाइल का चढ़ा है
उसके ऊपर चढ़ा है सैलाब
छत पर चढ़कर फोटो खिंचवाने
का महामारी रुपी मोबाइल का
पति देव को खाने -पीने का होश नहीं
बस दोस्तों के साथ हसते मुस्कराते हैं
पति देव कुछ पल परिवार के लिए
समय नहीं दे पाते हैं
हाय ये मोबाइल तू कलयुग में क्यों आईं ,महामारी मोबाइल।।
अब न रही रिस्तो में प्यार
बस टकरार अब क्या करें यार
लगता है जीवन बेकार ,अब
जीवन भर झेलों मोबाइल
की मार अब कौन करेगा साकार
रिस्तो को महामारी मोबाइल
को कौन थामें गा कौन बचाएगा
महामारी से?

Thursday, October 17, 2019

छत्तीसगढ़ से कवयित्री सीमा साहू की रचना- अजब छत्तीसगढ़ के गजब रूप


नाम-सीमा साहू
राज्य-छत्तीसगढ़
शीर्षक_अजब छत्तीसगढ़ के गजब रूप
मो नं


भारत भुंइहा में हावय,भइया
किसम किसम के नाम
फेर एक धाम से सबले बढ़िया
छत्तीसगढ़ हे नाम।।
सरी राज के मन हा ,खाते कमाये बर आथे
शिक्षा के धानी हरे हमर भेलई
इहीच हमर जिंदगानी हे।
छत्तीसगढ़ बोली , शिवनाथ
के पानी हे।
देख तो हमर छत्तीसगढ ला
करमा,ददरिया, पंथी ,सुआ
हम गाथन जी, पंडवानी, रामायण
गीता अव संस्कार के धानी हे।।
देख तो हमर छत्तीसगढ ला
पंजाब सही दिखथे जी।
जघा जघा म येहर सिंधी के
सिंध सही दिखथे जी।।
ओलकी कोलकी म अंध्रा,तमिल सही दिखथे
केरल कर्नाटक घलो हमर छत्तीसगढ दिखथे
हरियाणा, मारवाड़ संग ये फबे
हुब हुब दिखथे जी
छत्तीसगढ़ तो हावय भैया
जइसे सूरज के हे धाम।
गुजराती के सौराष्ट्र इहां,मराठा के
महाराष्ट्र
असमिया के आसाम इंहा , बंगाली के बंगाल।
उड़िया मन के उड़ीसा,इहेच गोरखा के नेपाल।
इंहेच बिहारी के बिहार हावे,
के उत्तरप्रदेश के चौपाल।।
छत्तीसगढ़ के भारत लहुटगे,
ये माटी ला परनाम।।
फेर एक......
छत्तीसगढ़ महतारी कहिथे,अपन
लोग लइका मन ला।
आनेच मन अव लानतेच,सगा सोधर मन ला।
त हमन काबर जावत हन भैया
अपन घर कुरिया ला।
छत्तीसगढ़ दाई कलपत हे
झन जा बेटा छोर के मोर
अंचराला।
काबर जाबे बेटा,इंहा हे सब के धाम।।
फेर एक धाम से सबले बढ़िया छत्तीसगढ़ हे नाम।।
जय श्री राम जय श्री राम
हरे हमर भैया,माता कौशल्या
के धाम।
छत्तीसगढ़ ला परनाम, छत्तीसगढ़ ला परनाम।।

Tuesday, October 8, 2019

छत्तीसगढ़ से सीमा साहू की रचना- रामचरित मानस

नाम -सीमा साहू
राज्य-छत्तीसगढ़
शीर्षक-रामचरित मानस
मो -9406210457
रामचरितमानस
यह शरीर अयोध्या हैं
तन में बसने वाले राम
को मेरा सादर प्रणाम
रा से -रामचरित मानस से जीवन सुंदर साकार बना ।
म से-माता सीता का हनुमान को दुलार मिला।
च -चरित्र हो सुंदर यह रामायण सिखाती हैं।
रि-रीत नियम से राम जी करते अहंकार का नाश।
त-तर जाता है पापी भी जिसने लिया है राम का नाम।
मा-मारा जाता है मैं कहने वाला अंहकारी रावण।
न-नष्ट करो मन से मैं रुपी रावण को।
स-समरसता हो परिवार में
    बनें अयोध्या सा धाम।
बोलिए एकता के स्वर में
जय श्री राम जय श्री राम
तन हो राम,मन हो राम,आत्मा राम।
जय श्रीराम जय श्रीराम🙏
        सीमा साहू सुभाष नगर दुर्ग/भिलाई

Monday, September 30, 2019

छत्तीसगढ़ से कवयित्री सीमा साहू की रचना- आंँखो में पावस सी

01.कवयित्री - सीमा साहू
02-राज्य-छत्तीसगढ़
03-शीर्षक-आंँखो में पावस सी
04-मोबाइल नंबर-

नारी जिंदगी !
आंँखों में पावस सी,
लगने लगी नारी जिंदगी।
पूर्णिमा में अमावस सी,
लगने लगी नारी जिंदगी।।

कभी धूप कभी छांँव,
कभी आंँधी तूफान रुपी
मन के गगन में घन सी,
लगने लगी नारी जिंदगी।

परिवार के दो पाटों के बीच
संकट के कांँटों के बीच,
जीवन उपवन में सुमन सी,
महकने लगी नारी जिंदगी।

श्याम मेघ की गर्जना
बिजली वर्षा की सर्जना
आषाढ़ के अभिनंदन में
मयूर मन सी,
मचलने लगी नारी जिंदगी।

रिमझिम बरसे नयनों में सावन
पीड़ा का पावस तड़पाये मन
प्रिय के लिए विरहन सी,
तड़पने लगी नारी जिंदगी।

भीग लो बरस रही
जिंदगी की बूंदें
मिल लो जाने कब
चले जाये मोक्ष में,
जीवन दर्शन में चिंतन सी
उतरने लगी नारी जिंदगी।

ढोंगी कुछ जोगी
लगते वासना के रोगी
उम्र में क्या बेटी क्या पोती
शोषण में बिलखती रोती
जीवन में चीरहरण सी,
ठगी ठगी सी लगती
नारी जिंदगी।।

✍️सीमा साहू

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...