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Tuesday, September 29, 2020

देवयानी शुक्ला की रचना- खौफ़

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- खौफ़
०४. विधा :- मुक्तक 
-----------------------------
*खौफ़*

लेते ही नाम इसका
स्टार्ट हो गया
कोरोना ना हुआ मुआ
*वोल्डेमाॅर्ट हो गया

जब खाना पकाती है
घर घरनी घबराती है 
ना छौंक ही लगती है
ना दाल बघराती है

छींकों को रोक लेना
अब आर्ट हो गया

है खौफ़ सबपे छाया 
कैसा कहर बरपाया
ना कोई घर पे आया  
ना किसी ने बुलाया 

पत्थर सा सख्त सबका
अब हार्ट हो गया 

झुलसाते **बफारों से
नमक के गरारों से
मांगें सभी संरक्षण
अदरक बुझे काढ़ों से

गरम मसालेदार 
डाइट चार्ट हो गया

है फिक्र अपनी सब को
भूले हैं पार्टी क्लब को
कुछ सूरमा हैं लेकिन
ना छोड़ते तलब को

उनका बदन रोगों का
शॉपिंग कार्ट हो गया

खीसे में सेनिटाइजर
घर पर बुलाए बार्बर
पहने हुए दस्ताने 
और मास्क दिए मुंह पर

मोहल्ले का हर इक "पप्पू" स्मार्ट हो गया
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*वोल्डेमार्ट :- बच्चों की फिल्म सिरीज़ "हैरी पॉटर का दुर्दांत खलनायक, जिसके डर से लोग उसका नाम नहीं लेते ।

**बफारे - दवाई मिला कर ली जाने वाली भाप ।
-----------------------------
अतिशयोक्ति अलंकार

1) लेते ही नाम इसका
स्टार्ट हो गया
2)पत्थर सा सख्त सबका अब हार्ट हो गया
3)उनका बदन रोगों का
शॉपिंग कार्ट हो गया

Saturday, September 26, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- क्रूरता

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- सहृदय क्रूरता
०४. विधा :- मुक्तक

-------------------------
सहृदय क्रूरता

समय तेरी ये कैसी सहृदय क्रूरता
जिसके कारण मुक्त हुए हृदय के उद्गार ।
कहीं संवर गए रिश्ते
कहीं छिन गए रोज़गार ।

महामारी ने जीवन के विस्मृत क्षण याद दिलाए ।
नए विकट अवसरों ने
पुराने औज़ारों के धार लौटाए ।

अनावश्यक आवश्यकताओं की छटनी हो गई ।
रोज़गारों के मुंह पर
बंद चिटकनी हो गई ।

किंतु.....
इन सरल कठिनाईयों के बीच,
कुछ आँखों से सपने टूटे।
बुझा दिए ना जाने कितने दीप,
ना जाने कितने अपने छूटे ।

कोरोना काल में हमने 
अपनी खोई पहचान वापस पाई ।
हमारे ही कुछ साथियों ने पर
अपनी रोज़ी रोटी गंवाई ।

आओ सब मिलकर 
नई राह गढ़ते हैं ।
साथ मिलकर विकास की
सभी सीढ़ियां चढ़ते हैं ।।
-----------------------------
विरोधाभास 
*सहृदय क्रूरता
*विकट अवसरों ने
*सरल कठिनाईयों के बीच
*अनावश्यक आवश्यकताओं की छटनी हो गई ।

Saturday, September 19, 2020

देवयानी शुक्ला की रचना- राजमार्ग

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़) 
०३. विधा :- मुक्त छंद
०४.शीर्षक :- राजमार्ग
 _________________    
      *राजमार्ग*

मेरे पड़ोस की सड़क 
जो कि राजमार्ग कहलाती है ,
अपनी ही सीमा से लगी
नदी की कलकल
अक्सर सुन नहीं पाती है ‌।

बेचारी सड़क......
सदा रहती है व्यस्त ,
व्यथित ,विह्वल ।
बिजली के तारों पर सजी
पंछियों की चौपाल में
ठहर नहीं पाती दो पल ।

निरख नहीं पाती है 
उस सुंदर दृश्य को नयन भर ,
जिसे निहारते हैं 
कितने ही प्रेमी युगल
उसी की गोद में बैठकर ।

वो तो बेचारी
कर्त्तव्य भार से
हमेशा हांफती रहती है ।
गाड़ियों की फटकार और
टायरों की चिंघाड़ से 
सदा कांपती रहती है ।

जिसे मिलती है 
गालियाँ जन से और 
उपेक्षा तंत्र से ,
वो सड़क परिचित है ,
झूठी दिलासा और 
सच्चे षड़यंत्र से ।

उसकी पथरायी देह
दिन भर सबका भार ढोती है ।
रात में एकाध पहर को
जब कुछ एकांत पाती है ,
तो फफक कर रोती है ।

कहने को तो वो राजमार्ग है ,
पर उसे सुख है न चैन ।
मैं छत से जब मुस्कुरा कर देखती हूँ उसे ,
तो चुरा लेती है नैन ।

अपनी गरिमा के 
विदीर्ण मखमल को
सरकारी टाट से छिपाती है ।
मेरी पड़ोस से गुजरती सड़क....
इस दीनता में भी 
राजमार्ग कहलाती है ‌।
-----------------------------

Tuesday, September 8, 2020

देवयानी शुक्ला की रचना- पितर

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- पितरों का अभिनंदन
०४. विधा :- मुक्तक

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   पितरों का अभिनंदन
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न ईश्वर का भय, न लज्जा 
न कोई संकोच
जीवित देह का मूल्य नहीं
और मरने पर उत्कोच

जिन संतानों को हैं लगते
माँ बाबूजी बोझ
वही शान से करवाते हैं
उनका मृत्यु भोज

पितृ की अवमानना
और माता पर रोष
ऐसी संतानों का जीवन 
स्वयं है पितृ दोष

पक्षों पर कैसी निर्भरता
आदर की क्या विधियाँ
बूढ़े मात पिता की सेवा
दिन चाहे ना तिथियाँ 

स्वर्ग की पहली ही सीढ़ी है
आदर और समर्पण
लोभ स्वार्थ से दूषित हो तो
व्यर्थ है पितृ तर्पण

सदा मिले सम्मान और आदर
सुख से भरा हो जीवन
सारे जीवित और उपेक्षित
पितरों का अभिनंदन ।
-----------------------------

Monday, September 7, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- निमित्त

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- निमित्त
०४. विधा :- मुक्तक (उदाहरण अलंकार)

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*निमित्त*

सबमें दोष ही ढूंढते
दुर्जन नीच स्वभाव
जैसे मक्खी देह में
ढूंढ के बैठे घाव

भद्र मनुज गुण पारखी
भृंग ज्यों गहे सुवास
छोड़ के सारी वाटिका
बैठे पुष्प के पास

मधुकर के साह्चर्य में
करते जग की सैर
अपने रज के रुप में
फूल फिरे बिन पैर 

अपयश के भागी बने
भंवरे चंचल चित्त
पुष्प-परागण में बने
अनजाने ही निमित्त 
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Wednesday, September 2, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- ताज़ा खबर

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- आज की ताज़ा खबर
०४. विधा :- मुक्तक (संदेह अलंकार)

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*आज की ताज़ा खबर*

ठीक उसकी आंखों के सामने
गांव का आखिरी पेड़
अभी-अभी डूबा है
रत्ना देख रही है विस्फारित नयनों से
जैसे कोई अजूबा है

बाढ़ से शापित उस पेड़ की 
अंतिम बची टहनी
पछाड़ें खा कर जलमग्न हो रही है या
काली पाट वाली हरी साड़ी में 
दहाड़ें मार मार कर
उसकी अम्मा रो रही है 

निर्मम नदी ने पार कर दी हैं विस्तार की जघन्यतम सीमाएँ ,
चौपाल पर बरसने वाले 
आवारा बादल 
घर के सबसे निजी कोनों तक
उद्दंडता से घुस आए 

कल रात की बात है
या 
पिछले किसी जन्म की याद है 

उपलों पर लिट्टी सेंक रही थी
अम्मा बैंगन का चोखा परोस कर 
उसे लाड़ से देख रही थी

ये धुंधलका दृश्य में है
या उसके दर्शन में 
इस पर उसे संदेह है 
दूर से आती वो कोई डोंगी है
या फूल कर बहती हुई 
कोई मृत देह है 

गांव क्या डूबा
उसकी बुद्धि भी जैसे 
गाद से भर गई है 
ना जाने करता हो रहा है 
बादल सनक गए हैं
या नदी बिफर गई है 

सर चकरा रहा है
या कोई हवाई जहाज
चक्कर काट रहा है 
हैं!!!!!
क्या वो यमदूत है
जो डबलरोटी और दूध 
बांट रहा है ???

बड़ी प्यास लगी है मेडम जी .....
ये पानी की बोतल
खोलती क्यों नहीं हो??????
"ए लड़की !! माईक तोड़ दोगी क्या??"
"कैसा महसूस हो रहा है तुम्हें,
बोलती क्यों नहीं हो??"

उसके सूखे गले में 
जाने क्या चुभ रहा है 
उस डूबते पेड़ की 
टहनी है कोई 
या शायद मैडम जी की 
माईक है 
या यम का पाश है........
बड़बड़ाती हुई रत्ना 
बेसुध बेअसर हो गई
आँखें क्या मूंदी 
रत्ना आज की ताज़ा  खबर हो गई ।।
---------------------------
प्रस्तुत कविता में बाढ़पीड़ित रत्ना की मनोदशा का वर्णन करने के लिए संदेह अलंकार का प्रयोग किया गया है ।

Tuesday, September 1, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- चल माँ पढ़

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- चल माँ पढ़
०४. विधा :- मुक्तक (उत्प्रेक्षा अलंकार)
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*चल माँ पढ़*

चूल्हा चौका बहुत हुआ माँ
चल अब क ख ग भी पढ़
दुनिया को न ताक उचक कर
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़

"क्या कर लूंगी मैं लिख पढ़ के ?"
ऐसा तो बिलकुल मत  सोच
अनपढ़ की जो छाप है तुझ पर
चल उठ अपनी कलम से पोंछ

भाग रही है सरपट दुनिया 
दौड़ लगा चल उसे पकड़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़

कल जो तुझको चिठ्ठी भेजूँ 
किससे कहेगी बाँच दे वीर
अपने जी की जी में रखेगी
कह न सकेगी मन की पीर

जब तू जागे तभी सवेरा 
चल उठ अपनी किस्मत गढ़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़

जंगल के पत्ते बूटे पर
तेरे श्रम की छाया है 
इस अजेय व्यक्तित्व में मानो
सारा वन ही समाया है

थोड़ा श्रम शिक्षा पर कर ले
चल अपने अज्ञान से लड़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़

माना नदियाँ,पर्वत,गह्वर
जैसे तेरे सहचर हैं 
लेकिन एक अलग ही दुनिया
इस वन प्रांत के बाहर है

विद्या के कुछ हीरे-मोती
चल अपने व्यक्तित्व पे जड़
दो सीढ़ी शिक्षा की चढ़
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व्याख्या -
प्रस्तुत कविता में एक एक शिक्षित वनवासी बालिका अपनी कर्मठ किंतु अशिक्षित माँ को पढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है ।
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उत्प्रेक्षा अलंकार

*इस अजेय व्यक्तित्व में मानो
सारा वन ही समाया है 

*माना नदियाँ,पर्वत,गह्वर
जैसे तेरे सहचर हैं

Monday, August 31, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- वाह जीवन

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :-  वाह जीवन
०४. विधा :- मुक्तक (उल्लेख अलंकार)

________________

*वाह जीवन*

वाह जीवन !!! क्या स्वाद तुम्हारा
मीठा तीता नर्म करारा
खारे सागर मीठी सरिता
उठती लहरें कलकल धारा

दूध भात तुम हो बचपन के 
मीठी ठौर बने जीवन के  
निश्छलता के पुष्प हैं खिलते
बालकपन के मन उपवन में 

वाह जीवन!!! क्या रूप तुम्हारा
सुंदर उजला मोहक प्यारा

युवाकाल का स्वाद चटपटा
ऊर्जा और पुरुषार्थ से पटा
तेज धार तलवार के जैसी
प्रबल वेग नद धार सरीखा

वाह जीवन!!! क्या शौर्य तुम्हारा
प्रखर पराक्रम प्रबल प्रहारा

फीकी सीठी वृद्धावस्था 
यादों का अचार मुरब्बा
अनुभव का अनमोल पिटारा
बीते सुख का नर्म मुनक्का

वाह जीवन!!! क्या चक्र तुम्हारा
बहती नदिया तीन किनारा
__________________
व्याख्या-

प्रस्तुत कविता में "उल्लेख अलंकार" का प्रयोग कर जीवन के विविध पड़ावों का उल्लेख किया गया है।
__________________

Saturday, August 29, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- निंदा पर दोहे

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- निंदा पर दोहे
०४. विधा :- दोहा (भ्रांतिमान अलंकार)
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*निंदा पर दोहे*

शत्रु अपना जान के, निंदक निंदे मूढ़। 
निंदा निंदे दोष सब, यही ज्ञान है गूढ़।। 

मिथ्या श्लाघा से लगे, पावक पावस एक। 
निंदा चुटकी काट के, खोले चक्षु अनेक ।। 

अपने पर मोहित सभी, महिमा कही ना जाए। 
मोहन समझें स्वयं को, निंदा सही ना जाए ।।

मौन रहे तो संत लगे, बातें निपट गंवार। 
ज्ञान की गुरुता सह सके , ऐसा नहीं संसार ।। 

विपदा में नहीं पूछते, सुख में जो उपलब्ध। 
चाटुकारिता से भले, निंदा के अपशब्द ।। 

निंदा से बचता फिरे, मन में पाले दर्प । 
उस अज्ञानी को दिखे, रज्जु में भी सर्प ।। 
------------------------------
(निंदाई का अर्थ है खरपतवार अलग करना )
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*भ्रांतिमान अलंकार*

१)शत्रु अपना जान के
निंदक निंदे मूढ़ 

२)मिथ्या श्लाघा से लगे
पावक पावस एक

३)मोहन समझें स्वयं को

४)मौन रहे तो संत लगे

५)उस अज्ञानी को दिखे
रज्जु में भी सर्प

Friday, August 28, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- श्रम बिन्दु

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- श्रमबिंदु
०४. विधा :- मुक्तक (अपह्नुति अलंकार)


*श्रमबिन्दु*

तुमने ही तो चौक पुरे हैं 
हर घर की चौखट में 
तुमने ही तो मधुर सुरीले 
गीत भरे पनघट में 

तुमने सतत् प्रयासों से
बंजर धरती पर खेत गढ़े
वसुधा के फीके आंचल पर
फसलों के माणिक्य जड़े 

तुमने रचकर ईंट ईंट पर
माटी को आकाश किया
तुमने अपराजित शिखरों  के
साथ बैठ परिहास किया

तुमने ही तो व्याख्या की है 
पीड़ा की और हर्ष की
तुमने ही तो नींव बुनी है 
प्रगति की उत्कर्ष की

नहीं कर्मरत बाहु युगल ये ब्रह्मा के प्रतिरूप हैं
श्रम आनन का प्रखर तेज है
ये ना समझो धूप है


तुमने ही तो दिखलाई हैं
राहें सुख सम्मान की
हे श्रमबिन्दु !!! तुमने झर कर
धुन छेड़ी नवगान की
---------------------------
अपह्नुति अलंकार

* नहीं कर्मरत बाहु युगल ये ब्रह्मा के प्रतिरूप हैं‌

* श्रम आनन का प्रखर तेज है 
ये ना समझो धूप है*

Thursday, August 27, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- पाती

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- *पाती*
०४. विधा :- मुक्तक (रूपकातिशयोक्ति अलंकार)

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*पाती*

तरसी आँखों ने भिजवाई 
पाती इंद्र के गेह ,
रूखी सूखी धरा हो गई 
भेजो कुछ तो मेह ।
भेजो कुछ तो मेह ,
दया हम पर दिखलाओ ।
करुणा की बूंदें तनिक ,
हम पर बरसाओ ।
नहीं पसीजी इस पर भी 
आसमान की छाती ।
शून्य हुए अनुरोध ,
वृथा हुई अनुनय पाती ।

उस पाती को पतंग बनाया ,
ऊँची छोड़ी डोर ।
अंबर के बागीचे में 
उलझी जाकर छोर ।
उलझी जाकर छोर ,
तोड़ लिए बादल सारे ।
फूट फूट कर रोई बरखा
भय के मारे ।
"भय बिनु होए ना प्रीति" ,
कह गए संत गोसांई ।
पाती के उत्तर में छमछम,
बरखा आई ।
------------------------------

Wednesday, August 26, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- श्रद्धा प्रायद्वीप

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- 
*श्रद्धा-प्रायद्वीप*
०४. विधा :- मुक्ति (रूपक अलंकार)
-----------------------
*श्रद्धा-प्रायद्वीप*

एक ओर *करुणा-सिंधु*
एक ओर *ममता-जलधि*
एक ओर *कृपा-सागर*
तीनों ओर तेरी परिधि

मैं *पद-पंकज* पर ओस प्रभु
तुम *प्रेम-मुक्ता* मैं सीप हुई 
तुमसे परिसीमित मैं रक्षित
मैं *श्रद्धा-प्रायद्वीप* हुई
----------------------------

Tuesday, August 18, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- अधूरी ख्वाहिशें

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- अधूरी ख़्वाहिशें
०४. विधा :- ग़ज़ल

*अधूरी ख़्वाहिशें*

छू ही आएगा कभी
ये मन का पंछी चाँद को ।
आसमां सुन ले तेरी ये 
साज़िशें रह जाएंगी ।

टूट जाएंगे सभी 
पिंजरे परों के ज़ोर से ।
देख लेना एक दिन सब 
बंदिशें रह जाएंगी ।

हो गए ग़र हम विदा 
प्यासे यूं ही इस ओर से ,
हाथ मलती उस तरफ की
बारिशें रह जाएंगी ।

मुल्तवी होती रही हैं ,
चाहतें दिल की सभी ।
हम फ़ना हो जाएंगे ,
फ़रमाईशें रह जाएंगी ।

तुम मना ना पाओगे ,
जो रूठ कर मुँह फेर लें ।
हाथ में कुछ अनकही
गुज़ारिशें रहा जाएंगी ।

चल पड़ेगा कारवां
सांसों का सामां लाद कर ,
दो जहानों की सभी
आराइशें रह जाएंगी ।

कब्र में ये जिस्म तो 
इक दिन दफ़न हो जाएगा ।
पर कफ़न में कुछ अधूरी ख़्वाहिशें रह जाएंगी ।।
------------------------------
आराइश - सजावट

Monday, August 17, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- बीती स्मृतियाँ

०१. रचनाकार :- _देवयानी शुक्ला_

०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)

०३. शीर्षक :- *बीती स्मृतियाँ*

०४. विधा :- मुक्तक

०५.दिनांक :- 17/08/2020
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*बीती स्मृतियाँ* 

बीती स्मृतियाँ काई होती हैं ;
पलकों पर उगी,
हरी,मुलायम,
फिसलन भरी काई ;
जिस पर पग धरते ही मन फिसलकर दूर ...
बड़ी दूर निकल जाता है ।

जहाँ ऊब की केंचुली उतार
उछाह ताज़ी हो जाती है 
और हमारे उम्र की दहाईयाँ 
छोटी हो जाती हैं।

जहाँ छोटी-बड़ी स्मृतियाँ 
'म' से शुरु कर खेलने लगती हैं अंताक्षरी।
चहकती हैं गप्पों से शामें,
किताबों के सीने में गुज़रती है दोपहरी।

जहां अच्छे दिनों के मीठे फल 
उचक कर तोड़ने पड़ते हैं ;
और बीते पलों के कड़वे 
अनुभव पीछे छोड़ने पड़ते हैं ।

ये स्मृतियों की भीनी धूप 
जब-जब भी चमकती है ।
हृदय भर आता है ,
आँखें देर तक बरसती हैं ।।
--------------------------

Friday, August 14, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- मैं भारत हूँ

०१. रचनाकार :- देवयानी शुक्ला
०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- 
*मैं भारत हूँ*
०४. विधा :- मुक्तक


*मैं भारत हूँ*

मैं भारत हूँ 
माना पीड़ा आपादभाल
शत्रु फैलाए सहस जाल
पर माथा उन्नत ,मन विशाल

हर शौर्य के लिए उद्यत हूँ
मैं भारत हूँ 

है ओज का सूरज चमक रहा
गौरव से मुख है दमक रहा 
है कठिन भयंकर पथ तो क्या
मेरा प्रयास भी अथक रहा 

अपने भुज बल से 
अवगत हूँ
मैं भारत हूँ 

माना अश्रु हैं भरे हुए
पग में कंटक हैं गड़े हुए
अवरोध कई हैं खड़े हुए

मैं आशाओं का पर्वत हूँ
मैं भारत हूँ 

मेरी उन्नत यात्रा जारी है 
आशाएँ कभी न हारी हैं 
संकल्प के पथ पर चलना है
माना तलवार दुधारी है 

मैं जीत के लिए दृढ़मत हूँ
मैं भारत हूँ 

मीलों के पत्थर साथ लिए 
एक अरब जोड़ियाँ हाथ लिए 
संघर्ष के गहन अंधेरे में
हाथों में उज्ज्वल प्रात लिए

मैं नई सदी का स्वागत हूँ
मैं भारत हूँ 

एक भोर की लाली बिखर रही
मेरी प्रतिभा दिन दिन निखर रही 
कितनी भी बाधाएँ आएँ 
मेरी गरिमा सदा ही प्रखर रही 

हर परिस्थिति में संयत हूँ
मैं भारत हूँ 

अपने अतीत से हूँ गर्वित 
और वर्तमान से हूँ ऊर्जित
हूँ दूरदर्शी हूँ सहज सजग 
भावी चुनौतियों को सज्जित 

जीवन रण में पारंगत हूँ
मैं भारत हूँ 
------------------------------

Thursday, August 13, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- बंधु अनन्य

०१. रचनाकार :- *देवयानी शुक्ला*
०२. जिला/राज्य :- *रायपुर (छत्तीसगढ़)*
०३. शीर्षक :- *बंधु अनन्य*
०४. विधा :- मुक्तक (असम अलंकार )

*बंधु अनन्य*

रक्त जुड़े संबंध सब,
जब पीछे हट जाएँ |
नेह की डोर से बंधे हुए 
मीत ही साथ निभाएँ ।
मीत ही साथ निभाएँ ,
न इन -सा दूजा कोई ।
इस विधि करें मिताई ,
हो जैसे पूजा कोई ।
बंधु मिले अनन्य ,
कि जैसे जन्मों के अनुबंध ‌
पीछे रह जाएं सारे
रक्त जुड़े संबंध ।।
___________________
*असम अलंकार*

# न इन -सा दूजा कोई

# बंधु मिले अनन्य

Wednesday, August 12, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- भारत

01. रचनाकार का नाम :
देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़) 
03. छंद :- मुक्त (अनन्वय अलंकार) 
04. रचना का शीर्षक :-

*स्वावलंबी भारत*

उठो ! तनिक निज गर्व निहारो ।
निर्भरता की परत उतारो 
भारत तुम सम केवल तुम हो ।
अपनी क्षमताओं को संवारो ।

सुई से लेकर चंद्रयान तक ,
पदतालों से नभ उड़ान तक ,
औषधियों से आत्मज्ञान तक ,

हर मोर्चे पर झंडे गाड़ो ।
भारत तुम सम केवल तुम हो ।
अपनी क्षमताओं को संवारो ।

तुम से इस जग में बस तुम हो ।
भारत माता के कुमकुम हो ।
विश्व हाट से क्यों कर गुम हो ?

परदेशी रिपु को ललकारो ।
भारत तुम सम केवल तुम हो ।
अपनी क्षमताओं को संवारो ।।

___________________
अनन्वय अलंकार

*भारत तुम सम केवल तुम हो

*तुम-से इस जग में बस तुम हो

Tuesday, August 11, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- मोक्ष

01. रचनाकार का नाम :
देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़) 
03. छंद :- सवैया (उपमा अलंकार) 
04. दिनांक :- 11-08-2020
05. रचना का शीर्षक :-

*मोक्ष की लोनी*

रुन-झुन पैंजनी ,
छुन-छुन करधनी ,
केशव के डगमग पगफेरे ।
लाल वैजन्ती की ,
माल सुहावनी ,
सारी धरा को है जैसे घेरे ।
नैन कटार-से ,
बैन मल्हार-से ,
मायाजाल के जैसे चितेरे ।
नंद के लाल की ,
बाल गोपाल की ,
ऐसी छबि है बसी मन मेरे ।।


कृष्ण की वेणु-सी ,
गोकुल की धेनु-सी ,
ब्रज रेणु-सी बना दे विधाता ।
यमुना का तट ,
गोपियों का घट ,
राधा का पनघट दिखा दे विधाता ।
गोप सखा संग ,
मोर पखा रंग ,
मुझको भी रंगवा दे विधाता ।
मोह दुहानी-सा ,
प्रेम मथानी-सा ,
मोक्ष की लोनी चखा दे विधाता ।
___________________
*लोनी = माखन

_उपमा अलंकार_

( सा,सी,से और जैसे लगे सभी पदों में उपमा अलंकार है। )

Saturday, August 8, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- गगन के दीप

1. रचनाकार का नाम :
*देवयानी शुक्ला*
2. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़) 
3. छंद :- मुक्तक *(श्लेष वक्रोक्ति अलंकार)* 
4. रचना का शीर्षक :-गगन के दीप

किस गगन की सैर पर
निकले पतंग तुम ?
जिस गगन के दीप बन 
निकले पतंग तुम ।

चाल ये, क्या ठाठ ये 
और ये प्रखरता !!!
दोपहर में दिवस का 
यौवन निखरता ।

साथ ले आए हो 
बचपन की तरंग तुम ।
हो गए हो अश्वमेध के 
तुरंग तुम ।

क्यों भला सर पे
सभी के तन गए हो ?
तुम भी तो मर्ज़ी के राजा
बन गए हो !

अपनी ऊर्जा देख क्यों
होते हो दंग तुम ?
होड़ जैसे कर रहे हो
मेरे संग तुम ।

अपनी क्षमता को 
सदयता से बरतना ।
दीन दुखियों के सदा
संताप हरना ।

सांझ की बेला में भर दो
थोड़े रंग तुम ।
हर निस्संग को थाम लो
बन अंतरंग तुम ।।
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व्याख्या - कविता में दोपहर के सूर्य और जीवन की दोपहर के सूर्य अर्थात् युवा शक्ति के मध्य 
उनकी शक्ति,सामर्थ्य और कर्त्तव्य के विषय में वार्तालाप है।
दोनों ही एक दूसरे को संसार के कल्याण के लिए प्रेरित कर रहे हैं ।
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*श्लेष वक्रोक्ति अलंकार*

पतंग (1) पक्षी (युवा)
पतंग (2) सूर्य

दोपहर (1) -अपराह्न
दोपहर (2) -युवावस्था

सांझ -वृद्धावस्था
रंग -आनंद

संपूर्ण कविता में श्लेष वक्रोक्ति है।

Friday, August 7, 2020

रायपुर से देवयानी शुक्ला की रचना- चिर सुख

01. रचनाकार का नाम :
देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़) 
03. छंद :- मुक्तक (पुनरुक्तवदाभास अलंकार) 
04. रचना का शीर्षक :-

*चिर सुख*

जीवन की सब माया मिथ्या
हर्ष प्रमोद समनार्थ नहीं
सच्चे सुख की राह कठिन है 
बुद्ध हर एक सिद्धार्थ नहीं

सबके अपने-अपने सुख हैं
सबके अपने-अपने दुःख
जाली है कृत्रिम प्रसन्नता 
झूठे हैं सब हर्षित मुख

चरम सत्य से भरे जगत में
कुछ भी परम यथार्थ नहीं

अली कली के स्वांग में उलझा
मधु की आस भी मधुर कहाँ
यह प्रछन्न कारा है पगले 
भटक रहा तू भ्रमर कहाँ 

ये आलिंगन ये अपनापन
कलिका का परमार्थ नहीं

अनादि अनंत के श्रीपद में
अर्पित हो चिर सुख पा लेते
जिसके सान्निध्य में प्रेम बसा
उनको हम सम्मुख पा लेते

किंतु इस जीवन के रण में
माधव तो हैं पर पार्थ नहीं ।
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व्याख्या :-इस कविता में मिथ्या संसार में ईश्वर की शरण को ही सच्चे सुख का उपाय बताया गया है।
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पुनरुक्तवदाभास अलंकार

माया -जादू भरे
मिथ्या - झूठ

हर्ष -खुशी
प्रमोद -मज़ा

बुद्ध -भगवान बुद्ध
सिद्धार्थ -नाम

जाली- जाल से भरा
कृत्रिम- नकली

सत्य -सच
यथार्थ -वास्तविकता

अली -भंवरा
भ्रमर -भ्रमित

मधु -शहद
मधुर -मीठा

अनादि -ईश्वर
अनंत -विष्णु

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...