स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'रक्षाबन्धन'
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पवित्र रिश्ता होता जग में , भाई-बहन का प्यार ।
रेशम के दो ताग में भरा , प्यार का है भण्डार ।।
भाईकी रक्षा की कामना , करे बहन रखे ध्यान ,
रक्षासूत्र में नित छुपा रहा , रक्षा की है पहचान ।
प्यार-स्नेह के इस धागे में , बन्धा हुआ संसार ।।
सबूत है बहन के प्रेम का , रक्षाबन्धन का डोर ,
सबको बाँटता भारी खुशी , बिखेरे चारो ओर ।
बहना की सुरक्षा की भाई , संकल्प ले हर बार ।।
इस पर्व में भाई-बहन का , उमड़े प्रेम का भाव ,
एक-दूजे के शुभ सोच का , इसमें निहित वर्ताव ।
रिश्ते की महत्व को ताजा , करता रक्षा त्यौहार ।।
बहन भाई की कलाई में , स्नेह का बान्धे ताग ,
यह उत्सव दोनों के मन में , बढ़ाता है अनुराग ।
रोली-चन्दन की टीका दे , खिलाती मिष्ठाहार ।।
सदियों से है देते आया , यह त्यौहार आनंद ,
पवित्र प्रेम का प्रवाह प्रथा , कभी नहीं हुआ मंद ।
सुरक्षा हित सदैव भाई की , बहना करे मनुहार ।।
रक्षासूत्र पहना के बहना , जाती खुशी में खूब ,
भाई भी राखी बँधवा के , खुशी में जाता डूब ।
हमेशा रक्षाबन्धन 'ठाकुर', करता हर्ष संचार ।।
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व्याख्या--प्रस्तुत रचना में रक्षाबन्धन के महत्व एवं
भाई-बहन के पवित्र प्रेमपर प्रकाश डालने
यथा सम्भव प्रयास किया गया है ।
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