स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विषय--छत्तीसगढ़ के सन्त
शीर्षक--सन्त शिरोमणि गुरु घासीदास
०××××××०
ललना महँगूदास के , अमरौतिन के लाल ।
बाबा घासीदास हैं , सन्तों के ज्यों भाल ।।१।।
धरती छत्तीसगढ़ की , बाबा महान सन्त ।
अवतारी सज्जन रहे , महिमा रही अनन्त ।।२।।
सत्यनाम के पंथ का , किये प्रचार-प्रसार ।
जोते थे हल बैल बिन , किये थे चमत्कार ।।३।।
अग्नि बिना है आपने , भोजन कर तैयार ।
चमत्कृत किये वे कई , रहा सत्य आधार ।।४।।
समाज सुधार वे किये , दिये विचार अनेक ।
सारे मानव एक हैं , सब का स्वामी एक ।।५।।
सत्य-अहिंसा है दया , करना परोपकार ।
माँसाहार तज दें सब , लें सात्विक आहार ।।६।।
यथा अन्न करते ग्रहण , वैसे बने विचार ।
बढ़े माँस भक्षण किये , मन में खूब विकार ।।७।।
आये मानस मूढ़ता , कुण्ठित होता ज्ञान ।
जीव मात्र में प्रभु बसे , करें जीव का मान ।।८।।
जीवोंपर करना दया , हत्या करना छोड़ ।
नशा पान करना नहीं , इससे है मुँह मोड़ ।।९।।
सदा सत्य वाणी कहें , सत्य जगत में सार ।
असत्य बोल कहें नहीं , झूठ नर्क का द्वार ।।१०।।
गौ हत्या बन्द करना , पशु बलि देना पाप ।
वास करें हर जीव मेंं , राम ब्रह्ममय आप ।।११।।
छोड़ मूर्ति पूजन करें , ईश प्रभु निराकार ।
रूप रहित 'ठाकुर' रहे , धरें नहीं आकार ।।१२।।
०××××××०
व्याख्या--प्रस्तुत रचना में सन्त शिरोमणि गुरु-
घासीदास के चमत्कार एवम् उनके
उपदेशपर प्रकाश डालने का यथा
सम्भव प्रयास किया गया है ।
No comments:
Post a Comment