Thursday, May 20, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- दोहन करना छोड़ो

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { सार छन्द }
शीर्षक--दोहन करना छोड़ो                    
                       ०××××××०
प्रेम  प्रकृति से  करना  प्यारे , नाता   उनसे  जोड़ो ।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।

मानव  मिलके  निर्दयता  से , निचोड़ दी धरती को ,
तेरा   लालच   खा  जायेगा , निश्चय ही जगती को ।
संतुलन  को  कायम  रखना , सीमाएँ   मत   तोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।१

सारी  धरती  उजाड़   डाली , तू  ने   बिना  विचारे ,
दूरदृष्टि    है    नहीं   तुम्हारी , उससे  किया किनारे ।
देखा   केवल   वर्तमान  को , भूत तरफ मुख मोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।२

पेड़ - पौध   को  काटा   तूने , नष्ट किया  हरियाली ,
भावी  पीढ़ी  के  जीवन  को , विनाश है कर डाली ।
उनके खातिर  लता - वृक्ष है , प्राणवायु  तो  छोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।३

विशुद्ध जल भी  पीने को  है , उनके लिए  बचा दो ,
संसाधन  के  नित  दोहन  में , प्यारे  रोक लगा  दो ।
आगत  पीढ़ी की हित  साधो , स्वयं हेतु मत जोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।४

भरा  प्रदूषण  इस  धरती  में , पर्यावरण    बिगाड़ा ,
तू  वैज्ञानिक  विकास  का है , निश्चय  झण्डा गाड़ा ।
करना  विचार  मन में  सोचो , भविष्य को  है ताड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।५

जितने  विकास  होगा उतना , विनाश  बढ़ जायेगा
जग में  समीप  बिगाड़ होगा , अति  संकट छायेगा ।
प्रकृति संग 'ठाकुर' कहता है , प्यारे   नाता   जोड़ो ।।
दोहन  करना  बसुधा का  है , अब तो मूरख छोड़ो ।।६
                          ०××××××०
व्याख्या--प्रकृति के दोहन का दुष्परिणामपर प्रकाश
              डाला गया है ।

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