निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { सार छन्द }
शीर्षक--दोहन करना छोड़ो
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प्रेम प्रकृति से करना प्यारे , नाता उनसे जोड़ो ।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।
मानव मिलके निर्दयता से , निचोड़ दी धरती को ,
तेरा लालच खा जायेगा , निश्चय ही जगती को ।
संतुलन को कायम रखना , सीमाएँ मत तोड़ो ।।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।१
सारी धरती उजाड़ डाली , तू ने बिना विचारे ,
दूरदृष्टि है नहीं तुम्हारी , उससे किया किनारे ।
देखा केवल वर्तमान को , भूत तरफ मुख मोड़ो ।।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।२
पेड़ - पौध को काटा तूने , नष्ट किया हरियाली ,
भावी पीढ़ी के जीवन को , विनाश है कर डाली ।
उनके खातिर लता - वृक्ष है , प्राणवायु तो छोड़ो ।।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।३
विशुद्ध जल भी पीने को है , उनके लिए बचा दो ,
संसाधन के नित दोहन में , प्यारे रोक लगा दो ।
आगत पीढ़ी की हित साधो , स्वयं हेतु मत जोड़ो ।।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।४
भरा प्रदूषण इस धरती में , पर्यावरण बिगाड़ा ,
तू वैज्ञानिक विकास का है , निश्चय झण्डा गाड़ा ।
करना विचार मन में सोचो , भविष्य को है ताड़ो ।।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।५
जितने विकास होगा उतना , विनाश बढ़ जायेगा
जग में समीप बिगाड़ होगा , अति संकट छायेगा ।
प्रकृति संग 'ठाकुर' कहता है , प्यारे नाता जोड़ो ।।
दोहन करना बसुधा का है , अब तो मूरख छोड़ो ।।६
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व्याख्या--प्रकृति के दोहन का दुष्परिणामपर प्रकाश
डाला गया है ।
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