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Wednesday, March 31, 2021

प्रताप चंद साहू की रचना- सरहद

रचनाकार-प्रताप चंद साहू
जिला-जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़)
विधा-कविता
शीर्षक- सरहदें

जब लोग पार कर जाते हैं हदें-२
उनके बीच बन जाती है नफरत की सरहदें।।

क्यों उठती ये नफरत की दीवार-२
अगर करते हम एक-दूसरे से प्यार।।

आखिर हम भी तो अपने हद में नहीं हैं-२
इसलिए कोई शांति सरहद में नहीं है।।

ना पाक बनता ना बांग्लादेश बनता-२
केवल और केवल भारत देश बनता।।

न होते ये जिन्ना विचार वाले नेता-२
गांधी, सुभाष, टैगोर भारत और देता।।

आज गांव-गांव के बीच नफरतें है-२
शहर-शहर के बीच कटुता है।।

नेता-नेता में मार-काट है-२
जनता-जनता न कोई अछुता है।।

फिर कैसे मिटेगी ये तनाव की सरहदें-२
जब बोझ बनकर एक दूसरे पर लदें।।

इसके लिए मर्यादा और सहयोग की नैया में लगें_२
खत्म हो जायेगी ये नफरत की सरहदे
                  नफरत की सरहदें।।

Monday, January 25, 2021

जांजगीर-चांपा से प्रताप चंद साहू की रचना

रचनाकार-प्रताप चंद साहू
जिला- जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
विधा- पद्य 


दीन हूं नहीं कोऊ सरदार ।
करता भक्ति भाव है तेरो छपै नहीं अखबार ।
कहता कोई मूरख है तो कोई ढोर गंवार।
अचरज लागो है बड़ मोही ए देखि देखि संसार।
आस्तिक भयी दुश्मन सारे नास्तिकन भयी यार।
कहैं प्रतापा मरै वै जो चिन्है न मुक्तावन हार।।४।।

मेरो जात चौधरी होऊ।
ना श्रेष्ठतम है ना उधमा मध्यम क्रम में सोऊ।
का हुआ तुम वेदना रूठी कभी न हमी रोऊं।
जात -कुजात न जानव कबहूं ऐसी मोर सुभाऊं।
उजला-मैला पहचाने हौं ता चौधरी कहाऊं।
कहैं प्रताप हमार प्रभु और जन्म  इहि पाऊं।।५।।


प्रेमन से मिले प्रभुताई।
माया-वश ही दूर रहा मैं चेतना नहीं आई।
कियो प्रेम था अनन सुकन्या दोऊ-हिया समाई।
ताहि समया मम् हिरदै में आदि शक्ति परछाई।
छोड़ कन्या लगे योग साधे‌ बहु दिन बा प्रभु पाई।
तभी वेदना प्रताप मिले थाल आरती सजाई।।६।। 


प्रताप चंद साहू

Saturday, November 7, 2020

जांजगीर से प्रताप चंद साहू की रचना- माता-पिता

रचनाकार-प्रताप चंद साहू
जिला-जांजगीर (तुलसी) छत्तीसगढ़
 विधा-चौपाई 
शीर्षक -माता-पिता


बड़ि विडंबना हुए संताना। बात-बात लगे आंख दिखाना।
रहत पढ़त अरू रौब जमांहीं। विद्या-बुद्धि कुछ नहीं पाहीं।।6।।

टूटी कमर ढोवहि नर्क बोझा।पाई विद्या जो कोई ओझा।
काम धाम नाहिं मन रूचा। तन श्रृंगार बनावहि रूपा।।7।।

गली गली सो दौड़ लगाई। कन्या देख ता कियो हंसाई।
बढै केस-वधु इत्र छिडकावा। ना जानव काहू धन पावा।।8।।

मात-पिता है आश लगायो। कियो करम सो फल अब पायो।
लगै नौकरी दुर को जावा।सुत-बनिता ते प्रेम बढ़ावा।।9।।

रहो घर तो कियो लरकाना। बंद-जुबान-मार धमकाना।
मात-पिता लो हुए नरकों सा।पावक-पत्नी बने सरकों सा।।10।।

Friday, October 30, 2020

जांजगीर-चांपा से प्रताप चंद साहू की रचना- चंद्रमा

रचनाकार-प्रताप चंद साहू
जिला-जांजगीर(छत्तीसगढ़)
विधा-कविता
प्यारा चन्द्रमा


सूरज यूं ही धीरे-धीरे डूबता रहा।
चन्द्रमा भी धीरे-धीरे उगता रहा।।

भूल हुआ उसे अभी भोर की अंधेरा।
मैं जाऊंगी तो शाम होगी या सबेरा।।

इस भ्रम डूबकर मैं लास हो गई थी।
इधर या उधर हाय!हताश हो गई थी।।

डाल पर चिड़िया चहचहाने लगे थे।
एक दो लोग आने जाने लगे थे।।

खड़ी रही मैं निर्जीव स्तंभ सा।
शायद किसी के आने में विलंब था।।

बेसुध -ब्याकुल मैं बड़ी बेचैन थी।
असकों की धारों से गिली मेरी नैन थी।।

तभी खत्म हुआ इंतजार की घड़ियां।
उदित हुआ मेरा प्यारा चन्द्रमा।।

दुर हुआ चूभन जो दुखता रहा।
सूरज यूं ही धीरे-धीरे डूबता रहा।।
                              डूबता रहा।।।

Monday, October 19, 2020

जांजगीर से प्रताप चंद साहू की रचना- ज्ञानदीप

रचनाकार - प्रताप चंद साहू
जिला - जांजगीर (छत्तीसगढ़)
शीर्षक - ज्ञानदीप
विधा - दोहावली

प्रताप प्रभु-चरण निर्मल, लख सके नहीं कौऊ।
लखन चाह सो मैं गया, मन विरक्त सा होऊ।।१९।।

नर काहे घमंड करै, ना जाने कब जाय।
प्रताप एही न समझै, बोल एक बार हाय।।२०।।

छोटे से पदवी धरै, बड़ो-बड़ो ही बताय।
ता घरै मिलनै जाहु, प्रताप रोऊ आय।।२१।।

कलयुग ऐसा फेर है, न जाने कोय धरम।
मात-पिता बांह पकड़े, प्रताप कोऊ सरम।।२२।।

नारी ऐसी होइया, लगै लक्ष्मी अवतार।
चित्त न इतै-उतै हुआ, प्रताप पुज संसार।।२३।।

कर पुष्प तु पकड़े सदा, और धरे तलवार।
दुनिया की शक्ति तुझमें, प्रताप तेर रखवार।।२४।।

जात-पात को न मानूं, स्वच्छ डारिहौं नजर।
साफ ठीक न साफ रहा, न बैठूं चाहे गुजर।।२५।।


Tuesday, October 13, 2020

प्रताप चंद साहू की रचना- चांद ने किया

रचनाकार -प्रताप चंद साहू
जिला - जांजगीर (छत्तीसगढ़)
शीर्षक - चांद ने किया इशारा था


जिंदगी का ओ दिन सबसे प्यारा था -२
चांद ने जब किया इशारा था ।

देख तुम्हें शर्मा गई जो -२
फूल नहीं ओ तारा था
जिंदगी का ओ दिन प्यारा था।।

कैसे समझूं मैं दुर तुमको -२
बैठी अपना किनारा था
जिंदगी का ओ दिन प्यारा था।।

कभी जलते और कभी बूझते -२
वह जुगनू बस सहारा था
जिंदगी का ओ दिन प्यारा था।।

कैसे भूल पाऊं ओ सबब -२
जब चमकी उनकी सितारा था
जिंदगी का ओ दिन प्यारा था।।

नहीं किसी कि नजर उन पर -२
वह तो बस हमारा था
जिंदगी का ओ दिन प्यारा था

उनको देने के वास्ते मुझे-२
आसमां ने पुकारा था
दिल से लगाए खत-तस्वीर-२
वह केवल तुम्हारा था
जिंदगी का ओ दिन प्यारा था।।

Monday, October 12, 2020

प्रताप चंद साहू के दोहे

रचनाकार _ प्रताप चंद साहू
जांजगीर (तुलसी)- छत्तीसगढ़
ज्ञानदीप (दोहावली)२००३


१०. अल्ला अल्ला कहनै लगे,अल्लाहोअ न जान।
जो अल्ला के बंदे हों, खुद को ले पहचान।।

११. मरत नहीं वह हिन्दू, पूजै बकरी -भेड़।
राम भी पूजै ताको, मिटै र उन्की खेल।।

१२. विद्यार्थी मृदु सुभाऊ, गुरु वचन लिए शिश।
ताही जन आगै बढै, नेम नेह व सुशील।।

१३. सतै छात्र को लक्ष्णाय, मात -पिता सो दास।
रिपुवन सो मित्रन किजै, चाहत जन-जन आस।।

१४. रंक ऐसा सुभाइया, जैसे संत सुभाव।
सुख-दुख दोऊ पल है, फिर धुपन तोउ छांव।।

१५. साहित ऐसा ना होय, जा में नंग समाय।
सतै चरित्र सत जीवना, पाक-साफ ही आए।।

१६. सत्यता चिंतामणि हैं, जो चाहत सो पाए।
सतै राह को छोड़ तो, रौ-रौ नरक ही जाए।।

१७. सत्यता ऐसी ना मिलै, करो तपस्या व ध्यान।
आंख मूंद कर सबै दिन, लियो प्रभु का नाम।।

१८. जनेऊ महता भारी, जाने नाहीं लोग।
देखा मैं दोऊ धारी, एक सीधै एक चोर।।



Saturday, October 10, 2020

प्रताप चंद साहू की रचना- संगीत

रचनाकार _ प्रताप चंद साहू
जांजगीर (तुलसी) _ छत्तीसगढ़
सुगम संगीत


यूं तो वक्त चला गया आपके आने का -२
बहाना ढूंढो कुछ आ न पाने का।।

रास्ता देख रहा था आपके आने का -२
मन कुछ नहीं कर रहा था खाने का।।

विश्वास उठ गया है तंग जमाने का -२
मन करता है केवल मातम मनाने का।।

शायद आपका मन था मुझे रूलाने का-२
इसलिए प्रयास नहीं किए हंसाने का।।

क्या  कहूं तुम्हारे उस बेदम बहाने का-२
जिसने तुम्हें रोक रखा उस ठिकाने का।।

देखा राह सूर्योदय से अस्ताने का-२
जलती दीपक हुआ बुझाने का।।
युं तो वक्त चला गया आपके आने का।।



दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...