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Saturday, June 12, 2021

तू भी काश : विनोद कुमार "जोगी"

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
शीर्षक :- तू भी काश समझ जाती।
विधा :- छंद मुक्त कविता

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बड़े जतन से लिखकर यारा,
भेजी थी मैंने पाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को, 
तू भी काश समझ जाती।

बाल हृदय में नया नया जब, 
प्रेम पुष्प नव फूटा था।
रातों की नींदें खोई थी, 
चैन हृदय से छूटा था।
मैंने तुझको अपना माना,
तू ना समझी संगाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को, 
तू भी काश समझ जाती।

कोरे कागज में मैंने तब, 
प्रेम भाव लिख डाला था।
प्रथम प्रेम का नशा चढ़ा था, 
बन बैठा मतवाला था।
मेरी प्रेम कहानी को तुम, 
अपने हिय को समझाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को, 
तू भी काश समझ जाती।

भले नहीं मालूम सुनो पर, 
खिड़की से मैंने झांका।
जाने कितनी बारी मैंने, 
भरी सभा में है ताका।
मेरे उर के मधुरिम गाने, 
खुले हृदय से सुन पाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को, 
तू भी काश समझ जाती।

निष्ठूर बनकर बिन पढ़े ही, 
खत को तूने फेंका था।
चुपके से खिड़की से छिपकर, 
मैंने तुझको देखा था।
काश उसे पढ़कर के तू भी, 
ढांढ़स झूठी बँधवाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को, 
तू भी काश समझ जाती।

नेह निमंत्रण को मेरे तुम, 
काश नहीं तब ठुकराती।
मेरे दिल के जज़्बातों को, 
तू भी काश समझ जाती।

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व्याख्या :- रचनाकार ने अपनी कविता के माध्यम से वियोग रस से सराबोर, अपनी प्रेयसी को संबोधित करते हुए कहा है कि आखिर क्यों उसने प्रेम पत्र को बिना पढ़े फाड़ दिया।

Monday, May 31, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- प्रहरी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- प्रहरी
शीर्षक :- वह बैठा है आराम से।
विधा :- छंद मुक्त कविता

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दरवाजे पर बैठा है प्रहरी,
एकटक निगाहें किए।
लोगों की सुरक्षा को सचेत,
उसे विरक्ति है उगते हुए दिन से,
ना ललचाता है ढ़लती हुई शाम से।
और हम ठहरे मुरख जो ये सोचते हैं,
वह बैठा है बड़े आराम से।

सारी जिम्मेदारी उसके कांधे पर है,
और नयन से नींद नदारद है।
रखा है चाय की प्याली, और एक पुरानी टाॅर्च,
एक बड़ी सी लकड़ी, सुरक्षा हेतु।
मानो उसने छुट्टी ले ली हो,
हमेशा के लिए विश्राम से।
और हम ठहरे मुरख जो ये सोचते हैं,
वह बैठा है बड़े आराम से।

बन जाता है कभी सब्जी वाला,
कभी बच्चों को स्कूल तक ले जाता है।
कभी बुला लाता रिक्शा गेट पर,
कभी साहब की गाड़ी धुलवाता है।
कभी करता नहीं है कामचोरी वह,
मतलब रखता है बस अपने काम से।
और हम ठहरे मुरख जो ये सोचते हैं,
वह बैठा है बड़े आराम से।

हाँ वो भी प्रहरी है देश का,
जो सीमा पर तैनात खड़ा है।
जब जरूरत पड़ी देश को,
अपना जी-जान लगा कर लड़ा है।
कतरा-कतरा वतन के वास्ते बहाता,
करता अगाध प्रेम आवाम से।
और हम ठहरे मुरख जो ये सोचते हैं,
वह बैठा है बड़े आराम से।

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Saturday, May 29, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- क्या होगा जी हाल

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- मुक्त
शीर्षक :- क्या होगा जी हाल।
विधा :- दोहा गीत

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उठे हृदय में नित्य ही, केवल एक सवाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

बरसों तक घर में रहे, लगा बुद्धि में जंग।
दूर पढ़ाई से हुए, मचा रहे हुड़दंग।।
देखो जकड़ रही हमे, यंत्रों का यह जाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

विद्यालय जाते सदा, पढ़ते थे नव पाठ।
पूरी कक्षा में सुनो, होती थी निज ठाठ।।
घर बैठे शिक्षा हुई, देखो अब बेहाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

कोरा कागज हो गए, बचा नहीं कुछ शेष।
बदल गया है आचरण, बदल गया है भेष।।
जिज्ञासा अब मर गई, ज्ञान लगे जंजाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

कोरोना के दौर का, लगा हमें आघात।
भूल गए हैं ज्ञान सब, करनी नव शुरुआत।।
फिर से नव आगाज में, धीमी होगी चाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

जाने कैसे यह कटे, रोग व्याधि के काल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

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Wednesday, May 26, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- दिवास्वप्न

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- दिवास्वप्न
शीर्षक :- दिवास्वप्न
विधा :- कविता ( छंद मुक्त )

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बैठा है खेत की मेड़ पर,
एक नन्हा सा बालक नादान।
सामने गायों का झुंड है,
नीचे घास, ऊपर खुला आसमान।

मन में उसके चलचित्र की भांति,
दिख रहा है दृश्य सुहाना।
दिवास्वप्न में खोया बालक,
चाहता है खूब कमाना।

देखता है दृश्य अद्भुत,
दूध बेच पैसे कमाता।
खुला है गोठान नव्य,
गोबर वहाँ बेच आता।

जो भी मिलते पैसे उनसे,
ले लेता गायों का जोड़ा।
फिर पैसे जो और मिले तो,
ले आता एक अद्भुत घोड़ा।

इसी तरह आगे बढ़ते वह,
बन जाता नामी धनवान।
नौकर-चाकर लेकर आते,
स्वाद भरे मीठे पकवान।

तभी अचानक सपना टूटा,
वर्तमान में आया नादान।
गायब हो गए नौकर-चाकर,
खो गए कहीं सारे पकवान।

खेत में ही बैठा था वह,
नहीं हुआ था वह धनवान।
टूट गया वह दिवास्वप्न अरु,
टूट गए सारे अरमान।

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Tuesday, May 25, 2021

मानसून पर विनोद कुमार "जोगी" के दोहे

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- मानसून
शीर्षक :- जोगी के दोहे "मानसून"
विधा :- कविता
प्रायोगिक छंद :- दोहा छंद

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मानसून का आगमन, लिए नव्य सौगात।
हरी-भरी होगी धरा, जब होगी बरसात।।१।।

सागर से मिलने चले, है नदियों में होड़।
अविरल वे बहने लगी, अनुपम देखो दौड़।।२।।

मेंढ़क टर्राते फिरे, भरे लबालब ताल।
सर्प मीन कछुए सखा, करने लगे धमाल।।३।।

घुमड़-घुमड़ कर घिर रही, देखो घट घनघोर।
पंख पसारे नाचते, वन में पुलकित मोर।।४।।

खेत जोतकर पालता, हिय में नव अरमान।
पहली बारिश देख कर, हर्षित हुआ किसान।।५।।

जब बारिश होगी सखा, घटे धरा की ताप।
शीतल पुरवाई चले, धुले हृदय के पाप।।६।।

झंकृत उर के कोर हैं, मिटे सकल अवसाद।
खुश होकर छतरी कहे, मुझे करेंगें याद।।७।।

कागज की कश्ती बना, खेलें अद्भुत खेल।
बहती जल धारा सखा, दे खुशियाँ बेमेल।।८।।

सकल जगत में चढ़ गया, मानसून का रंग।
गर्जन-तर्जन से घटा, मचा रहे हुड़दंग।।९।।

मानसून को देखकर, जोगी करे पुकार।
हे बादल! बरसो यहाँ, सूख रहा संसार।।१०।।

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Monday, May 24, 2021

विनोद कुमार "जोगी" के दोहे - जीवन

रचनाकार:- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- जीवन
शीर्षक :- जोगी के दोहे "जीवन"
विधा :- कविता
प्रायोगिक छंद :- दोहा

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अविनाशी जीवन नहीं, नाशवान ही जान।
मेहमान बनकर यहाँ, आया है इंसान।।

चार दिवस का है मिला, जीवन यह उपहार।
उर में सेवा भाव हो, पालो नहीं विकार।।

पतझड़ जो आए अगर, आएगी बरसात।
नव्य सवेरा से सुनो, छट जाएगी रात।।

जीवन की यह रीत है, जाने है संसार।
साथ सुखों के है मिले, दुख का भी अंबार।।

बुझ जाएगी एक दिन, जीवन जलती जोत।
जन्म हुआ तो हे सखा, होगी इक दिन मौत।।   

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Friday, May 21, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- माँ

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- माँ
विधा :- दोहा गीत
शीर्षक :- मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार

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तेरी आँचल में सदा, बरसे नेह अपार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

नौ महिने तक कोख में, जीवन भर निज गोद।
लालन-पालन नित करे, रहे सदा अनुमोद।।
मूरत है वात्सल्य की, जीवन का आधार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

सेवा सबकी जो करे, जिनसे नव्य प्रभात।
मातु रूप में है मिली, ईश्वर की सौगात।।
काजल की बिंदी लगा, लेती नजर उतार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

पाक कला से आपके, करते छप्पन भोग।
मैया तेरी प्रार्थना, रखती हमें निरोग।।
तेरे ही आशीष से, हो ऊर्जा संचार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

गुरुवर शिक्षा दायिनी, मैया तू हमराज।
लूला - लँगड़ा जो रहें, है तेरे सरताज।।
जिनकी गोदी में सुनो, देखा है संसार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

ईश्वर से है कामना, शुभ्र करूँ मैं काम।
शीश उठा तू चल सके, रौशन हो माँ नाम।।
बन लाठी मैं आपकी, दूँ मैं भी उपहार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

विनती जोगी नित करे, मिले मातु का प्यार।
मैया जीवन दायिनी, वंदन बारम्बार।।

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Wednesday, May 19, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- क्या होगा

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा:-  दोहा गीत
शीर्षक :-क्या होगा जी हाल 

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उठे हृदय में नित्य ही, केवल एक सवाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

बरसों तक घर में रहे, लगा बुद्धि में जंग।
दूर पढ़ाई से हुए, मचा रहे हुड़दंग।।
देखो जकड़ रही हमे, यंत्रों का यह जाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

विद्यालय जाते सदा, पढ़ते थे नव पाठ।
पूरी कक्षा में सुनो, होती थी निज ठाठ।।
घर बैठे शिक्षा हुई, देखो अब बेहाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

कोरा कागज हो गए, बचा नहीं कुछ शेष।
बदल गया है आचरण, बदल गया है भेष।।
जिज्ञासा अब मर गई, ज्ञान लगे जंजाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

कोरोना के दौर का, लगा हमें आघात।
भूल गए हैं ज्ञान सब, करनी नव शुरुआत।।
फिर से नव आगाज में, धीमी होगी चाल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

जाने कैसे यह कटे, रोग व्याधि के काल।
जाएंगे पढ़ने अगर, क्या होगा जी हाल।।

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Friday, April 16, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- जहाज़

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- जहाज
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- तिलस्मी कागज का जहाज

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यादों की गुल्लक से आज,
कुछ किस्से निकाल आए हैं।
स्मृतियों के मंच पर फिर से,
उन लम्हों की सीरीयल चलाएं हैं।

लौट चलें फिर से हम,
उन खुशियों के जहान में।
वो उन्माद भरे दौर में,
और वो सपनों की उड़ान में।

वो दौर कि जिसमें माथे पर,
ना कोई चिंता की लकीर थी।
ना कांधे पर रत्तीभर बोझ था,
बड़ी लाजवाब अपनी तकदीर थी।

वो दौर की जब बिखरे कागज के टुकड़ों से,
अरमानों के जहाज बनाया करते थे।
हां ज़रूर डांट भी पड़ती थी बड़ों से,
मगर खगदल सा आजाद उड़ा करते थे।

संदेशा जब भी हमें पहुंचाना हो,
या दोस्तों को बेवजह चिढ़ाना हो।
लिख कर कागज के जहाज उड़ा लेते।
उन्हें जब भी कुछ समझाना हो।

कभी - कभी तो खेल - खेल में,
यारों संग होड़ लगाया करते थे।
तेज़ उड़ान भरने पहले रगड़ते, 
फिर फूँककर जहाज उड़ाया करते थे।

हां ज़रूर आज समय के साथ,
हम आसमान में उड़ने लगे हैं।
मगर आज वो अल्हड़ता खो गई है,
हम जिम्मेदारियों में उलझने लगे हैं।

काश की जादू की छड़ी होती,
या होता तिलस्मी कागज का जहाज़।
बैठकर उसमें भूत में चले जाते,
छोड़कर भागदौड़ भरी आज।

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Monday, April 12, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- गवेजा

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- गवेजा
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- लाॅकडाउन लौट आया है।

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सुना है लाॅकडाउन लौट आया है,
कि फिर से चारदीवारी में कैद होना है।
दुनिया से अलग - थलग होकर,
फिर खुद में ही खोना है।

नाता औरों से तोड़कर,
गवेजा अपने घरवालों संग।
घर में ही बैठकर फिर से,
भरेंगे जिन्दगी में नव रंग।

फिर हटाकर ध्यान यंत्रों से,
विचारों का आदान-प्रदान करें।
लौट चलें भाग दौड़ भरी जिंदगी से,
जीवन में फिर से खुशियाँ भरें।

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Friday, April 9, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- कादम्बरी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- कादम्बरी
विधा :- गीत
शीर्षक :- मधुरिम गीत सुना जाओ।

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जंगल - जंगल घूम रही हो,
मेरे घर भी आ जाओ।
हे कोकिल हे सुर की देवी,
मधुरिम गीत सुना जाओ।
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खिले हुए उपवन में टेसू,
उर में प्रीत जगाती है।
आते देख बसंत प्रेयसी,
मन ही मन ललचाती है।
हे उड़ती शीतल पुरवाई,
हवा नेह की तुम लाओ।
खट्टे मीठे आम फले है,
जितना चाहो खा जाओ।
हे कोकिल हे सुर की देवी,
मधुरिम गीत सुना जाओ।
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रंग भले ही काला है पर,
बोली कितनी मीठी है।
सुनकर मनवा हर्षित होता,
गायन बड़ी अनूठी है।
विरहन की जो आग लगी है,
आओ उसे बुझा जाओ।
बढ़े हृदय में प्रेम नित्य ही,
ऐसी राग सुना जाओ।
हे कोकिल हे सुर की देवी,
मधुरिम गीत सुना जाओ।
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सज-धज कर बैठी है सजनी,
उनकी आस लगाई है।
श्रृंगारित कर खुद को देखो,
मन ही मन शर्माई है।
नई नवेली दुल्हन बैठी,
घूंघट जरा उठा जाओ।
घर बैठी प्यारी रांझा को,
संदेशा दिलवा जाओ।
हे कोकिल हे सुर की देवी,
मधुरिम गीत सुना जाओ।
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Thursday, April 8, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- चिरौंजी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- चार - चिरौंजी 
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- चिरौंजी के लाभ

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चार - चिरौंजी फल गए, वृक्ष हुए फलदार।
काले मोती से लगे, सजे गले ज्यों हार।।१।।

भले जरा मँहगे मगर, बड़े अनोखे लाभ।
कच्चे पक्के झूलते, डाली में हरिताभ।।२।।

बड़े लाभकारी सुनो, जड़ - फल - पत्ती - बीज।
चाह लिए जो गोंद की, जाए मनुज पसीज।।३।।

सूखे मेवे के लिए, फल को लेते फोड़।
केवल कुछ की चाह में, तोड़े कई करोड़।।४।।

तन में गर सूजन हुआ, लगा चार का अर्क।
पल भर में आराम हो, दिए वैद्य ने तर्क।।५।।

बीज चिरौंजी पर किया, जाने कितने शोध।
रोग मुक्त काया रखे, बढ़ती है प्रतिरोध।।६।।

डायरिया गर हो कभी, संग शहद लें छाल।
भोग लगा उसकी मिले, राहत हमे कमाल।।७।।

कब्ज रोग में तुम सखा, करो चिरौंजी भोग।
सेहत क्षण में चुस्त हो, काया रहे निरोग।।८।।

मनुज त्वचा में नित लगा, चार - दूध का लेप।
मुख से सब धब्बे मिटे, राय सुनो संक्षेप।।९।।

तेल चिरौंजी का बना, लगे मनुज के केश।
झड़े नहीं न श्वेत हों, जैसे हो परिवेश।।१०।।

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Wednesday, April 7, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- संगम

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- संगम
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "संगम"

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गंगा यमुना अरु सखा, सरस्वती की धार।
संगम प्रयागराज में, बाँट रहे हैं प्यार।।1।।

यमुना चंबल सिंध अरु, क्वारी पहुज प्रवाह।
पचनद संगम देखने, उठती उर में चाह।।2।।

महानदी सोंढ़ूर अरु, पैरी गाती फाग।
संगम अनुपम देख लो, छत्तीसगढ़ प्रयाग।।3।।

कहे त्रिवेणी लोग नित, महानदी अरु लांत।
संगम देखो मांड की, बड़ी अनूठी गात।।4।।

यौवन के उन्माद का, चढ़ा सभी पर रंग।
नर नारी संगम हुआ, उर में उठे उमंग।।5।।

देख ग्रहों का हो रहा, संगम बड़ा अनूप।
आस जगी उर में नवल, जीवन बदले रूप।।6।।

कविवर भावों का करे, शब्दों से श्रृंगार।
सुन्दर संगम से करे, संदेशा संचार।।7।।

होती धरती का सुनो, मनवा से जब मेल।
सबको मन भावन लगे, संगम यह बेमेल।।8।।

दृग को भाती दृश्य इक, भरती उर उल्लास।
देख क्षितिज में मिल रहे, धरती अरु आकाश।।9।।

संगम ऋतुओं का हुआ, आया सखा बसंत।
धरती के श्रृंगार से, खुशियाँ मिले अनंत।।10।।

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Tuesday, April 6, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- नक्सलवाद

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद 
विषय :- बीजापुर
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- बीजापुर और नक्सलवाद

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दक्षिण बस्तर में बसा, उपवन सुन्दर एक।
विश्व पटल में है छटा, किस्से सुनो अनेक।।१।।

मातु धरा की कोख में, मानो दीप समिद्ध।
बीजापुर के नाम से, जग में हुआ प्रसिद्ध।।२।।

कल - कल करती नित्य ही, बहे नदी की धार।
प्यास हरे सबकी सदा, बाँटे सब में प्यार।।३।।

भैरमगढ़ - पामेड़ हैं, अभय विजन श्रृंगार।
झर-झर निर्झर नित झरे, ज्यों घुँघरू झनकार।।४।।

मगर नज़र किसकी लगी, छाया है आतंक।
आतंकी मर्दन करें, घूमे सदा निशंक।।५।।

सरकारी हर काज में, बाधा नक्सलवाद।
शोषित वर्गों की सदा, उर में भरें मवाद।।६।।

निज उल्लू सीधा करें, सेवा की ले आड़।
उकसाते हैं नित्य ही, चढ़ा चने की झाड़।।७।।

दीमक जैसा रूप ले, नक्सलवादी लोग।
खाते सारे देश को, बनकर नित नव रोग।।८।।

सदा विरोधी भाव ले, धरते नित हथियार।
वीर जवानों पर करें, सदा पीठ पे वार।।९।।

हाथ जोड़ जोगी कहे, छोड़ो नक्सलवाद।
कहो समस्या आपकी, चलो करें संवाद।।१०।।

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Saturday, March 27, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- नींद

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- नींद
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "नींद"

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नींद बड़ी अनमोल है, देती नित आराम।
नैन उनींदा हो गया, ज्यों ही आई शाम।।१।।

उर में भरती ताजगी, झंकृत हिय के कोर।
नींद चांदनी सी उड़े, होता ज्यों ही भोर।। २।।

सेहत को अच्छी रखे, करती चिंता दूर।
नियत समय के नींद से, हो ऊर्जा भरपूर।।३।।

नव्य स्वप्न नित देखते, गहराती जो रात।
कांच सरीखे टूटती, देखे स्वप्न प्रभात।।४।।

कुछ कहते आलस भरे, कुछ का कहना और।
दैनिक कार्यों में इसे, माने जग सिरमौर।।५।।

कभी व्यस्त होकर सुनो, करो न इसका त्याग।
जीवन में खुशियाँ भरे, जागे इससे भाग।।६।।

जब जब टेंशन है बड़े, उड़े रात की नींद।
कुछ पल की निंद्रा मिले, चाहे मनुज मिलिंद।।७।।

नींद स्वान सा हो कभी, कभी कुम्भ सी बात।
झटपट उठता स्वान है, कुम्भ जगे नहिँ रात।।८।।

नींद अगर अच्छी मिले, दूर रहे नित रोग।
कहे लोग सब नींद को, एक तरह का योग।।९।।

मैया की लोरी जुड़ी, जुड़ा पिता का प्यार।
नींदो से यादें जुड़ी, सपनों का संसार।।१०।।

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Thursday, March 25, 2021

जोगी के दोहे "एकलव्य"

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद 
विषय :- एकलव्य
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "एकलव्य"

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एकलव्य एकांत में, इक चित करके ध्यान।
गुरु मूरत को मान कर, अर्जित करता ज्ञान।।१।।

भील पुत्र ही जानकर, दिया द्रोण ने त्याग।
समझा जिसको कोयला, वह तो निकला आग।।२।।

शिष्यों को ले वन गए, करने को आखेट।
घने विजन में द्रोण की, हुई शिष्य से भेंट।।३।।

देख धनुर्धर की कला, द्रोण हुए हैरान।
अद्भुत ताकत वीर की, मिला नहीं पहचान।।४।।

धनुष कला को देखकर, द्रोण हुए भयभीत।
सोचें अर्जुन से कहीं, जाए नहिँ यह जीत।।५।।

भय में आकर द्रोण ने, खोजा अद्भुत बाट।
एक इशारे से सुनो, दिया अँगूठा काट।।६।।

एकलव्य नादान था, छल से था अंजान।
आज्ञाकारी शिष्य था, रखा विज्ञ का मान।।७।।

होनहार फिर भी रहा, सब शिष्यों में श्रेष्ठ।
अपने जप तप से बना, धनुर्धरों में जेष्ठ।।८।।

नित्य अथक अभ्यास से, प्राप्त हुआ गुरु ज्ञान।
अपनी विद्या से बना, जग में लव्य महान।।९।।

लगन लगी जो ज्ञान की, दिया सकल बल झोंक।
होनहार की राह में, टिके न कोई रोक।।१०।।

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Friday, March 19, 2021

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- व्रीहि

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- व्रीहि
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "व्रीहि"

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बड़े जतन से पालते, व्रीहि भरे खलिहान।
तब जाकर पाता सखा, ऊर्जा नित इंसान।।१।।

हरे उदर की भूख को, बढ़े जीभ का स्वाद।
अन्न देव कहते सभी, इसमें नहीं विवाद।।२।।

भिक्षुक आएं द्वार में, करो व्रीहि का दान।
घर से निज दुत्कार कर, मत करना अपमान।।३।।

रैन - दिवस देखे नहीं, करे नित्य वे काम।
हलधर हरदम श्रम करे, करे नहीं आराम।।४।।

उनके श्रमफल रूप में, मिलता सदा अनाज।
फिर जाने क्यों बावला, करता उनपर राज।।५।।

पाप - पुण्य करता मनुज, लिए व्रीहि की चाह।
कई बार पड़ मोह में, चुने गलत वह राह।।६।।

व्रीहि जहां भरपूर है, है लक्ष्मी का वास।
दान व्रीहि का जो करे, कभी न हो धन हास।।७।।

देव व्रीहि को मानकर, करो नित्य सम्मान।
जीवन दायी हैं यही, नहीं सिर्फ सामान।।८।।

जोगी जग से बोलता, अन्न बड़े अनमोल।
बेमतलब नहिँ फेंकिए, कमतर कभी न तोल।।९।।

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Wednesday, March 17, 2021

विनोद कुमार "जोगी" के दोहे:- फागुन मास

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- फागुन
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "फागुन मास"

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ग्रीष्म शरद के मेल का, अनुपम फागुन मास।
ऋतु बसंत के रूप में, है यह सबसे खास।।१।।

बाल युवा गुरु कृष्ण का, पूजन करते लोग।
इनकी पूजा से बने, नित खुशियों के योग।।२।।

हिन्दू निज पंचांग में, माने अंतिम मास।
शनै - शनै गर्मी बढ़े, बढ़े हृदय की प्यास।।३।।

प्रेम और आनंद से, हर्षित है संसार।
द्वेष - बैर को त्यागता, रंगों का त्यौहार।।४।।

गेहूं की बाली सखा, खेतों में लहराय।
देख सुनहरी बालियाँ, कृषक हृदय मुस्काय।।५।।

गली - गली में गूंजता, सखा नगाड़ा ढ़ोल।
पिचकारी मारें सभी, प्रीत भाव को घोल।।६।।

विरहन की पीड़ा जगी, पिया गए परदेश।
आएंगे इस मास में, सोच सजाए केश।।७।।

शहनाई बजने लगी, होने लगे विवाह।
नव्य युवाओं में जगी, प्रणय मिलन की चाह।।८।।

कृष्ण पक्ष चौदस सखा, शिव शंकर की रात।
उनके पूजन से मिले, खुशियों की सौगात।।९।।

पेड़ों में फलने लगे, खट्टे - मीठे आम।
बड़ी रंगीली होत है, फागुन की ये शाम।।१०।।

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Tuesday, March 9, 2021

जोगी के दोहे "शिव शंकर" रचनाकार - विनोद कुमार "जोगी"

 रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- शिव
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "शिव शंकर"

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गरल हलाहल कंठ में, बदल गया जी रंग।
नीलकंठ फिर भी हुए, देखो मस्त मतंग।।१।।

देव लोक का ज्यों हरे, हरो हमारे त्रास।
इसी आस में नित्य ही, रखते हम उपवास।।२।।

सर्प राज हैं कंठ में, चंद्र विराजे शीश।
बहे जटा से देख लो, गंगा का आशीष।।३।।

बेल पत्र अरु फूल का, सुंदर हैं संयोग।
शिव शंकर को भात है, नित्य भांग के भोग।।४।।

सुखमय जीवन की लिए, सदा हृदय में आस।
पूजन से उनकी सखा, होत कष्ट का नाश।।५।।

विनोद कुमार "जोगी" की रचना- शिव

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- शिव
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "शिव शंकर"

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गरल हलाहल कंठ में, बदल गया जी रंग।
नीलकंठ फिर भी हुए, देखो मस्त मतंग।।१।।

देव लोक का ज्यों हरे, हरो हमारे त्रास।
इसी आस में नित्य ही, रखते हम उपवास।।२।।

सर्प राज हैं कंठ में, चंद्र विराजे शीश।
बहे जटा से देख लो, गंगा का आशीष।।३।।

बेल पत्र अरु फूल का, सुंदर हैं संयोग।
शिव शंकर को भात है, नित्य भांग के भोग।।४।।

सुखमय जीवन की लिए, सदा हृदय में आस।
पूजन से उनकी सखा, होत कष्ट का नाश।।५।।

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दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...