स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--सरसी छन्द
शीषर्क--मल्लाह
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पानी में भी पंथ बनाता , देता उतार पार ।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।
एक किनारा से है लेके , पहुँचाये तट अन्य ,
दोनों तट का स्वामी होता , जीवन उसका धन्य ।
सतत् लगा है पर सेवा में , रखता शुभ्र विचार ।।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।१।।
मोह तजे वह जीवन का है , पर का रखता ध्यान ,
जिन्दा को वह पार उतारे , भुजा खूब बलवान ।
मन में अदम्य साहस होता , हाथों में पतवार ।।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।२।।
सरिता-सागर - झीलों में है , पानी भरा अथाह ,
भय मुक्त रहे मल्लाह सदा , करे नहीं परवाह ।
उसके आगे पूर्ण बाढ़ की , झुक जाती है धार ।।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।३।।
मानव-पशु-पक्षी सबको है , करता पार तुरन्त ,
उसका आश्रय लेते आये , साधक-सन्त -महन्त ।
नेता - मंत्री - अधिकारी हैं , जनता सह सरकार ।।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।४।।
ईश्वर मृत्यु बाद है तारे , सजीव को मल्लाह ,
उसको प्रबल-प्रखर धारायें , नित देतीं हैं राह ।
सम्भव उसके बिना नहीं है , दुनिया में व्यापार ।।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।५।।
माली हालत खराब इनकी , है काफी कमजोर ,
सबको है पार उतारे जो , दुःख झेलता घोर ।
पार करे 'ठाकुर' वही यहाँ , फँस जाता मँझधार ।।
पार लगाये मल्लाह सदा , देता घाट उतार ।।६।।
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व्याख्या--इस छन्द में मल्लाह के गुणों का वर्णन
करने का यथाशक्य प्रयास किया गया
है ।
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