Friday, January 15, 2021

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- मल्लाह

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--सरसी छन्द
शीषर्क--मल्लाह
                     ०×××××०
पानी में  भी  पंथ  बनाता , देता    उतार     पार ।
पार लगाये  मल्लाह  सदा , देता    घाट     उतार ।।
एक  किनारा  से  है  लेके , पहुँचाये   तट   अन्य ,
दोनों तट का  स्वामी होता , जीवन  उसका धन्य ।
सतत्  लगा है  पर सेवा में , रखता  शुभ्र  विचार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।१।।

मोह तजे वह जीवन का है , पर का रखता ध्यान ,
जिन्दा को  वह  पार उतारे , भुजा खूब  बलवान ।
मन में अदम्य साहस होता , हाथों    में   पतवार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।२।।

सरिता-सागर - झीलों में है , पानी   भरा  अथाह ,
भय मुक्त रहे मल्लाह सदा , करे    नहीं   परवाह ।
उसके  आगे पूर्ण  बाढ़ की , झुक  जाती  है  धार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।३।।

मानव-पशु-पक्षी सबको है , करता   पार   तुरन्त ,
उसका  आश्रय  लेते आये , साधक-सन्त -महन्त ।
नेता - मंत्री - अधिकारी  हैं , जनता  सह सरकार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।४।।

ईश्वर   मृत्यु   बाद  है  तारे , सजीव को  मल्लाह ,
उसको प्रबल-प्रखर धारायें , नित  देतीं   हैं   राह ।
सम्भव उसके बिना नहीं है , दुनिया   में  व्यापार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता   घाट     उतार ।।५।।

माली हालत खराब इनकी , है   काफी  कमजोर ,
सबको  है  पार  उतारे  जो , दुःख   झेलता   घोर ।
पार करे 'ठाकुर' वही  यहाँ , फँस जाता  मँझधार ।।
पार लगाये  मल्लाह   सदा , देता    घाट    उतार ।।६।।
                           ०××××××०
व्याख्या--इस छन्द में मल्लाह के गुणों का वर्णन
             करने का यथाशक्य प्रयास किया गया
             है ।

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