Friday, May 21, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- माँ

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता { दोहा छन्द }
विषय--माँ
शीर्षक--माँ ममता की मूर्ति है
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माँ ममता  की  मूर्ति  है , होता  शब्द अनूप ।
माँ है  सागर  स्नेह  की , जीवन  सेवा  रूप ।।१।।
माँ शीतल-सी  छाँव  है , है मंगल की खान ।
माँ ईश्वरमय   शब्द   है , जीवनदायक जान ।।२।।
माँ पर्वत  है  त्याग  की , भरा  प्रेम का भाव ।
माँ करुणा की  धाम  है , रहा विनम्र सुभाव ।।३।।
माँ पोषण   दे  उदर  में , रखती भारी ध्यान ।
माँ खानपान  को   रखे , संयमित सदा मान ।।४।।
माँ नव  माह   गर्भ  धरे , सारे   पीड़ा   झेल ।
माँ - सा  रखना पेट  में , नहीं हँसी का खेल ।।५।।
माँ प्राणी  को  जन्म  दे , पीड़ा  झेल  अपार ।
माँ ही  लाये  जीव   को , दिखलाये   संसार ।।६।।
माँ का दुग्ध अमृत  रहा , गढ़ता  देह सुजान ।
माँ से   पायें   शक्ति   है , देती  वह सद्ज्ञान ।।७
माँ करती   सन्तान  को , जी जान से  दुलार ।
माँ है  रक्षा  कवच - सी , होती       पहरेदार ।।८।।
माँ जाती  लड़  मौत से , करे नहीं  मन भीत ।
माँ जैसे   इस   विश्व  में , नहीं  रहे   हैं  मीत ।।९।।
माँ साजसवाँर    करती , लगी रहे  दिन-रात ।
माँ का  आशीष  करता , सुख की है बरसात ।।१०।।
माँ ही  होती  प्रथम गुृरु , रही   ज्ञान   दातार ।
माँ का  गुण अनलेख है , नभ  जैसे  विस्तार ।।११।।
माँ का आँचल सुखद है , देता   सदैव   छाँव ।
माँँ का  पद 'ठाकुर' रहा , स्वर्ग  देव का ठाँव ।।१२।।
                      ०×××××××०
दि.२१.०५.२१

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