निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग } ,
विषय--पलाश ,
विधा--कविता { दोहा छन्द } ,
शीर्षक--पलाश ।
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गाँव - नगर से दूर में , देखो खड़ा पलाश ।
वट-पीपल इसको तजे , होता नहीं हताश ।।१।।
पीपल- पलाश-वट हुये , प्रकट एक ही साथ ।
पर वट-पीपल तज इन्हें , खींच लिए हैं हाथ ।।२।।
पद्मपुराण कहे इसे , वर्णित है आख्यान ।
क्रोध हुईं जब पार्वती , की थीं श्राप प्रदान ।।३।।
वट - पीपल को पूजते , श्रद्धा समेत लोग ।
जड़ में जल ले चढ़ाकर , पूज रहें दे भोग ।।४।।
वन्य क्षेत्र पलाश खड़ा , मन में नहीं विकार ।
आते समय बसन्त के , शोभित लगे अपार ।।५।।
लाली अम्बर ओढ़ के , लगता शोभा मान ।
देता आनन्द दृग को , सुन्दरता की खान ।।६।।
सजता ज्यों दुल्हन लगे , भाये छवि अतिरेक ।
कुढ़ जाते ज्यों अन्य तरु , लगता पलाश नेक ।।७।।
शोभा इसकी देख को , कुंठित तरुवर अन्य ।
पास खड़े तरुवर सभी , खुद को माने धन्य ।।८।।
दिखता पलाश दूर से , दृग को लेता खींच ।
मानो हर्षित हो रहा , अन्य वृक्ष के बीच ।।९।।
एक कहावत तक बना , पलाश के ही नाम ।
तीन पात हैं ढाक के , कहते लोग तमाम ।।१०।।
पर पलाश कमतर नहीं , करना सोच-विचार ।
पत्ते का पत्तल बने , लोग करें आहार ।।११।।
पूजा में काष्ठ उसकी , आते रहती काम ।
शिव रीझें सूखे पुष्प से , जो हैं मंगल - धाम ।।१२।।
कई व्याधि को नष्टकर , करता रोग विनाश ।
कह 'ठाकुर' आते रहा , अनेक काम पलाश ।।१३।।
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