Tuesday, March 2, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- पलाश

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले',
निवास--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग } ,
विषय--पलाश ,
विधा--कविता { दोहा छन्द } ,
शीर्षक--पलाश ।         
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गाँव - नगर  से   दूर   में , देखो खड़ा  पलाश ।
वट-पीपल  इसको  तजे , होता   नहीं  हताश ।।१।।
पीपल- पलाश-वट  हुये , प्रकट एक ही साथ ।
पर वट-पीपल तज इन्हें , खींच  लिए  हैं हाथ ।।२।।
पद्मपुराण    कहे     इसे , वर्णित है  आख्यान ।
क्रोध   हुईं  जब  पार्वती , की थीं  श्राप प्रदान ।।३।।
वट - पीपल  को  पूजते , श्रद्धा  समेत   लोग ।
जड़ में जल  ले चढ़ाकर , पूज  रहें   दे   भोग ।।४।।
वन्य क्षेत्र  पलाश  खड़ा , मन में  नहीं विकार ।
आते  समय  बसन्त  के , शोभित  लगे अपार ।।५।।
लाली  अम्बर  ओढ़  के , लगता  शोभा  मान ।
देता  आनन्द   दृग   को , सुन्दरता  की  खान ।।६।।
सजता ज्यों  दुल्हन लगे , भाये छवि अतिरेक ।
कुढ़ जाते ज्यों अन्य तरु , लगता पलाश नेक ।।७।।
शोभा  इसकी  देख  को , कुंठित तरुवर अन्य ।
पास खड़े  तरुवर  सभी , खुद को  माने धन्य ।।८।।
दिखता  पलाश   दूर  से , दृग को  लेता खींच ।
मानो   हर्षित   हो   रहा , अन्य  वृक्ष के  बीच ।।९।।
एक  कहावत  तक बना , पलाश  के  ही नाम ।
तीन  पात  हैं   ढाक  के , कहते  लोग  तमाम ।।१०।।
पर पलाश  कमतर नहीं , करना  सोच-विचार ।
पत्ते   का    पत्तल   बने , लोग    करें   आहार ।।११।।
पूजा   में   काष्ठ  उसकी , आते   रहती   काम ।
शिव रीझें सूखे  पुष्प  से , जो हैं  मंगल - धाम ।।१२।।
कई व्याधि  को  नष्टकर , करता  रोग  विनाश ।
कह  'ठाकुर' आते   रहा , अनेक  काम पलाश ।।१३।।
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