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Monday, November 2, 2020

रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- धान के कटोरा

रचनाकार--डिग्री लाल जगत निर्भीक
स्थान-रायगढ़
विधा-छत्तीसगढ़ी कविता
शीर्षक- धान के कटोरा


धान के कटोरा,
धान कटोरा के धुरा कपूर चिखला चंदन,
छत्तीसगढ़ महतारी के कोटि-कोटि वंदन।
मउर मुकुट रामगिरी महानदी पखारे पैईयां,
दंतेश्वरी चंद्रहासिनी महामाया हे आशीष देवईया।
इहें बल्लभाचार्य के जनम भूईयां चम्पारण से छंईया,
लोटा ल छुये पारस पथरा भिलाई सोना ढारे।
कोरबा म करिया हीरा उपजे बांगो खेत उपजाए,
हिरीमाइंस दल्लिराज हरा के गर्भ म रतन सजाय।
रहिन इहें सवरिन अस भक्तिन मोरध्वज अस दानी,
इहें जनम लिन वीर नारायण सिंह घासीअस गुरु ज्ञानी।
ऋषभधाम महाघाट रतनपुर इंहे हे दण्डक वन ,
इ धरती म चंदा लोरि के अमर प्रेम के गाथा।
सालहो ददरिया सुवा करमा चुमे जेकर माथा,
छत्तीसगढ़ी भाखा हर आंजे शब्द शब्द के अंजन।


डिग्री लाल जगत निर्भीक
साहित्य साधना सभा छत्तीसगढ़

Monday, September 14, 2020

डिग्री लाल जगत निर्भीक कृत आलेख- हिन्दी

लेखक-डिग्री लाल जगत निर्भीक
निवास स्थान- खरसिया जिला रायगढ़
विधा-आलेख
विषय-
हिन्दी, हिन्दुस्तान की पहचान है। राष्ट्रभाषा के ताज के मार्ग में अड़चनें तो है पर,हिन्दी को बांध सके वो सीमा कहीं नहीं : 

आजादी के बाद भारत में भाषाओं को लेकर अनेक विवाद और आंदोलन हुए, किंतु भाषा से जुड़े प्रश्नों का हल आज भी नहीं मिल पाया है। जबकि विवादों और आंदोलनों से हिंदी सहित भारत की अधिकांश क्षेत्रीय और आंचलिक भाषाओं को हानि ही उठानी पड़ी। आज वस्तु स्थिति यह है कि कथी पथ हिंदी वाले हैं हिंदी की अक्ष्मयता को सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। देखा जाए तो उनके तर्क में कोई युक्ति संगत तथ्य नहीं होता, उनकी बातें महत्वपूर्ण लगती है। क्योंकि प्रयोग की स्तर पर भारत में सरकारी तंत्र हिंदी का विरोधी रहा है।सबसे दुखद बात यह है कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विरुद्ध हम टिप्पणियां सहन कर लेते हैं। राजनीतिक कारणों से ही हमारी समक्ष राष्ट्रभाषा हिंदी सामर्थ्य एवं समृद्ध भाषा नहीं लगती। विनोबा जी ने विश्व हिंदी सम्मेलन में चिंता व्यक्त करते हुए। 1975 मैं कहा था केवल सोलह करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा स्पेनिस को संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी है। और 50 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी को मान्यता नहीं दी गई है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है।विश्व स्तर पर हमने हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने का असफल प्रयास तो किया। किंतु अपने ही राष्ट्र में प्रतिष्ठित नहीं कर पाए। राष्ट्रभाषा हिंदी का सम्मान तो हिंदी को प्राप्त है।किंतु उसका प्रयोग राष्ट्रभाषा की मर्यादा के अनुकूल नहीं हो रहा है। मॉरिशस के पूर्व प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने कहा था। हिंदी भाषा को लेकर पिछले 150 वर्षों से हमने पूर्वजों की परंपराओं को मारीसिस में जीवित रखा है। तो प्रश्न यह है कि क्या हम भारतीय भी अपनी परंपराओं के प्रति सचेत जागरूक एवं संवेदनशील हैं शायद नहीं चूंकि राष्ट्रभाषा को मात्र कागजी दर्जा ही मिला है। व्यवहारिक सम्मान प्राप्त नहीं है। आज सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों के अधिकतर अधिकारी हिंदी का प्रयोग करना या हिंदी बोलना अपना अपमान समझते हैं। हिंदी के नाम पर हर वर्ष विभिन्न सरकारी कार्यालयों एवं प्रतिष्ठानों में हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। किंतु इसमें क्या लाभ जब तक हिंदी का प्रयोग हर दिन नहीं होगा। इसका कोई औचित्य नहीं होगा। सही अर्थों में हिंदी को स्मरण करना इसे प्रयोग में लाया जाना आवश्यक है। आज अखिल विश्व में मातृभाषा में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा बच्चों का अधिकार माना गया है। क्योंकि  मातृभाषा भाषा में विषयों की गहयता अधिक होती है।यह भी जानने और याद रखने की जरूरत है मातृभाषा के माध्यम से ही एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपनी संस्कृति संस्कार और विचार प्रेषित करती है। इस प्रेषण के रुकाव से ही समाज में अनेकों विकृतियों और अपस संस्कृतियों जन्म लेती है। आज की सामाजिक समस्याएं और पश्चिमी अपसंस्कृति की प्रति भारत में बढ़ते मोह भारतीयता और भारत में भाषाई आत्म सम्मान को भुला देने का कारण वे प्रतीत होते हैं। अब वक्त आ गया है कि हमें भारतीयता की रक्षा के लिए भारत की अस्मिता के लिए हिंदी सहित अन्य सभी क्षेत्रीय आंचलिक भाषाओं के दिशा में सार्थक पहल करना चाहिए।देखा जाए तो अंग्रेजी परस्त लोग ऐसी आवश्यकता और उसके लिए पहल करने की बात पर आदतन प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं। उन्हें यह उत्तर दिए जाना उचित लगता है कि हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाएं मिलकर भारत की अस्मिता संस्कृति परंपराओं और संप्रभुताओं का आधार बनती है।इन भाषाओं का वस्तु परख विकास करने पर समाज में भी अपना उचित स्थान स्वयं प्राप्त कर लेगी।

            लेखक
डिग्री लाल जगत निर्भीक

Tuesday, June 9, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से डिग्री लाल जगत निर्भीक द्वारा सृजनित लेख- शौर्य भूमि सोनाखान

रचनाकार डिग्री लाल जगत निर्भीक
विधा -लेख
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़) 
शीर्षक-शौर्य भूमि सोनाखान


  छत्तीसगढ़ के राजधानी से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऐतिहासिक ग्राम सोनाखान जिसके नाम से ही स्थान का परिचय हो जाता है सोनाखान सोने का भंडार धरती गर्भ में भरा पड़ा हो ,उस स्थान पर क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह वीर सपूत का जन्म हुआ। वर्तमान में सोनाखान गांव अब जमीदार का महल नहीं है किंतु अवशेष के रूप में खंडहर है। उनके परिजन झोपड़ी नुमा घर में रहते हैं।गांव के पश्चिम में एक छोटी पहाड़ी है जिसका नाम कुरू पाठ एक ऐसा स्थान है। जहां साधारण रूप से तो कोई नहीं जा सकता उसका रास्ता जाना सरल था यहां छोटी सा झील है जहां सदैव पानी रहता है। उक्त स्थल बहुत ही मनोरम है। कुरू पाठ के उत्तरी छोर में बड़े तालाब है राजा सागर तथा दक्षिण में एक तालाब मंद सागर वीर नारायण सिंह द्वारा खुदवाये गएथे, वे उसी स्थान पर स्नान किया करते थे। आज की बस्ती नई है, पुरानी बस्ती तालाब से लगी हुई थी माह दिसंबर 1857में इन्हीं बस्तियों पर ब्रितानियों ने हमला कर अन्याय अत्याचार किए थे।  अंग्रेजों ने मासूम बच्चों को पकड़कर धधकते आग में झोंक दिया था। अंधाधुंध गोलियां चलाकर सैकड़ों निर्दोष नर नारीयों को मौत की घाट उतार दिया था। आसपास की बस्तियों के लोग सेनापति के भय से घर छोड़कर जंगल की ओर भाग गए थे। कुरू पाठ डोंगरी में युवराज वीर नारायण सिंह के वीर गाथा जिंदा इतिहास दफन है जहां पुरातत्व विभाग द्वारा कुछ खुदाई की गई है, युवराज नारायण सिंह के पास एक घोड़ा था जो की स्वामी भक्त था, जिसका रंग कबरा था वे घोड़े पर सवार होकर सुबह का भ्रमण किया करते थे सुख दुख दर्द सुना करते थे सोनाखान इलाके में एक नरभक्षी शेर का आतंक फैला था मनुष्यों एवं पालतू जानवरों को मारकर खा जाता था प्रभावित क्षेत्र की प्रजा जमीदार नारायण सिंह से सुरक्षा की मांग करने लगे बहादुर युवराज नारायण सिंह 35 वर्ष के हष्ट पुष्ट बलिष्ठ नौजवान थे उनमें अपूर्व उत्साह था प्रजा की सेवा करने हमेशा तत्पर रहा करते थे उन्होंने दरिंदे शेर को मार डालने की ठान ली वह हमेशा बंदूक लेकर नरभक्षी शेर का जंगलों के बीहड़ों में खोजते रहे बहुत दिनों तक शेर का पता नहीं चला अचानक एक दिन रायपुर के कसबाई क्षेत्र में उत्पात मचाने लगा युवराज नारायण सिंह मुकाबले के लिए शेर के सामने लगभग निहत्थे खड़े हो गए शेर ने युवराज पर आक्रमण कर दिया मुकाबला होने लगा तब म्यान से तलवार निकालकर शेर को मार डाला शेर तो आखिर शेर ही था लेकिन वह सवा सेर थे वह सचमुच में गोंडवाना के शेर थे इस बहादुरी से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार वीर की पदवी से सम्मानित किया तब से उनके नाम के आगे वीर जुड़ गया और वीर नारायण सिंह नाम से जाने जाते हैं।

Tuesday, June 2, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- हमर गांव

रचनाकार-डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला-रायगढ
विधा- कविता
शीर्षक- आबे हमर गांव

 आबे हमर गांव
लीम ,पीपर, तेन्दु ,महुआ के छांव
नदिया के तीर बसे हे मोर गांव।
मोर मयारू आबे हमर गांव
रहि रहि के आथे तोरेच सुरता।
का कहि के समझाअवं मन बइरीला
समझाए ले नई समझय।
देखत रइथो तोर रद्दा
मोर मयारू आबे हमर गांव।
घर के अंगना मा लगे हे तुलसी चंवरा
अऊ लगे हे आनी बानी के फूल।
बागे बगीचा मा कोयल हर कूहके
केकती केवरा घलो हांसत हे।
भात पसीया घलो नई सुहावय
रहि रहि के आथे तोरेच सुरता।
मोर मयारू आबे हमर गांव
नदिया के तीर बसे हे मोर गांव।

डिग्री लाल जगत निर्भीक

______________________

व्याख्या- इ कविता म कवि हर अपन गंवई गांव के बरनन सुघर ढंग ले करे हे कवि ह अपन मयारू नाता रिश्ता मन ल सुरता केअपन गांव ल देखे बर बुलात हावय कवि हर अपन गांव के परसंसा के वरनन करत कथे हे मयारू तै मोर गांव आबे मोर गांव ह नदिया के तीर म बसे हाबे।आऊ मोर गांव अब्बड रूख रही लीम,पीपर, केन्दु, मौहा के छांव हे मयारू तोर घरी बेरी सुरता आथे तै हमर गांव आबे ।मोर मन बइरी नई मानय कतको समझाए ले नई समझय मै तोर रद्दा घरी बेरी देखत रहिथो ये मयारू तै मोर गांव आबे ।घर के अंगना म तुलसी चौरा अऊ अंगना म आनी बानी के फूल घलो हे तीर के बगीचा म कोइली हर कूक थे,अऊ केकती केंवरा के फूल हर कूक थे अऊ केकती केवरा के फूल हर बहुत अच्छा फूले हे ऐसन लगत हे कि फूल हर हासत हे ।मै तोला अब्बड सुरता करत हो तोर सुरता म भूख पियास नई लागे तोर हर घरी वेला तोरेच सुरता आथे मोर मयारू तै मोर गांव आबे।मै तोर रद्दा देखत रहूं।

Monday, June 1, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- मुल्क

रचनाकार- डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला- रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- अपन मुलुक के मया

   अपन मुलुक के मया
मंहु अपन मुलुक के खातिर अपन परान गंवातेंव जी,
भारत भुईया के दुलरवा बेटा कहातेंव जी। 
मंहु अपन मुलुक.................
हमर देश मा राज करईया
हमर मरजाद अऊ धन लुटैया
बैरी दुश्मन ला अपन समझ के
सुमत के गोट गोठियातेव जी
मंहु अपन मुलुक..................
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख,ईसाई
एके महतारी के लईका अन
झन करव एक दूसर ले बैर
अही बात समझातेंव जी।
मंहु अपन मुलुक....................
गांधी -सुभाष के रददा म चलके
सुमता के गोठ गोठियातेंव जी।
अमर रखे बर आजादी ल,
जिनगी ल दांव लगातेंव जी
मंहु अपन मुलुक......................
आतंकवाद, नक्सलवाद मिटाये खातिर
बीर शहीद बन जातेंव जी।
भारत मां के कर्ज चुका के,
जीवन धन्य बनातेंव जी।
मंहु अपन मुलुक....................
गिरे,परे,हपटे मन संग
मंहु बदतेंव मितान जी
दुख-सुख के पीरा ल बांट के
अपन जिनगी ल सफल बनातेंव जी।
मंहु अपन मुलुक....................

 डिग्री लाल जगत निर्भीक
खरसिया जिला रायगढ़ छत्तीसगढ़

Thursday, May 28, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- विजय

रचनाकार -डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिले का नाम -रायगढ़
शीर्षक - विजय का शंखनाद
विधा -कविता

विजय का शंखनाद
मन के यान से अनंत की यात्रा है,
भावना के डग से अनतं की व्याख्याहै।
विचारों के नित उमड़ते बादल,
बूंदों की अनगिन रंगो की हलचल।
कल्पनाओं की पहुंच नहीं जहां तक,
सहज हो गया देख हर्षित पलक,
विश्वास विश्वासों की आंचल में छुपता है।
रुक गई यहां थक कर पार्थिव परिभाषा,
सांस लेती झुरमुट तले, मानवीय आशा।
दिव्यनाद का सरस सरगम स्वर,
अमृतमय  है जहां लहराती लहर-लहर
 
नील कमल का पराग झरता है।
हरदीप प्राणों का स्नेह जलाए जलता,
हर आंगन में एक सूर्य प्रकाश बिखेरता।
उर-उर में धड़कती शीतल चांदनी,
सूक्ष्म दिव्य जगत का यथार्थ है,
मृत्यु हारकर जीवन जीवन्त रहना है।
निर्झर पावन जल की धारा पयस्विनी,
सजल संवेदना का हार पहनती कल्याणी।
निष्कलंक नवजात शिशु के हाथ देकर मशाल,
देवत्व की विजय का शंखनाद करता है।

डिग्री लाल जगत निर्भीक

Wednesday, May 27, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- पर्यावरण

रचनाकार -डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिले का नाम -रायगढ़
शीर्षक -पर्यावरण सजाएं
विधा -कविता


पर्यावरण सजाएं
आओ पेड़ लगाएं,
पर्यावरण प्रदूषण बचाएं।
सुंदर सा दृश्य बनाएं,
संदेश ये हम सब तक फैलाएँ।
बदल रहा है पर्यावरण,
दोहन कर रहा जंगल को मानव।
हवा हो रही है ज़हरीली,
खतरा आ पडा मानव पर।
समय आ गया है मिलकर,
हम सब कोई कदम उठाये।
संदेश ये हम सब तक फैलाएं,
आओ पेड़ लगाएं।
व्याख्या -कवि इस कविता में पर्यावरण का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आओ मनुष्य हम सब पेड लगाएं और प्रदूषित वातावरण को बचाएं और प्रकृति की सुंदरता को बनाए रखें यह संदेश पूरे मानव जाति तक फैलाना है पर्यावरण का तलाश बदल रहा है। मनुष्य जंगल को दोहन में लगे हैं हवा विषाक्त हो गई है मानव में खतरा मंडरा रहा है अब समय आ गया है मिलजुल कर कोई समाधान कदम उठाने का यह संदेश संपूर्ण मानव जाति में फैलाये और पेड़ लगाएं

Friday, May 22, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- कलम के सिपाही

 डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला -रायगढ़, छत्तीसगढ़
शीर्षक- कलम के सिपाही
विधा -तुकांत कविता
कलम के सिपाही


वो  कलम के सिपाही,तैं जागत रइबे।
नइ ए सोये के समे,तैं ताकत रइबे।
साहित्य के बगिइचा मा, कोनहो घुस जाही चोर।
कर लिही चोरी, तैं ताकत रइबे।
चलत रहय सिरजन के काम,झन रुके कलम के गति।
सूख जाही सियाही,तैं जाचते रइबे।
कलम मा  ताकत हे,बम ले घलो जादा।
कही हो जही बिसफोट ,तैं मापते रइबे।
साहित्य के बगइचा के माली ,तैं काबर हो गे हस निरास ।
देख सूख जाही पउधा ,तैं सीचते रइबे।
        


व्याख्या- रचनाकार अपनी रचना के माध्यम से सृजन करने वाले कलम के सिपाहियों को सचेत रहने जागते रहने की अपील की है।

Tuesday, May 19, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- पुकार

रचनाकार- डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला -रायगढ़
शीर्षक -पुकार
विधा -कविता
               पुकार
मानव कहलाने वाले मानव
दानवता को क्यों कर अपनाओ,
ईश्वर के पुत्र कहलाने वाले
धरती को स्वर्ग बनाओ।

आज मनुजता पर अंधकार है
अत्याचार अनाचार को दूर भगाओ,
भूख प्यास निर्बलता को
धरा से तुम मिल मिटाओ।

ऐटम बम बनाने वाले
मानव मन को बनाओ,
उजड़ रहे घर बिखर रहे मन
उनको बसा और मिलाओ।

आज मनुजता  भटक रही है
उसको पथ दिखलाओ,
राजनीति से धर्म न जोड़ों
सांप्रदायिकता से नाता तोड़ो।

नित हो रहे अनाचारों से ,धराऔ
मानव को तुम मुक्त कराओ,
भारत भूमि को फिर से 
सोने की चिड़िया बनाओ।
____________________________


 संक्षिप्त व्याख्या-
                   इस कविता में कवि मानवीयता को व्यक्त किया है मानव कहलाने वाले मानव आज दानव प्रवृत्ति को अपना रहा है मानव ईश्वर का पुत्र कहलाने वाले मानव धरती को स्वर्ग बनाओ आज मनुजता अर्थात मानवीय व्यवहार पर अज्ञानता छाया है इस अत्याचार और अनाचार को समाज से दूर भगाओ और भूखे प्यासे निर्बल(कमजोर) व्यक्तियों की सहायता कर इस कुकर्म कार्य को धरती से मिटाओ। हे ऐटम बम बनाने वाले मानव तुम बम बना कर क्या करोगे बनाना है तो तुम्हारे मन को पवित्र बनाओ और उजड़ेआशियाना को आबाद करो भ्रमित बिखरे मन को मानवीय की ओर ले जाओ। आज मनुष्यता भटक गयी है। उसको सही रास्ता दिखाओ शोषण रूपी राजनीति से दूर रहो और सांप्रदायिकता अर्थात सामान रुप से प्रदान की जाने वाली व्यवस्था को अपनाओ। आये दिन इस पृथ्वी पर अत्याचार हो रहा है। उससे तुम मुक्त कराओ और भारत भूमि को पुनः  एक समृद्धि शाली धरती बनाओ कहने का मतलब अमानवीय से मानवीता की और आगे बढ़ो और भारत के हर जनता समाधान समृद्धि भाव के साथ जीये। ऐसा कवि मानव की मानवीता के लिए पुकार रहे हैं।
डिग्री लाल जगत निर्भीक

Thursday, May 14, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- समर्पण

रचनाकार- डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला -रायगढ़
शीर्षक -समर्पण
विधा -कविता
         समर्पण
करूं समर्पण निश्छल भाव से
 प्रभु ऐसे भाव जगा देना,
सत-पथ पर  चलूँ स्वामी
ऐसा सद विवेक जगा देना।
जैसे जल बिन मछली तड़पे
एक पल विलग न रह पाये,
पीर ऐसी अंतस में जगा देना।
तुम ही तो अमृत पारस हो
कर स्पर्श मुझे हीरा बना देना
दिनों के प्रति स्नेह धरूँ
प्रभु ऐसे भाव जगा देना।
सदा चलूं सद पुरुषों के पथ पर
ऐसे भाव बना देना
कर पाऊं जग में सत्कर्म
प्रभु ऐसी शक्ति जगा देना।
विश्व में तुम्हारा विराट रूप देखूं
जन-जन के मर्म को समझूँ
मानवता की अलग जगाऊं मैं
प्रभु निर्मलो का कष्ट हरू।

________________________________
व्याख्या-

            कवि समर्पण भाव से प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं की हे प्रभु मेरे अंतरात्मा में निश्चल भाव( पवित्र भाव) जगा देना मैं सत्य पथ पर चल सकूं और मेरी अंतरात्मा में सदाचार और विवेक का भाव जगा देना जिस तरह बिना जल के मछली तड़पती जल से एक पल भी विलग नहीं रह पाती इसी तरह हे पीर( ईश्वर) मेरे अंतरात्मा निश्चल भाव सत्य सदाचार विवेक जैसे मानवीय गुणों के विना मैं भी जिंदा ना रहूं अर्थात हर पल हर क्षण मानवीयता के साथ जी पाऊं ऐसी भाव सदा बनाए रखना। मुझे ऐसे प्रेरणा दीजिए जिस तरह मैं पारस पत्थरों में मूल्यवान है। स्पर्श से लोहे को सोना बना देता है इसी तरह प्रभु मुझे भी अमानवीयता से मानवीयता मैं जीने का प्रेरणा देना जिससे मैं मूल्यवान बनकर गरीबों के प्रति मेरा स्नेहा भाव हो और मैं हमेशा सदाचारी पुरुषों के साथ चलूं ताकि मुझे कहीं भटकाव ना हो ऐसी भाव जगा देना। हे प्रभु मैं संसार में सत्य कर्म करूं मुझे ऐसी शक्ति( प्रेरणा) देना और विश्व में तुम्हारा विराट स्वरूप को देख पाऊं अर्थात मेरे अंदर आपको ज्ञान स्वरूप मैं देख पाऊं हर लोगों की संवेदना को समझ पाऊं तथा जो लोग अज्ञानी अमानवीयता मे जी रहे लोगों को मैं अलग होकर मानवीयता का पाठ पढ़ाऊ और गिरे हुए निशक्त लोगों का कष्ट दूर कर पाऊं हे प्रभु मुझे ऐसे सन्मार्ग पर ले जाना मैं आपसे ही समर्पण करता हूं
डिग्री लाल जगत निर्भीक

Friday, April 3, 2020

छत्तीसगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- कोरोना

डिग्री लाल जगत निर्भीक
 छत्तीसगढ़
मोबाइल- 7691944492
कोरोना

मत घबराना
कोरोना से
मिल कर
लडेंगें कोरोना से

इसको हल्के में
मत लेना

मचाएगा कोहराम
होगा तबाही
सरकारी फरमान
नहीं मानोगे तो
चीन इटली
जैसे होगा हाल

कितने लोगों की जान जाएगी
गिनती नहीं कर पाओगे
कहां  जलाओगे?
कहां दफनाओंगे?

जगह मिल पाएगी?

ज्वलंत प्रश्न है

करो विचार
आत्म सुधार 
से ही होगी नैया पार

इसलिए घर से बाहर मत निकलो
भीड़ से बचो
वायरस अपने आप मर जायेगा

मान लो मेरा कहना
करो सब का सहयोग
नहीं तो जिंदगी का होगा अंत

मानोगे गर कहना
तो फिर से होगी 
नई जिंदगी की शुरुआत

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दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...