Tuesday, September 8, 2020

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- माँ

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'माँ के सामने कम पड़ेंगे'
दिनाँक--०८.०९.२०
                       ०××××××०
हम   सारे  कहते  आये   हैं , माँ के  नाम  एक शाम ।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग  आठों  याम ।।
उनके लिए अगर  कर  देंगें , जीवन के हरपल त्यक्त ,
निश्चय मानो  कमतर  होगा , जितना  भी सारा वक्त ।
सृष्टि के समय  जितने सारे , इकट्ठा   करेंगे    तमाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
माँपर ये  वक्त  खर्च कर  दें , होगें  निश्चय  ही  अल्प ,
सारे   विश्व  में   ढूँढ़   देखो , माँ  का नहीं है विकल्प ।
प्रथम गुरु माँ  कहलाते रही , होती  है  वह  गुणधाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
अपनी आँचल भीतर से माँ , पिलाती  सुधा-सा क्षीर ,
पालनपोषण   करने  में   है , होती न कदापि अधीर ।
सन्तानपर  नित  ध्यान देती , करते रहती  सब काम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
अपने सारे  सुख-सुविधा है , माँ  कर  देती  है  त्याग ,
कष्ट  अनेक  उठाया करती , सन्तानोंपर      अनुराग ।
माँ की ममता अनमोल रही , होती  गुणों  में  ललाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग  आठों   याम ।।
विकास चाहती  सन्तान की , मन  से   सदैव  उत्कर्ष ,
उनकी माँ सुनके किलकारी , होती   है   अपार   हर्ष ।
रखती कल्याण की भावना , माँ  होती  पूरण   काम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग   आठों  याम ।।
वात्सल्य की सिन्धु होती है , भरा  करुणा  अनुपमेय ,
वेद-शास्त्र-गीता-कुरान-सा , माँ  का  जीवन  है  गेय ।
ऐसी  माँ  को  'ठाकुर'  देना , लगता गलत एक शाम ।।
माँ  के  सामने  कम  पड़ेंगे , सारे   युग  आठों   याम ।।
                      ०××××××०
व्याख्या--माँ के नाम सारे युगों के समय को अर्पित
             कर दिया जायेगा तो भी माँ के गुणगान
             में कम पड़ जायेगा ।

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