स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'माँ के सामने कम पड़ेंगे'
दिनाँक--०८.०९.२०
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हम सारे कहते आये हैं , माँ के नाम एक शाम ।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
उनके लिए अगर कर देंगें , जीवन के हरपल त्यक्त ,
निश्चय मानो कमतर होगा , जितना भी सारा वक्त ।
सृष्टि के समय जितने सारे , इकट्ठा करेंगे तमाम ।।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
माँपर ये वक्त खर्च कर दें , होगें निश्चय ही अल्प ,
सारे विश्व में ढूँढ़ देखो , माँ का नहीं है विकल्प ।
प्रथम गुरु माँ कहलाते रही , होती है वह गुणधाम ।।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
अपनी आँचल भीतर से माँ , पिलाती सुधा-सा क्षीर ,
पालनपोषण करने में है , होती न कदापि अधीर ।
सन्तानपर नित ध्यान देती , करते रहती सब काम ।।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
अपने सारे सुख-सुविधा है , माँ कर देती है त्याग ,
कष्ट अनेक उठाया करती , सन्तानोंपर अनुराग ।
माँ की ममता अनमोल रही , होती गुणों में ललाम ।।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
विकास चाहती सन्तान की , मन से सदैव उत्कर्ष ,
उनकी माँ सुनके किलकारी , होती है अपार हर्ष ।
रखती कल्याण की भावना , माँ होती पूरण काम ।।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
वात्सल्य की सिन्धु होती है , भरा करुणा अनुपमेय ,
वेद-शास्त्र-गीता-कुरान-सा , माँ का जीवन है गेय ।
ऐसी माँ को 'ठाकुर' देना , लगता गलत एक शाम ।।
माँ के सामने कम पड़ेंगे , सारे युग आठों याम ।।
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व्याख्या--माँ के नाम सारे युगों के समय को अर्पित
कर दिया जायेगा तो भी माँ के गुणगान
में कम पड़ जायेगा ।
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