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Tuesday, June 8, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- व्यवहार

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- प्रेम पूर्वक व्यवहार करना
विषय -  व्यवहार
दिनाँक - 08/06/2021
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इस  मानव जीवन  को नित  सुंदर बनाने,
दया करुणा और प्रेम  का श्रृंगार  करना।
त्याग कर,  ईर्ष्या और द्वेष अभिमान को,
गीले शिकवे सबको तुम दरकिनार करना।
सबसे तुम प्रेम पूर्वक ही व्यवहार करना।।

कोई नहीं है  यहाँ  पर अपना और पराया ,
सबको  मानव  जैसा ही तुम प्यार करना।
याद करे लोग तुम्हें  तुम्हारे जाने बाद भी,
जीवन में अपनी तुम सदा उपकार करना।
सबसे तुम  प्रेम पूर्वक ही व्यवहार करना।।

लड़ाई  झगड़ा से  किसका  हुआ है भला,
इस बात पर तनिक तुम भी विचार करना।
रिश्तों  में  पड़ जाये ना कहीं  गांठ  कभी,
रूठे  हो  कोई  अपना तो  मनुहार करना।
सबसे तुम  प्रेम पूर्वक ही व्यवहार करना।।

मान -सम्मान सबकी  वो  एक  सा  कर सके,
बच्चों में कम से कम  इतना  संस्कार भरना।
रखना सबसे  मधुर संबंध जीवन है अनमोल,
भूलकर कभी किसी का ना तिरस्कार करना।
अपेक्षा रखते हो जैसे तुम दूसरों से जीवन में,
खुद भी वैसे ही दूसरों से तुम व्यवहार करना।।
                  .................

Saturday, May 29, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- जहाँ की रिवाजे़ें

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक -  जहाँ की रिवाज़ें
विधा- गजल
दिनाँक - 07/04/2021
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कोई भगवान  तो  कोई  खुदा  बताते हैं,
अपने ही फायदे की सब कथा बताते हैं।

देखते  कौन  हैं अपने  गिरेबान  में  भी,
सब  के सब  दूसरे को ही बुरा बताते हैं।

वो जहर ही उगलते हैं जुबान से अपनी,
और खुद को मगर  देखो  डरा बताते हैं।

लूटते  हैं  वे  ही  हिस्से  सभी  गरीबों के, 
पीड़ितों संग खुद को जो खड़ा बताते हैं।

बेच खाए इधर वो सब कमाई पुरखों की,
जाने क्यों फिर तिजोरी को भरा बताते हैं।

न्याय  की आस भी  उनसे यहाँ  करें  कैसे,
पोजिशन देखकर जज जी सजा बताते हैं।

इस जहाँ की रिवाज़ें भी अजीब हैं कौशिक,
जख़्म  देकर  हिफ़ाजत  की दवा बताते हैं।
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Tuesday, April 6, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- बीजापुर

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  बीजापुर
शीर्षक - बस्तर पूछती है सवाल ?
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बस्तर की धरती आखिर,  होती रहेगी लाल कब तक,
नासूर बन चुकी हैं समस्या, रहेगी यही हाल कब तक।

वोट बैंक की  राजनीति छोड़, अब तो समाधान करो,
बलिदानियों के पार्थिव पर, सियासी बवाल कब तक।

खोखली माओवाद  संग  मानवाधिकार की चाल चल,
मासूम वनवासियों को, बनाते रहेंगे वे, ढाल कब तक।

वो बुद्धि जीवियों अब नफरत की आग लगाना छोड़ दो,
सैनिकों के घर परिवार, होते रहेंगे यूँ  बेहाल कब तक।

केवल  संवेदना व्यक्त  करने से  काम नहीं चलेगा अब,
आखिर खोते रहेंगे, मजदूर किसान के, लाल कब तक।

सत्ता बदली नीति बदली, बस्तर की हाल वही के वही है,
दो पाटों के बीच में बस्तर,बनती रहेगी कंकाल कब तक।

निर्वस्त्र  कर लाशों को, नाच रहे हैं वे, देखो कैसे नंगा नाच, 
मानवता को झकझोरने वाली,आती रहेगी भूचाल कब तक।

कभी  दंतेवाड़ा, कभी  सुकमा,  कभी कांकेर  बीजापुर,
लाल  अँधेरा  का आतंक  होता रहेगा विकराल कब तक।

कितने बार रक्त से रंगेगी बस्तर , कितने बार करेंगे निंदा,
कब  निकलेगा  हल इसका, बनी रहेगी सवाल कब तक।
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Saturday, April 3, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- इत्र

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  इत्र
विधा -    गज़ल(बे बहर)
दिनाँक - 03/04/2021
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आँगन को महका दे जो ऐसा  इत्र  चाहिए,
रंग  भर  दे  जीवन  में  ऐसा  मित्र चाहिए।

हर साल  यूँ ही पुतले जलाने से क्या होगा,
रावण  को मारने  राम जैसा चरित्र चाहिए।

गंगा  नहाने  की  सार्थकता  तभी  हैं  जब ,
तन  के  साथ  मन भी होना  पवित्र चाहिए।

खंडित हुए हैं कितनी बार भारत भूमि जिसे,
अखण्ड भारत बनाने फिर पुष्यमित्र चाहिए।

ऊर्जा का दुरूपयोग कर रहे हैं नौजवान जो,
देशहित में  उसे बदल दे ऐसा जनित्र चाहिए।
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Monday, March 22, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- संकल्प

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  संकल्प
विधा -    मुक्त 
दिनाँक - 22/03/2021
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आसमाँ को झुकाने संकल्प चाहिए
हसरतें अपनी पाने संकल्प चाहिए

ये  मंजिल आपकी  कदमों में होगी 
राह  अपनी  बनाने संकल्प चाहिए

आँगन में तुम्हारी जगमगाहट होगी
अँधेरे को  मिटाने  संकल्प  चाहिए

दुःखों का पहाड़  भी  पार हो जायेगा 
जिंदगी चैन से बिताने संकल्प चाहिए

 ख़्वाहिश दिल में पालने से क्या होगा
 कुछ  कर के  दिखाने संकल्प चाहिए
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Saturday, March 20, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- चंदन

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  चन्दन
विधा -    मुक्त 
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सुगन्धित  खुशबू  बिखेर  अपनी
घर  आँगन  महकाती  हैं  चन्दन

दूर  करती  तन  मन की  तपिश 
शीतलता  हमें पहुँचाती हैं चन्दन

रोम  रोम  पुलकित  हो जाती हैं
ताजगी मन में  जगाती हैं चन्दन

दादी बनकर गोद में खेलाई हो मुझे
याद  तुम्हारी  बहुत आती हैं चन्दन
 
भुजंग लिपटे रहते साथ में फिर भी
स्नहे  प्रेम  की  बरसाती  है  चन्दन

चन्दन सा  महकते  रहना जीवन में 
महकना  ही  हमें  सीखती है चन्दन

जन्म लिया इस  चन्दन सी धरा पर 
इस बात पर मन इठलाती हैं चन्दन

विरप्पनों  से  अब बचा  लो  इसको
प्रकृति प्रदत्त  हमारी थाती हैं चन्दन
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Thursday, March 18, 2021

गावस्कर कौशिक की रचना- बसाहट

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  बसाहट
विधा -    मुक्त 
दिनाँक - 18/03/2021
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आ रही अभी से  ख़तरे  की कैसी आहट देखिये
काट कर  जंगलो  को शहरों की बसाहट देखिये

कैसे बदल रही हैं आबोहवा हमारे स्वार्थ के चलते
फरवरी मार्च में ही मई जून की  गरमाहट देखिये

शहरों  की  चकचौन्ध  तो  आप  देखते  ही होंगे 
एक  बार  झोपड़ियों  की   टिमटिमाहट  देखिये

दिन  रात वे  मजदूर  खून  पसीना  एक करते हैं 
हालत  न  सुधरी, तकदीर  की लिखावट देखिये

चुनाव आते ही कैसे बदल जाते हैं इनके स्वभाव
वोट के लिए बातों की इनकी  चिकनाहट देखिये

दो  चार  बात  खरी  खरी क्या कह दी हमने उसे
चेहरे  की उनकी  अब जरा तिलमिलाहट देखिये

क्या रक्खा हैं  ईंट सीमेंट की मकानों में कौशिक
देखना है तो बया के घोसलों की बनावट देखिये
              ~  गावस्कर कौशिक
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Wednesday, January 13, 2021

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- किसान

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  किसान
शीर्षक- किसान की हत्या
विधा -    मुक्त काव्य
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हर रोज मिलते हैं एक शव 
किसी खेत के मेड़ में लगे पेड़ में,
संदिग्ध अवस्था में लटके हुए किसान का शव!
आत्म हत्या कहकर ढंक देते हैं उसे कफ़न
और साथ में दफन हो जाती है राज़!
हत्या है या आत्महत्या।
नहीं गठित होती हैं कोई जाँच एजेंसी, 
बिना पड़ताल के हत्या बदल दी जाती है आत्म हत्या में,
उस किसान के हत्या  में सम्मिलित होते हैं
कितने ही गहरी साजिशें
लेकिन नहीं होती कोई जाँच की मांग
कितने साजिशें दफन हो जाते हैं
कथित आत्म हत्या के साथ

उस साजिश में शामिल होते हैं 
बीज निगम जो देते है अमानक बीज की डोज ,
पटवारी के अनावरी रिपोर्ट में छिपे होते हैं,
उनके हत्या के राज़!
फसल बीमा के टर्म और कंडीशन के कई,
घुमावदार मोड़ में उन्हें फंसाया जाता है
उस साजिश में शामिल रहते हैं कॉर्पोरेट हितैसी बैंक ,
जो बड़े बड़े पोस्टर चस्पा करके ,
घोषित करते हैं उन्हें डिफाल्टर,
उस साजिश में सम्मिलित होते हैं उपज मंडी 
जहाँ लगती है बोली उनके उपज की,
और कौड़ी के मोल नीलाम हो जाती हैं उनकी मेहनत!
उस साजिश में शामिल होते हैं कृषि के नीति निर्धारक,
जिनके नीति अन्नदाता को दो वक्त की रोटी भी,
नसीब नहीं करा पाती।
एक किसान के आत्महत्या में,
सम्मिलित रहते हैं कितने किरदार, कितने साजिशें
लेकिन नहीं होती साजिशों की कोई पड़ताल !

लोकतंत्र के प्रहरी मौन स्तम्भ बन
बांध लेते हैं अपनी आँख में पट्टि
उनके कान में नहीं रेंगते जूँ 
उन्हें फुर्सत नहीं रहती हैं वीआईपी ब्रेकिंग न्यूज से
नहीं करते पड़ताल हत्या हैं या आत्माहत्या
नहीं होती मांग किसी सीबीआई जाँच की
और दफन हो जाती हैं हत्या की गहरी साजिश
एक आत्म हत्या बनकर।
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        ~गावस्कर कौशिक
        सुकमा , छत्तीसगढ़

Friday, January 8, 2021

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- सायक

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  सायक
शीर्षक- सियासी निशाने बाज
विधा -    मुक्त काव्य
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सियासी निशाने बाजों की 
क्या कहें
एक से बढ़कर एक हैं यहाँ निशाने बाज
पक्ष और विपक्ष
दिन प्रतिदिन साधते हैं निशाने 
एक दूसरे के ऊपर
हर जुबानी तीर के प्रतिक्रिया में,
साधते है वे जुबानी तीर,
लेकिन इनके तूणीर में नहीं है वो
तीर जिससे ये साध सके निशाना
गरीबी और बेरोजगारी पर,
एक तीर से मिटा सके 
जाति और सम्प्रदायिक हिंसा को,
नष्ट कर सके स्त्री हिंसा,
दहेज और भ्रष्टचार रूपी राक्षस को
ऐसा धनुर्धारी नहीं हैं ये निशाने बाज
सोचता हूँ ये निशाने बाज
क्या कभी भेद पाएँगे
सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता,
शिक्षा और पोषण, कृषि उन्नति
स्त्री और जातीय समानता के लक्ष्य को
या यूँ ही साधते रहेंगे निशाने एक दूसरे के ऊपर 
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     गावस्कर कौशिक सुकमा छ्ग

Thursday, January 7, 2021

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- अश्क़

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय - अश्क
विधा -   मुक्तक
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भीड़ में भी हम  अक्सर तन्हा रहते हैं,
मोहब्बत के दर्द को खुद ही  सहते  हैं।
छोड़ के ऐसे गयी वो हरजाई  हमें कि-
आँखों से हरदम अब अश्क  बहते  हैं।।

कब तक यूँ  ही अश्कों  की बरसात  होगी,
जाने कब  उनसे  फिर ये  मुलाकात  होगी।
तब लिया जायेगा  हमारा  ही  नाम पहला-
जब भी इश्क में पागल होने की बात होगी।।

घुट घुट के जीना हमारा  मुकद्दर  हो गया,
हार गए इश्क में हम वो सिकन्दर हो गया।
एक  समंदर  था  कभी इन आँखों  में जो-
सुख गए अश्क अब  दिल पत्थर हो  गया।।
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          गावस्कर कौशिक  सुकमा छ्ग

Friday, December 18, 2020

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- गुरु पइयाँ लागंव

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय -  छतीसगढ़ के संत
शीर्षक- गुरु पइयाँ लागंव 
विधा -    गीत
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गुरु पइयाँ लागंव तोर......
सुरता राखे रहिबे मोर.......
तैं बढ़ ग्यानी  सत के पुजारी
सत के  रददा मोला दिखादे
जाति-पाति  छुआ-छूत बाढ़े
मनखे मनखे के भेद मिटादे
अंधियारी छाए घनघोर
भटकत हंव गली खोर......
गुरु पइयाँ लागंव तोर..........

मैं अग्यानी  निचट  हंव  दीन
भर दे मोर ग्यान के गागर ल
बीच भँवर म फंसे मोर डोंगा
पार लगादे गुरु भवसागर ल
तोर हाथ हावय न,
तोर हाथ हावय न,
मोर जिनगी के डोर
मोह के बंधना ल टोर...
गुरु पइयाँ लागंव तोर..............

तोर एक  दरस  पाये खातिर
इहाँ  उहाँ  खोजत रहिगेंव मैं
खुलगे अब अन्तस् के आँखि
गुरु घट घट म बिराजे हच तैं
तोर रुपे हे अपार
तोरे रुपे  हे अपार
नइहे कोनो ओर छोर.......
गुरु पइयाँ लागंव तोर..............
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Thursday, December 17, 2020

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- कविता

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय - क्या होती है कविता?
विधा -    कविता
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निराशा के अंधकार  में  दिव्या  प्रकाश है कविता
दुःखों के पहाड़ में खुशियों की  तलाश है कविता

कहीं रंगीन कहीं बेरंग सी है  सफर  ए जिंदगी की
पतझड़ में बसंती  बहार भरे  वो पलाश है कविता

प्रेम के  फूल मुरझाते नहीं  विरह की  आग में कि
दिल को जवां  रखने  वाली च्यवनप्राश है कविता

जीवन की विरक्ति में,भी  जिजीविषा भरती है कि
प्रेम के डोर में बांधे रखे जो वो रति पाश है कविता

आधुनिकता और भौतिकता में बिसर  रहें परम्परा
लोकसंस्कृति को जिंदा रखे वो अमृताश है कविता
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Monday, November 2, 2020

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- छत्तीसगढ़िया के पीरा

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- छत्तीसगढ़िया के पीरा
विधा -    कविता
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गोबर  के  दिन  घलो   बहुर गे,
बहुर  गे  दिन  अब  गौठान के।
घुरुवा  के  दिन  घलो  बहुर गे,
नई बहुरिच दिन ह किसान के।

बहुर  गे  दिन  ह  आरी  बारी  के,
नई  बहुरिच दिन  ह खेतिहारी के।
परदेस के  संस्कृति  ह फर फुलगे,
नाव गिनावत हे अब चिन्हारी के।
 
किसान  मेर   खाय  बर  नइहे,
खेत म फसल  सुखावत सरगे ।
मुआवजा के कोनो पता नइहे,
बिमा कंपनी के कोठी ह भरगे ।

गली  गली अउ  खोर  खोर मा,
दारू ह नदिया कस बोहावत हे।
गाँव म निस्तारी बर पानी नइहे,
तरिया नरवा  मन ह अंटावत हे।

सुघ्घर  दिन  के  सपना  दिखाथे,
अपन डफली अपन राग बजाथे।
बिकास  करे  के  पारी  आथे त,
कोन्हा डहर अपन  मुहुँ  लुकाथे।

भई  गे भईया काला   गोठियाबे,
अपन पीरा ल  तैं  अपनेच जान।
नई  हे  कोनो  ह  हमर  पूछईया,
जइसे नौकरसाही तइसे सियान।

काखर  ऊपर  बिसवास  करबे,
कोन  लगाही  हमर  बेड़ा  पार।
सबो  झन  एक  बरोबर हे संगी,
जइसे   मुड़ी   के  नाव  कपार ।
     ----------------------------
     - कौशिक

Friday, October 16, 2020

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- शारदे माँ

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय- माँ
शीर्षक-  शारदे माँ
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वर दे!  वर दे ! शारदे वर दे !
हे   वीणा वादनी,  हंसवाहिनी , वागीश्वरी
अंधकार को दूर कर  जगमग  जग कर दे
सुषुप्त अचेतन मन मेरा ज्योतिर्मय कर दे
वर दे ! वर दे ! शारदे वर दे !

नवल सृजन को नव अंकुर,निज मन में मेरे भर दे
ज्ञान ज्योति प्रदीप्त कर ,भवसागर  से पार कर दे
ज्ञान बिना  न हो इति मेरा ,ज्ञान पुंज  उर में भर दे
मैं अज्ञानी विवेक शून्य, भटक रहा  हूँ अंधकार में          
तिमिर घना अब संत्रास हर,उजास अन्तस् में कर दे
वर दे! वर दे! शारदे वर दे!

तुम नित्य अविनाशी अक्षुण गगन,तेरी छाया शीतल चन्दन
तुझमें अर्पण मेरा मन,चरणों में तेरी शत्-शत् अभिनन्दन
तेरी ही अवयव  हूँ मैं, ममतामयी आँचल की छाँव कर दे
पीड़ा हर सकल तन की, दिव्य अलौकिक जीवन कर दे
वर दे! वर दे!  शारदे वर दे!

मैं असहाय विवश लाचार नित बहते लोचन नीर
उद्विग्न व्याकुल  मन मेरा,धरु ऊर में  कैसे धीर,
तुम उदार सरस्  हृदय, मैं विरक्ति निष्ठुर मलिन
तुम श्रेष्ठ ललित मंजुल सरस् मैं असभ्य दम्भी नीरस
चंचल यह मन मेरा, दृढ़ स्थिर अटूट विमल कर दे
वर दे! वर दे ! शारदे वर दे !

सप्त सुर  सरगम संगीतमय, गीत प्रीति मम उर कर दे
नवल गीत नव लय स्वर,वीणा की झंकार मन में भर दे
मैं  नव अंकुर गीत का, पल्लवित पुष्पित  मुझे कर दे
हे महादेवी जय की प्रसाद दे, मुझे पन्त निराला कर दे
वर दे ! वर दे ! शारदे वर दे !
        ---------------------------------------
               ~ गावस्कर कौशिक


Monday, October 12, 2020

सुकमा से गावस्कर कौशिक की रचना- भारत की सरज़मी

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- भारत की सरज़मीं
विधा -     गज़ल (बे बहर)
      *********************
शेर  बैठे है  यहाँ  कोई  गधों  की जमात थोड़ी हैं,
देश को दहलाये अब किसी की औकात थोड़ी हैं।

मोहब्बत  हैं  जी जान  से  हमें भारत माँ तुझसे,
ये  खाली  कोई  दिखावे  की  जज़्बात थोड़ी हैं।

कब  तक बाँटते  रहेंगे  हम अपने मातृभूमि को,
ये  भारत की सरज़मीं  हैं, कोई  खैरात थोड़ी हैं।

जब चाहे तब आ जाते हैं हंगामा करने चौराहे पर,
ये सड़क हैं,  किसी  के  बाप की बिसात थोड़ी हैं।

ये  चिल्लाते  है, बरगलाते  है,  इन्हें  मिमियाने  दो 
सब पुराना तमाशा हैं,कोई आज की बात थोड़ी हैं
           ************************
                  ~  गावस्कर कौशिक

Saturday, October 10, 2020

गावस्कर कौशिक की रचना- रिश्ते

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- रिश्ते में मिठास रहे
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फिर तुमसे  मिलने  की  दिल में आस  रहे,
ये दौर भी गुजर जायेगा होती आभास रहे।

जालिम है ये कोरोना अभी मिलने नही देगा,
मैं तेरे दिल में बसा हूँ तू मेरे दिल के पास रहे।

फासले  भी यूँ नजदीकियाँ में बदल जायेगी,
दिल में बस  मोहब्बत की ज़रा अहसास रहे।
 
लॉकडाउन  में अब  यादों  की ही सहारा है, 
तुम्हारे  साथ गुजारे  हुये लम्हे जो खास रहे।

बुझे न  विरह में  तड़पते  दिल की ये आग,
चाहत  की तुम्हारी, हरदम  मुझे  प्यास रहे।

ज़हर  घोलते है यहाँ  की  फ़िजा रिश्तों में,
मैं  तेरा हूँ  तू मेरी  है  बनी ये विशवास रहे।

मिट जाए  दिल की  कड़वाहट  सभी  अब,
रिश्ते में हमारी अब बनी यूँ ही  मिठास रहे।
              ••••••••
       गावस्कर कौशिक

Wednesday, October 7, 2020

गावस्कर कौशिक की रचना- जीवन

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय- जीवन का महत्व
शीर्षक- चलते रहना जीवन है
          *************************   
सुख  की  चाहत में   दुखों को भी गले लगाना हैं
न बैठो तुम मन हार के अगर मंजिल को पाना है।।

हर चुनौती को तुम करो स्वीकार न मानों तुम हार
दृढ़ संकल्पित हो,  बढ़ आगे हो जाना हैं तुम्हें पार।।

जीवन के संघर्ष पथ पर , निरन्तर तुम्हें बढ़ते जाना है
कभी दुःख तो कभी सुख,एक-दूजे का आना जाना है।।

जब राह सूझे न कोई तब, देखो नदी की धाराओं को
राह अपनी खुद बनाती है , पार कर के बाधाओं को।।

देखो सूरज को तुम बादलों को करके पार ढलता है
अँधेरी रातो में भी  शीतलता लिए चाँद निकलता है।।

जीवन में भी हमारे चाँद सूरूज का आना जाना है
कभी शीतलता कभी उष्णता कुदरत का पैमाना है।।

हर परिस्थिति में हमे बस निष्काम कर्म करते जाना है
जीवन एक संघर्ष पथ है, हमे चलते चलते ही जाना है।।

चलते रहना ही जीवन है ,  रुकना अंत है जीवन का
बहते रहना निरंतर वैसे ही, गति होती जैसे पवन का।।

फूल है  तो  कांटे भी  मिलेंगे  , जीवन ऐसी  उपवन है
रुक न जाना ओ राही हार के,चलते रहना ही जीवन है ।।
           *************************
          गावस्कर कौशिक
          सुकमा, ( छ्ग )

Tuesday, October 6, 2020

गावस्कर कौशिक की रचना- मोह

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
विषय- मोह (तद्गुण अलंकार)
शीर्षक- मोह का बंधन
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मोह में हुई मन मतंगा
जीवन बन गया पतंगा
जीर्ण जीर्ण  देह जले
शनैःशनैः मृत्यु द्वार चले

मोह का छाये अंधकार 
सुखिया लगे यह संसार 
मृग मरीचिका बन भटके
माया के जाल में लटके

टूटत ही बन्धन मोह का
तन मन में होत है उजास
माया का अंधकार मिटै
फैलत जब भक्ति प्रकाश
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Monday, October 5, 2020

गावस्कर कौशिक की रचना- औरतें

रचनाकार- गावस्कर कौशिक
जिला - सुकमा, छत्तीसगढ़
शीर्षक- औरतें गाँव की
विधा- मुक्त काव्य

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गाँव की औरतें चूल्हे में पकाती है खाना
और खुद भी पकती हैं ताप से!
दुःखों को पी लेती हैं! धुएँ को जैसे पीती हैं 
गाँव  की औरतें चल लेती हैं नंगे पाँव
नदी  नालों खेत खलिहानों में ,
नहीं रोक पाती  उनकी राह
सावन भादो की अनवरत झड़ी,
न तपती हैं वो, जेठ बैसाख के महीनों में!

गाँव की औरतें स्वच्छन्द नहीं होती
कैद भी नहीं होती घरो में, मखमली लिबास पहने, 
खेतों में मिट्टी पानी के साथ घुलती मिलती हैं,
जानती हैं वो चादर की लंबाई,
छोटी सी कुटिया में, बिता देती हैं अपना जीवन
एक चीथड़े में ढंक लेती हैं अपने तन
मांग थोड़ी सी ही होती हैं उनकी
थोड़ा सा प्रेम थोड़ा सा अपनापन !
अपने लिए नहीं जी पाती वो !
बच्चे और परिवार के लिए ही जीती हैं
उनकी खुशी में ही  ढूंढ लेती हैं अपनी खुशी
हर दरार को सी लेती हैं स्नेह की धागों से !

कमजोर नहीं होती गाँव की औरतें
शालीन होती हैं, मर्यादा में बंधी!
हर मुसीबत को झेल जाती हैं
कभी गदल तो कभी धनिया बनकर
आंच नही आने देती अपनों पर
अपने हक से ज्यादा फर्ज को जानती हैं वो
हर माहौल में ढल जाती हैं 
निराशा और हताशा में भी ढूंढ ही लेती हैं आशा ! 
फूलों की चाह में काँटों के चुभन भी सह लेती हैं
टूट जाती हैं खुद पर,
घर को टूटने नहीं देती ! औरतें गाँव की

             ~  गावस्कर कौशिक
                     स्वरचित

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...