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Monday, July 20, 2020

राजनांदगांव से ओमप्रकाश साहू "अंकुर " कृत आलेख

नाम - ओमप्रकाश साहू "अंकुर "
पता - सुरगी, छत्तीसगढ़ 
 जिला- राजनांदगाँव 
विधान -  आलेख 




खेती किसानी ले जुड़े़ तिहार हरे हरेली 


हमर छत्तीसगढ़ हा कृषि प्रधान राज्य हरे. हमर प्रदेश के किसान मन धान के खेती जादा करथे.एकर सेति  छत्तीसगढ़ ला धान के कटोरा कहे जथे. इहाँ के कतको तिहार बार हा खेती किसानी ले जुड़े हवय. अक्ती तिहार हा धान बोवाई के संकेत हरय ता हरेली परब हा धान के सुग्घर हरियरपन दिखे के प्रतीक हरय. 
  हरेली तिहार हा सावन अमावस मा मनाय जथे. आषाढ़ मा किसान हा धान बोवाई के काम चालू कर देथे. जउन किसान मन के पास खुद के पास बोर, नदी, डेम ले पानी मिले के आसा नहिं रहय वोमन बोयता पद्धति ले धान बोथे. आज कल खेती किसानी मा बइला फंदाय नांगर के प्रयोग एकदम कम होगे हे. आज कल हर काम हा जल्दी मा होवत हवय. नांगर के जगह ला अब ट्रेक्टर हा ले डरे हवय. अब बहुत कम किसान मन हा बइला रखे हवय. खेत मा बइला अउ नांगर ला देखे बर आँखी तरस जथे. अइसे लगथे धीरे ले नांगर हा नंदा जही. पहिली बइला ला फांद के दंतारी अऊ पाटा चलाय जाय. अब ये सब ला ट्रेक्टर हा कर देथे. 
   जउन किसान मन के पास हाथ मा पानी रहिथे. बोर, नदी, बांध ले पानी खींच के पलो डलथे. अइसन किसान मन हा परहा पद्धति ले धान बोथे. एकर बर पहिली ले खेत के कोनो भी जगह धान के थरहा लगा देय रहिथे. जब थरहा हा लगाय के लइक हो जथे ता खेत ला बढ़िया जोत - मंताके ,पाटा मा बरोबर करके परहा लगाया जथे. अभी ए काम ला बनिहार मन हा करत हवय. का पता कल जाके यहू काम ला घलो सिरिफ मशीन हा करे ला लग जही. 
  आज कल आधुनिक तरीका ले खेती होवत हवय. पहिली गोबर खातू के उपयोग जादा करय. अब बहुत साल होगे हे रासायनिक खाद यूरिया, डीएपी, पोटास के गजब उपयोग करे जथे. बन ला मारे बर निंदानाशक दवा के छिड़काव करे जथे. बनिहार मन के काम हा कम होवत जावत हवय तभो ले बनिहार नहिं मिलय. खेती किसानी  करे मा बनिहार के समस्या हा गहरात जावत हवय. एक दू रुपया किलो चऊंर के सुविधा अउ खेती किसानी काम के प्रति लोगन मन के उदासीनता हा एकर प्रमुख कारण हरय. 

  आवव अब हरेली तिहार के बात 
करथन. ये तिहार हा अइसे समय मा मनाय जथे जब खेत मा धान के फसल हा लहलहाय ला लग जथे. बोयता पद्धति के धान के बियासी हो जथे. कुछ बचे घलो रहिथे. वइसने परहा पद्धति के धान हा घलो सुग्घर ढंग ले पोठ दिखे ला लगथे. 
  ये तिहार ले किसान मन के संगे संग बइला -भईंसा के थके हरे जांगर ला सुसताय ला मिल जथे. खेती किसानी मा कट -कट काम करे ला पड़थे. खेती अपन सेती  कहे गेहे. ये तिहार मनाय से किसान, बनिहार मन ला कम से कम एक दिन आराम मिल जाथे. 
ए समय खेती किसानी मा प्रयोग होने वाला अवजार नांगर -बख्खर, पाटा, दंंतारी, रापा, कुदारी, गैंती, टंगिया, बसुला, भंवारी, हंसिया, साबर, तुतारी अउ अब नवा जमाना मा ट्रेक्टर,अ टिपर, हार्वेस्टर के पूजा करे जथे. घर के दुवार मा सुग्घर ढंग ले मुरमी डाल के ये अवजार मन ला रखे जथे. अब दुवार मा घलो पथरा लग गेहे ता कतको मन मुरमी नहिं डोहारय. सुग्घर ढंग ले किसान परिवार हूम -धूप ,
फूल, दीया, अगरबत्ती के उपयोग कर पूजा करथे. पिसान के लेप बनाके जम्मो अवजार मा लगाथे. 
चीला चढ़ाय जथे. पशु धन बइला, गाय, भईंसा के पूजा करे जथे. 
ए दिन राउत मन गाय, बइला, भईंसा ला जड़ी बूटी से बने दवई खिलाथे. साथ मा किसान मन घलो आटा से बनाय लोंदी जउन में  नून घलो डलाय रहिथे. येला पशु धन ला खिलाथे. बरसात मा पशु धन के बीमार पड़े के संभावना जादा रहिथे. जड़ी बूटी अउ लोंदी हा हमर पशु धन के रोग प्रतिरोधक क्षमता ला बढ़ाथे अउ स्वस्थ रखथे. किसान मन राउत ला चांवल, दाल, नमक, मिर्च अउ जउन बन पड़े भेंट करथे. 
हरेली तिहार के दिन लोगन मन मा गजब उछाह रहिथे. घरो घर चीला, बरा, सोहारी, भजिया, अरसा, कटवा रोटी चुरथे. अपन घर परिवार अउ अड़ोस पड़ोस ला खाय बर बुलाथे. एकर ले मेल मिलाप अउ आपस मा भाई चारा के भावना हा बढ़थे. लईका मन के संगे संग बड़का मन घलो गेंड़ी मा चढ़ के मजा लेथे . पहिली गाँव के गली मा गजब चिखला रहय. एकर से बचे बर गेड़ी हा काम आय. आज कल अब गली के क्रांकीटीकरण होगे हवय. अउ कतको जगह होना बाकी हवय. कतको जगह गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता होथे. अउ तरह तरह के ग्रामीण खेल कबड्डी, रस्सा खींच, मटका फोड़, फुगड़ी, बिल्लस, कुर्सी दौड़ के आयोजन होथे. ग्रामीण मन गाँव के मैदान मा सकलाके एक दूसर ले मिलथे जुलथे अउ सुख दुख के गोठ गोठियाथे. नवा नेवरनिन मन ला तीजा लाय के शुरुआत घलो हो जथे. अइसन सुग्घर ढंग ले हमर छत्तीसगढ़ मा हरेली तिहार मनाय जथे.   
  आप जम्मो झन ला हरेली तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई... 

        जय जोहार... 

Wednesday, July 15, 2020

राजनांदगांव से ओमप्रकाश साहू" अंकुर " कृत- पवन दीवान ने जब सुरगी के अर्थ बताया

 
रचनाकार - ओमप्रकाश साहू" अंकुर "
पता - ग्राम +पोष्ट - सुरगी, जिला - राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) 
विधा - रेखा चित्र 
 शीर्षक -  पवन दीवान ने जब सुरगी के अर्थ  
 




जिला मुख्यालय राजनांदगांव से 13 किलोमीटर दूर ग्राम सुरगी बसा हुआ है। इस गांव के नाम पढ़ने के पीछे कहानी है कि, पहले इस गांव में सुरंग था जिसका संबंध ओड़ारबांध से है। अभी भी सुरंग के निशान सुरगी में देखे जा सकते हैं। पूर्व सरपंच पदुमलाल साहू एवं श्रीमती देवकी साहू के घर के सामने सुरंग के चिन्ह मौजूद है। इसी प्रकार जन श्रुति है कि सुरगी में छै आगर छै कोरी अर्थात 126तालाब थे। कहते हैं कि छ: लाख उड़िया मजदूरों ने छमासी रात में सारे तालाब को बनाए थे। आज भी सुरगी के चारों ओर लगभग दर्जन भर तालाब है। इसमें सबसे बड़ा तालाब दर्री तालाब है। इस गाँव का प्रसंग दसमन कैना कथा में भी उल्लेख होता है। एक बार साकेत साहित्य परिषद् सुरगी जिला राजनांदगांव के वार्षिक स्थापना दिवस एवं सम्मान समारोह में पधारे संत कवि श्रद्धेय पवन दीवान जी ने सुरगी की व्याख्या कुछ इस प्रकार से की थी - सुर + गी  यानी कि सुर माने देवता और गी माने गाँव. अर्थात देवताओं का गाँव है सुरगी। कुछ हद तक यह अनुमान सही भी है, क्योंकि गाँव के चारों ओर विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमा विराजमान है। इस परिभाषा को सुन कर जहाँ उपस्थित साहित्यकारों का मन प्रफुल्लित हो गया वहीं ग्रामीण जन भी फूले नहीं समाए। ऊपर से पवन दीवान जी का जोरदार ठहाका खुशी को द्विगुणित कर रहे थे। लेकिन यह भी सच है कि सुरंग होने के कारण इस गाँव का नाम सुरगी पड़ा. मेरे गाँव में 21 मार्च 1999 को मेरे घर में अंचल के साहित्यकारों की बैठक हुई और साकेत साहित्य परिषद् सुरगी जिला राजनांदगांव का गठन हुआ। साकेत विगत 21 वर्षों से साहित्यिक सक्रियता के लिए प्रतिबद्ध है. इससे दो दर्जन से अधिक साहित्यकार जुड़े हुए हैं । 

Friday, July 10, 2020

राजनांदगांव से ओमप्रकाश साहू "अंकुर " की रचना- कमाबो-खाबो

काव्य संसद
नाम -ओमप्रकाश साहू "अंकुर "
 पता -  सुरगी, छत्तीसगढ़ 
जिला - राजनांदगांव 
विधान - छंदमुक्त (छत्तीसगढ़ी) 




अपने डहर कमाबो खाबो 

  परदेस ले अपन जनम भूमि कोति आवत हे ।
   कोरोना  हा सब ला अपन माटी मा लावत हे ।।

  गजब झन  पैदल कतको दूरिहा ले   आवत हे ।
    रेंगत -रेंगत ओमन अब्बड़ दुख पावत हे ।।
   धनवान मन हा  जी गजब  मजा उड़ावत हे ।
   गरीब मनखे मन संसो- फिकर मा मर जावत  हे ।।
  बस  रेलगाड़ी हा इंकर भाग मा नई हे संगी हो ।
   देखव  गा जानवर  जइसे टरक मा भरावत हे ।।
   कुछु नई मिलत हे मजदूर मन ला  सहयोग ।
   
   लांघन -भूखन  वोमन ला रहे ला पड़ जावत हे ।।
     दू बीता के पेट खातिर परदेस मा जाके ।
   अपन करम ला  मरो जियो ले ठठावत हे ।।
   आवत खानी  वोमन जऊन  दुख पाहे तेला ।
    सुसक- सुसक  के  सब  ला  बतावत   हे ।।
    सबो मन अपन छइहाँ भुइयाँ डहर आवत हे ।
   नई जावन  कभू परदेस कहिके कसम खावत हे।।
    अपन गांव अपन राज डहर रहिके कमाबो खाबो ।
      मजदूर मन हा अइसन अब अपन मन ला बनावत हे ।।


भावार्थ - कोरोना महामारी के कारण सबसे ज्यादा मजदूर प्रभावित हुए हैं. वे अपने एवं अपने परिवार का भरण पोषण हेतु अपने गांव और शहर को छोड़ कर दूसरे राज्य गए हुए थे. इस बीच कोविड -19 के चलते देश भर में लाक डाउन हो गया. मजदूर जहां फंसे थे वहीं फंस गए. ऐसी स्थिति में उनके समक्ष भूख मरने जैसे हालात निर्मित हो गए .
   ऐसे स्थिति में मजबूर मजदूर अपने राज्य एवं गांव की ओर पैदल ही लौटने लगे क्योंकि बस, रेलगाड़ी का चलना भी बंद हो गया. फिर मजदूर हजारों किलोमीटर दूर पैदल ही चलने लगे. इस समय बेबश मजदूर बहुत ही तकलीफ पाए. पैदल चलते चलते पांव में छाले पड़ गए. खाने पीने के लिए तरसना पड़ा. इस विकट दौर में जब उनको गंतव्य स्थल तक ले जाने के लिए बस /रेलगाड़ी की सुविधा
उपलब्ध नहीं हो पाई थी तब तक ट्रक में ही जानवर जैसा सफर करना पड़ा. कुल मिलाकर कोरोना महामारी के चलते मजदूर ों की स्थिति बहुत ही बदतर हो गई है. वे अपने जन्म भूमि लौटने लगे और भाव विभोर होकर यह प्रण करने लगे कि अब हम अपने ही गांव /राज्य में रोजी रोटी कमाएंगे और अपने छइहाँ भुईयाँ को छोड़ कर नहीं जाएंगे.

Wednesday, July 8, 2020

राजनांदगांव से ओमप्रकाश साहू "अंकुर" की रचना- पर्रा भर लाई


रचनाकार - ओमप्रकाश साहू "अंकुर "
निवास - सुरगी, छत्तीसगढ़ 
जिला - राजनांदगांव 
शीर्षक -"पर्रा भर लाई "
विधा - कविता (छन्द मुक्त) 

                पर्रा भर लाई 

    अगास मा दिखथे चन्देनी, 
    उही ला कहिथे पर्रा भर लाई. 
    चन्दा के सिपाही हरे पर्रा भर लाई, 
  एकर कहानी सुनाथे बबा अऊ दाई. 
सुग्घर चन्दा अऊ चन्देनी मिलके, 
  घूप अंधियार ला दूर करथे भाई .
पर्रा भर लाई दुनिया भर छरयाई,
ये गजब सुग्घर गाना हे बहिनी -भाई. 





 भावार्थ - आसमान में जो तारे दिखाई देते हैं उसी को पर्रा भर लाई कहते हैं. यह चन्द्रमा का सहयोगीगण है. चन्द्रमा और तारे मिल कर अंधेरा को दूर करते हैं. दादा दादी इसके बारे में कहानी सुनाते हैं. पर्रा भर लाई, दुनिया भर छरयाई छत्तीसगढ़ अंचल में यह गाना बच्चों के बीच बहुत ही प्रसिद्ध है.

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...