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Tuesday, June 8, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- विनयशील मानव

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विषय-व्यवहार
शीर्षक- विनयशील मानव

★★★

सरल सहज व्यवहार सदा ही,
जीवन को महकाता है।
 विनयशील मानव के आगे,
ईश्वर भी झुक जाता है।।
जिसके मन में रहे समर्पण,
निपुण रहे व्यवहारों में।
मन को छोटा नहीं करे जो,
गुरूजन के सत्कारों में।।
द्वेष कपट छलदंभ स्वार्थ को,
रखता दूर विचारों से।
स्वागत करता सब मित्रों का,
निज मन के मनुहारों से।।
धन बल पद पाकर भी जिसका,
हृदय नहीं इठलाता है।
विनयशील मानव के आगे,
ईश्वर भी झुक जाता है।।
सरल सहज व्यवहार सदा ही,
जीवन को महकाता है।



प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना

Tuesday, June 1, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" कृत आलेख- विचार

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
शीर्षक-विचार
विधा-आलेख

★★★

,                 *विचार*
जिंदगी विचारों के साथ प्रारंभ होता है और विचारों के साथ ही समाप्त हो जाता है।विचार हमारे मन और मस्तिष्क का यह संबंध मनुष्यों में ही पाया जाता है।सोचने समझने के लिए,मन में विचार लाने के लिए एक विकसित मस्तिष्क की आवश्यकता होती है।विचार स्थायी न होकर परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं।विचार हमारी समझ व ज्ञान के द्योतक होते है।यदि कोई व्यक्ति महान बनता है तो वो अपने विचारों से बनते हैं।घर,परिवार, कार्य,व्यापार सफलता एवं विफलता व्यक्ति के विचारों पर ही निर्भर होता है।करुणा,दया,मर्म,सुख-दुख,ममता एवं जीवन के विभिन्न रंग विचारों से ही उत्पन्न होते है।अतः हम सभी को वैचारिक निरंतरता को अनवरत् जारी रखते हुए आगे बढ़ते रहेंगे।हमें नित्य सकारात्मक विचारों को अपने जीवन में लाना होगा और खुशी खुशी जीवन व्यतीत करना होगा।जब हम प्रत्येक विचार के साथ सकारात्मकता को जोड़कर देखेंगे तो असली स्वभाव का पता लगाने में सहायक होगा।

*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

Monday, May 31, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- प्रहरी

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विषय-प्रहरी
शीर्षक-वीर जवान
★★★
रक्षक जो निज देश के,अपने वीर जवान है।
उनके ही बल से हमें,होता  अभिमान है।।

हाथों में बंदूक,सीने में अंगार है।
दुश्मन कोई जब दिखे,करता वार अचूक है।।

निज मन में विश्वास भर,माथे पर ले ओज है।
सीमा पर रक्षा करें,अपने सैनिक रोज है।।

निज परिजन से दूर रह,रखे देश के मान को।
अपने वीर जवान,सहकर सब कष्ट को,।।

रक्षा खातिर देश की,दे दी जिसने जान को।
उन वीरों का प्रेम तुम,कर लेना सम्मान उनको।।

प्रेमचन्द साव"प्रेम",बसना

Saturday, May 29, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- विनम्रता

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विधा-लावणी छंद
शीर्षक-विनम्रता

★★★
सुगम सहजता से महकेगा,निज मन का कोना-कोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
                            १
प्रेम वही पाता है जग में,जिसका पावन भाव रहे।
नहीं भावना हो बदले की,नहीं मनन में ताव रहे।
वीणा सम झंकार मधुर हो,जिसकी अनुपम बोली में।
प्रथम-दृष्टि में हृदय जीत ले,अपनी हँसी ठिठोली में।
विनम्रता ही फलित करेगा,प्रेम बीज जन में बोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
                             २
अकड़ दिखाकर कहाँ निभा है,मानवता की रीति यहाँ।
कटुक वचन वाला भी ढूँढे, हरपल पग-पग प्रीति यहाँ।
विनम्रता भी लेख भाग्य का,कहाँ सभी को मिलता है।
सरल-सहज व्यवहार रहे तो,पुहुप सुखों का खिलता है।
नम्र नहीं जिसका मन उसको,पड़ा अवज्ञा ही ढोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
                           ३
धर्मग्रंथ के पन्नों से भी,विनयशीलता पाएँ हैं।
इसीलिए प्रभु के वचनों को,सभी प्रेम से गाएँ हैं।
उस मानव का मूल्य कहाँ है,जिसके मन अभिमान भरा।
कुविचारों को जिसने त्यागा,वही बनेगा स्वर्ण खरा।
उठो साथियों दंभ त्यागकर,छोड़ो निज मद में सोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।

*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

Friday, May 21, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- माँ

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विधा- दोहा
विषय-माँ
शीर्षक- माँ

.                       *माँ*
ममतामयी ममत्व की,है पावन प्रतिरूप।
श्रेष्ठ सदा संसार में,माँ का प्यार अनूप।।१।।

माँ से बढ़़कर कब कहाँ,है कोई भगवान।
माँ ही है संसार में,ममता की पहचान।।२।।

माँ निज बच्चों के लिए,सदा लगाकर प्राण।
जीवन के दुखदर्द से,नित करती हैं त्राण।।३।।

माँ ही सुख की छाँव है,माँ ही सरस फुहार।
माँ के आशीर्वाद बिन,कब हो बेड़ापार ?।।४।।

क्या समझे इस बात को,जग में जो मतिहीन।
जिनकी माँ होती नहीं,वही मनुज है दीन।।५।।

माँ ही है गुरुवर प्रथम,जिनसे पाया ज्ञान।
कृपा मिले जब मातु का,मानव बना महान।।६।।

माँ मंगलमय मूर्त बन,सदा करे उपकार।
पीड़ा पीकर भी भरे,बच्चों में संस्कार।।७।।

बेटे को जिनसे मिला,जग में प्यार अकूट।
उस माता को त्याग दी,हो माया वशीभूत।।८।।

बूढ़ी माँ क्या मांँगती,दो रोटी अरु दाल।
पुत्रवधू समझे उसे,जीवन का जंजाल।।९।।

जिस माँ ने परिवार का,सदा उठाया भार।
नहीं सके उसको जतन,बेटे मिलकर चार।।१०।।

*"प्रेम"* कभी तुम मातु का,मत करना अपमान।
माँ रूठे तब रूठता,इस जग का भगवान।।११।।

Wednesday, May 19, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- मन

रचनाकार- प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विधा-दोहा
शीर्षक- मन

,                     मन

मन वीणा के तार में,रमे राम का नाम।
श्रेष्ठ करे मनभाव को,सभी बनाये काम।।

मन मंदिर में दीप जो,टिम-टिम करती नित्य।
सदा सहेजे भाव को ,और लिखे साहित्य।।

मनभावों में प्रेम हो,और हृदय में ज्ञान।
तभी बने संसार में,मानव परम महान।।

मन को जिसने जीत ली,जीत लिया संसार।
जीत जीत में जीत है,जीत भगाये हार।।

मन से मन को छेड़कर,मन में भर दो प्रेम।
मन ही मन को दे रहा,मन का मन-मन हेम।।

व्यर्थ किया अपना जनम,धार कलंकित भेष।
मन में निशिदिन भर रहा,मन से मन-मन द्वेष।।

मन से मत हारो कभी,मन को लेना जीत।
मन को जो मंदिर करे,वही प्रेम का गीत।।

*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

Tuesday, April 6, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- वीर जवान

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला- महासमुंद
विषय - बीजापुर
शीर्षक- वीर जवान
विधा-  दोहा छंद

रक्षक हैं जो देश के,अपने वीर जवान।
शत शत उनको है नमन,वे हैं परम महान।।

निज कर्तव्यों में कभी,करे नहीं जो चूक।
सीमा पर हर पल डटे,हाथ पकड़ बंदूक।।

सर्व समर्पण जो करे,पुण्य धरा के नाम।
ऐसे वीरों को सदा,शत शत करो प्रणाम।।

चिल-चिल करती धूप हो,या ठंडी बरसात।
सैनिक निज कर्तव्य पर,डटे रहे दिन रात।।

जिनके मुख पर शोभते,सदा ओज के गीत।
स्वयं जनम निज हार के,दिया देश को जीत।।

जिनके बल सबको मिले,सुखी सुरक्षित त्राण।
 रक्षण करते देश का,वीर लगा निज प्राण।।

*"प्रेम"* कभी भूलो नहीं,वीरों का उपकार।
जिनके बल पर है सुखी,अपना घर संसार।।


*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

Tuesday, March 23, 2021

एक दोहा धरा पर - प्रेमचन्द साव "प्रेम"


रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विधा-दोहा
विषय-धरा
शीर्षक-धरती
★★★

सराबोर  सुख  से हुआ , अपना  मन  आकाश।
धरती  भी  सुरभित  हुई , पाकर  सूर्य प्रकाश।।

फैल गई उजली किरण,सुरभित सब तृण पात।
प्रखर  सूर्य  के  संग  में , आया   पुण्य  प्रभात।।

मन   वीणा   के   तार   में , उठने   लगी  तरंग।
जब फैली स्वर्णिम किरण,शुभ प्रभात के संग।।

लगे  चहकने  खग  सभी , अलि करता गुंजार।
सूर्य  किरण  पाकर हुआ,जब सुरभित संसार।।

फेंक  रहा  धरती  सुरभ, मोह  जाल  का  पाश।
प्रखर  सूर्य ने  जब किया, अंधकार  का  नाश।।

जब-जब  सूरज  ने किया, धरती  को  आलोक।
अंधकार  के  संग  में ,मिटा  तमस  घन  शोक।।

स्वर्ण  किरण  की  लालिमा , जैसे   पावन  हेम।
सूर्य  ओज  मन  में भरो ,उठ प्रभात  में  *प्रेम*।।

*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

Tuesday, March 9, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" जी की रचना

रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विषय -शिव
शीर्षक- शिव शंकर
"●●●●●●●●●●●●●●

                    भोले तुम हो भोले
                      सीधे साधे भोले।
                  पल में दुख हर लेते हो।
               उमापति महादेव कहलाते हो।।
                  कैलाश पर्वत पर रहते हो।
                       गंगा को शीश धरे,
                     चन्द्र की मुकुट पहने।
                     हे देवों के देव महादेव।
                      सारे संकट हर लेते हो,
                    नंदी की सवारी करते हो।
                      विष कण्ठ में रखते हो,
                      नीलकण्ठ कहलाते हो।
                       हे आदि अनंत के देव,
                    सभी सृष्टि के रचयिता हो।
          बेलपत्र,फूल मे ही खुश हो जाते हो।।
                       भोले तुम हो भोले।
                            सीधे साधे भोले।।

*प्रेमचन्द साव "प्रेम"

Tuesday, March 2, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- पलाश

नाम- प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला -महासमुंद
विधा-  दोहा
विषय-पलाश
शीर्षक-पलाश

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

नित सुरभित होने लगा,धरती से आकाश।
आम बौर से लद गए,खिलने लगे पलाश।।

पुरवाई चलने लगी,लेकर सौंधी गंध।
कोयल कुहुके बाग में,बाँध प्रीति अनुबंध।।

सरिस पुहुप झड़ने लगे,लेकर खुशबू संग।
मौसम हुआ बसंत का,उड़ने लगे विहंग।।

पगडण्डी में धूल की,उड़ने लगे गुबार।
दुर्लभ है वह दृश्य अब,बदल गया संसार।।

खुशी जताने है लगी,लता कली सब झूम।
सूरज भी होकर युवा,रहा धरा को चूम।।

मेलों का,त्यौहार का,बेला यही बसंत।
खुशियाँ ही खुशियाँ बढ़ी,हुआ दुखों का अंत।।

इस बसंत में नित्य ही,बरस रहा है हेम।
और खुशी में झूमकर,गीत सुनाये *'प्रेम'*।।

*रचनाकार*
*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

Thursday, December 17, 2020

महासमुंद से प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- कविता

रचनाकार:- प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-    महासमुंद
विषय-   क्या होती है कविता ?
शीर्षक- कविता

     *कविता*
       
 खामोश शहर की,
 जुबान है कविता।
उजड़े चमन में दिल की,
अरमान है कविता।।
जो खुद से सताए हुए,
 है इस जहान में।
ऐसे पलों की जग में,
पहचान है कविता।।
      ➿१➿
जब प्यार में किसी को,
धोखा मिले यारों।
साथी बिना किसी की,
जब दिल जले यारों।।
तड़पे हुए लोगों की,
अरमान है कविता।
ऐसे पलों की जग में,
पहचान है कविता।।
      ➿२➿
दुनिया की भीड़ में,
जो खो गये सारे।
इस जीत के सफर में,
खुद से ही जो हारे।।
उनके जुबां पे हरपल,
मेहमान है कविता।
ऐसे पलों की जग में,
 पहचान है कविता।।
        ➿३➿
जो भक्त हैं प्रभु के,
तन-मन से समर्पित।
हंसते हुए करते हैं,
जीवन को जो अर्पित।।
उनके जुबां में सजती,
गुणगान है कविता।
ऐसे पलों की जग में,
पहचान है कविता।।

➿➿➿➿➿
व्याख्या-इस कविता में कविताओं के विशेषताओं के बारे में बताया गया है।

Thursday, November 12, 2020

बसना से प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- धनतेरस

रचनाकार:-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
स्थान-बसना
विधा-दोहा
विषय:-धनतेरस

          *धनतेरस*

धनतेरस के पर्व में,माँ लक्ष्मी का वास।
और दीप की आवली,मन भरता विश्वास।।

गूँज रहा मन बाग में,दीवाली का शोर।
धनतेरस के पर्व में,खुशियाँ है चहुँओर।।

शुभ लाभ करता सदा,शुभता का संचार।
धनतेरस के पर्व में,बाँट-बाँटकर प्यार।।

द्वारों पर सजने लगे,सुंदर वंदनवार।
धनतेरस के पर्व में,दीप करे उजियार।।

कलुष तमस का नाश हो,मिले झूठ को हार।
धनतेरस के दीप से,मिलता है सुखसार।।


प्रेमचन्द साव "प्रेम"

Saturday, May 30, 2020

छत्तीसगढ़ के महासमुन्द से प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- मजदूर

रचनाकार:-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
   निवास-बसना,महासमुंद
   विषय- मजदूर
   विधा-मुक्त छंद मुक्तक

        *मजदूर* 
                            (१)
न खुशियों की अधिकता है ,न सुख से दूर रहते हैं।

न मरने की कोई  चिंता,न ही मजबूर रहते हैं।

जमाने में सभी ऊँचे इमारत जो बनाते हैं।

झोपड़ी में बिना सुविधा,वही मजदूर रहते हैं।।

                             (२)

न कोई कर्ज है इनपर,न कोई भी खजाना है।

सुबह से शाम करके काम ,घर जिनको चलाना है।

नहीं कमजोर हैं मजदूर ये निर्माण के भगवन।

है इनका लक्ष्य बस इतना के दो रोटी कमाना है।।

Monday, April 20, 2020

छत्तीसगढ़ से प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना

प्रेमचन्द साव "प्रेम"
 बसना,छ.ग.
 महामानव को नमन्
 ...........................................................
जीवनभर समानता के लिए,
               संघर्ष करने वाले बाबा को नमन्।                
ज्ञान के प्रतीक,प्रकाण्ड विद्वान,
     विश्व प्रणेता,संविधान शिल्पकार को नमन्।।
 विपुल प्रतिभा व ज्ञान के धनी,
      जातिगत भेदभाव को जिसने दूर किया।
 सामाजिक अव्यवस्था को दूरकर,
               असमानता व भेदभाव को दूर किया।।
शिक्षा,सार्वजनिक स्वच्छता पर,
                 जिसने महत्वपूर्ण कार्य किया।
 मानवतावाद,सत्य,अहिंसा,
                  भाईचारा का मार्ग प्रशस्त किया।।
 दूरदृष्टि व समय के आगे की,
                   सोच की झलक दिखलाया।
 लोगों में चेतना की लहर,
      दौड़ाने के उद्देश्य में कामयाबी दिलाया।।
देश को सामाजिक न्याय,एकता का राह दिखाया।
 समाजहित में सदैव कार्य कर समृद्ध बनाया।।
बेजुबान,शोषित,अशिक्षित लोगों को जागृत किये।
  समता,बंधुत्व का कार्यकर महामानव कहलाये।।
शिक्षित बनो,संगठित रहो,संघर्ष करो का दिया नारा।
संविधान निर्माण में अतुलनीय योगदान देकर,बन गए भीम प्यारा।।
  ----------------------------------------------------
                        

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...