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Tuesday, October 13, 2020

संजय वासनिक की रचना- मेरी बिटिया रानी

कवि:- संजय वासनिक “ वासु”
शीर्षक:- *मेरी बिटिया रानी * 
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र 

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मेरी बिटिया रानी 
एक बात कहुं 
गर सुनती हो...
तुम मुझको बडी 
अच्छी लगती हो...
कुछ चंचल सी 
कुछ चुपचुप सी ..
कुछ पगली सी
बड़ी प्यारी प्यारी
 लगती हो...

है चाहने वाले 
तेरे और बहुत ....
पर तुम मे है 
कुछ बात अलग ..
तुम अपने सपने सी 
लगती हो...
बडी मासुम सी 
दिखती  हो...
एक बात कहुं 
गर सुनती हो...
तुम मुझको बड़ी 
अच्छी लगती हो...

आँखों में बसे है 
कई सपने तुम्हारे 
रहे ना कोई अधुरे 
सब हो जायें पुरे...
तुम सबको 
ईतना भाती हो 
की सबको तुमसे 
प्यार हो जाये ...
बड़ी अच्छी अच्छी 
लगती हो...
एक बात कहुं 
गर सुनती हो...
तुम मुझको बडी 
अच्छी लगती हो...

बस मेरा है इतना कहना
जिवन की दौडमें 
हमेशा आगे ही रहना 
आये कोई भी 
कितना बड़ा संकट 
बड़े धैर्य से उससे
तुम निपटना ....। 
ना संकट से हार जाना 
ना ही थक कर लौट जाना 
बस आगे ही आगे
बढते जाना, बढ़ते जाना 
इसमें होगी जित तुम्हारी 
यही होगी प्रित हमारी 
मेरी प्राणप्रिय प्यारी हो 
एक बात कहुं 
अगर सुनती हो...
तुम मुझको बड़ी 
अच्छी लगती हो...! 
तुम मेरी बिटिया रानी हो ..। 

संजय वासनिक
( कन्या दिवस पर मेरी बेटी को समर्पित)

Monday, June 8, 2020

महाराष्ट्र से संजय वासनिक की रचना- बारिश की बुंदे

कवि:- संजय वासनिक 
शीर्षक:-बारिश की बुंदे
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र 

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 बारिश की बुंदे 

बारिश की बूंदें जब 
समाती है मिट्टी में...
और महकती  है मिट्टी..
मिट जाने के लिये..

बारिश के प्यार में...
हो जाती है मदहोश ..
मोहब्बत में उसके...
बह जाने के लिए...

कुछ तो चाहत होगी 
इन बूँदो की भी जैसे 
बरसो से तडप रही हो 
मिलन की आस में...

पहली बारीश की बुंद..
जब छुती है मिट्टी को..
सुलग सा जाता है ..
तनबदन उसका..

चाहत  में उसके...
मिटा देती है खुदको..
समा जाती है मिट्टी में..
और बन जाती है 
मिट्टी का  ही अंश..

पडते ही बिज उन दोनो की...
आगोश में, फुटता है अंकुर ..
और होती है शुरवात. ..
एक नये जिवन की...
एक नयी जिॅदगी की ..
# संजय वासनिक” वासु”...

Wednesday, February 19, 2020

महाराष्ट्र से संजय वासनिक की रचना- पाखंडी नेता

कवि:- संजय वासनिक 
शीर्षक:- *पाखंडी नेता*
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र 
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
———————————
पाखंडी नेताओ ने जुमलो के 
भरोसे क्या क्या गुल खिलाये है ...
कलतक अजिज थे जो, 
वो आज दुश्मन एक दुजे के हो गये है ..
जवानों की शहादत पर ये 
घडीयाली आसुं बहाते है....
वोटो के लिये जनता की भावनाओ से खेलने से भी ना कतराते है ...
कलतक था वोटो केलिये ईनका 
जाती और धर्मका नारा ...
नही चला वो सिक्का तो,
कहते है  बनेगा मंदिर वही दुबारा  .. 
ना बना मंदिर ना बना ये पायेंगे,
भगवान के नामपर ये जनता को,
युहीं बेवक़ूफ़  बनाते जायेंगे  ...
गर ना चल पाया राम नाम का सिक्का ,
तो ये पाखंडी सैनिकों की जान से,
भी खेल जायेंगे ..
सिमाओ के प्रहरीयों के प्रती 
हर कोई भावुक हो जाता है..
उनके बलिदान की राजनीति पर
भाई भाई भी आपस में बंट जाता है ...
# संजय वासनिक २६/०१/१९.

Thursday, January 9, 2020

महाराष्ट्र से संजय वासनिक जी की कविता- तकलीफ़

कवि:- संजय वासनिक 
शीर्षक:- *तकलीफ़*
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र 
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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*तकलीफ़*
क्यों किसीके दिन उदास, 
और रातें बेरुख़ी सी होती है...

एक छत के निचे रहकर भी,
लोग  तनहा ज़िंदगी जीते है ...

रोज़ाना आँखों के सामनेसे गुज़रते
कई चेहरे अंजाने से लगते रहते है ..

नज़रें शायद कुछ बोलती है लेकीन,
ओठोंपर लफ़्ज़  क़ैद  होकर रह जाते है ...

गर रुह और जिस्मों को बिखरना ही है   
तो टकराकर क्यों बिखर नही जाते है...

उम्र का कारंवा युहीं गुजर जाता है ,
मनमे सवालों के गुबार उठें रहते है ...

युहीं गुज़र जाती है ज़िंदगी बेमानी सी ..
क्यों ख़ुशियों का समा नही बाँधा जाता  है ... 
# संजय वासनिक “ वासु”

Monday, November 25, 2019

महाराष्ट्र से संजय वासनिक की रचना- रेल और पेट

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:- “रेल और पेट”
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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“रेल और पेट”
रोज देखा करता था
उसे आते जाते 
चार चक्को  की
गुड़गुड़ी गाड़ी  पर बैठा
गंदा सा मैला कुचैला
रेल्वे के प्लेटर्फ़ोर्म पर
आते जाते राहगीरों को
घूरता रहता था...
कभी कभी अजीब हरकतें करता,
राहगीरो का ध्यान पाने के लिये,
मांगता था वो कभी कभी कुछ,
पेट की आग बुझाने के लिये,
प्लेटर्फ़ोर्म पर खड़ी रेलगाड़ी
के रिजर्वेशन के डिब्बे मे
बैठा था कोई शरीफ सा
दिखनेवाला आदमी
कुछ अलसाया सा
कुछ परेशान सा ...
उसी परेशानी के साथ
एक डिब्बा खोला उसने
कूछ खाने चीज़े होगी शायद 
आंखे बता रही थी उसकी...
जैसे ही  उठाकर निवाला
कड़वा सा मुंह बना लिया ..
थूक दिया तुरंत प्लेटर्फ़ोर्म पर
बिलकुल निचे एक सख़्ती के
जहाँ लिखा था
“स्वछ भारत मिशन”
उसी थुकी चीज को
उसने भी देखा,
उठी उसकी आँखोंमे
एक अजिबसी चमक
और पूरी ज़ोर से अपनी
चार चक्कोवाली
गुड़गुड़ी गाड़ी दौड़ाया
और एक ही पल मे
लपक लिया खिड़की से
बाहर थूकी हुयी
वो खाने की चीज़
अपनी मैली सी फटी पुरानी
कमिज से उसे  करके साफ
वो बड़ी खुशी से
गटक गया ....
पेट की आग पर
जैसे पाणी की करने बौछार ...
तभी रेल गाड़ी और
वह  रेंगने लगे...
अपने अपने गंतव्य की ओर ....
# संजय वासनिक ”वासु”

Friday, November 1, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की कविता- मेरे गांव के बच्चे

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-मेरे गांव के बच्चे
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.


मेरे गांव के बच्चे
सुना है अब मेरे गांव के,
सारे बच्चे बडे हो गये...
कोई हिंदु तो कोई,
मुसलमान हो गये...
खैर ये तो मजहब की बात है,
पर वे बडे छुपे रुस्तम से हो गये..
यकायक ही एक दुजे के,
वो दुश्मन से हो गये...
पलट कर देखा जब जिदंगी को..
कुछ हसीन लम्हे याद आ गये....
वो मजे, वो खेल और ..
माहौल याद आ गये...
वो जमाने भी क्या रंग बिंरगे थे..
जब सबके हाथ मे तिंरगे थे..
गांव गांव गली गली पैगाम थे..
तिंरंगे के ही चर्चे सरे आम थे...
तब सारे बच्चे मासुम थे..
सब के सब इंसान थे...
वे बच्चे अब बडे हो गये,
तिंरगे के रंग आपस मे बट गये...
कोई केशरीये हो गये..
तो कोई 'हरे' भरे हो गये,
तो कोई 'निला'म य हो गये..
बचे खुचे कुछ  'मा' ओ के लाल हो गये ..
अब सच मे 'लाल' म 'लाल' हो गये...
कुछ तो मालामाल हो गये,
तो कुछ जिंदगी के बोझ को,
ढोते ढोते बेहाल हो गये...
मेरे गांव के बुरे हाल हो गये,
सच मे मेरे गांव के बच्चे
अब "बडे" हो गये ...
# संजय वासनिक"वासु"...
~25102017

Tuesday, October 22, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक जी की रचना- गुमान



कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-गुमान
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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गुमान
जानता हुं मै
​ज़िन्दगी कभी भी
ले सकती है करवट,
ईसिलीये किसी बात का
गुमान नही करता ..
​गर छुलु मै बुलंदियाँ हज़ार,
मगर किसीके लीये कोई
गुनाह नही कर सकता
कोई और करे गुनाह तो
उसे सह नही सकता
ईसिलीये मै किसी बात
का गुमान नही करता
कुछ बेतुके झगड़े​,
​कुछ इस तरहसे ,
खत्म कर दे​ना चाहता हुं,
हमेशा हमेशा के लीये..
​जहाँ गलती नही भी​ रहती
​फिर भी हाथ जोड़कर
माफी मांग लेना जानता हुं..
ईसिलीये किसी बात का
गुमान नही करता ..
# संजय वासनिक “ वासु”...

Monday, October 14, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की रचना - कुछ लोग

2. कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-कुछ लोग
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
——————————-

*कुछ लोग*

भीड़ में भी अक्सर
अकेले होते है
तनहाई से बातें करते हैं
कुछ लोग...

मुश्किल से
दिन गुजारते हैं,
रातों में अक्सर जागते हैं
कुछ लोग....

महफिलों में
खामोश रहते हैं,
खुद से  बहस करते हैं
कुछ लोग....

छुपाते हैं अक्सर
दिल की लगी को
अकेले में बहुत रोते है
कुछ लोग...

दिल की गहराइयों में
उतर जाते हैं,
दिल्लगी को भुलाए
ना भुल पाते हैं
कुछ लोग...

किनारो  से प्यार
करते है वो,
संमंदर की  गहराई को
सीनेमे बसाते  हैं
कुछ लोग....
# संजय वासनिक
email:-smwasnik@gmail.com

Monday, October 7, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की रचना- कवि की कविता

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-कवी की कविता
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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*कवि की कविता*

किसी ने मुझसे कहा,
के वाह! भाई क्या लिखते हो,
मंत्रमुग्ध अपने शब्दों से,
हर बार तुम कर देते हो,
मैंने उनसे कहा की ये दोस्त ...

मेरे शेर, मेरी शायरी,
मेरी कवितांये
कहा मेरी अपनी है,
किसी बेटी के,
किसी माँबाप के ,
किसी प्रेमी के,
बस ये कुछ सपने है....

मै लिखता नही,
समेटता हुँ उन्हे शब्दोमे, 
कुछ अल्फ़ाज़ ...
किताबों  मे जो,
कभी छपे होते है ...
कही किसी पन्ने पर,
बिखरे बिखरेसे...
भटक रहे होते है ,
बस उन्हें समेटकर
कलम अपनी चलाकर,  
कहानी उनकी बनाता हुँ ...

रास्ते पर बिखरे कुछ
आवारा पन्नोपर अक्सर
मिल जाते है मुझे कुछ लफ्ज,
उठा लेता हुँ वहीं से और
केवल वक्त बन जाता हुँ
एक लड़ी मे उनको पिरोता हुँ
एक धागा हुं मै,
सुई मेरी कलाम है,
चल देता हुं युही मनचला सा,
फिर से किसी राह पर,
आवारा लफ़्ज़ों को ढुंडने ...

यह जो बात सराही है तुमने,
ये पीड़ा उनकी सही है मैंने ,
सब कुछ इन आंखोने देखा है
मैंने तो  केवल शब्दों में कही है....

जो कुछ देखता हु,
आसपास मै मेरे ,
ना जाने कैसी तकलीफ मे,
जीते है कई लोग, 
जो जिंदा कहलाते  है,
उन सबके, दुख दर्द के
अफसानो को बाँधकर
अपनी दिल की पोटली में...
एक एक कर,
जोडने की, पिरोने की,
करता कोशिश हुँ
तभी शायद सहता हुं,
प्रसव पिडा को...
और जन्म देता हुं,
कोई शेर, कोई गज़ल,
या किसी कविता को...
जो किसीके के मन को छूती है,
किसीके गम को भरती है,
शायद किसीके  अपने
शब्दों के जरिये,
सपने नए दिखाता हुँ ...
कुछ अधूरे, कुछ पुरे ...
ख्वाबो को जागता हुँ ....
# संजय वासनिक" वासु"....

Friday, September 27, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की प्रकाशित रचना- महाराष्ट्र देशा (मराठी)

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-*महाराष्ट्र देशा*
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
—————
*महाराष्ट्र देशा*

महाराष्ट्र देशा
माझ्या मराठमोळ्या देशा
ईथे नांदती विविध भाषा
पश्चिम तटाची कोंकणी
आणी मालवणी
उत्तरेस बोले अहिराणी
मराठी जी बोले पुण्याची
मध्य मराठा ठासुन बोले
गायी शिवरायाची गाणी ..
दक्षिनेला बोलती दख्खणी ..
विदर्भात बोले वर्हाडी
सोबत चाले झाडी अन लांजी ...
मुबंईची बोली खिचडी  कशी
काय ती शब्दाची फोडणी ...

देश महाराष्ट्र हा पुरोगामी तितुका
शिवराय ते आंबेडकर महान हा ईतुका
ईथे जन्मले  संत महात्मे उगीच न कौतुका
ज्ञानेश्वर ते तुकडोजीं हे देणं ह्या मातीचा

रण दुंदुभी गाजे सह्याद्री च्या कपारी
शिवाजी संभाजी ची तळपे तलवार न्यारी
रयतेच्या रक्षणार्थ देह ठेवला या भुमीवरी
अस्पृश्य म्हणती जयांना अशा पोलादी
विरांनी ही कापला चाळीसपट अरी उरी ..
मराठी विरांचे झेंडे फडकती अटकेवरी..
तळपी तलवार  ही अखिल भारतावरी ...

वैनगंगा, कन्हान , कृष्णा अन गोदावरी
धर्माचे सौख्य नांदे ईथे शांत नदीतिरी
एक पिके ना पिकती बहुत पिके शेतावरी
भात कापुस सोया उस माळावर अंगुरी
तुर हरभरा ज्वारी बाजरी अन लाखोरी ...
घाटमाथा पठार पर्वत शांत समुद्रा तिरी
वनवन फिरुन वारा बसे किर्र जंगलापरी

निसर्गाची काय ही लिलया तर्र्हा
पुर्वदेश अन पश्चिम किनारा
नुसताच  होई जलमय बिचारा
मध्यदेश हा पाण्याविन कोरडा निरा
जंगल संपतीचा अफाट पसारा
खनिजद्रव्य चा साठी  ना पडे अपुरा ...
बहुरंगी, बहुढंगी विविधतेत नटनारा
अमुचा देश मराठमोळा प्यारा
महाराष्ट्र देश आमुचा प्यारा ...
# संजय वासनिक “ वासु”

Monday, September 23, 2019

महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की कविता- निब्बाण

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-निब्बाण
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
———————————-
*निब्बाण*

ज़िंदगी बहुत छोटी है
एक दिन जब
तुम मर जाओगे
तब तुम सौ साल के
भी ना होंगे ....
अगर तुम बुढ़ापा
महसूस भी नहीं करोगे
तब भी उम्र तुम्हें बता देगी
की तुम अब थक चुके हो....

तुम्हारा ख़ुशहाल
और ये रंगीन जिवन
एक दिन फीका पड़ जायेगा
तब तुम सदमे में जाओगे ...

क्योंकि इस धरातलपर
कुछ भी स्थायी नहीं
सब कुछ अनित्य
तुम्हें ये भी पता होगा
तुम्हारी अपनी चीज़ें
और ख़ुद तुम्हारा
जिवन भी यथार्थ नहीं ...

शायद तुम्हारे अपने
सुखदायी और आरामदेह
घरौंदे में भी कभी
चैनसे नही महसूस कर पाओगे
ना ही आराम से रह पाओगे ... 

ईसिलीये तुम कभी किसी
भौतिक वस्तुसे ईतना
क़रीब ना जाना और
ना ही उससे लगाव रखना
की तुम्हे उससे प्यार हो जाये ..
तुम सोचते हो हर चीज़
जो तुम्हारे पास है
वह तुम्हारी है ....

पर ज़रा यहाँ रुको
एक पल के लिये सोचो
जब तुम मर जाओगे
तब क्या रहेगा
तुम्हारा तुम्हारे पास....
क्या साथ आयेगा ...
थोड़ा सोचो और समझो
ख़ुद से प्यार करो
वर्तमान में जियों
जो सत्य है ...

सब भुल जाओ
आराम चैन और नींद
खोकर जमा की गयी
भौतिक वस्तुओं को...

क्योंकि तुम्हारे सपने भी
तुम्हारे अपने नहीं होते ...
सपनों में  जब तुम
किसीसे मिलते हो और
फीर जागते  हो तब
सब का सब कही
विलीन हो जाता है....

तुम जिससे बेहद 
प्यार करते हो
तुम्हारा अपना
बहुत क़रीबी व्यक्ति
अगर  मर जाता है तब
तुम फिरसे अकेले पड़
जाते हो.....

बस ईसी तरह है
तुम्हारा जीना है खुद से
केवल वर्तमान में
खुद के लिये, खुद से
और यही है
जिवन का अंतिम सत्य ....
यही है निब्बाण  ....
( भगवान बुध्द के सुत्त निपान पर आधारित )
# संजय वासनिक “ वासु”

Tuesday, September 17, 2019

मुंबई,महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की कविता- मेरी राष्ट्रभाषा....

3. कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-मेरी राष्ट्र भाषा...
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.

मेरी राष्ट्र भाषा...
(अतंरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर एक छोटीसी कोशीश...)

दो दिन की चांदनी
फिर अंधेरी रात....
क्यों करते हैं भाई,
हम राष्ट्र भाषा की बात ....
 
भुल जाओ इसे,
होगा यही बेहतर...
नही तो कैसे जा पायेंगे
हम आंतरराष्ट्रीय स्तर पर...
 
बच्चो को फिर भारत में ही
पढाना होगा...
अमरिका जाने के सपनो से
तुम्हे हाथ धोना होगा...
 
आजकल तो हम हिंदी भी
अंग्रेजी में लिख लेते है...
जब काम चल जाता है
तो क्यों हम हिंदी सिखते है...
 
क्यों नही चाहते हो
हमारी भाषा की उन्नती ...
बताओ कहाँ थम गई चीन,
जापान, जर्मनी और रुस की प्रगती…
 
क्यों हमें हमारी भाषा की
कोई फिक्र नहीं,
गुलामी की मानसिकता है बस,
स्वसम्मान का जिक्र नहीं...... 
 
कब होगी हमारी हमारे
अंतरआत्मा से मुलाकात,
कोसो दूर है खुद से,
राष्ट्रभाषा की छोड़ो बात....
 
भूला चुके है पाली और
संस्कृत को कबसे ,
हिंदी को भी भूल जाएंगे
हम आहिस्ते आहिस्ते.....
 
ए हिंदुस्थानी पूत तुम सिर्फ क्या
विदेशियों की नकल कर पाओगे,
श्रेष्ठ वाङ्ग्मय रचयिता  ए कुल वंश तुम,बंदर बनकर  रह जाओगे.......  
 
एक  अदनासा है सुझाव
करे हम अपने आप से ही
अपनी भाषा मे ही संवाद,
फिर क्यों करना है ...
हिन्दी की श्रेष्ठता पर विवाद ....
# संजय वासनिक ”वासु”

Tuesday, September 10, 2019

मुंबई, महाराष्ट्र से कवि संजय वासनिक की कविता- पागल बारिश

कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:- पागल बारीश
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
********
*पागल बारीश*

पागल बारीश
जानती ही नही की
मिट्टीसे क्या मिलेगा उसे ...

फिर भी दिवाने की तरह ...
करने मिट्टी को सरोबार ...
बरस जाती है दिलसे ...

जिॅदगी भी बस कुछ
ऐसे ही जी ले ये इंसान...
क्या पाना है उसकी...

क्या करना  चिंता...
हर पल  जी ले जरा
दिवानों की तरह  दिलसे ...
# संजय वासनिक

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...