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Thursday, August 5, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- ग़ज़ल

रचनाकार का नाम- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा - गजल 
काफिया (तुकान्त)- आरा
रदीफ(पदान्त)- नहीं
शीर्षक-
          कोई हमारा नहीं


इस जालिम दुनिया में कोई हमारा नहीं,
मगर  हमने अपनों से किया किनारा नहीं ।

बात- बेबात लोग कभी रुठ जाया करते हैं,
मगर ये नहीं कह सकते, हमने पुकारा नहीं ।

जज्बात् हमारे सस्ते लगते तो लगने दो,
हमने किसी को कभी  दिल से उतारा नहीं ।

जुड़कर भी दूर हुये जाते हैं लोग हमसे,
कैसे कह दूँ इस जहाँ में मिलेंगे दुबारा नहीं ।

सहते रहे लोगों की बदजुबानी सदा,मगर
तल्ख़ जुबां का तीर हमने मारा नहीं ।

ये दुनिया जाने किस बात पर गुमां करती है,
यहाँ सब बराबर ,खुदा का कोई बँटवारा नहीं।

हो जायेंगे रुखसत कौन यहाँ ठहरा है, अनु,
मीठे लब्ज़ रह जायेंगे, भाया किसी को खारा नहीं।

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Saturday, June 12, 2021

तुम ही श्रृंगार : अनुरमा शुक्ला

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान - दुर्ग छ.ग.
विधा- कविता
शीर्षक-  तुम ही श्रृंगार

बाट जोह रही प्रेयसी,पिया मिलन की आस,
दूर हो तुम ,मैं बेचैन, कैसे मिटाऊँ हिय प्यास,
तुम बीन कैसा श्रृंगार, क्या बिंदिया क्या हार,
आ जाओ अपलक नयन से करती हूँ इंतजार,
बाँहो में यूँ भर लूँगी, हर खीझ उतार लूंगी,
जी भर तुझे निहार लूंगी,फिर सारे श्रृंगार करुंगी ,
तुम आओ तो ले आना चटक रंग सिंदूर,
माँग मेरी भरकर सजना जीवन सफल बना देना,
तुम संग ही महकती रहूँ, फिर ना जाना दूर,
पहनकर तेरे प्यार का गहना रुप मेरा सजा लूंगी,
सात फेरों का अटूट बंधन सात जनम निभा लूंगी।।

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Tuesday, June 8, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- व्यवहार

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता छंदमुक्त
शीर्षक-  व्यवहार मित्र से

कुछ दोस्त...
बड़े प्यारे होते हैं
दिल के करीब लगते है
प्यारी- प्यारी बातें उनकी
ज्यों मिश्री हो घुली 
सुबह शाम की मौज मस्ती
शरारतें उनकी मन को भाती
लाख गिले-शिकवे में भी
दोस्ती सदा बनी रहती..
सुख-दुख में जो साथ रहे
मित्रता सबसे ऊँची वही
महज मन बहलाने वास्ते
बनते नहीं मित्र प्यारे...
बात यह तुम गांठ बाँध लो
पल-पल मित्र ना बदलो
हर मुश्किल में साथ रहो 
व्यवहार सबसे मधुर रखो ।

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Monday, June 7, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- तेजस

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान - दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता छंद मुक्त
विषय - तेजस
शीर्षक - 
      *तमस का तेजस*


जाने क्यूँ ..
पल-पल बदलता है मन
कभी खुशियों का झोंका
कभी उदासियों की कहर
खोजती हूँ क्या ?
यह मेरे लिये ही पहेली
मन की खिन्नता..
ऊथल-पुथल अन्तर्मन की 
जाने क्या करती है तलाश
और फिर..
हौले से कोई आकर ठिठोली करता,
मेरी पीड़ा आँखो में पढ़कर 
गुदगुदाहट भरी मस्ती से
उल्लास भरता
मन के एकांत कोने में था
जो तमस
उदीप्त कर देता वो बन
 तेजस ।

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Saturday, May 29, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- गाँव के सुरता

रचनाकार - अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता छत्तीसगढ़ी
शीर्षक -गाँव के सुरता

अब्बड़ सुरता आवत हे मोला
बखरी के तुमा नार,
पाके पाके मखना अऊ आमा के ओरमे डार ।

कोटना में गऊ के चारा 
अऊ बियारा में रखे पैरा,
कुआँ पार के ठिठोली अऊ
केरा के सुघ्घर घेरा ।
 
देवारी के तिहार संग
राऊत के नाचा,
ए पारा ले ओ पारा
किंदरय ममा संग भाँचा । 

खेत के मेंड़ मा पीपल के छँइहा ,
कतनो चिखला माते फेर
ममहाये मोर भुंईया ।

रँधनी खोली के धुँगिया मा
भात के अँधना,
दू आँसू रोवाये रोज चूल्हा के राँधना ।

सीललोढ़ा मा पिसाये बने चिरपोटी पताल के चटनी,
बोरे बासी मिठाये सुघ्घर मिठाये अंगाकर रोटी ।

नंदा गे वो बटकी, नंदा गे धान के कोठी,
हाथ गोड़ के ठुनठुनाये ले
तापन अँगरा के गोरसी ।

शहर के नवा फैशन मा नंदावत हे जम्मों तिहार,
अब्बड़ सुरता आथे मोला बखरी के तुमा नार...।

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Friday, May 21, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- माँ

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता छंद मुक्त
शीर्षक- माँ


*माँ*

लेखनी भी आज गौरवान्वित है,
अपना वजूद निखारने को...
बस माँ लिख देना तुम मुझे चलाकर-
यही शब्द खुद में परिपूर्ण  है ।

उम्रभर समझौता कर जाती है,
बच्चों की खातिर खुद को भूलाती है,
स्नेहिल थपकी देती शिशु को..
निहारती नजरों से खुद कभी सो जाती है।

स्वादिष्ट भोजन जतन से पकाती,
सामान सबके करीने से जमाती,
सबकी पसंद ध्यान में रखकर-
अपनी ही पसंद भूल जाती है ।

पीकर अपमान के घूंट भी, प्यार सभी पर लुटाती..
सुन कठोर वचन लोगों के
चुपचाप रह जाती 
चूक कहाँ हुई मुझसे, यह सोच दुःख जताती ।

आधुनिक माँ अब बनने लगी आत्मनिर्भर, 
पुरुषों के साथ चलती कांधे से कांधा मिलाकर,
उठा लेती अब वित्तीय भार, फिर भी
समझौता करती चलती है जीवनभर ।

पा लेती भरपूर खुशी बच्चों को देखकर,
जुट जाती नई ऊर्जा से भविष्य के सपने बुनकर,
ऊँची उड़ान देकर इन्हे जी लूंगी जी भरकर-
गुजर जाती है मगर जिंदगी पांव-पांव ही चलकर ।

वो माँ की गोद सा सुकून और आँचल ममताभरी,
जहाँ सिर रखकर मिटा लेते थकान हमारी,
नहीं है शब्द परिभाषित करें जो माँ को-
खोज लें शब्दकोश दुनियाभर की सारी ।

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Thursday, May 20, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- मन की कल्पना

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान - दुर्ग छ.ग.
विधा- कविता छंदमुक्त
शीर्षक- मन की कल्पना


      मन की कल्पना

क्या बताऊँ मेरे मन की कल्पना,
         बसा लेती हूं एक अलग ही दुनिया।

हँसती रहूं खुशियाँ मनाती रहूँ,
       तितलियों की भाँति मचलती फिरुँ।

दृढ़ता से मनचाही राह पर चलूँ,
      रुढिवादी दिवारों के अवरोध हटाऊँ।

जकड़ते हैं, रोकते हैं कुछ रिवाज मुझे,
      क्यों ना उन नियमों को ताक में रख दूँ।

वो ऊँचे गगन का बादल पुकारता है मुझे,
       नहीं तेरा वो बसेरा..भरमाता है मुझे ।

है आभास, छलावा है,अब ना होंगे ये सच,
   फिर भी कुछ पल के लिये रुह में उतारुँ ।

लगाकर पंछियों सा पंख स्वच्छंद मैं उडूँ ,
      तोड सारे बंधन गगन के संग ही हो लूं...।।

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Tuesday, April 20, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना -ठिहार

रचनाकार -अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- ठिहार 

ठनी हुई है आज जीवन-मृत्यु में
मगर..
जीजीविषा भी अड़ी हुई है ।

ऐ प्रभु तुम से ही है ठिहार
कभी तो..
प्रार्थना हमारी स्वीकार होगी ।

माना निराशाओं के बादल हैं आज
कल यही...
आशाओं की बूंद बनकर बरसेंगी ।

प्रकृति फिर उल्लास मनायेगी
हर तरफ...
हरियाली ही नज़र आयेगी।

रहते नहीं दिन सदा एक जैसे
है ठिहार...
फिर दुनिया मुस्कुराने लगेगी ।।

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Saturday, April 10, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- खगंगा

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग)
विधा-कविता
विषय- खगंगा
शीर्षक-
*आकाश दर्शन*


सारी दुनिया की दिनचर्या
दूर अंतरिक्ष में तय होता
सूर्योदय से दिन चले तो..
सूर्यास्त से घोर अँधियारा ,
सौर-परिवार का मुखिया तारा
आठ ग्रहों संग सूर्य हमारा ।
 
तारे टिमटिम चमकते ऐसे,
नभ में दीप जले हों जैसे
सप्तर्षि,धूमकेतु, पिंड उल्का
आकाशगंगा संग निहारिका
टूटते तारे से माँगे मन्नत 
आओ कर लें आकाश दर्शन।

शुक्र सबसे चमकीला ग्रह
कहें इसे सांध्य,भोर का तारा
वृहस्पति का आकार  बड़ा
मंगल में जीवन की संभावना
लाल ग्रह यह है कहलाता
कहते यहांँ से एलियन आता।

शनि के तीन वलय सुंदर
रवि के पास बुध रहे सदैव
पृथ्वी पर बसता है जीव
तभी तो कहलाये अद्वितीय 
दूरबीन ने खोज लिया अरुण
दूर रहकर ठंडे हुए वरुण ।

तारामंडल तारो का समूह
उत्तर दिशा में स्थिर तारा ध्रुव
चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह
देख इसे करते,  व्रत -पूजन 
आसमान में सबसे न्यारा
 बच्चों का यह मामा प्यारा ।

सुंदर ये नजारे झिलमिल  रहते सारे सदा  हिलमिल 
अनेकता में एकता की मिसाल
सीख लें इनसे सारा संसार ।।

                  अनुरमा शुक्ला
                   दुर्ग (छ.ग.)

Saturday, April 3, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- इत्र

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- ईत्र


मुझे नहीं भाती....वो खुश्बू जो तन को महका दे,
किसी स्थिर शांत चित्त को बहका दे,
जानती हूं....
ईत्र जब घुलती है हवाओं में हवा भी बहक जाती है,
वो ईठलाती हुई जाने कहाँ तक जाती है,
तीक्ष्णता मन मस्तिष्क में छा जाती है,
मगर वह खुश्बू ही क्या जो शीशियों में बंद हो...

मुझे भाती है मिट्टी की सौंधी सी महक, जो
पानी की बूंदें पड़ते ही फिजाओं को महकाती है,
प्रकृति भी स्वच्छ निखरी नजर आती है जैसे...
बरसों से प्यासी धरा प्यास बुझने की खुशियाँ मनाती हो ।।


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Wednesday, March 31, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- सरहद

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- सरहद पार


ये कैसी विपदा देश में आई,
जन जन में खौफ है छाई,

सरहद पार से जाने किसने
हवाओं में जहर घोल फैलाई

सैन्य बल भी हुये नाकाम
ऐसी दुश्मनी किसी ने निभाई

साँसो की डोर जो थम रही
काम ना आती कोई दवाई

पैसे सुविधाएं सब सूक्ष्म हो गये
सूक्ष्म ने ही अति कहर है ढाई 

राजा-रंक सब एक समान
चेहरे से इसे पहचान ना आई

टीकाकरण सुरक्षित उपाय
मेहनत से जो सफलता पाई,

जन-जन में जागरूकता लाकर,
अब देश सुरक्षित कर लो भाई ।।


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Thursday, March 25, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- एकलव्य

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- गुरुभक्त एकलव्य


        अब ना कोई एकलव्य
        ना ही गुरु द्रोणाचार्य 
        अपनी विद्या से स्वयं
        की करते हैं गुणगान ।
अँगूठा काट रख दे अपनी
महान गुरुभक्त कहलाये
ऐसा कौन जो अपनी
विद्या ही समर्पित कर जाये ।
     अर्जुन बनना है आसान
     द्रोणाचार्य भी होंगे कितने
     दान करे जो मुफ्त विद्या
     ऐसे गुरु विरले ही होंगे
प्रतिमा को गुरु मानकर 
अभ्यास कठोर कर जाये
ऐसा श्रेष्ठ धनुर्धर जग में
एकलव्य ही कहलाये ।।

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Tuesday, March 23, 2021

धरा की व्यथा-अनुरमा शुक्ला


रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- धरा की व्यथा

करती करुण क्रंदन अपनी बेबसी पर धरती,
सूखे अधर अतृप्त नयन, आकाश को निहारती,
दरार पड़े जिस्म, लिये मरहम की आस..
जल की एक बूंद को धरा अब तरसती ।।

कोई भूखे पेट क्यों ? जब भरपूर अन्न यह ऊपजाती,
सोने चाँदी हीरे खदान ,गर्भ में इसकी थाती,
मगर मानवीय कुकृत्यों से शर्मसार ...
प्रदूषकों की धार से हर रोज धरा मैली होती ।।

खंडों-खंडों में बँटी, जो अखंड वसुंधरा कभी कहलाती,
लालच द्वेष की तराजू ने हर अंग इसकी मापी,
चहुँ ओर लहलहाती हरियाली थी कभी, मगर...
बंजर होने का विलाप अब यह धरा करती  ।।

Monday, March 22, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- संकल्प

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा -कविता
शीर्षक- संकल्प


संकल्प पवित्रता की पराकाष्ठा  है,
मजबूत मन की परीक्षा भी है।

अच्छे कर्मों को करने की लगन तो..
बुरे विचारों को त्यागने की दृढ़ता है।

न्याय पथ पर चलने की लगन  है,
नव-निर्माण की शक्ति,धर्म का पालन  है ।

हिम्मत से ही संकल्प है और
संकल्प से ही संघर्ष सफल है।

देश की उन्नति निश्चित है अगर..
हर कार्य की नींव दृढ़ संकल्प से होती है।।

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Friday, March 19, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- व्रीहि

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- *व्रीहि*


फूलों से लदी लताये ,मन को  बहुत लुभाती,
हरी-हरी हरियाली उपवन की शोभा है बढ़ाती,
ऊँचे-ऊँचे वृक्ष झूमकर छूते
जैसे आसमान,
प्रकृति की इस सजावट से
ऊर आनंद समाती,

मगर लहलहाते व्रीहि देख
खुशियाँ धरा मनाती,
अन्नदाता के चेहरों में जैसे
रौनकें यह ले आती,
भूख मिटाये पेट की, खेत
 जब लहलहाये
सोना रुपी अन्न उपजाती धरती,सबको सम्पन्न बनाती ।

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Thursday, March 18, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- बसाहट

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता(छंद मुक्त)
शीर्षक-
  *बसाहट दिलों की*                    


इन वीरानियाँ में कुछ तो शोर
किया जाए,
रौंनके उत्सवों की मोहताज ना होने पाये,
रहते थे कभी जिन बस्तियों में शरमाये से,
क्यों ना अब खुलकर ठहाके लगाया जाये ।

एक वक्त था वो भी, जब घरों में थी दूरियाँ ,
मगर पास थे दिल और सांझा थी रसोईयां, 
बढ़ने लगी भीड़ और बसाहट घनी हुई,
पास रहकर भी दरवाजों में देखो लगी है कुंडियां ।

थोड़े पैसे ही कम ना थे खुशियों के बाजार में,
छोटी सी मीठी गोली ही बाँट लेते थे प्यार में,
माँ के आँचल में बंधी वो चवन्नी मिलने की खुशी,
लाखो रु भी कम पड़ेंगे ऐसा दुलार पाने में ।।

चलो फिर वहीं चलते हैं खोया हुआ वक्त खोज लेते हैं,
बैठकर संग सबके ,फिर वही मीठे दिन जी लेते है,
इन तन्हाइयों को देकर उल्लास की बसाहट,
जीने की खूबसूरत सी वजह दे देते हैं ।।

...................................

Monday, March 8, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- निराकार

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा-कविता
शीर्षक - *निराकार शक्ति*


विस्तृत है  विशाल है
        दृश्य है सारे जहाँ में
धुंधली सी रेखाएं बनती
        विस्मृत हुई यादों की
स्मृति पटल को झिंझोड़ती 
      उठती बादलों में फिर
 छुप सी जाती आकृति            
     जोर देती मस्तिष्क पर
कुछ समझ नहीं पाती 
   कुछ तो बनती बिगड़ती          
खोजती हूं कुछ खोयी सी
    दो आँखे शक्ति से भरी                                                                    निहारती शक्तिदायिनी सी
    जीवन देने वाली देवी ही
मुझे बल देती, रक्षा करती 
    फिर चल पड़ती मैं नये पथ
संघर्ष की नई शुरुआत में
      और साथ मेरे शीश पर 
वही दो आँखे संबल देती
          हैं ना दोनों निराकार
आसमान और वह ईश्वर ।।

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Tuesday, March 2, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- बोलते पलाश

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग(छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- बोलते पलाश


सुर्ख रंग की चुनरी जैसे
ओढ़े तरु सड़क किनारे,
खेतों की मेड़ों पर
सुकून भरी छांव है,
देखो फाग के रंगो से
सजने लगी है प्रकृति,
चेहरों को रंगने जैसे
आतुर है होली सी,
जंगल में अग्नि दिखती
आँखो को करते भ्रमित
खिलने लगी हैं कलियाँ,जैसे
जवान हो गई डालियाँ
धड़कनें लगी है बढ़ने
चेहरे हया से लाल हुये,
इंतजार करती नायिका को जैसे
प्रिय के आने की हो आस,सच में...
लगता है जैसे कुछ बोलते हैं ये पलाश....। 

Friday, February 19, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- खिलौना

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान -दुर्ग छ.ग.
विधा- कविता
शीर्षक- खिलौने


गये जब दुनिया के बाजा़र में
देखे खिलौने रंग-बिरंगे,
हँसते मुस्कुराते चेहरे 
गुड्डे-गुड़ियों के लगे थे मेले
दौड़ती मोटर गाड़ीयाँ थी,
घोड़े हाथी चाबी से चलते,
मन को मोहने वाले लगे
चुल्हे-चौंको के बर्तन सजे,
बिकती खुशियाँ मोल में
चंद सिक्कों का खेल ये
मासूम बचपन कितना निश्छल,
पल में हँसना पल में रोना,
मिल जाये जब कोई खिलौना
मन बहलाने के साधन प्यारे
बच्चों को लुभाने वाले
अब ढुंढती हूं कोई खिलौना
बहलाकर फिर से हँसा दे
संघर्ष भरे लम्हों में,
 खुशियाँ मुझे अपार दे,
क्यूं अब हम समझदार हुये,
रौनक लाने चेहरों मे सबके,
खिलौने बनकर स्वयं रह गये ।।

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Tuesday, February 9, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- चेतना

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक-
        *चेतना*

श्रम रुपी पूँजी ना सहेज,
हाथों पर भरोसा रख,
ऐ मानव जाग ज़रा,
अपनी पहचान तो कर।

यूँ ना गंवा जिंदगी निर्रथक,
अपनी ताकत देख आज़मा,
चट्टानों से राह बना सकता है,
तू एक बार कोशिश तो कर ।

दिया है सब कुछ प्रभु ने,
शिकायत अब ना कर,
बुद्धि मिली है सबसे बढ़कर,
अच्छे बुरे में अंतर तो कर ।

है सजीव,अचेतन नहीं,
निर्जीव नहीं, ये तो जता,
मोल अपनी तू समझ,
कर्म की गठरी खोलकर।

सोना उगा सकता है धरा पर,
अनमोल है यह मानुष काया,
वजूद पहचान ले खुद की,
चेतना अपनी जागृत तो कर ।।

                   अनुरमा शुक्ला
                    दुर्ग (छ.ग.)

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...