Monday, December 21, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले की रचना- ममता

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--ममता मीठी मोदक जैसी
                  ०××××××××०
ममता महके  माँ के मन में , जगती  का  आधार ।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।

ममता महान  गुण होती है , ममता   रही  अनन्त ,
ममता बिन प्राणी का प्यारे , हो    जायेगा  अन्त ।
ममता से ही  पोषण  होता , प्राणी    की   उद्धार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।१।।

ममता से शिशु पल पाते हैं , दुनिया  चलाय मान ,
ममता रखती है  जीवों को , जग  में  रही  प्रधान ।
ममता गढ़ती जगती को है , रही  यह शिल्पकार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगर ।।२।।

ममता से कायम  है जगती , यह जीवन का डोर ,
ममता ही   रखते  आई   है , हराभरा  चहुँ   ओर ।
ममता माँ के उर  बसती है , ममता  जग में  सार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।३।।

ममता बसती सब प्राणी में , चाहे  कीट  -  पतंग ,
ममता बिना  नहीं   जीतेंगे , जीवन  का  है  जंग ।
ममता ही  जीवन  देती  है , खुद  को  है  दे  वार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।४।।

ममता होती  जग में  प्यारे , सारे  सुख  का  मूल ,
ममता ही तो  हर  लेती  है , मन  का  सारा  शूल ।
ममता बिन है दुनिया सारी , होगी   खूब   असार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।५।।

ममता का है  गुण गा पाना , नहीं  विश्व में  शक्ति ,
ममता के  आगे जग  बौना , ममता श्रद्धा - भक्ति ।
ममता होती  'ठाकुर' मानो , करुणा   का   श्रृंगार ।।
ममता मीठी  मोदक  जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।६।।
                       ०××××××०
व्याख्या--ममता की विशेषता का यथासंभव वर्णन
              करने का प्रयास किया गया है ।

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