स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--ममता मीठी मोदक जैसी
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ममता महके माँ के मन में , जगती का आधार ।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।
ममता महान गुण होती है , ममता रही अनन्त ,
ममता बिन प्राणी का प्यारे , हो जायेगा अन्त ।
ममता से ही पोषण होता , प्राणी की उद्धार ।।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।१।।
ममता से शिशु पल पाते हैं , दुनिया चलाय मान ,
ममता रखती है जीवों को , जग में रही प्रधान ।
ममता गढ़ती जगती को है , रही यह शिल्पकार ।।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगर ।।२।।
ममता से कायम है जगती , यह जीवन का डोर ,
ममता ही रखते आई है , हराभरा चहुँ ओर ।
ममता माँ के उर बसती है , ममता जग में सार ।।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।३।।
ममता बसती सब प्राणी में , चाहे कीट - पतंग ,
ममता बिना नहीं जीतेंगे , जीवन का है जंग ।
ममता ही जीवन देती है , खुद को है दे वार ।।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।४।।
ममता होती जग में प्यारे , सारे सुख का मूल ,
ममता ही तो हर लेती है , मन का सारा शूल ।
ममता बिन है दुनिया सारी , होगी खूब असार ।।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।५।।
ममता का है गुण गा पाना , नहीं विश्व में शक्ति ,
ममता के आगे जग बौना , ममता श्रद्धा - भक्ति ।
ममता होती 'ठाकुर' मानो , करुणा का श्रृंगार ।।
ममता मीठी मोदक जैसी , मधु-सी गुण आगार ।।६।।
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व्याख्या--ममता की विशेषता का यथासंभव वर्णन
करने का प्रयास किया गया है ।
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