निवास--सारंगढ़ ,
विधा--कविता { मुक्तक }
शीर्षक--कानन
दि.०१.०३.२१
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कानन सुंदर लगता भारी जंगल में मंगल होता है ।
पशु-पक्षी का कानन में ठौर-ठौर दंगल होता है ।।
तीतर-बटेर-मोर-पपीहा खंजन-तोता-कपोत-मैना ।
कई जीव के आश्रयदाता धरती में जंगल होता है ।।१
बाघ-लोमड़ी-सांभर-भालू बंदर-खरहा करे बसेरा ।
बाघ-नेवला-सियार-हाथी चीता-वनभैंसा का डेरा ।।
चीतल-बराह-बारहसिंघा रहती है गिलहरी सयानी ।
विपिन श्वान हैं झुण्ड बनाये चलते सारे रखके घेरा ।।२
पादप-पौधे अनेक सारे कानन भीतर पाये जाते ।
सागौन-साल-बीजा-तेन्दू-बेल-चार-महुवा हैं भाते ।।
अर्जुन-कोसम-साजा-धौंरा हर्रा भी आँवला-बहेड़ा ।
जड़ी-बूटियाँ औषधि देके बीमारी को दूर भगाते ।।३
कानन धरती की शोभा हैं जंगल पानी बरसाते हैं ।
हराभरा जंगल देखे से आँखों को भी ये भाते हैं ।।
कंदमूल फल के ये दाता शुद्ध वायु के रहे प्रदाता ।
जन्म दिया सरिता-नाले को पानी दे तृषा बुझाते हैं ।।४
कानन वीरान हुए सारे हम सबने ही किया सफाया ।
भारी स्वार्थी मानव होते काट-काटके जंगल खाया ।।
पर्यावरण बिगाड़ा हमने अपने पैर मार कुल्हाड़ी ।
बना प्रदूषण संकट भारी जग में पानी घटते आया ।।५
कानन उजड़ रहे धरती के बढ़ते रही समस्या भारी ।
ओजोन परत में छेद बढ़ा धरा हमारी जलती सारी ।।
आज हमें है मिलके भाई जंगल रक्षा करना होगा ।
कहता 'ठाकुर' वरना प्यारे नहीं बचेगी धरा हमारी ।।६
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