Monday, March 1, 2021

जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- कानन

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
निवास--सारंगढ़ , 
विधा--कविता { मुक्तक }
शीर्षक--कानन
दि.०१.०३.२१
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कानन सुंदर लगता भारी जंगल में  मंगल होता है ।
पशु-पक्षी का  कानन  में ठौर-ठौर  दंगल  होता है ।।
तीतर-बटेर-मोर-पपीहा खंजन-तोता-कपोत-मैना ।
कई जीव के आश्रयदाता धरती में  जंगल  होता है ।।१
बाघ-लोमड़ी-सांभर-भालू बंदर-खरहा करे  बसेरा ।
बाघ-नेवला-सियार-हाथी चीता-वनभैंसा  का डेरा ।।
चीतल-बराह-बारहसिंघा रहती है गिलहरी सयानी ।
विपिन श्वान हैं झुण्ड बनाये चलते सारे रखके घेरा ।।२
पादप-पौधे  अनेक  सारे  कानन भीतर  पाये जाते ।
सागौन-साल-बीजा-तेन्दू-बेल-चार-महुवा हैं  भाते ।।
अर्जुन-कोसम-साजा-धौंरा हर्रा भी आँवला-बहेड़ा ।
जड़ी-बूटियाँ औषधि देके  बीमारी  को  दूर भगाते ।।३
कानन धरती की शोभा हैं जंगल  पानी  बरसाते हैं ।
हराभरा जंगल  देखे से  आँखों को  भी ये  भाते हैं ।।
कंदमूल फल के ये  दाता शुद्ध  वायु के  रहे प्रदाता ।
जन्म दिया सरिता-नाले को पानी दे तृषा बुझाते हैं ।।४
कानन वीरान हुए सारे हम सबने ही किया सफाया ।
भारी स्वार्थी मानव होते काट-काटके जंगल खाया ।।
पर्यावरण  बिगाड़ा हमने अपने  पैर  मार कुल्हाड़ी ।
बना प्रदूषण  संकट भारी जग में पानी घटते आया ।।५
कानन उजड़ रहे धरती के बढ़ते रही समस्या भारी ।
ओजोन परत में छेद बढ़ा धरा हमारी जलती सारी ।। 
आज हमें है  मिलके भाई जंगल रक्षा  करना होगा ।
कहता 'ठाकुर' वरना प्यारे नहीं  बचेगी धरा हमारी ।।६
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