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Monday, August 3, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- रक्षाबंधन

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*काव्य संसद*
जिला    - राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
*विषय  -  रक्षाबन्धन*
*विधा - कुण्डलिया छंद*(अनुप्रास अलंकार)*
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रोली  अक्षत  से  सजा , दीप  जलाती थाल ।
बहना  करती आरती, तिलक  लगाती भाल।।
तिलक  लगाती  भाल , बाँधती  भ्राता राखी ।
ले   बहना  उपहार ,  झूमती   सारी  साखी ।।
वचन  सुरक्षा   लेत ,  देखती   बहना  भोली ।
सुंदर  लगते  भ्रात ,  माथ   में  अक्षत  रोली।।

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नाता   बहना   भ्रात  का ,  जाने  है  संसार ।
कोमल  रेशम डोर  ही , रिश्ते का  आधार ।। 
रिश्ते  का  आधार , भावना  जग  से न्यारा ।
अनुपम लगता साथ,जहाँ में कितना प्यारा।।
भ्रात बहन का प्यार ,हिया में खुशियाँ लाता।
दुख में सुख का भान, संग  हो ऐसा  नाता ।।

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*प्रवीण कुमार ठाकुर* 
*पतोरा , छुरिया , राजनांदगांव , छत्तीसगढ़*
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Friday, July 10, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- कोरोना

काव्य संसद
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जिला  --  राजनांदगांव ,छत्तीसगढ़
विषय  --  कोरोना 
विधान --  सरसी छंद
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सारी दुनियां में है फैला ,
कोरोना का राज ।
हाथों को साबुन से धोना ,
तब कर सारे काज ।।
हम सब को घर पर है रहना ,
गया सकल जग जान ।
सामाजिक दूरी अति जरुरी ,
रखो सभी ये ध्यान ।।1।।
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कपडे़ से मुँह हरदम ढ़कना ,
बात सभी ले जान ।
कुछ भी हो घर पर है रहना ,
रहे सदा ये भान ।।
सर्दी खांसी साथी ज्वर हो ,
यही रोग पहचान ।
दुष्कर हो जब सांसे लेना ,
घातक भारी जान ।।2।।
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तन मन से बीमारी जाए ,
मन रख सद आचार ।
ये काया योगी बन जाए ,
रोग बने लाचार ।।
तज संकट हे मांसाहारी ,
नर बन शाकाहार ।
मानवता ना हो अपमानित ,
रोको पापाचार ।।3।।
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कोरोना से मिलकर लड़ना ,
सदा कहे सरकार ।
घर से तुम बाहर ना जाना ,
जाओ ना बाजार  ।।
माहामारी है कोरोना ,
जग में हाहाकार ।
शासन का हम सहयोगी हों ,
जोर कहे सरकार ।।4।।
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प्रवीण कुमार ठाकुर 
पतोरा, छुरिया , राजनांदगाँव ( छ. ग.)
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Thursday, July 9, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- जग

काव्य संसद
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ज़िला    -- राजनांदगांव ,छत्तीसगढ़
विषय  -- *यह जग माया नगरी*
विधा     -- कविता ( निर्वेद रस )
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यह जग है  एक  माया नगरी 
टूट जाये कब  ये  मिट्टी गगरी
मोह माया सब  जग है ठगरी
छोड़ जाएगा धन  की  गठरी।

आया जग में मानव एक दिन 
तय है एक दिन तुमको जाना
माटी से उपजे माटी के काया
एक  दिन  माटी  में  है  जाना।

मतलब के सब है  रिश्ते  नाते
वक्त में काम  कोई  नहीं आते
यहीं रह  जाएंगे  दुनियाँ  सारी
धन  दौलत  ये  महल  अटारी।

निःस्वार्थ कोई  करो तुम काज
यही   है  परम  सुख  का  राज
जीवन मरण  तुम  सहज  बना
भज राम ईश मन मन्दिर बना।

जन  सेवा  ही प्रभु की है सेवा
परोपकार से ही मिलते हैं मेवा
जन सेवा कर नित्य आठोयाम
प्रभु प्रसन्न होंगे कर ऐसा काम।
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व्याख्या :--    उक्त कविता में निर्वेद भाव का 
के साथ नश्वर काया , जगत का वर्णन  किया
गया है । धन  दौलत  अंत  काल  काम  नहीं 
आता है । सत्मार्ग  परोपकार  द्वारा  ही  हम
परम सुख की प्राप्ति कर सकतें हैं ।
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*प्रवीण कुमार ठाकुर*  
पतोरा , छुरिया , राजनांदगांव , छत्तीसगढ़  ।
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Monday, July 6, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- सावन

काव्य संसद
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प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  -- राजनांदगांव , छत्तीसगढ़
विषय  -- *सावन आया *
विधा   -- दोहा छंद
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सावन आया है  धरा , हरियाली  चहुँ ओर ।
शीतल  चलती है हवा , वन में  नाचे  मोर ।।

धानी  आँचल ओढ़  के , धरे धरा नव रूप ।
फसल लहर मन मोह ले,सुंदर छटा अनूप।।

अवनी  अंबर  झूमते , खिले चमन में फूल ।
प्रिया मिलन की  है  घड़ी, बूँदे चुभते शूल ।।

रिमझिम सावन है झरे ,भरे नदी जल ताल ।
बरखा छमछम नाचती, कूके कोयल डाल।।

पुलकित जिससे है धरा ,बरखा  है आधार ।
अगणित पुष्पित मंजरी , मेघ करे आभार ।।  

महादेव  की   वंदना , करते  सावन  मास  ।
करे खुशी की कामना ,रखते जन उपवास।।
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*प्रवीण कुमार ठाकुर* 
पतोरा , छुरिया , राजनांदगांव , छत्तीसगढ़ ।
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Saturday, July 4, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- अंधविश्वास अब मिट रहा है

काव्य संसद
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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  -- राजनांदगांव , छत्तीसगढ़
विषय  --  अंधविश्वास अब मिट रहा है
विधा  --  कविता (अनुप्रास अलंकार)
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मिट  रहा  अंधविश्वास   है ,
हर मन  में नव विश्वास है ।
                   हो रहा शिक्षा का प्रसार है ,
                   हो  रहा  ज्ञान का प्रचार है ।
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झाड़ फूक के चक्कर में ,
कितनों ने जान गवाएं हैं।
                  ठग  बाबा  के  झांसे में ,
                  कितनो  ने प्राण लुटाएं ।
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अब   नहीं   औरत  कोई ,
जादू टोने के भेंट चढ़ेंगी ।
                 लांक्षन अगर लगाए कोई,
                 न्याय  की  सीढ़ी  चढ़ेंगी।
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नारी अबला नहीं  सबला  है,
आग में नही  अब जलना है।
               छल में अब नहीं आने वाली,
               ये दुर्गा  काली है  शेरावाली ।
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बिल्ली रास्ता काटे कोई बात नही,
बाँयी आँखे फड़के कोई बात नहीं।
             उल्लू  की  आवाज़ों  से नहीं कोई ,
             आफत नहीं  आती  है नई कोई ।
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कट चुकी हैं अंधविश्वास की बेड़ी ,
शिक्षा की तेज प्रबल तलवारों से।
            घायल नहीं होंगी अब बेटियाँ यहाँ,
            दहेज की कमजोर टकरारों से ।।
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व्याख्या :-- प्रस्तुत कविता में अंधविश्वास पर
प्रहार किया गया है तथा कविता में यत्र तंत्र
अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है ।
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रचनाकार  
प्रवीण कुमार ठाकुर
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Friday, July 3, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर कृत आलेख:- शिक्षा: वर्तमान परिदृश्य

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रचनाकार  --  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांदगांव, छत्तीसगढ़
विषय  --  शिक्षा वर्तमान परिदृश्य में
विधा   -- आलेख ।
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              शिक्षा किसी भी देश के सर्वांगीण विकास में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करता है ।अर्थात जिस देश में शिक्षा का स्तर जितना अधिक ऊँचा होता है । वह देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है ।
            हमारा देश प्राचीन काल से ही शिक्षा के क्षेत्र में हमेशा से आगे रहा है ।प्राचीन काल में देश में गुरुकुल शिक्षा पद्धति थी । घर से बाहर रह कर आश्रमों में रह कर ज्ञान प्राप्त किया करते थे । अर्थात माता पिता अपने बच्चों को पूर्ण रूप से ऋषि मुनियों को सौप दिया करते थे ।
            शिष्य भी पूरी तन्मयता से आश्रय के नीति नियमों का पालन करते हुए  , गुरु के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित हुआ करते थे ।जिसके कारण प्राचीन काल में शिष्य बहुत  आज्ञाकारी , अनुशासित और संकल्पवान हुआ करते थे ।
आश्रम में नियम बहुत कड़े होते थे । और शिष्यों को नियमों का कड़ाई से पालन करने के लिए बाध्य होना पड़ता था ।
इसमें बच्चे के पालकों को किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होती थी । ज्ञान नैतिकता से परिपूर्ण थी ।

            वे तो ये चाहते थे कि बच्चे आश्रम से सर्व गुण संम्पन्न हो निकले ।और ऐसा ही होता भी था ।
गुरु ऋषि मुनि ज्ञानी जन भी अपने कर्त्तव्यों का अक्षरशः पालन करते थे ।
          परंतु वर्तमान परिदृश्य में में  शिक्षा पद्धतियाँ बिल्कुल बदल गयी है । नैतिक शिक्षा के कहीं भी दर्शन नहीं होते हैं ।
         शिक्षा विभाग में हो रहे निरंतर बदलाव ने विभाग की कलाई खोल दी है । शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव ने शिक्षा की नींव हिला दी है । पूरी शासन व्यवस्था , शिक्षा विभाग  कागजी घोड़ा दौडाने में लगे हुए हैं ।
        शिक्षक को कोई हक नहीं कि वह बच्चे को कुछ बोल सके । शिक्षक को कोई हक नहीं कि वह बच्चे को कुछ बोल सके । शिक्षा विभाग में कमजोर और श्रेष्ट बच्चे में कोई भेद नहीं है ।
       शिक्षा का अधिकार मानों अभिशाप बन गया है  वरदान नहीं । बच्चे गुरुजनों को आँखें दिखाने लगे हैं । वे जानते है गुरु को हमें प्रताड़ित करने का कोई बच्चों का गुणवत्ता स्तर निरंतर घटता जा रहा है ।
      इसलिए शिक्षा क्षेत्र में उत्तरोत्तर सुधार लाने हेतु शिक्षा पद्धतियों में बदलाव लाना चाहिए । शिक्षा में शिष्यों के सम्पूर्ण विकास हेतु , नैतिकता का समावेश होना चाहिये।
शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायिकता का  , आत्मनिर्भरता और रोजगारपरक शिक्षा का समावेश होना चाहिये ।
         
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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर
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Thursday, July 2, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना

काव्य संसद
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प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  - राजनंदगांव , छत्तीसगढ़
शीर्षक  -- एक शब्द दो अर्थ
विद्या  --  कविता (श्लेष अलंकार)
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     बाला पहनी , सुंदर दिखती ,
     गोरी है वर्ण , सुंदर दिखती ।

               सोना  वक्त  को  खोना ,
               मिलना मान को खोना ।

     प्रकृति  सन्ताप  है  घटा ,
     बरसे  अम्बर  पर काली ।

               नीति अच्छी  बेटा बेटी है ,
               दो शिक्षा संस्कार अच्छी ।

         प्रभु  मेरी भव बाधा  हर  ,
         विपदा ,  संकट दूर  कर ।

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बाला -  कान का आभूषण , 
           कन्या ।
गोरी  -  वर्ण  , लड़की  ।
सोना -- शयन , एक धातु ।
घटा  -- बादल , कम होना ।
दो   --  संख्या , देना  ।
हर  --  कम कर , प्रत्येक  ।

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रचनाकार  
प्रवीण कुमार ठाकुर
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Wednesday, July 1, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- अलख हरि की माया

काव्य संसद
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प्रवीण कुमार ठाकुर 
जिला  --  राजनांदगांव , छतीसगढ़
विषय  -- अलख हरि की माया
             कहीं धूप कहीं छाया। ।
शीर्षक  --ईश्वर महिमा
विधा    --  मनहरण घनाक्षरी छंद
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अलख हरि की माया
       कहीं धूप कहीं छाया
            मन को बहुत  भाया
                 हरि नाम लीजिये ।।
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कभी  दुख  है  मिलते 
       कभी  सुख  है  खिलते
            गुजारा   यूँ   है   करते
                 ईश    गान   कीजिये ।।
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हम   तो   हैं   एक  जोगी
       सुख  फल  के   हैं   भोगी
            किसी   रोग  के  हैं   रोगी
                 योग   ध्यान    कीजिये ।।
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कभी   प्रभु    नहीं   पाया 
       मद    लोभ    मन   छाया
            कण   कण   छाया   माया
                 सत    संग    दीजिये   ।।
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                   दर्शन   दो   छिपे   कहाँ 
             खोजूँ   तुम्हें   यहाँ  वहाँ
       तेरा   लिया  गया   जहाँ
घट   घट   के   वासी ।।
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                 हम  भक्तों  को  ले  जान
            विनती   मेरी   तू    मान
       धरूँ   तेरा    ही    ध्यान
देवा    है    अविनासी  ।।
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                 तुही  अंत  तुही   आदी
           मेरा   मन   तेरा  आदी
       तुम     अंनत   अनादी
आ  मन  में   कैलासी ।।
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                  शिव   नाम   तू  जप   रे
             करना    तुम    तप   रे
       भक्ति में  काया खप  रे
 मैं   शम्भु   तेरा   दासी ।।
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व्याख्या  :--
                     प्रस्तुत सृजन में  ईश्वर की स्तुति 
का वर्णन किया गया है ईश्वर स्वयं दिखाई नहीं
देते हैं । पर यह लौकिक जगत बहुत सुदर है । 
               जीवन में हमें दुख भी मिलते हैं और
 सुख भी  ।  पर ईश  को हमे क़भी भी नहीं 
भूलना चाहिए ।।
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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर 

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Tuesday, June 30, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- ईमान

काव्य संसद
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रचनाकर  --  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांदगांव , छत्तीसगढ़
शीर्षक  --  ईमान यहां ठनठन गोपाल
विधा    -- तुकांत कविता
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नाम है जिसका  धनी लाल ।
करम  धरम  से  है  कंगाल ।
ईमान यहाँ ठन ठन गोपाल ।
बेईमान यहाँ है माला माल ।
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आधा  तीतर  आधा  बटेर  ।
     काल काल का है ये  फेर।
          जल्दी  करो तो होती देर ।
               कलयुगी दौर बड़ा अंधेर ।        
                ***********************
               नाम  बड़े  और दर्शन  छोटे ।
          दुबले  पतले अक्ल  के मोटे।
     कद  काठी  से   नेता  छोटे ।
चले  खूब  और  होते  खोटे ।
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गोरा  बदन  है वसन सफेद ।
काले  चिट्ठे  हैं  खुलते  भेद ।
वोट  डाल  सब  करते खेद ।
दल दल  नेता में  है मतभेद ।
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मुँह  में  राम  बगल  में  छुरी ।
     वादा  करे ना  कभी भी पुरी ।
          मिलते ही खुर्शी कर लेते दूरी।
               आशा विश्वास है होती अधूरी।
               *************************
               जहां  विश्वास  वहां पर धोका ।
          ईमान की राह बेमानी ने रोका ।
     चाल  बुरी  किसी  ने ना रोका ।
शांत  मन जग तेज  है  झोंका ।
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************************
मेहनत  कस   सुखते  मरते  ।
पोंगा पण्डित फलते  फूलते ।
आईएएस देखो सेल्यूट करते। 
फोकट छाप  राज यहाँ करते।
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व्याख्या : -- प्रस्तुत कविता में आधा  तीतर 
आधा बटेर को अर्थात अनमेल  को  ध्याय
में रख कर लिखी गयी है ।
            यहां पर नेताओं की काली करतूत
को भी , भोली जनता को कैसे वादे कर के
लुटती है दिखाने का  प्रयास किया गया है ।
 हमारे देश की  विडंबना है  एक आईएएस
 अधिकारी ,ना लायक  नेताओं  को  सेल्यूट
करते हैं ।
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रचानाकार  
प्रवीण कुमार ठाकुर

Saturday, June 27, 2020

राजनांदगाँव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- शिक्षा के दीप

काव्य संसद

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रचनाकार  --  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला   -- राजनांदगांव, छत्तीसगढ़  ।
शीर्षक  --  "शिक्षा के दीप"
विधा  --    कुण्डलिया छंद 
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छाया  काला  काल  है ,  होत  नही  है  भान ।
शिक्षक शिक्षा के  बिना , मिले कही  ना ज्ञान।।

मिले  कही ना ज्ञान , दान  ना  भिक्षा  मिलती।
गुरु के  पावन पाँव में,दान  ये शिक्षा खिलती।। 

मिला जिसे  गुरु चरण , पुण्य  है  उसने पाया ।
बढ़े देश का  मान है , मिले गुरु शिक्षा छाया ।।

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ज्ञानी  शिक्षा  देत  है ,  करे  जगत  उजियार ।
बाँटे  शिक्षा  है  बढ़े  ,  दूर   करो  अँधियार  ।।

जीवन प्रकाश सम  बने , दूर  तम  होते  सारे ।
बुद्धि बढ़े  अरु मान,  ज्ञान  ही  बाजी   मारे ।।

पढ़े तभी सम्मान  हो , यही  है  सुजान  बानी ।
प्रगति देश की होत  है,नित्य जो बोलत ज्ञानी।।

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व्याख्या :--
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               प्रस्तुत कुण्डलिया छंद के माध्यम से
 रचनाकारने   शिक्षा को  एक  दीपक के समान
 बताया गयाहै ।शिक्षा रूपी प्रकाश द्वारा ही हम 
अपने आपके जीवन तथा समाज की अज्ञानता
 रुपी तम को मिटा कर ही अपने आप और देश 
का हमविकास कर सकते हैं ।और ज्ञान गुरु के
 बिना  संभव नही है । 
                     शिक्षा के महत्व को बताना ही 
उपरोक्त दोनो ही छंद का उद्देश्य है ।
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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर
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Wednesday, June 24, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- ये गरीबी

काव्य संसद
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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शीर्षक  -- *"ये गरीबी है या बीमारी "*
विधा    -- कविता( तुकांत )
अलंकार - (पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार)
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बढ़ती है तृष्णा पल-पल 
     भूख अगन में जल-जल ।
          पग - पग पर है लाचारी
               ये गरीबी है या  बीमारी ।।
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गरीबी  से  लड़ - लड़ 
     मरते देखो धड़ - धड़ ।
          काल मार पडे़ तड़-तड़
               जीतें  जीवन  मर - मर ।।
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थू -थू  अमीर  हैं  करते  
     धूँ-धूँ  शरीर  हैं  जलते  ।
         गम  के  घूँट - घूँट  पीना
           पडे़  तड़प-तड़प जीना ।।
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ऋण - ऋण में पडे़ जीना
     क्षण -क्षण है कैसा जीना।
          धक-धक करते हैं सीना
               गम - गम  को  है  पीना ।।
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कैसा  तंग-तंग  जीवन
     मन बे  रंग-रंग  उपवन
          स्वप्न - स्वप्न  है  जीवन
               कलह-कलह है तनमन।।
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कदम-कदम पर छलते गये
     पल-पल जीवन  ढ़लते गये ।
          चल-चल के दम घूट से  गये
               सांसे चल-चल  रुक  से गये।।
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वादे कर - कर सरकार लुटे 
     जन-जन का आक्रोश फुटे।
          आस - आस में विश्वास टुटे।
               अपनों का नित-नित हाथ छुटे।।
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कहते  हैं  घट-घट राम हैं 
     कण-कण  में भगवान हैं।
          हे  जर्रे-जर्रे  का  वासी
               हर-हर दुख अविनाशी ।।
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गम   के  दरिया   में  डूब-डूब
     गये  जान से  बहुत  खूब-खूब।
          अनजान  रहे  सब जान-जान
               गरीबों की व्यथा है मान-मान।।
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धन्य - धन्य  करो  भोले  नाथ
     हर - हर दुख कर  दो  सनाथ ।
          दुखिया नवाए  सब  माथ-माथ
               सर रख दे मेरे सदा हाथ-हाथ।।
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रचनाकार
प्रवीण कुमार ठाकुर
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व्याख्या :--
प्रस्तुत कविता मे गरीबों की वर्तमान स्थिति ,दीनहीन दशा का बडा़ ही मार्मिक चित्रण किया गया है ।
    तथा सम्पूर्ण कविता को पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार से सुसज्जित एवं अलंकृत करते हुए गरीबों की वस्तुस्थिति को कविता में उकेरने का एक प्रयास किया गया है ।
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Tuesday, June 23, 2020

राजनांदगाँव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- जगन्नाथ पुरी

काव्य संसद 
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रचनाकार  --  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शीर्षक  -- जगन्नाथ पुरी 
विधा    --  दोहा 
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।।१।।
नाथ जगत प्रभु आप हैं , पुरी नाम निज धाम ।
नित्य  करते  हैं वंदना , सदा  यही  है  काम ।।
।।२।।
देने  दर्शन   देव   ने  ,  मंदिर  बाहर  आय  ।
देखत अनुपम रूप को,धन्य भगत हो जाय ।।
।।३।।
प्रचलित पुरानी है  कथा , जगन्नाथ के नाम ।
असर जगत पर है करे , जनता जाने आम ।।
।।४।।
मात  यशोदा  देवकी , बहन  सुभद्रा  साथ ।
वृंदावन  से  द्वारिका , आये  धर कर हाथ ।।
।।५।।
करे  निवेदन  रानियाँ , कथा  कही  है  मात ।
बेसुध होकर है सुनी, बाल किसन की बात ।।
।।६।।
बहन  सुभद्रा  द्वार है , भाई  दोनो ना आय ।
दाउ कृष्ण सब है सुने ,जान कोय  ना पाय ।।
।।७।।
मात  यशोदा  से  सुनी , लीला  दोनो  कोय ।
आँख बडे़ लट हो  खडे़ ,भ्रात दंग  दो होय ।।
।।८।।
बाल कथा सब भाय है , महिमा कृष्णा भाय ।
जान सकै ना कोय है ,मुनिनवर भी आ जाय।।
।।९।।
नारद  मोहक  रूप  में , मोहित  होता  जाय ।
अनुभव  करके  सब उठे , आने  कोई  आय ।।
।।१०।।
ऐसे मोहक रुप है धरे , प्रभु  तुम  कब भू आय ।
मुनि सुनि कृष्णा है कहे ,कलियुग धर रुप काय।।

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व्याख्या।  :---
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                                जगन्नाथ हिन्दू भगवान विष्णु , 
श्री कृष्ण का ही एक रुप है । ओडिसा राज्य के  पुरी 
शहर में भगवान जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर स्थित है ।
वर्ष में एक बार इसकी एक रथ यात्रा निकलती है ।
              और यह यात्रा केवल भारत में ही नही वरन 
पुरे विश्व में प्रसिद्ध है ।
                   इस रथ यात्रा में जगन्नाथ ,भाई बलभद्र
अर्थात  बलराम और बहन सुभद्रा की रथ निकली है ।
             इसी से जुडी़ हुई प्राचीन कथा का कुछ अंश
 यहाँ पर दोहा के रुप में आपके सम्मुख रखने का एक
छोटा सा प्रयास किया है ।
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रचनाकार  
प्रवीण कुमार ठाकुर 

Monday, June 22, 2020

राजनांदगाँव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- पग

काव्य संसद 
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रचनाकार  --  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
शीर्षक   -- धरा धरा पर पग धरे
विधा   --  दोहा (यमक अलंकार का प्रयोग)
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।।1।।
धरा धरा पर पग  धरे  ,  छम छम  बाजे  साज  ।
खग बिन पर उड़ ना सके , पाँव चले पर आज।।
।।2।।
घटा  घिरे  जल  है  गिरे , घटा  जगत  का  ताप ।
प्यास  मिटी  सब जीव की , जीव जंतु  संताप ।।
।।3।।
काल  काल  पर आत है , मरे कोय न अकाल ।
चाल चले  सम  वेग  है ,  रोक  सके  ना  ढा़ल ।।
।।4।।
कर  से  कर  को  लेत  है , स्वप्न   करे  साकार ।
सेवा   सुविधा  है  बढी़  ,  सोंच  लेत  आकार ।।
।।5।।
प्राणघात  मद   पान  है ,  नशा  लेत  है  जान ।
ज्ञान  सही  ये  जान ले , सत्य वचन है  मान ।।

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1 धरा = लड़की का नाम , धरा = पृथ्वी ।
     पर = के ऊपर , पर   = पंख , परन्तु ।
2. घटा  =  मेघ ,  घटा   घटना , कम होना ।
3. काल  =  मृत्यु , काल  =  समय ।
4. कर  =  टेक्स  ,  कर    =   हाथ  ।
5. जान  =  प्राण  ,  जान  =   ज्ञान
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व्याख्या  :---
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दोहा के सम्पुर्ण पर में रचनाकार ने  यमक  अलंकार
 का प्रयोग करते हुये सम्पुर्ण दोहे को अलंकृत  करते
 हुए काव्य की अद्भुत छटा की अभिव्यक्ति दी है ।
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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर 
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Saturday, June 20, 2020

राजनांदगाँव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- ऐ चीन

काव्य संसद , वर्ण पिरामिड
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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव , छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक -- ऐ चीन 
विधा -- वर्ण पिरामिड
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ऐ
चीन
तू हीन
जुर्म तेरा 
बडा़ संगीन
लेंगे रे बदला 
हम तुझसे गीन ।।1।।
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                             ऐ
                             पापी
                             है घाती
                             अति किया
                             है वार किया
                             मानवता पर
                             तूने प्रहार किया ।।2।।
                             *********************
क्या
किया
है पता 
तूने काल
ज्यौं न्यौता दिया
बडी़ खता किया 
तू तो जान से गया ।।3।।
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                            ऐ
                            मूर्ख
                            है धूर्त
                            बुरा किया 
                            प्राण ले लिया
                            वीर छिन लिया
                            न्यौता मौत को दिया।।4।।
                            ************************
है 
तंग 
मति तू 
हुई छवि
धूल धुमिल 
प्राण लेंगे छिन
मेरे हिन्द के वीर ।।5।।
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व्याख्या :----
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                      प्रस्तुत वर्ण पिरामिड साहित्य विधा
के माध्यम से हमारे पडौ़सी देश की ओछी हरकत
का वर्णन किया है । हमारे जवानों पर सीमा पर 
हमला कर अपनी अमानवीय कृत्य का परिचय दिया
है । का चित्रण किया है।
                   ऐसा कर चीन ने अपनी मौत को न्यौता
दिया है । अब हमारे शूरवीर रणबाँकुरे उन्हें जिंदा नहीं
छोडे़गे ।साथ ही हमारे शहीद जवानों का चुन चुन कर
बदला लेंगे । ईंट का जवाब पत्थर से देंगे ।।
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रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर 
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Thursday, June 18, 2020

राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- पावस

पावस (चौपाई)

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रचनाकार  --  प्रवीण कुमार ठाकुर 
जिला  -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक  --  पावस
विधा  --  चौपाई छंद
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।।१।।
पावस  के  आते  ही  धरती ।
नव  रुप  देखो  कैसे  धरती ।।
          झर  झर  झर  नित   निर्झर  झरते ।
          कल कल नद  स्वर  निनाद करते ।।
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।।२।।
मेघा   बरसे   बिजली   दमके  ।
पावस जल सम  इतउत चमके ।।
          जल  बुँद  चूमे झूमे  अचला ।
          धरणी हर्षित आँचल सजला ।।
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।।३।।
कूके  कोयल  डाली  डाली ।
चले पवन सरस  मतवाली ।।
          झीं  झीं  वाणी  झींगुर बोले ।
          टर  टर  दादुर  बोले  हौले ।।
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।।४।।
देखो  ये  ऋतु   वर्षा  आए  ।
काले  बादल  नभ  पर  छाए ।।
          हलधर उर ऋतु अति  ही  भाए ।
          गीत  खुशी  के  तन  मन  गाए ।।
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।।५।।
यत्र  तत्र  भू   हरियाली   छाई ।
          धरणी  सुरभित   सौंधी  आई ।।
तृप्ति  धरा  है  पावस  आए ।
          नव रुप नव सुख  पावस लाए ।।
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।।६।।
पंछी  अति   ही   कलरव   करते  ।
          कलकल नद स्वर  मनभर  बहते ।।
निर्झर  झरना  झर  झर  झरते  ।
          सरबस  बरबस  मन  को  रिझते ।।
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।।७।।
इस  पर  निर्भर  जग  यह  सारा ।
          टिम  टिम  करते  नभ  पर  तारा ।।
देखो   पावस    शोभा   छाए  ।
          प्राणी   पादप  खुशियाँ    पाए  ।।
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                     रचनाकार
               प्रवीण कुमार ठाकुर 
      

Wednesday, June 17, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर कृत- संस्मरण

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रचनाकार  प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांगाँव(छत्तीसगढ़)
शीर्षक  --  माँ की सूनी माँग
विधा  --    संस्मरण ।
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                              मैं जब भी अपनी माँ की सूनी माँग को 
देखता हूँ तो मुझे अतीत के उन लम्हों की यादें बरबस ही रुला देती है  ।
                          जब मेरी माँ ने  साल 2005 में  मेरी शिक्षाकर्मी वर्ग 02 की नौकरी लगी तब  नौकरी स्थल में जाने  के लिए और वहाँ रहने की तैयारी करने के लिए
माँ ने अपने गहन बेचने का फैसला कर ली ।
                              तब मुझे ये फैसला मंजूर ना था क्योंकि माँ के पास ज्यादा गहने नहीं थे ।मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा । परन्तु  माँ यह कह अपनी बात को उचित ठहराने लगी कि यदि तुम नौकरी पर चले जाओगे तो कभी भी आभूषण खरीदी जा सकती थी ।
                      उस समय किसी ने हमारी कोई मदद की ना कोई रिस्तेदार ना कोई चित परिचित लोगों ने , किसी ने आर्थिक रुप से सहयोग नहीं किये । तब माँ ने अपने गहने बेचने का निर्णय ली थी ।
                      इस समय मेरे डी एड के मित्र दिनेश निषाद सर ने मेरी आर्थिक रुप से सहयोग मंगने पर एक बार में कुछ राशि देने को तैयार हो गए । और मैने पैसे लेते समय इस वादे के साथ पैसा स्वीकार किया कि मेरी पहली तनख्वा जब भी मिलेगी । मैं आपकी उक्त राशि बा इज्जत वापस लौटा दूँगा ।
                      उस समय मेरी पगार की कुल राशि 3250 रुपये  जो काफी लगती थी । पेमेंट मिलते ही हमने वादे के मुताबिक मित्र का पैसा लौटा दिये तब तीन माह पश्चात पेमेंट मिली थी । दीपावली जैसे पर्व में सर जी के पिता पैसे लेना उचित नहीं समझ रहे थे । परन्तु हमने समय पर किये सहयोग का एवं हमारे वादे का  वास्ता देकर किसी तरह से राशि वापस लेने को तैयार कर सके ।
                      इस तरह समय गुजरने लगा । समय के साथ माँ के गहने खरीद कर वापस देने की बात सोंचता पर इसके पूर्व और कोई नयी आर्थिक समस्या खडी़ हो जाती ।
                    कभी इस तरह समय गुजरने लगा । समय के साथ माँ के गहने खरीद कर वापस देने की बात सोंचता पर इसके पूर्व और कोई नयी आर्थिक समस्या खडी़ हो जाती ।
                    कभी भाई की पढा़ई का खर्च तो कभी बहन की शादी का तो कभी घर बनाने की बात होने लगती । मगर कारण जो भी हो माँ के गहने वापस दिलाने की बात रह जाती थी ।
                    इसके पूर्व माँ ने मेरे लिए मुझे डी एड करने जाने के लिए अपने गहने बिक्री करा दी थी । परन्तु डी एड मेंप्रशिक्षण में बेमेतरा दो साल तक रहा उस समय मेरी सबसे प्यारी बडी़ बुआ समय समय पर मेरी बडी़ मदद किया करती थी ।जो बी एस पी स्कूल दल्ली राजहरा में शिक्षिका थी ।अब दो तीन साल से ज्यादा हो गये सेवानिवृत हो चुकी हैं।मैं बडा़ ही भाग्यशाली हूँ कि मेरी ऐसी बुआ है ।
                      हमेशा कोई ना कोई समस्या आ ही जाती पर माँ की गहने लेने की बात वहीं की वहीं धरी की थरी रह गयी । कुछ समय पश्चात अर्थात बाबू जी की मृत्यु हो गयी । जिससे हमारे हर से बाप कि छाया छिन गया ।ऐसे लगा जैसे हम अनाथ हो गए ।
                     अब मेरी माँ के सर से पिता के नाम का सिंदूर मिट गया । अब शायद कभी इस स्थिति में आर्थिक रुप से योग्य हो भी जाऊँ कि माँ के लिए गहने खरीद कर दे सकूँ ।पर मलाल ताउम्र पिछा नहीं छोडे़गी कि मैंने माँ का सोलह श्रृंगार कभी पूर्ण नहीं कर पाया ।
यह दुख हर बार मुझे कचोटता है मैं जब भी अपने माँ की सूनी कलाई और सूनी माँग को देखता हूँ ।।

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रचनाकार 
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प्रवीण कुमार ठाकुर
पतोरा , छुरिया , राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
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Tuesday, June 16, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- दीवारों के भी कान

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रचनाकार  -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  --  राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक  -- दीवारों के भी कान होते हैं
विधा  --  कविता
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जब भी कोई किसी से  ,  रहस्य की बातें करता है ,
तब श्रोता पहले तो ध्यान ,  से इधर उधर देखता है ।
फिर श्रोता ने वक्ता से,  सतर्क  करते  ये  कहता है ,
अरे यार जरा धीरे से कहो ,दीवारों के  कान होते हैं।
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अरे फिर हमने कहा  ,  दीवारों  के   कान  होते हैं  ?
क्या सचमुच कान होते हैं  , क्या वे  इंसान होते हैं  ?
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जो  ये  कहते  हैं  कि  , दीवारों  के  कान  होते हैं ,
सख्शियत  वो  ही  बडे़  महान  होते  हैं   क्योंकि ।
ऐसे ही लोग बन कर दीवार ,दुसरे की बातें सुनते हैं ,
चापलुसी करते  हैं , गैरों के  घरों में  दरार करते हैं ।
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सख्श ऐसे बडे़ कमाल करते हैं ,कान दीवारों की बता,
दीवारों  यूँ  ही  इंसान ,बेवजह बदनाम किया करते हैं ।
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व्याख्या   :--
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                      प्रस्तुत कविता में रचनाकार ने कविता
के माध्यम से मुहावरा --
 "दीवारों के कान होते हैं" 
के माध्यम से इस मुहावरे का प्रयोग करने वाले लोगों
पर व्यंग्यात्मक प्रहार करते हुए कहा है कि दीवारों के
कोई कान वान नहीं होते खाम खाँ ऐसे लोग दीवारों को बदनाम करते हैं ।
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 रचनाकार 
प्रवीण कुमार ठाकुर
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Saturday, June 13, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- किसान

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रचनाकार  -- प्रवीण कुमार ठाकुर 
जिला  --  राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक  --  किसान 
विधा  --   गीत ( छत्तीसगढी़ )
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।।१।।
असाड़ महिना आगे संगी,बोए चलना धान ।
नांगर बईला धर के संगी,बोए चलना धान ।।
।।२।।
उमडे़ करिया बादर देखो,आँखी आंजे काजर।
रझरझा के गिरे ला पानी ,चलना गा किसान ।।
।।३।।
कमरा खुमरी लउठी धर ,तुतारी लेना हाथ मा ।
जांगर तोड़ मेहनत संगी , हरे तोर रे पहिचान ।।
।।४।।
चिऊं चिऊं चिरई बोले  , कोयली मारे ताना ।
बबा खांसत डोकरा उठे,उठ हो गेहे बिहान।।
।।५।।
पाग बने धरे हे नांगर , बने चलही जांगर  ।
जादा पानी मा लेटा धरे , धर ले धियान ।।
।।६।।
खेती के दिन ला संगी , बिरथा झन जावन दे।
दुख के पाछु सुख संगी , कहिथे जी सियान।।
।।७।।
मेहनत हम करबों संगी , धान ला उपजाबों ।
करबों मजा दिन बिताबों , सुन लेना मितान।।

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                          रचनाकार  
                   प्रवीण कुमार ठाकुर
          पतोरा,छुरिया,राजनांदगाँव(छ.ग.)
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 किसान - संक्षेप व्याख्या
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व्याख्या  :--
प्स्तुत गीत के माध्यम ले मैं माटी पुत्र किसान के
वर्णन करे के एक छोटे से प्रयास करे हों ।
                 कइसे किसान हर घाम पानी बादर 
ल नई देखे अउ सतत परिश्रम करथे अउ धरती
माता के सेवा करत धन्न , धान्य उपजाथे ।
किसान जग मा सबले महान हे ।
     
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Friday, June 12, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- पर्यावरण

                विधा - सायली
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रचनाकार  --  प्रवीण कुमार ठाकुर 
जिला  --  राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक  -- पर्यावरण  प्रदुषण
विधा  --  सायली 
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                        ।।1।।
                      पर्यावरण
                 करना     संरक्षण
             वृक्ष        ना       काट
                  कर       रक्षण
                        तरुवर

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                         ।।2।।
                         विटप
                  करो       रोपण
            दूर       हो        प्रदुषण
               स्वस्थ्य   वातावरण
                       जीवन
                    
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                         ।।3।।
                         तरुवर
                    जब      कटे
             प्राण      वायु      घटे
                   ताप        बढे़
                          चले

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                          ।।4।।
                         जंगल
                 सिमटने      लगे
            उर्वरता      घटने      लगे
                  बंजरता       बढे़
                       अपरदन

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                           ।।5।।
                         प्राकृतिक
                   आपदा       बढे़
               बाढ़      बढ़ने      लगे
                   संग्रहण    क्षमता
                            घटे
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                          ।।6।।
                         बरसात
                  कम         होए
              उतरे      जल      स्तर
                    चिंता       बढे़
                          मानव

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                          ।।7।।
                       जनसंख्या
                    बढे़       दोहन
                घटने   लगे    जंगल
                 जंगली    जानवर
                         संतुलन

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                         ।।8।।
                        प्लास्टिक
                  पर्यावरण     घातक
             प्रकृति    प्रदुषण     कारक
                  जीव        आफत
                          मुसीबत

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                           ।।9।। ।  
                          प्लास्टिक 
                        रहता     जहाँ
                  जल    वायु   वसुंधरा
                      प्रदुषण    करता
                            सर्वदा

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                          ।।10।।
                           मानव
                लालच      परित्याग
          कर       प्रकृति       संतुलन
                 मनन           चिंतन
                         संरक्षण

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व्याख्या  :--
                प्रस्तुत सृजन में सम्पूर्ण पंक्तियों में
पर्यावरण प्रदुषण के विषय में संक्षेप  में वर्णन
किया गया है ।
तथा इसके दुष्प्रभाव का भी  उल्लेख  संक्षिप्त
रुप में किया गया है ।
पर्यावरण प्रदुषण की  रोकथाम  के  उपाय भी 
संक्षेप में बताया गया है ।
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Thursday, June 11, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से प्रवीण कुमार ठाकुर की रचना- माँ

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रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला  -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक  -- "  मेरी माँ  "
विधा  --  मनहरण घनाक्षरी(छंद)
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।।1।। 
ऐसी कोई कहीं नहीं,माँ जैसी कोई भी नहीं ,
महिमा   तेरी   अपार  ,  माता  तू  महान है ,

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।।2।। 
फर्ज निभाए हैं सारे , माँ प्राणी तुम्हें पुकारे ,
सब  पर  तेरा कर्ज  ,  माँ से  ही  जहान है ,

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।।3।।
नौ मास तू कोख धरे , बेटा दुख से है परे ,
हमें रक्त सींचा करे , स्वार्थी तू इंसान है ,

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।।4।।
दर्द मुझे हो तू रोती , रोता हूँ तो तू है रोती ,
भूखी तू दे मुझे रोटी , बेटा माँ की जान है ।

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                  रचनाकार
           प्रवीण कुमार ठाकुर
    पतोरा , छुरिया , राजनांदगांव ,
                  (छ.ग.)
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दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...