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Tuesday, June 8, 2021

एच.एस.अरमो की रचना- व्यवहार

रचनाकार-एच.एस.अरमो,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
विषय-व्यवहार ।
विधा-कविता (छ्न्द मुक्त)
शीर्षक--व्यवहार ।
÷÷÷÷÷=========÷÷÷÷÷÷÷÷
●●○••||व्यवहार ||○●●
             ========
मानव जाति में--
तूने जनम लिया है,
और इस धरा में तो 
करना होगा,तुझको सद्व्यवहार ।।

जीने के लिए --
करना पड़ता है,
सामाजिक मानवीय मूल्यों से,
नैतिकता का,सबसे वैसा व्यवहार ।।

पारिवारिक परिवेश और--
वातावरण का पड़ेगा उस पर ,
अच्छे-बुरे व्यवहार करने का,
सांसारिक जीवन में,पाता सुख ।।

नैतिकता को,जो भूला दिया हो--
करता वो सभी के साथ ,
अनैतिक सा व्यवहार ।।

इन्सान और जानवर के बीच--
फर्क बस इतना-सा हैं ,
वो करता सभी से सदव्यवहार ,
जानवर करे,प्रवृति के  अनुसार ।।

जो जैसा करता है व्यवहार--
होती है ,उसकी वैसी ही पहचान ,
व्यवहारिकता का व्यवहार,
होती है,सभी गुणों की खान ।।
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Monday, May 31, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- प्रहरी

रचनाकार-एच-एस-अरमो , अरमान ।
निवास-रायपुर , छत्तीसगढ़ ।
विषय- प्रहरी  ।
विधा-कविता (छ्न्द मुक्त)
शीर्षक--"" प्रहरी """   ।
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●●●●••प्रहरी ••••●●●●
             ***********
सारे जगत के प्रहरी---
तुम हो परमेश्वर ।।01।।

परिवार के सच्चे प्रहरी--
होते हैं,सबके माता-पिता ।।02।।

देश की सुरक्षा में--
प्रहरी हैं, बनते,
थल,जल व वायुसेना के,
सैन्य दल-बल व सामरिक शक्तियाँ।03।

बगिया का प्रहरी,बनता है---
उसका ही,वह बागवान ।।04।।

सीमाओं में प्रहरी की--
लापरवाही या हो जाती चूक,
आंतकवादियों,घुसपैठियों को,
अपने मकसद में,होते तभी कामयाब।05।

मानव शरीर में--
श्वेत रुधिर कणिकायें,
शरीर में,प्रवेशित वायरसों से,
सुरक्षा के,बन जाते,सजग प्रहरी।06।

प्रकृति की संरचना--
उत्तर में है,अडिग हिमालय पर्वत ,
तीनों ओर से घिरे,सागर तट से,
देश की,मजबूत सुरक्षा के,
बन जाते हैं,प्राकृतिक प्रहरी ।07।

प्रहरी के सम्पर्पण,त्याग---
और सजगता व ईमानदारी ,
के साथ,कर्तव्यपरायणता की मिशाल,
होती उसकी,सच्ची मूल पहचान ।08।
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Friday, May 28, 2021

एच-एस-अरमो कृत आलेख- मोह

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर छ.ग.।
विषय-"" मोह ""    ।
विधा--  आलेख     ।
शीर्षक-"" सांसारिक मोह """ ।
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●●•••||•सांसारिक मोह •||•••●●
            *****$$$*******
           इस भौतिक जगत में सभी जीव-जन्तुओं व वनस्पतियों को अपनी भौतिक काया मोह होता ही है ।मनुष्य तो अपनी क्रिया-कलापों को व्यक्त करने की क्षमता रखता है,अपितु बाकी जीव-जन्तुओं व वनस्पतियों के बारे में उनकी बोली व हाव-भाव से जीवनशैली व वृद्धि को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है ।यहाँ इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए मोह शब्द की व्याख्या इस प्रकार से की जा सकती है:-
               मनुष्य में मोह की पृष्ठभूमि उसके सोच-विचार के अनुसार भिन्न- भिन्न हो सकती है ।जैसे--माता-पिता का अपनी संतानों के लालन-पालन और विकास के प्रति अटूट रिश्ता अथवा मोह होता है ।दम्पत्तियों में एक-दूसरे के लिए,प्रेमियों के बीच आपस में आदि।मानव जाति का स्वभाव ही है कि बचपने से लेकर वृद्ध तक,किसी न किसी प्रिय वस्तुओं व लोगों के प्रति मोह जरूर होता है ।चाहे सजीव हो या निर्जीव क्यों न हो-?जबकि एक ऐसा मोह है जिसे सर्वश्रेष्ठ श्रेणी में रखा जाता है,वह है--अध्यात्म के प्रति अति मोह का होना ,चाहे हम उसे श्रद्धा व भक्ति का रूप भी कह सकते हैं ।जिनमें सन्त-महात्मा और सच्चे भक्तों को स्थान दे सकते हैं।सांसारिक माया-मोह के अंतर्गत परिवार,समाज व देशप्रेम की भावना को भी सम्मिलित कर सकते हैं ।
               हम देखते हैं कि वनस्पतियों में भी अपने शरीर व उसके प्रत्येक अंश से उसका मोह होता है ।जब उसमें किसी प्रकार से तनाव,भय व कष्ट होता है या शरीर का कोई भी अंश विच्छेद होता है,तो वह अपने हाव-भाव से दु:ख का इजहार करता है ।मेरी दृष्टि में ये भी मोह के कारण ही होता होगा ।
           इसके अलावा जीव-जन्तुओं,जानवरों में नर-मादा अपने नवजात शिशुओं के लालन-पालन,सुरक्षा,वृद्धि के लिए हरदम,मरते दम तक प्रयासरत रहता है ।ये एक प्रकार से मोह को ही दर्शाता है ।इस बात का गहराई से अध्ययन करें तो इस भौतिक जगत में अंड़ज,बीज व जीव तत्व सभी में जीने के प्रति मोह के साथ साथ जीवन चक्र को पूरा करने की लालसा भी होती है।
          विश्व स्तर पर अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि समाज के विशेष विधा के पारखी व ज्ञानी लोगों के द्वारा किसी विशेष क्षेत्र की जानकारी व खोज को हासिल करने के लिए अपना जीवन सम्पर्पित कर देते हैं और इस त्याग व तपस्या को हम जुनून कह सकते हैं ।उन्होंने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए,अपने जीवन व परिवार का मोह के साथ-साथ सांसारिक सुखों का भी त्याग करते हुए दुनिया के सामने अनूठी व चमत्कारिक चीजों व खोजों को बखुबी अंजाम दिया है ।जिसके लिए सम्पूर्ण विश्व जगत उनके इस उपलब्धियों के लिए नतमस्तक होता है ।
         आज हम सब व दुनिया के लोग कोविड-19 महामारी से ग्रस्त व भयभीत जीवन गुजार रहे हैं ।अपितु इस संक्रमणकाल में भी कुछ लोग-जैसे-पेशेवर व्यक्ति,सेवार्थ समूह व इस प्रकार के कार्य से जुड़े सभी लोगों के साथ साथ वारियर्स के रूप में कार्य करने वाले लोगों ने मिलकर मानव जीवन को बचाने के लिए अपने जिंदगी का मोह त्यागकर,आगे बढ़कर नि:स्वार्थ भाव से परमार्थ का कार्य किया है और इस दौरान कुछ लोगों को अपनी जान की आहुति भी देनी पड़ी है ।इनके सेवा भाव को हम सब ह्रदय से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और ईश्वर से प्रार्थना है कि इनके परिवार को यह दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे ।
           अतः हम इस शब्द की व्याख्या व गूढ़ अर्थ को समग्र रूप में प्रस्तुत करना इतना आसान नहीं है,फिर भी अन्त में,मैं यह कहना चाहूँगा कि मानव जाति के लिए कि मोह में फंसकर उसके लिए कभी प्रगति तो कभी प्रगति अवरोधक की भूमिका के रुप में उभरकर सामने आती है ।अतः अपने जीवन में सकारत्मक सोच के साथ साथ,मोह के मध्य सन्तुलन स्थापित करते हुए,नये नये आयाम भी गढ़ सकते हैं ।मेरा मत है कि सभी लोगों को भी ऐसी ही सोच रखते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के की कोशिश करना चाहिए ताकि समाज को इसका एक अच्छा प्रतिफल प्राप्त हो सके ।हमने अनुभव किया है कि परिवार व निकट रिश्तेदारों में किसी प्रियजन की आसमयिक मृत्यु होने का सदमा/शोक होता है तो उन्हें इस दुःख को सहन करने की शक्ति लाने की कोशिश करना चाहिए ताकि जिंदगी को आसान बनाने के लिए मोह-माया को भुलाकर ,इस भवसागर में अपने दायित्वों का निर्वहन कठोर मन बनाकर करने की जरूरत है ।अति- मोह का त्याग ही,जीवन में सफलता,संतुष्टी और खुशी दिला सकता है ।
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Saturday, May 22, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- प्रवाह

रचनाकार-एच-एस-अरमो अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर,छ.ग.।
विषय--"" प्रवाह ""  ।
विधा-कविता,छ्न्द मुक्त ।
शीर्षक-" प्रवाह "   ।
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   ○○•••|| प्रवाह ||•••○○
               """:::::""""
प्रकृति और प्रवाह ---
सरिता और उसका प्रवाह,
श्वाँस और शरीर ,
रक्त और वाहिकायें,
ही,जीवंतता देती है ।

सामाजिक--संवाद में---
प्रवाह-गति बिन अधूरी,
वक्ता-श्रोता बिन होता है,
संवाद अधूरा--
अधूरे मन से,कही-सूनी ,
बातें,सतत् प्रवाह अवरोधक,
नियति प्रवाह की,गतिशीलता है ।

अँधेरे में,उजाले का प्रवाह--
हवा का प्रवाह और गति,
कभी जीवन और मृत्यु बनते,
प्रवाह का सन्तुलन ही--
मानव को,मान-सम्मान देते,
और तो महानतम बनाते -- ।

शरीर और आत्मा --
आत्मा और प्राण-वायु ,
फेफड़े और ह्रदय की गति,
प्रवाह के मानक हैं होते---
जीवित और निर्जीव शरीर का,
फर्क है,यही तो,हैं बताते--।

सँसार में, सन्त-महात्मा और--
गुरूओं के उपदेश,ज्ञान व संवाद,
के सतत् प्रवाह ने ही--
समाज की सभ्यताओं,सँस्कृतियों को,
हममें,अब तक,जीवित रखा है--।
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Friday, May 21, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- माँ

रचनाकार-एच-एस-अरमो अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
विषय -"" माँ "" ।
विधा-कविता- छ्न्द मुक्त ।
शीर्षक-" माँ " ।
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♡♡♡||••"" माँ ""••||♡♡♡
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माँ! तू कितनी महान है--
हर रूप में,तेरी महिमा न्यारी,
तू जननी, पालनहार भी है ।।01।।

तू ही माता इक धरा समान--
माँ तू ही तो,नि:स्वार्थ भाव से,
हमारे सारे गमों को,चुपचाप है सहती,
और हरदम ,तू ममता-प्यार लुटाती।2।

माँ,तेरी सन्तानें,देश की--
सुरक्षा के लिए,
अपने कर्तव्य पालन के खातिर,
हँसते-हँसते ,अपने प्राण हैं,गँवाते।3।

माँ,सिर्फ माँ होती है--
न इसकी तुलना,किसी से होती है,
इसलिए ये, आदि और अन्त होती है,
माँ का पर्यायवाची,कोई न होता ।04।
====दिनाँक-21/05/21======
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Thursday, May 20, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- हौंसला

रचनाकार-एच-एस-अरमो,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर,छ.ग ।
शीर्षक -"" हौंसला ""   ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
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○○○||••हौंसला ••||○○○
            °°°°°°°°°°°°°

जीवन की बगिया में----
रंग-बिरंगे पुष्प हैं खिलते,
पर, समय से पहले ही,
कुछ को,झड़ ही जाना है ।।01।।

जो खुशियाँ हैं,हममें बाकी---
उसे स्वीकारो और जीना सीखें,
उस पल को,भुलाना ही होगा,
अपनों और दूसरों के लिए,
अब तो, जीना सीखें---।।02।।

समय की,लेखनी से----
जो इबारत लिख जाती है,
ये,मुसाफिर तेरी राहों में,
तुझे,काँटे व फूल,दोनों ही मिलेंगे।03।

जो रखें,इस पल में हौसला---
उसकी,राहें भी,होती जायेगी आसान,
पर,कभी होना पड़ता है,हमें,
नियति के सामने मजबूर--।।04।।

होगें,चारों ओर भयानक मन्ज़र---
पर,बनना होगा तुझे,एक साहसी पात्र,
और इस कोहराम मचे पलों में,
हौसला बढ़ाते हुए,मंझधार में भी,
तू,अपने साहिल तक पहुँच ही जाएगा।।05।।

बेसहारा,जरुरतमंद की--
कर तू ,इन पलों में मदद ,
मन में,खुशियों के दीप जलेंगे ,
सुकूने-जिन्दगी की इबारत,
अपने आप,इस जहान में लिख जायेगी ।।06।।
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Wednesday, April 14, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- चेतिका

रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।ल
जिला- रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय-चेतिका ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" चेतिका "" ।
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●●●••||चेतिका ||••●●●
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चार दिन की,जिन्दगानी--
फिर हो जाती है,जीवन की शाम ।

जब तक,सांसे हैं---
माया-मोह के मकड़जाल में,
फँसा रहता,मैं की दुनिया में जीता ।

जीवन का फलसफा यही है--
सँसार में आया है तो,
एक न एक दिन,उसे जाना है ।

चेतिका तक,अपनों के हाथों--
पहुँचने का नसीब,
सबको नहीं है मिलता ।

भवसागर में,प्रभु से आस्था रख--
तेरा जीवन सफल हो जाएगा,
अच्छे कर्म कर,चेतिका में,
समाने के बाद भी,तेरा नाम रहे ।

आज कोरोना वायरस की महामारी ने,
कितने परिवार को,दुखित किया है,
इसके चपेट में आये,व्यक्तियों की,
लाशों को भी,चेतिका नसीब नहीं होती
कैसा,अजीब मंजर है,लाशों को,है--
छूना मना और ठीक से,सदगति होती।

जीवन के सत्य को,हम जान लें--
सबको,सदगति नहीं है मिलती,
नसीब वालों को ही मिलती ,
मानवता का रिश्ता निभाते रहो ,
यही बातें,तेरे काम आयेगी ।
----%%%%%%%%%%%%%----
**14/04/2021,बुधवार *****
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Monday, April 12, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- गवेजा

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय--गवेजा  ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- "" गवेजा """ ।
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<•>•<•>||☆गवेजा ☆||<•>•<•>
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संवाद के बिना,जगत में---
सभी जीव-जन्तुओं का,
जीना होता है,कितना मुश्किल ।

विश्व में,अनेक भाषायें हैं--
एक भाषी,एक देश के लोग,
जब आपस में गवेजा हैं करते,
मित्रता व अपनापन का भाव हैं पाते ।

गवेजा में सिर्फ,शब्दों की अहमियत--
जब हो न ,इसमें नजाकत,
तो आपस में अक्सर विवाद या 
बहस की गुंजाइश ही होती ।

दो देशों के बीच--
जब सन्धि या समझौता होता,
गवेजा का महत्व समझ में आता,
ये लिखित दस्तावेज,अहम बन जाता।

बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए--
आपस में महत्वपूर्ण गवेजा का होना,
बहुत है जरुरी तभी जीत है मिलती ।

प्रभावी गवेजा के लिए--
ज्ञान,उचित शिक्षा व सत्संग से,
आती उसमें परिपक्वता,
ऐसे लोग,संगठन में,धाक जमाते ।

मोबाईल और इंटरनेट से--
गवेजा करना,हुआ है आसान,
कहीं भी,कभी भी व कितनी दूर से,
महत्वपूर्ण गवेजा को,बल मिलता है ।

जीवन में,रिश्ते बनाये रखने के लिए--
गवेजा करते वक़्त,संयम जरुरी है,
गुस्से व शब्दों का नियंत्रण,जरुरी है,
जीवन का फलसफा भी,यही है--।
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****12/04/2021,सोमवार *****
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Friday, April 9, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- कादम्बरी

रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय-कादम्बरी ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- "" कादम्बरी ""  ।
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दिनाँक--09/04/2021,शुक्रवार ।
******************************
बसंत ऋतु का बिदा होना---
और ग्रीष्म ऋतु का झटपट आना,
ये मन्ज़र भी,होता है,कितना सुहाना,
आमों में,लगी होतीं हैं,ढेरों अमिया,
महुआ का गदराना और टपकना ।

जंगलों में,चार-चिरौंजी व तेंदू का---
पूरे यौवन में आकर,फिर पकना,
पेड़-पौधों का,पतझड़ के बाद--
सुहागन की तरह,हरे रंग में दिखना,
दुल्हन की तरह,धरा का सजना ।

अमुआ की अमराई की झुरमुट---
ऊपर से,सूरज का भीषण ताप,
और उसमें कादम्बरी के सुर ताल,
डालियों पर फुदकते हुए इठलाना ।

आमों की फसलों के साथ-साथ ---
कादम्बरी की,आवाज़ में भी,
आ जाती है,उतनी ही,प्यारी मिठास,
जैसे-जैसे,आम यौवनता में है आता,
फिर,धीरे-धीरे पकने की ओर है,जाता,
वैसे-वैसे,कादम्बरी की आवाज़ का,
सुर भी,मदहोशी में,बहकने लगता ।

अपने जीवनकाल को,गति देने--
रति-क्रिया का आगाज़ है करती,
तो अपने  स्वर को है,बदलती--।

पराये के नीड़ को,अपना बना--
उसमें अण्डे ,ये दिया करती,
और जब,उससे चूजे हैं होते,
वो,उसे ही,अपना आशियाना समझे ।

कादम्बरी व कागा का रंग--
मिलता -जुलता है,
पर स्वर की मधुरता होती है,
उसकी अपनी,एक अलग पहचान ।

कादम्बरी का नशा--
जिसमें,है छा जाता,
वो,उसके बिन,
इक पल भी,रह नहीं पाता,
और उसी मदहोशी में,सदा रहता ।

कादम्बरी-सा ,जीवन दर्शन--
वैज्ञानिकों,शिल्पियों ,कलाकारों,
में ही,झलकता है--
अपनी अनुपम प्रस्तुति से,
मोह लेते हैं,सारे चहेतों को--।
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Thursday, April 8, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- चार

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विषय-चार-चिरौंजी ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" चार-चिरौंजी """  ।
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%%%==!!चार-चिरौंजी!!==%%%
         ***((((())))))***

मैं बीहड़ जंगलों की मिठास हूँ,
फाल्गुन-चैत्र मास की फसल हूँ ।

व्यापारियों को मालामाल करे---
जनजातियों की मेहनत से ही,
बामुश्किल अब ये फसलें मिलती ।

मानव सभ्यता के विकास ने--
प्राकृतिक संसाधनों व सौंदर्य का,
भरपूर दोहन करता रहा है,
आज फलदार वृक्षों का सफाया हुआ।

मेरी मिठास में,लाल चींटियों का डेरा--
हरे से गुलाबी व फिर कालिमा आती,
पक्षियों को,ये फल बहुत है भाता,
कठोर कवच के भीतर,मैं रहता ।

यही दाना या बीज ही--
चार-चिरौंजी है,कहलाता ।
खीर,मेवे-मिष्ठान्न की शान बढ़ाता,
दुर्लभ फसल होते जा रहा हूँ ,
इसलिए मोल से,बिक पाता हूँ ।

चेहरे के,सौंदर्यीकरण का लेप --
महिलाओं की सुन्दरता निखारता ,
शीतलता व पौष्टिकता का गुणकारी,
मेरी लकड़ी व पत्तियाँ हैं उपयोगी ।

चार-चिरौंजी सी मिठास --
दूसरों में,मिलकर स्वाद बढ़ाना,
ऐसे ही गुणों को,हमें अपने जीवन में,
अपनाकर,मित्रता का भाव है जगाना ।
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**08/04/2021,गुरुवार ****
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Tuesday, April 6, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- बीजापुर

रचनाकार-एच-एस-अरमो,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय-बीजापुर ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-अशांत बस्तर ।
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●●<•>अशांत बस्तर <•>●●
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मैं बस्तर की,हसीन वादी हूँ---
मेरी जमीं में है--
सघन वन,जिसमें पलते हैं,
विशाल साल ,सागौन के वृक्ष,
कई जंगली जानवर व पक्षी ।

ऊँची -ऊँची पहाड़ियाँ और--
गहरी-गहरी खाईयाँ व बहते झरने,
उसके सौंदर्य को और भी अधिक,
अनुपम और खूबसूरत बना देता है ।

आज मेरा बस्तर,कुछ वर्षों से--
अशांत और अनमना सा हूं,
मेरे धरतीपुत्र के चेहरे से,
ना जाने क्यूँ,हँसी गायब हुई ।

मेरे अधिकांशतः क्षेत्रों में--
कुछ अजीब सी उलझन पाई है,
चाहे हो बीजापुर या सुकमा,
लाल सलाम का,आतंक फैला हुआ है,
जिसकी वजह से,हमें घुंटन सी लगती,
रात कैसे गुजरती,हम ही जानते है ।

शासन ने,सुरक्षा के लिए--
भारी फोर्सेस स्पेशल को तैनात की है,
पर,वे लोग,नक्सली रणनीति को,
ठीक से समझ नहीं हैं  पाते और--
मुखबिर के सिन्कँजे में फंस जाते हैं ।
पर,मुठभेड़ तो करते किंतु मात ही,
जबरदस्त खाते और उन्हें भी मारते 
उनका अटैक और हमारा डिफेन्स,
शय-मात में,चूक हो जाती है और 
हमें,अपने,जवान शहीद हो जाते,
हममें टेलन्ट की कमी नहीं है,ना 
जज़्बा की कमी,देंगे जवाब हम भी,
उनमें हताशा छा जायेगी,
इस जंगल से,भागना ही पड़ेगा ।

जब-जब मुठभेड़ में फंस जाते हैं,
एबुन्स की चपेट में आ जाते हैं,
चलती गोलियों के निशाने में आते ,
जवाबी हमला भी करते,फिर भी,
जवानों की शहादत,दनी पड़ती ।

ऐसे मौके में,लाशों के ढेर पर,
मुकाबले के,पुरज़ोर हमले होते,
कुछ वो भी मरते,घायल भी होते,
ये खूनी लड़ाई की,जंग जारी है--?

अशांत बस्तर क्षेत्र में---
बहते नदी-नालों से ,
बह रहा है,रक्तिम पानी का रंग,
पानी में,बारूदी गन्ध आ रही है,
बेरहमी से,बेबसों की जानें जा रहीं हैं,
दोनों हैं,देशवाशी,पर दुश्मनी क्यों है-?
कौन बताएगा,जवाबदेह कौन होगा--
यही सोचकर,हम हैरान-परेशान हैं ।

जवानों की होती है ,शहादत--
मरने वाला,एक होता है और--
मातम पूरे परिवार व देशवासियों को,
होती,इसकी भरपाई नहीं हो सकती है
रिश्तों के मतलब,हैं बदल जाते ।

शहीद हर जवानों को--
आओ मिलकर,दिल से,दें दे--
सच्ची भाव-भीनी श्रृद्धांजलि ,
उनकी शहादत,बेकार न जाये,
आओ ऐसी कसम,हम खायें,
उनके परिवारों तक अपनी,
संवेदनाएं पहुंचाने की कोशिश करें,
हो सके तो,प्रत्यक्ष भेंट कर आयें ,
जो जवान घायल हुए हैं,उनके --
शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करें,
जो हास्पीटल में हैं,उनसे मिलने जायें।
====""""""""""""""""""""""""""""=====
जय जवान------जय छत्तीसगढ़ 

Saturday, April 3, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- इत्र

रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला- रायपुर,छत्तीसगढ ।
विषय-" इत्र "
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- " इत्र "  ।
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•••••••♡♡|| इत्र ||♡♡•••••••••
               ••••••••••
मैं महज़ इत्र नहीं---
हूँ मुगलों की,महफ़िलों की शान,
मेरी खुशबू ,करती सबको मदमस्त,
डूब जाते, उस पल, सारे लोग --।

मेरी खुशबू ,करे ना,किसी से भेद ---
मैं सारे वातायन में,फैलने का,
मिल के,हवा के साथ,हुनर रखती हूँ ।

मेरी एक,छोटी सी बूँद---
ही काफी है,तुमको और--
वातावरण को महकाने के लिए ।

गुलाब,केवड़ा और मोंगरा--
फूलों की,ये पंखुड़ियां, जब--
सड़ती-गलती व रुप है बदलती,
तब बन जाती है,इत्र महरानी ।

मैं सोचता हूँ कि--
मानवता इत्र बन जाये,
सारे जहान में,ऐसी खुशबू फैलायें,
सुख-शांति और समरसता लायें ।

मैं हूँ,एक मामूली सी इत्र--
मुझमें तनिक भी,गरूर नहीं,
मैं,नर-नारी सबमें मिल जाऊँ,
अपने-पराये की,दूरियाँ मिटाऊँ ।

ईद-मिलन में,मोमिनो के--
परिधानों में,खुशबू फैलाती,
वे,एक-दूसरे से,जब गले हैं मिलते,
दो दिलों में भी,मोहब्बतें घोलते --।

सियासतदानों व रहिसजादे--
होते मेरे,बहुत शौक़ीन,
सजती हूँ मैं,खूबसूरत बोतलों में,
जब मिलती,मैं रुई के फाहे से,
जब वे कानों में,  हैं फँसाते ,
तो,ये इनकी ,रूहें को भी महकाते ।

इत्र की, खुशबू की तरह--
सबके दिलों में घुलना,
अपना मोल ,तुम दिखाना,
सारे जहान में,तुम बिकोगे,
गीत-गजलों में,तुम सजोगे --।
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Wednesday, March 31, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- सरहद

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास- बायरन बाज़ार ,रायपुर ।
जिला- रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय -सरहदें ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"सरहदें " ।
दिनाँक -31/03/2021,बुधवार ।
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●~•~•~||सरहदें||~•~•~●
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गाँव,शहर व देश की--
सरहदें होती हैं,उसकी पहचान ।

प्राकृतिक सरहदें---
अक्सर बनती हैं,नक्शे में,
नदियाँ ही--।

दो देशों के बीच---
सरहदों के लिए होती हैं,
अक्सर विवाद व लड़ाईयाँ ।

दो दिलों में,परिवारों में---
जब खींच जाती हैं सरहदें,
होती रहती हैं,अक्सर तकरारें ।

जमीन-जायदाद के---
बँटवारे में,उसकी सरहदें ही,
आपस में,सही फैसला करतीं ।

प्रभु के प्रति,सच्चे मन से--
आस्था और विश्वास,भक्ति से,
सरहदें मिटती और जुड़ाव होता ।

रियासतें बचानें ,सियासतदानों ने--
बनाई किलेबंदी व उसकी सरहदें,
एक ओर गहरी खाईयाँ होती,और 
दूसरी ओर होता है,नदी का किनारा ।

ऊँच-नीच और जाति-भेदों ने--
ऐसे विचारों से ही,आपस में,
खींच रखीं हैं,विवादी सरहदें ।

सरहदों की रक्षा करते-करते--
देश के सिपाहियों का,
दुश्मनों के बीच,अचानक मुठभेड़ में,
अपने प्राण को न्यौच्छावर कर जाते ।

आओ वैमनस्यता की सरहदें---
अपने दिलों से,सदा के लिए मिटायें,
भाईचारे को,दिल से अपनायें,
और देश में,शाँति का माहौल बनायें ।
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Saturday, March 27, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- नींद

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर , छत्तीसगढ़ ।
विषय- नींद    ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
दिनाँक-27/03/21,शनिवार ।
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■¤■¤••••|| नींद ||••••¤■¤■
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नींद न होती तो--
जीव-जन्तुओं की,जिन्दगानी--
इतनी लम्बी, नहीं होती  ।

घोड़ा सोये,खड़े-खड़े और--
कुत्ते सोते हैं,चपलता की नींद,
हम सोते हैं,मरे के समान,
कुंभकर्ण की नींद,घर्राटे की तान ।

जागते हुए,जो सो जाते--
घोर लापरवाह ,वे कहलाते,
शेखचिल्ली की तरह,
खुद को,वे अक्सर,हानि पहुंचाते ।

कुछ लोग,मक्कारियाँ सा करते--
और नींद में,सोने का,बहाना करते,
लोगों को,उल्लू अक्सर हैं बनाते,
और झांसे में, वे रखते--।

बालपन में,जब शिशु रहते--
माँ की गोद में ही, सो जाते,
थपकी व लोरी भी सुनते ,
ऐसा ममतामयी बिछौना पाते,
झटपट कब नींद आ जाती,
हम तुम,उस पल,जान नहीं पाते ।

दहशत का एहसास होने पर--
दिन रात की नींद,उड़ जाती है,
इन्सान क्या,जानवरों में भी,
यह बात,अक्सर नजर है,आती ।

रातें हैं,बनी नींद लेने के लिए--
सुरक्षा बलों को,जागना होता रातों में,
सुरक्षा के खातिर,कभी जान गँवा देते,
सच्ची देशभक्ति का,पालन हैं करते--।

जो जल्दी सोये, भोर होते ही जागे--
समय,उसके पीछे पीछे ही भागे ,
स्वस्थता का लाभ,वे लोग उठाते,
साधु-सन्तों को,देखा है,ऐसा अपनाते।

तंदुरुस्ती के लिए,सोना जरुरी है--
आगे बढ़ना है तो,समय पर जागो,
वक्त थमता नहीं,इसे तुम जानो ,
छ:से आठ घंटे,रोज सोना जरुरी है ।

सोने में,जिसने समय है गँवाया--
मकसद से,हमेशा वो,दूर हुआ ,
दुश्मनी में,लोग मौत के घाट उतारे,
चिरनिंद्रा में,वे सुला हैं जाते--।

नींद का,हम महत्व जाने--
वरना हम,दुर्घटना के,शिकार होते,
अधकचरा नींद,तनाव हैं देते ,
बेवजह की नींद,हानि हैं दिलाते ।
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Friday, March 19, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- व्रीहि

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर , छत्तीसगढ़ ।
विषय-व्रीहि   ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-  "" व्रीहि ""     ।


   ●●••••|| व्रीहि ||••••●●
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व्रीहि जगत का,अनमोल वरदान है--
ये,जीवन का,   आधार भी है  ।

आदिकाल से ही ये---
भोजन सामग्री है बना ,
कई देशों की है शान,
जब बनते हैं,इसके पकवान ।

वर्षा ऋतु , खरीब की फसल---
कहीं एक फसली,तो कहीं दो फसली,
लगता इसको,भरपूर है पानी,
पकने के लिए,लगे कड़क धूप ।

व्रीहि की फसल होने पर--
कहीं ओणम तो,कहीं बीहू का,
त्यौहार के रूप में मनाया जाता है ।

व्रीहि का दाना ---
बनता है,पूजन सामग्री,
खीर,अक्षत ,कहीं आटा बन,
तो कभी,भाल में,सौभाग्य टीका बने।

व्रीहि,मानव के साथ-साथ ---
पशु ,पक्षियों का,आहार होता,
और उनकी भूख है मिटाता ।

व्रीहि से,बने कई भोज्य पदार्थ--
पोहा,मुर्रा ,बिस्कुट,बुर्रा,चीला,
भात और रोटी में प्रयोग होता ।

किसानों की होती ,प्रमुख फसल--
आर्थिक समृध्दि व संकट मोचक,
जीवन विकास की है मुख्य धुरी ,
करते पूजा,धन लक्ष्मी के रूप में ।

कई देशों की है,मुख्य फसल--
उनके आर्थिक विकास का पैमाना,
इसके बिन,भोजन होता अधूरा ।
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Thursday, March 18, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- बसाहट

रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय-" बसाहट "    ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- "" बसाहट ""    ।
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■¤■¤••||बसाहट ||••¤■¤■
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आदिम युग से शुरू हुई---
बसाहट की कहानी,
रहते थे कभी कबीले में,
फिर हुई ,गाँवों की बसाहट--।

राज्य बने और रियासतें भी बनीं ---
फिर शुरु हुई वहाँ बसाहट,
किले बने , परकोट भी बने ,
फिर बना ,वह प्रजा,सेना का रहवास।

गाँवों से,कस्बे व शहर बने -----
जीवन स्तर में,फिर आया बदलाव,
और लोग,सुविधा भोगी हुये ,
और फिर,बसाहट भी बदलते रहते ।

किसी निर्जन स्थानों में--
जब,पहले-पहल कोई है बसता,
फिर वहाँ,धीरे-धीरे लोग बसते जाते,
ऐसी बसाहट बनाती जाती हैं,
टोला,मौहल्ला और गांव,शहर--।

बड़े शहरों में,होती जा रही हैं---
अब घनी आबादी और--
बनने लगती,फिर महल व अटारियाँ,
और गरीबों की झुग्गी-झोपड़पट्टीयाँ,
हो जाती हैं,ऐसी बसाहट की,
परेशानियाँ बढ़ती ही जाती हैं--।

बसाहट मानव जीवन के लिए--
एक मूल आवश्यकता है बनी ,
इससे हमको  ,सुरक्षा भी मिली,
और मानवीय विकास को,गति मिली।

जहाँ मिले,सभी को सुकून---
और जहाँ मिलता रहे आबो-दाना,
वहीं अक्सर,बसते जाते हैं,
जग के, जीव-जन्तु व इंसान सारे ।

घने जंगलों में---
बेफ़िक्र होती है जिन्दगी ,
वहाँ जंगली, जानवरों की,
बसाहट होती है,बहुत भारी,
मिले वहां पक्षियों का कलरव भारी ।

राज्य विस्तार,विरासत की भूख--
ने ही,आपस में युद्घ है कराया,
जिससे बसाहट का विनाश हुआ,
और सभ्यताओं की भारी क्षति हुई ।

बसाहट,गाँव,नगर,राज्य की--
सदा बनती है, मूल पहचान,
मिलते हैं,उन्हें एक नया नाम,
यही मानव सभ्यता की पहचान ।
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Wednesday, March 17, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- फागुन

रचनाकार-एच-एस-अरमो,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय-फागुन  ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" फागुन """    ।
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●●●●•••|| फागुन ||•••●●●
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ये री सखी,फागुन आयो--
तन-मन में,मस्ती है छायो ।

वो री सखी,मोरे पिया,गये हैं परदेश--
उनकी भारी,याद है सताती ,
मन में,अजीब-सी कसक है उठती,
ना लागे,मोरा जिया किसी कारज में,
रातें कटती हैं,बिस्तर में,
करवट बदल-बदलकर के--।

क्या,पिया मिलन की तड़पन --
ऐसी होती है,मुझको भी बताओ,
ये मेरी,प्यारी सखी रे --
क्या,ऐसा ही,एहसास भी--
उनको भी होता होगा क्या--?
ये री सखी,मुझे भी बताना --?

पहली-पहली बार फागुन आया है---
और प्रियतम से,हो रही दूरी मेरी,
ना कर पाऊँगी ,उनसे कोई भी,
जोरा-जोरी,रँग भी,लागे फीका-फीका। 

फागुन में,चलत ऐसी बयार--
हल्की-फुल्की तपिश लिए,
रबी की फसल लहलहाएगी,
इस तपिश से,धीरे-धीरे फसलें,
पकने लग जायेगी और--
किसानों में भी,खुशियाँ छा जायेगी।

फागुन की,रंग भरी मस्ती के साथ--
टेसू के फूलों का रंग है गहराता,
अमुआ में,छोटी छोटी सी कैरी,
अंगूर सी ,झुग्गे में,नजर आती,
कोयल की कूक भी सुनाई देती,
महुआ की गदराई कुचियाँ से,
महुआ टपकने को,होता है लालयीत ।

पतझड़ की होती है समाप्ति--
दरख्तों में आने लगती हैं कोपलें,
ठुटे पेड़ों में,रौनक छाने लगती ,
बंदरों को,कोपलें खाने हैं मिलती ।

हिंदी महीनों का फागुन होता है--
अन्तिम मास,चैत्र नवरात्रि का,
होने लगता है,देवी भाव का आगाज,
ग्रीष्म ऋतु की,गर्म हवा की शुरुआत ।

फागुन है,रंगों का त्यौहार--
सब लोगों में,छाता रंगीला खुमार,
सारे भेद भूला,रंगते हैं,एक रंग में,
खूबसूरत पर्व की,सद्भावना को ,
कभी भी,मलिनता में,ना बदलें  ।

गेहूँ और चने का होरा--
इसकी सौंधी-सौंधी,मीठा स्वाद ,
खेत-खलिहानों के रखवारों को भाये,
गेहूँ,चने के आटे से  बनाते हैं सत्तू--।
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Monday, March 8, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- निराकार

रचनाकार--एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास- बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला- रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विषय- निराकार   ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" निराकार ""     ।
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●●●•• निराकार ••●●●
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मैं ही, भूत - भविष्य---
और वर्तमान भी हूँ ,
पर-- मैं निराकार  हूँ ।

मुझमें ,लीन हुये तुम-सब---
साक्षातकार हुआ ,उसी को,
जिसके-- तप-ताप-तपस्या में,
एकाग्रता का, मनोबल खूब था--।

आस्था और विश्वास की--
दो धार्मिक,धारणायें प्रचलित,
सगुण व निर्गुण, मेरी है माया,
निराकार को,है जिसने धाया,
वही तो,निर्गुणमार्गी है कहलाया-।

मन है,अति चंचला---
जिसमें बहती है,कल्पनाओं की,
निर्मल,लंबी-लंबी अविरल धारायें,
इनको साकारता तक पहुँचने,
निराकार के,आशीर्वाद बिन अधूरा-।

निराकार, परम जगत के स्वामी---
देवों के देव हैं,महादेव भगवान्  ,
हैं,हिमालय पर्वत के वासी,
महाकाल-महाशिवरात्रि के दिन,
सब हैं,इसके पूजक - साधक ,
हैं,ये तो,सबके--भोला-भंडारी--।

ओँम निराकार ब्रह्म की जाप--
जगत तारनहार,हैं हमारे,
जो है,नास्तिक उसको भी तारे,
तुम्हारे,इक दर्शन को,तरसे हम सारे--।
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Tuesday, March 2, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- पलाश

रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय-पलाश  ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- """ पलाश """"    ।
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●♧♧♧||•पलाश •||♧♧♧●
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बसंत ऋतु का सरताज---
कानन का है गुलनाज,
पलाश है, आच्छादन का साज,
जैसे पेड़ों में,दिखाई देते,इसके फूल,
हों दहकते कोयले के अंगारे--।

सदियों से,बृज की होली में----
पलाश के फूलों के रंगों बिन,
लागे,वहाँ की होली,
अधूरी-अधूरी सी,
गोप-गोपियों का,जियरा,
लागे,इसके बिन,विरहिणी-सा--।

पलाश के,तीन पात---
मिलकर,बन जाते हैं पत्तरी-दोनॉ,
भूख मिटाने के लिए,बने थाली ,
गर्मी में,ठण्डक देवेऔर देत छाँव--।

पलाश है,गुणों की खान--
जिसमें पले,लाख प्रजाति के कीट,
बीजों व नौनिहाल पौधे के कन्द,
औषधीय गुणों से लबालब,
दूर करे,कई बिमारियों शर्तिया ।

पलाश के,गूदेदार फैलीं---
जमीं के भीतर जड़ें,
इनसे बनाई जाती

Monday, March 1, 2021

एच-एस-अरमो की रचना- कानन

रचनाकार-एच-एस-अरमो,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय- कानन  ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- """ कानन """""।
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जगत में,कानन ना होते --
जिंदगी में,फिर आनन्द भी न होते।

भौगोलिक स्थिति के कारण--
धरा में,कानन कई प्रकार के होते,
पर,अफ्रीका के,कानन में,
अति सघन,ऊंचे-ऊंचे वृक्ष होते --।

कानन इस धरा में,ना होते--
मृदु जल,हम कहाँ से पाते,
वर्षा ऋतु का आनन्द हम,
व पानी की फुहारें,कहाँ पाते ।

कानन में,जंगली जीव-जन्तु होते---
विविध वनस्पतियों के साथ- साथ ,
जड़ी बूटियों के हैं,असीम भण्डार ,
ये सब,निभाते लाभदायी किरदार--।

वृक्षों की सघनता,पहाड़ों की ऊँचाईयाँ
बहते झरनों की,कल-कल ध्वनियाँ,
पक्षियों की,अजीब-सी ,आती आवाजें,
शेर की,कानन में,दहाड़ती तेज गर्जनें।

मानव ने,अपने स्वार्थ के लिए--
कानन को,बहुत बर्बाद किया है,
जंगली जानवरों के पर्यावास को,
हमनें ही,बेशक बिगाड़ दिया है--।

कानन में,वृक्षों की सघनता---
पुकार-पुकार के,हमसे कह रही है,
हम,साथ-साथ रहकर भी,
आपस मे,कभी नहीं,लड़ा करते हैं,
सिर्फ आपस में,स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करते
किसी को,नीचा नहीं ,हम दिखाते।

आओ एक बार कानन की---
हम सब,सैर ही,कर आयें,
राष्ट्रीय पार्क ,अभ्यारण की,
वहाँ कुछ दिन,ठहरा भी करें,
पर्यावरणीय जीवंतता का,
सही अर्थ ,हम खुद समझ जायेंगे ।
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दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...