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Monday, April 12, 2021

ज्योति माला सिन्हा की रचना- गवेजा

रचियता -श्रीमती ज्योति माला सिन्हा
स्थान -मनेंद्रगढ
जिला -कोरिया
शीर्षक -गवेजा

बात-चीत का दौर कम हो चला है
इसलिए लोगो में फासला हो गया है।

एक समय था जब
पेड़ के नीचे चबूतरों 
पर बैठकर
लोग आपस में गवेजा 
कर लिया करते थे
अपने जिंदगी के उलझनों 
को वहीं सुलझा लिया करते थे।

हर किसी को एक दूसरे 
के बारे में पता होता था
खुशी हो या गम सब आपस
में बांट लिया करते थे।

घर के दरवाजे पर बनी 
थोड़ी ऊंची चौखट पर भी 
औरतों का झुंड हुआ करता था
और गवेजा करते करते
 खाना भी बन जाया करता था

बच्चों को भी शाम का 
इंतजार हुआ करता था
अपने दोस्तो के साथ 
आज कौन सा खेल खेलेंगे 
इस बात का ज़िक्र हुआ करता था।

गवेज़ा का वह दौर चलो
 फिर से शुरू करते हैं
 आने वाली पीढ़ियों को भी
गवेजा का लाभ सिखाते हैं

न होगा उनमें अकेलापन 
न होगी जीवन के प्रति निराशा
आत्मविश्वास बढ़ेगा उनका 
दूर होगी आत्मघात की अभिलाषा।।

Tuesday, March 2, 2021

श्रीमती ज्योति माला सिन्हा की रचना- पलाश

रचियता - श्रीमती ज्योति माला सिन्हा
स्थान -मनेंद्रगढ
जिला - कोरिया
शीर्षक -पलाश


हरित वर्ण किसलय को
देख , कर रही हूं तलाश
यहीं कहीं था वो 
केसरी रंग वाला पलाश

जिसके फूलों को देखकर
मचलता था मन  
बनाने के लिए पक्का रंग
रंगने दोस्तो को होली में
करते थे तरह तरह के योजन
ऐसी खुशी नहीं दिखती
क्योंकि अब पहले जैसे  
नहीं रह गए लोग आस पास
यहीं कहीं था वो
केसरी रंग वाला पलाश।

कभी हर गली मोहल्ले की 
पहचान हुआ करते थे
बच्चे भी जिसके पत्तो को 
जान लिया करते थे।
शहरी क्षेत्रों से हो गया 
इन वृक्षों का उन्मूलन
 कुछ गांवो में, कानन में 
ही दिखते हैं पलाश
नही रह गया यहां वो
केशरी रंग वाला पलाश

अब कम दिखते हैं 
 पत्तल वाले भी
जिनके जीविका का
 उपार्जन हुआ करते थे 
नहीं बना पाते अब 
पहले जैसे ढेर सारे बंडल
क्योंकि ढूंढना पड़ता है पलाश।
यहीं कहीं था वो 
केशरी रंग वाला पलाश।।

Monday, February 22, 2021

ज्योति माला सिन्हा की रचना- मुस्कुराहट

रचियता- ज्योति माला सिन्हा
स्थान - मनेंद्रगढ़
शीर्षक - मुस्कान
विधा - कविता


पुलकित नयन,प्रफुल्लित हो मन
लालिमा छा जाती है चेहरे पर
जब अधरों पर मुस्कान आती है।
 दर्शन हो तुम्हारा प्रिय  
हर्षित हो जाता मेरा हृदय
याद करके बीते लम्हों को 
बावरा मन खुश हो जाता है
तब अधरों पर मुस्कान 
आ जाती है।
 क्षणिक सुख है ये जो कुछ
 देर के लिए चेहरे पर आ जाती है।
फिर भी मानव मन खुश हो जाता है 
जब अधरो पर मुस्कान आती है।
किंतु सबसे अनमोल मुस्कान 
तो वो है जो किसी के 
मुस्कुराने की वजह बन जाए
कभी किसी के दर्द की दवा 
बन जाए।
तब अधरो पर जो मुस्कुराहट आएगी वो अंतरात्मा तक छा जाएगी और  गहरी हो जाएगी 
उन यादों की तरह जो मानस पटल पर विदमान हो जाती है।
तब अधरों पर सुकून वाली मुस्कान आती है ।

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...