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Saturday, June 12, 2021

ग़ज़ल : नलिनी बाजपेयी

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,जिला-कांकेर( छ.ग.)
            गजल सृजन
          काफ़िया- आती,
          रदीफ-होगी क्या
         दिनाँक-12.06.21
*~~~~~~~~~~~~~~~~~~*

मेरी याद तुम्हें रूलाती होगी क्या?
जख्म भरे दिल को सहलाती होगी क्या?

मैं गीत,गजल बन गया था प्यार में कभी।
वो गीत कभी तो गुनगुनाती होगी क्या?

मुझे याद आता है वह दिलकश नजारा।
ख्वाबों में कभी झलक दिखाती होगी क्या?

फूलों सा नाजुक ये तन है तुम्हारा।
प्रीत की बगिया को महकाती होगी क्या?

तेरा इश्क मुझे जीने नहीं देता " *नलिन*"। 
दिल में छुपी पीड़ा  छुपाती होगी क्या?

        नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,कांकेर( छ.ग.)

Friday, June 11, 2021

हम कविता क्यों लिखते हैं? : नलिनी बाजपेयी

रचनाकार -नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ.ग.)
विषय-हम कविता क्यों लिखते है?
      दिनाँक-11.06.21

    *हम कविता क्यों लिखते है*
   
               साहित्यिक विधाओं के अंतर्गत कविता भी एक प्रमुख विधा है। कविता " *गागर में सागर भरने*" में सक्षम होता है। कवि की आत्मा की क्षुधा कविता लिखकर तृप्त होती है। कवि कविता के माध्यम से जनमानस में ऊर्जा का संचार करता है,अपने विचारों को ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए कविता लिखता है।सामाजिक चेतना जगाने, *सर्वजन सुखायः,*सर्वजन हितायः* की भावना को समेटे कालजयी सृजन को प्रभावशाली बनाने के लिए कविता लिखता है।

        " *कविता में जब भावों की अनुभूति होती है। मन के विचार जब उद्वेलित होने लगते हैं, तब कवि की लेखनी कागज के पृष्ठों पर चल पड़ती है*"। कवि जब  प्रकृति में जब सौंदर्य की अनुभूति  करता है। स्वयं या जगत की व्यथा को महसूस करता है। कवि जब भावों, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को लिपिबद्ध करना चाहता है, तब वह कविता लिखते को आतुर हो उठता हैं।
            कवि की कल्पनाशीलता, कवि के जन हितकारी उद्देश्य और  उसके चारों जो हर्ष, विषाद,भय,प्रीति,संयोग, वियोग ,शौर्य,करूणा,हास्य, आदि भावों को देखकर उसके मन में भाव प्रस्फुटित होते है।उन भावों में स्वंय की पीड़ा या हर्ष महसूस करता है।उसके विचारों को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने वाली  सर्वव्यापकता की दृष्टि मिल जाती है,और विचारों को जब शब्द मिलते हैं। तब कवि मन  कुछ लिखने को तैयार हो जाता है।
              कवि प्रकृति के बहुत करीब होते हैं। उनका संवेदनशील मन जब भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर नए मूल्य,नए शिल्प विधान ,नये बिंब और बोलने लिखने की अतिशय क्षमता महसूस करने लगता है, तब कविता कामिनी कामिनी उसके हृदय से निकलकर लिपिबद्ध हो जाती है और हम कविता लिखने लग जाते हैं।

"*हिय में जब 
         हलचल मची।
  भावों ने ली 
            अंगड़ाई।।

 स्वर्णाभा छा गई 
               मन गगन में।   
  तब कविता कामनी 
               दौड़ी आई।।
 
जग का सौंदर्य देख
          फूलों की सुरभि से,
 धरा का अनुपम 
        सौंदर्य नजर है आई। 

अंबर धरती जल 
     थल में इंद्रधनुषी रंग है छाई।।
 कमनीय डाल सी 
        कविता मन  में इतराई।।

मन के सुख-दुख
             जैसे भावों को,   
  असीमित जन्मे 
                उद्गारों  को।

  मूर्त रूप देने को
             कविता बन
 ह्रदय में आकुल
            हो छटपटाई।।"
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         नलिनी बाजपेयी
     संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)

Thursday, June 10, 2021

कैफियत : नलिनी बाजपेयी

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ.ग.)
         विषय-कैफियत
        दिनाँक-10.06.21

                  कैफियत का शाब्दिक अर्थ *हालचाल*या *समाचार*।
              कैफियत अर्थात किसी व्यक्ति, वंश, समाज आदि के बारे में विस्तार पूर्वक वर्णन  की जाने वाली व्याख्या या फिर किसी बात या कार्य से पारस्परिक संबंध रखने वाली प्रमुख बातों का वर्णन करना या समाचार बताना कैफियत के दायरे में आता है।
       किसी के जीवन की कोई घटना, जिसे अक्षरशः याद करना या उसका वर्णन करना या उन बातों को लिपिबद्ध करना कैफियत कहलाता है।

    हमारे जीवन से संबंधित कोई महत्वपूर्ण घटना या सुखद घटना आदि के बारे में बात करना या याद करना और उसका विवरण बताना कैफियत कहलाता है। हमारे जीवन में होने वाली कई घटनाएं जिसे समय के साथ साथ हम कुछ भूल भी जाते हैं उन्हें क्रम से उसे याद करना, किसी के सामने उन बातों का विवरण देना  कैफियत जे अंतर्गत आता है।
  उदाहरण के रूप में राम चरित मानस में त्रेता युग में हुए घटनाओं
वर्णन करना ।

                नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)

Wednesday, June 9, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- अकिंचन

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ .ग.)
         विषय- अकिंचन
        दिनाँक-09.06.21

            अकिंचन

मैं अकिंचन  कैसे 
          करुँ तुम्हारा वंदन।
 मन की व्यथा बता नहीं 
          पाई सुनो मेरा क्रंदन।।

 तप्त हृदय, तृषित मन,
             आकुल है तन। 
जग की आधि व्याधि 
        से पीड़ित हुआ बदन।।

 कोई नहीं है जग में 
         प्रभु दुःख हरे जो मेरा।
 बैठी घर की देहरी पर 
         भावों का करती मर्दन।।

 राग ,द्वेष ,माया, 
      मोह ने किया  जीवन में बसेरा।
 दया, प्रेम ,करुणा पर 
        छाया तम का अँधेरा।।

 कैसे बतलाऊँ भगवान 
    कोई नहीं है मेरा।
सुख पाने की आस में 
    घूम-घूम  करता रहा मैं नर्तन।। 

तुम्हारा ऋण है बहुत ,
          हे नटवर नागर।
  दीन दुःखी जग से 
        व्यथित मैं हूँ सूखा सागर ।।

कृपा निधान दया करो 
        शरण पर पडी तेरा ।
अहम भाव त्याग कर 
     करता हूँ  सबका अभिनंदन।।
___________________

       नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)

Tuesday, June 8, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- व्यवहार

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला -कांकेर (छ.ग.)     
          विषय-व्यवहार,
       दिनाँक-08.06.21

             व्यवहार

दिव्य मानुष तन मिला है,
        मानवोचित व्यवहार करो। 
मौसम की तरह
        रह-रह कर मत बदलो।। 

सब से तुम मीठे
         बोल कर प्यार करो।
 प्रेम ,दया, करुणा, सौहार्द्र
       जैसे संस्कारों में हो पले ।।

दुर्जनता को छोड़ो 
      सज्जनता के छाँव में ही सँभलें।
स्वार्थ, माया, मोह, 
        हिंसा में विश्वास मत करो।।

जग को स्वर्णिम बनाना 
         हो तो परमार्थ स्वीकर करो।
 दुखी पीड़ित जन हो 
         उनको गले लगा पीर हरो।

आशीशों को आँचल में भरकर
          मानवता का बन शृंगार रहो।।
 सुख में सब के सुखी होना
          दुख में जख्मों को धोना। 
जग में इंसानियत की पूजा 
          हो ऐसा तुम चमत्कार करो।।

देश धर्म को आगे बढ़ाएं,
         सत्पथ की राह चलो।
 विकास पथ पर चल 
       नवसृजन का सपन साकार करो।
_________________________

       नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर, कांकेर,( छ. ग.)

Monday, June 7, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- तेजस

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
     संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ.ग.)
           विषय-तेजस,
       दिनाँक-07.06.21
*~~~~~~~~~~~~~~~~~~*
               *तेजस*

सूर्य सा तेजस लेकर तमस हरो। 
नन्ही नन्ही किरणों से मन में उजास भरो।।

सुख-दुख की लुकाछिपी से। 
कभी भी तुम हिम्मत ना हारो।। 

खत्म हुई लालिमा जीवन की। 
उसमें रंग आस का भरो।।

हम आर्यपुत्र दिव्य ईश्वर के संतान ।
तेज,शौर्य, साहस से रहो ना अंजान ।।

काली रातों की करना ना परवाह । 
नवसृजन नवजीवन का तुम में है प्रवाह।।

तेरा शौर्य देख जग है सदा हर्षाय ।
घोर निराशा में तेजस ले आस का दीप जलाया।।

        नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Thursday, June 3, 2021

नलिनी बाजपेयी कृत रेखाचित्र- अंधविश्वास

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,जिला-कांकेर, (छ .ग.)
         विषय-अंध विश्वास
           विधा -रेखाचित्र
        दिनाँक-03.06.21

               *अंध विश्वास*

            नैना की बड़ी बड़ी आँखें उसमें स्पष्ट दिखाई देते लाल- लाल डोरे आँसूओं से तर चेहरा,हल्दी की रंग लिए पीली साड़ी में उसका सौंदर्य निखर उठा था। दो दिन पहले ही उसके पति भगवान को प्यारे हो गए थे।    
           रो-रोकर नैना का बुरा हाल.... बुखार से तमतमाया चेहरा, तेज अंधड़ उठने पर जैसे पेड़ डोलने लगते वैसे ही रह-रहकर उसका बदन काँप उठता था।वह गिर-गिर पड़ती थी।शरीर में सिहरन सी उठती, जैसे शीत ऋतु में किसे बर्फीले क्षेत्र में वह बैठी हो।
            घर मेहमानों से भरा था। तरह- तरह के लोग, तरह-तरह की बातें...... कोई छाती पीटता, कोई उसके पति की प्रशंसा करता, कोई बेहोशी की मुद्रा में बिलखते नजर आ रहे थे ।कोई बोल -बोल कर रोते और अपना दुख व्यक्त करते थे ।सभी नैना के पति को अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि दे रहे थे। 
              नैना पढ़ी-लिखी संभ्रांत घराने की बेटी थी। दुःख तो उसे भी अपार था ।उसकी तो दुनियाँ उजड़ चुकी थी....मगर उसके दुख प्रकट करने के  तरीके अलग थे। कोई कहता कैसी निर्दयी है...... पत्थर दिल वाली...... इसकी तो  आँखों का पानी भी सूख गया है। सब सुनती रही,उसके कानों में ये शब्द गर्म सीसे के समान लग रहे थे। वह दहाड़े  मारकर रो भी नहीं सकती थी। ना छाती पीट सकती थी। व्यथा की सागर की हिलोरे उसके दिल में भी उठ  रही थी।सारी दुनियाँ उसे बेजार नजर आ रही थी।
           तभी एक श्वेत परिधान धारे महिला चेहरा सपाट लिए उसे खींचकर ले जाते हुए कहने लगी- "नाई आया है।केश मुंडन कराकर नहलाना  है ।" वो रोती-बिलखती रही लेकिन उसका किसी ने नहीं सुना। डॉक्टर ने बिस्तर से उठने मना किया था ।एक सौ चार डिग्री बुखार से उसका शरीर काँप रहा था। दांत भी बज रहे थे ।मगर उफ! ये  कैसा रीति रिवाज ....ये कैसा अंधविश्वास को कस कर पकड़े पाँच- दस महिलाएं उसे घर के अंदर घसीटते ले गई और वैधव्य के कठोर और बेहूदे परंपराओं का निर्वहन करने लगी। नैना के दुर्गति करते रहे, और नैना निढ़ाल होकर जमीन में गिर पड़ी और सन्नपात से उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

            नलिनी बाजपेयी
          संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)

Wednesday, June 2, 2021

नलिनी बाजपेयी कृत लघुकथा- परामर्श

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,जिला -कांकेर, (छ. ग.)
  विषय-परामर्श,विधा-लघुकथा
          दिनाँक-02.06.21
  
              *परामर्श*
          
                सुशीला बीते दिनों को याद कर रही थी ।आज से दस वर्ष पहले इस घर में ब्याह कर आई थी।ससुराल में संयुक्त परिवार था।सुशीला अपने घर में अकेली थी ।किसी दूसरे को वह बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। घर में रोज कलह होने लगी थी। सुशीला की माँ अपनी बेटी को लड़- झगड़ कर मायके ले  आई थी।
                  कुछ दिन मायके में अच्छा लगा, मगर थोड़े दिनों बाद ही उसका मन भर गया। गाँव में दबी जुबान से चर्चा होने लगी थी कि-" पति को छोड़ कर बैठी है।"         
  उन्हीं दिनों पड़ोस की दादी माँ ने उसे *परामर्श* दिया और कहा -" *बेटी सुशीला यह घर तुम्हारा मायका  का है। शादी के बाद लड़की को ससुराल में ही रहना शोभा देता है। दुःख मिले या सुख मिले ससुराल में ही तुम्हें रहना चाहिए ,और सेवा भाव से सबका मन जीतना चाहिए।*" दादी माँ की बात सुशीला के मन में बैठ गई ।दूसरे दिन सुशीला अकेले ही अपने ससुराल चली गई। सब लोगों ने उसे अपनापन दिया।अपने व्यवहार और सेवा से लोगों के मन में समा गई।
        आज घर में उसका ही राजपाट चलता है। दो प्यारे- प्यारे  बच्चे हो गए हैं। घर स्वर्ग बन गया है। सुशीला की हर कोई प्रशंसा करता है। आज सुशीला को दादी माँ की बात याद आ रही थी दादी माँ अब इस दुनियाँ में नहीं रही। मगर उसने जो *परामर्श* दिया उसके कारण ही सुशीला का घर पुनः बस गया। वह मन ही मन दादी माँ को धन्यवाद दे रही थी..........।
                   नलिनी बाजपेयी
           संबलपुर,कांकेर, (छ .ग.)

Tuesday, June 1, 2021

नलिनी बाजपेयी कृत आलेख- विचार

रचनाकार -नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
            आलेख विषय-विचार,दिनाँक-01.06.21

                 *विचार*

                 *मन में "सही,गलत,तर्क वितर्क करते हुए सोचना,समझना ही विचार कहलाते है।*"
            किसी भी विषय पर अपनी सोच प्रकट करना भी विचार कहलाता है।

              संसार में मनुष्य ही एक बुद्धिवान प्राणी है ।मनुष्य में ही सोचने,समझने और विचार व्यक्त करने की क्षमता होती है। जीव - जंतुओं में सोचने, समझने बोलने विचार करने की क्षमता नहीं होती है।
            मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपने विचारों के द्वारा अपने  को चाहे आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँचा दें, या जीव- जंतुओं के समान जीवन यापन करने को  मज़बूर होता है। विचारों से व्यक्ति महान बनता है और लोगों के मार्गदर्शक भी बन जाते हैं।
             किसी भी विषय पर अलग-अलग व्यक्तियों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं। यदि किसी  विषय पर हमारे विचार या  सोच सकारात्मक होगी, तो किसी की सोच नकारात्मक भी हो सकती है।     
             किसी भी विषय पर  शब्दों, उदाहारणों, तथ्यों तथा अपने अर्जित ज्ञान के आधार पर अपनी बात को रखना ही विचार कहलाता है। यह  गद्य और पद्य दोनों में हो सकते हैं ।भाषा स्वतंत्र और सार्थक प्रवाह शैली में होती है।  किसी भी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, एवं दर्शन आदि के क्षेत्रों  में कोई विचार या चिंतन करना है।वह स्वतंत्र विचार कहलाता है। अगर हमारे विचार अतार्किक होंगे, विज्ञान सम्मत ना होंगे तो हमारे विचारों की आलोचना होगी ।अगर हम तथ्यात्मक बातों को  ध्यान में रख कर लेखन करते या विचार लिखते हैं, तो सत्यापित करने वाली कोई बात नहीं होती है।  लोग स्वतः ही उस विचार को स्वीकार कर लेते हैं।
               हमारे विचार यदि तथ्यात्मक होंगे तो, आज के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता की बात होती है। विश्व के बड़े-बड़े विचारक, दर्शन शास्त्रियों के लेख समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं। जैसे -"महात्मा गाँधी, मार्टिन लूथर किंग, विवेकानंद नेल्सन  मंडेला, के विचार पूरे विश्व को प्रभावित करते हैं । उनके विचारों से मनुष्य का सर्वांगीण विकास के साथ आदर्श चरित्र एवं आदर्श नागरिक  का निर्माण कर उसे स्वालंबन की ओर ले जाना होता है।

 विचार से व्यक्ति बनते महान।

अच्छे विचारों से करें राष्ट्र- निर्माण।

मानवोचित विचारों से होता
 सदा ,

   विकास और जनकल्याण।            

             नलिनी बाजपेयी
       संबलपुर, कांकेर( छ. ग.)

Monday, May 31, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- प्रहरी

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
    संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ.ग.)
               विषय-प्रहरी
           दिनाँक-31.05.21
*~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~*
              *प्रहरी*

मैं भारत का सजग प्रहरी! 
तिरंगे की आन पर मिटता। 
तेरे रज में पला बढ़ा तेरी 
शान पर मैं हरपल मरता।

तेरे चाहे कितने भी संकट आए 
सरहद पर रहते सीना ताने।
तेरी आन बान बचाने हम 
बर्फ में खड़े रहते  बेगाने ।।

ऊँचे-ऊँचे पहाड़,उठती 
सागर की लहरें विशाल।
कंटक भरी राहों में चलते 
ताकि उन्नत रहे तेरा भाल।।

चाहे बाढ़ हो या सुनामी 
या उठे सागर में तूफान ।
कोई बुरी नियत से देखे तुझे 
आता है खून में उफान ।।

बम गिरे,बंदूक चले या 
चले गोलियों की बौछार। 
नापाक इरादों वालों से 
लड़ने को रहते सदा तैयार।।

सभी भाषा,बोली,जाति, 
धर्म पर लुटाते अपनी जान ।
तिरंगा की रक्षा के लिए 
होते रहते सदा कुर्बान ।।

         नलिनी बाजपेयी
    संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Saturday, May 29, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना - अभिमान

रचनाकार -नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, कांकेर,( छ.ग.)

           विषय-अभिमान,
            विधा-छंदमुक्त    
          दिनाँक-29.05.21
*~~~~~~~~~~~~~~~~~*
              *अभिमान*

देश, धर्म,जाति,पर 
मुझको है अभिमान ।
विश्व बंधुत्व और 
वसुधैवकुटुम्बकम का विचार महान।।

यहाँ की गौरव गाथा 
गाएं सकल जहान ।
यूँ तो सारा विश्व है, 
मगर मेरा भारत है महान।।

एकता,सौहार्द्र,भाईचारा, 
प्रेम का गाएं सदा गान ।
धैर्य,संयम,सहयोग,
दया का करता सदा बखान।।

हिंदू,मुस्लिम,सिक्ख, 
ईसाई है धरा की शान।
वेद,पुराण,कुरान,बाईबिल 
गुरु ग्रंथ की महिमा महान।।

हर बार जन्म लूँ तेरी गोद में 
यही है अरमान ।
त्याग,समर्पण की गाथा सुन 
मन हो जाता कुर्बान ।।

वीरों की यह भूमि 
जग करता इसका गुणगान।
जन्म लिया हूं माँ भारती 
करता हूँ इस बात पर अभिमान।।

       नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Friday, May 28, 2021

नलिनी बाजपेयी कृत आलेख - मोह

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
    विषय-मोह,विधा-आलेख
        दिनाँक-28.05 .21

                  *मोह*

            मोह मन की वह भावना है जो वस्तु विशेष के प्रति व्यक्ति को हर पल उसे अपनी ओर आकर्षित करते रहता है। हर हाल व्यक्ति  उस वस्तु को पाना चाहता है ,या अपने पास बने रहने देना चाहता है। वह हमारे मन को बार-बार चुंबक की भाँति अपनी ओर आकर्षित करता है ।
            आदमी अच्छे से जानता है कि, माया मोह सब मानसिक विकार है ।मनुष्य के मन में सात्विक, राजस, और तामस मूल प्रकृति पाई जाती है। इस संसार में कुछ पदार्थ या चेतना रहित वस्तु और व्यक्तिगत सुख-दुख ही मोह का प्रमुख स्रोत हैं। ऐसे ही जड़ पदार्थ ही मोह का कारण बनता है।  *व्यक्ति की अज्ञानता के कारण किसी वस्तु के प्रति लगाव की पराकाष्ठा ही मोह का प्रकट रूप है। नश्वर संसार,या नाशवान वस्तुओं के प्रति आसक्ति ही  मोह कहलाता है।*  किसी को धन दौलत अर्थात काया, किसी को माया के प्रति आसक्ति होती है वही मोह है।

        अगर हमारे पास कोई वस्तु है और खो गई है तो हमें बहुत दुःख होता है, क्योंकि वह हम से जुड़ा होता है। इसी तारतम्य में यदि  हमारी खोने वाली वस्तु से भी अधिक महंगी किसी और की वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है, तब हमें  दुःख नहीं होता। हमारी छोटी चीज का नष्ट होना भी हमें कई दिनों तक परेशान किए रहता है, और किसी की जिंदगी भर की पूरी कमाई नष्ट होते देख कर भी हमें दुख नहीं होता ।कहने का तात्पर्य है कि, "मोह" अर्थात अज्ञानता या  सम्मोहन होना, अर्थात स्वयं के साथ संबंध होना ही मोह कहलाता है। अपनी वस्तु के खोने का दुःख हमें बहुत होता है,और पराए का बड़ा नुकसान भी हमें दुःखी नहीं करता। अर्थात वस्तु से मोह नहीं बल्कि हमारे मन के अंदर यह भाव होता है,अर्थात *जहाँ  " *मैं, मेरा* " *है वहीं मोह होगा। *मोह में जब व्यवधान होता है तो व्यक्ति को क्रोध होता है, लोभ होता है, और अहंकार भी होता है, और यही पतन का कारण बनता है।*

        कहने का तात्पर्य है मोह बुरी बात है।मोह से हमारा अपकर्ष होता हैं।पतन होता है।
   
            नलिनी बाजपेयी
        संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)

Wednesday, May 26, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना-दिवास्वप्न

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर (छ. ग.)

           दिवा स्वप्न

           दिवा  स्वप्न
 
नींद में सपनों का 
       आना लगता है सुहाना। 
मगर दिवास्वप्न भी 
         लगता है एक नजराना ।।

 उम्मीदें और ख्वाहिशें
          बुनते रहे एक-बाना।
 सपनों को साकार कर
           कुछअलग कर सके यह
 जग को है दिखलाना।। 

परिंदों का दम लिए दिवास्वप्न 
          में बुलंदियों को चाहते हैं छूना। मेहनत करेंगे और धैर्य, साहस, 
          विश्वास का जादू है दिखाना।।

सपनों के छाँव मिले, 
         उम्मीदों का लौ जलने लगे।
राहें भले कठिन हो
        मगर दिवास्वप्न  पले।।

 सुनहरे दिन, चाँदी सी  
          रातें मन में लगाता है आघातें। 
मगर दिवा स्वप्नों को पूरा 
          करने सहते हैं सब बातें।।
_____________________

        नलिनी बाजपेयी
    संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)

Monday, May 24, 2021

नलिनी बाजपेयी के दोहे- जीवन

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
   विषय-जीवन,विधा-  दोहा
      दिनाँक-24.05.21

          *जीवन* (दोहा)

जीवन सरिता नेह की,खुशियाँ     बाँटो यार।
प्रेम की उठती लहरें,सुखी रहे हर द्वार।।

जीवन में साँसे मिली,कर ले उससे प्रीति।
साँसों से रिश्ते जुड़े,तब बनता मनमीत।।

जीवन फूलों सा सदा,खिले और मुस्काय।
संकट से डरना नहीं,जग तब लगे सुहाय।।

जीवन में तुम हो सुखी,महको बनकर गन्ध।
राहों के काँटे चुनो,भरो जग में सुगन्ध।।

          नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)

Friday, May 21, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- माँ

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
       विषय-    माँ
        दिनाँक-21.05.21
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माँ हूँ,जगती पर मेरा,
  प्रभाव है समाया।
 बच्चों पर मेरी ममता,
 हर पल नजर आया।।

मुझे मातृत्व का 
एहसास कराया ।
जीवन में संपूर्णता का 
भान हो आया ।।

आ तुझे बाँहों में 
भर कर नेह से भर दूँ ।
तेरे हर अरमानों पर 
हर सुख वार दूँ ।।

जग की ऊँची-नीची 
राहों में चलना सिखा दूँ ।
क्या होती है दुनियाँ ?
उस चलना सीखा दूँ ।।

हाथों में उठा तुझे 
आसमां की सैर करा दूँ ।
तेरी किलकारी सुन 
सब बैर भाव भूला दूँ ।।

तूने जन्म लेकर 
मुझको है निहाल किया ।
तेरी तुतली बोली,घुटनों के बल 
चलने ने मुझे खुशहाल किया ।।

तेरी मुस्कान मेरी जान है 
जग को बदला दूँ ।
माँ जैसी जग में कोई नहीं 
जग को समझा दूँ ।।

तू प्यारा,मेरी आँखों का 
तारा,राज दुलारा है ।
इस जग में कोई नहीं 
तुम्हीं मेरा सहारा है ।।

सदा खुश रहे,गगन चूमे, 
आशीष हमारा है ।
जीवन पथ पर बढ़ता जाएं,
यह आस हमारा है ।।

       नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Thursday, May 20, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- हरी-भरी वादियाँ

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ. ग.)
    विषय- हरी -भरी वादियाँ
           दिनाँक-20.05.21
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          *हरी भरी वादियाँ*

हरी-भरी वादियाँ पर्वत 
ऊँचे और विशाल ।
कल कल बहती धवल निर्झरिणी 
चूमती धरा के भाल ।।

गगन चूमता पर्वत अद्भुत दृश्य, 
देख जग होता निहाल ।
लगती प्रकृति सुंदर किंतु 
उर में समेटे है भूचाल ।।

गिरता झरना बीच में 
करता झील का निर्माण ।
ऊँचे-ऊँचे देवदार संग औषधियों को 
गर्भ में समेटे करता जग कल्याण ।।

झील से निकली जलधाराएं 
सुषमा छाई है अपार।
अद्भुत,अनुपम,मृदु, मनोरम दृश्यों से 
स्वर्ग का सपन करते साकार ।।

युगों-युगों से अचल खड़ा 
पर्वत डिगता नहीं पथ से।
बाधाएं आएं कितनी भी, 
गिरा नहीं दृढ़ता के रथ से ।।

पर्वत की उर से कई नदियाँ 
धरा पर है उतरती।
शस्य श्यामला वसुधा के 
आँचल में नई ऊर्जा है भरती ।।

पर्वतों पर उपत्यकाएं सुंदर, छोटे-बड़े 
पौधों और पुष्पों से भरी घाटियाँ । 
जीवन रक्षक औषधियों से 
भरी अद्भुत क्यारियाँ।

      नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Friday, April 16, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- जहाज़

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ.ग.)
      विषय-जहाज,
            दिनाँक-16.04.21

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              *जहाज*

धरा से गगन तक तो 
मैं ही हूँ जाता ।
नीले नभ में अपना 
वर्चस्व हूँ दिखाता।।

जन-जन को एक कोने से 
दूसरे कोने क्षण में पहुँचाता।
मैं ही हूँ जो देश के विकास 
की गाथा सबको बताता।।

वेद पुराणों में पुष्पक 
विमान का जिक्र है आता।
कलयुग में वही हवाई या 
पानी जहाज है कहलाता।। 

अनुसंधानकर्ताओं ने 
खोज है निकाला।
नभ के संग जल में 
चलाने नौकायान बनाया।।

हजारों किलोमीटर की दूरी 
घंटों में पूरी करवाता।
समय शक्ति बचा
अपना महत्व है बतलाता।

अद्वितीय लड़ाकू 
विमानों का निर्माण कर 
देश अपनी
ताकत है दिखलाता।।

दुश्मन भी देख काँप उठे ऐसा 
नभ और जल में लोहा मनवाता। 
सागर का सीना चीर एक महाद्वीप 
से दूसरे महाद्वीप तक पहुँचाता।।

      नलिनी बाजपेयी
 संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Monday, April 12, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- गवेजा

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
    संबलपुर,जिला-कांकेर,( छ.ग.) 
       विषय-गवेजा
            दिनाँक-12.04.21
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                 *गवेजा*

रिश्तों को जिंदादिल बनाएं 
रखने के लिए गवेजा जरूरी है ।
सन्नाटे में होती नहीं गुजर
संवाद हीनता खत्म करना जरूरी है।। 

अभिव्यक्ति जीने के लिए 
बहुत  ही जरूरी है। 
मौन अधरों से संवादों का
पर्दा हटाना भी जरूरी है।।

दर्द है गर सीने में, 
अश्क भी  बहते हैं ।
जख्मों पर अश्रु धार 
बहाना भी जरूरी है ।।

जिंदगी खुशहाल रहे 
सीने से बोझ उतर जाएं।
संवाद हीनता के दौर में 
तकरार करना भी जरूरी है।।

कोई किसी से अगर 
ना बोले, ना देखें।
वाणी की यह सबसे 
बड़ी मजबूरी है ।।

जीवन डोर टूटने लगे, 
पीड़ा को वाणी ना मिले।
तब मन का अवगुंठन खोल 
शब्दों की स्वर देना भी जरूरी है ।।

संवादों पर विराम लगा 
कर भी कोई जीता है ।
विवादों के समाधान के लिए 
संवाद *गवेजा* जरूरी है ।।

संवाद समर्पण मिठास 
भरा होता रहे ।
ब्रह्मांड की निरन्तरता के 
लिए संवाद जरूरी है।।

भावों की पूर्णता बिन 
भाषा के पूरी नहीं होती।
मौन को मुखर करने के लिए 
संवादों का होना जरूरी है।

      नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Saturday, April 10, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- खगंगा

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर, जिला-कांकेर, ( छ.ग.) 
       विषय-खगंगा,
            दिनाँक-10.04.21
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                *खगंगा*

विस्तृत नभ में सारे ग्रह,नक्षत्र,
पुच्छल तारा,उल्का पिंड समाते।
झिलमिल करते सब 
खगंगा में गोते है लगाते।।


सर्पिल खगंगा, क्षीरमार्ग,
आकाश गंगा भी कहलाते।
अपने में सैकड़ों अरबों तारे 
और ग्रहों को छूपाते।।

सौरमण्डल इसका पूरा चक्कर 
करोड़ों वर्ष में लगाते।
सैकड़ों आकाश गंगा,
निहारिकाएं ब्रह्मांड में पनाह पाते।।

विस्तृत,अथाह,असीमित ब्रह्मांड के 
कई ब्रह्मांडों को समझ ना पाते।
नक्षत्रों से भरी आकाश गंगा 
दिव्य ज्योति पूँज कहलाते।।

अपने दायरों में सिमटे खगंगा
कल्पना से परे नजर आते।
जलती बुझती निहारिकाएं 
मानव को नव पथ दिखा जाते।

        नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

Friday, April 9, 2021

नलिनी बाजपेयी की रचना- कादम्बरी

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
    संबलपुर,जिला-कांकेर, ( छ. ग.)
      विषय-कादम्बरी,    
         दिनाँक-09.04.21
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            *कादम्बरी*

कोयल कुहूकिनी,पीक, 
बसंतदूत बैठी हैआम्र मंजरी। 
लेकर आती मधुमास का संदेशा 
ऐसी हो तुम कादंबरी।।

तन काला पर कोकिल कंठी 
नाम तुम्हारा है मधु रागिनी ।
तेरी मीठी कुहू कुहू की बोली
 लगती है प्राण दायिनी।

मदमाती सुगंध लिए 
आता है मास  बसंत।
पत्ते सारे झड़ गए,नव पल्लव ने 
बतलाया आया पतझड़ का अंत।।

अमवा की डाली पर बैठी 
कोयलिया गाती गीत हो मन मतंग।
मधुप का गुनगुन,तितलियों 
का डूबा है मन तरंग ।।

 गूँज उठा दिग-दिगंत भोर में 
आई कोयलिया की आवाज ।
नव पल्लव,नव कोपलें 
तरु का करती है साज ।।

अलौकिक आनंद लिए 
ऋतु बसंत है आई ।
कादंबरी छेड़ रही तान 
प्रकृति भी है मुस्कुराई।।

      नलिनी बाजपेयी
  संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...