Showing posts with label उर्मिला सिदार. Show all posts
Showing posts with label उर्मिला सिदार. Show all posts

Saturday, June 12, 2021

श्रृंगार : उर्मिला सिदार

रचयिता -उर्मिला सिदार 
विधा -कविता (छंद मुक्त)
शीर्षक-श्रृंगार पर स्वर विवेक से रचना
शीर्षक-"श्रृंगार"
दिनांक -12/06/2021
*************************
         *श्रृंगार*

ब्रह्मा का श्रृंगार ब्रह्मांड ।
ब्रह्मांड का श्रृंगार प्रकृति ।
प्रकृति का श्रृंगार  रीति। 
जगत का श्रृंगार संस्कृति। 

धरा का श्रृंगार समृद्ध ।
मिट्टी का श्रृंगार उर्वरा ।
वन का श्रृंगार हरियाली।
सार्वभौम श्रृंगार वसुंधरा।

शरीर का श्रृंगार स्वस्थ। 
आत्मा का श्रृंगार ज्ञान ।
जीवन का श्रृंगार भाव।
राज्य का श्रृंगार विधान।
 
पति का श्रृंगार श्रम ।
घर का श्रृंगार स्वच्छता।
पत्नी का श्रृंगार सेवा।
जिंदगी काश्रृंगार व्यस्तता।

फूल का श्रृंगार खुशबू ।
आँख का श्रृंगार  प्यार। 
संगीत  का श्रृंगार  राग।
वाणी का श्रृंगार  मृदु।
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ छत्तीसगढ़

Friday, June 11, 2021

हम कविता क्यों लिखते हैं? : उर्मिला सिदार

रचयिता- उर्मिला सिदार 
विधा- आलेख
विषय -"हम कविता  क्यो लिखते है।"
दिनांक -11/06/2021
*************************

*हम कविता क्यों लिखते हैं।*

कविता साहित्य जगत की एक विधा है। मानव जो भी क्रिया कलाप प्रकृति और मानव के साथ भावात्मक संज्ञानीयताएं
 होती है ।उसे लोगों तक पहुंचाने की माध्यम के अंतर्गत जो भी तत्व होते हैं, उसे विधा कहते हैं। और भावों के पहुंचाने के जितने प्रक्रियाएं हैं ,उस प्रक्रिया का नाम साहित्य है। साहित्य जो सभी अर्थात अस्तित्व के हित के लिए किया गया कार्य जो ,सभी के शुभ के अर्थ में लिखी जाती है, साहित्य कहलाती है। जिसे सामान्य भाषा में सभी का हित कहा जा सकता है। साहित्य लिखने वाले साहित्यकार अपनी कल्पनाओं के माध्यम से अनेक विधाओं में भावों को प्रस्तुत कर जन मानस तक पहुंचाने का कार्य करता है। साहित्य लेखन में नकारात्मक और सकारात्मक, नकारात्मक का एहसास और सकारात्मक का अनुभव को मौखिक, लिखित, सांकेतिक माध्यम से व्यक्त करता है। इन्हीं विधाओं में से एक विधा कविता है ।कविता को  पद्य भी कहा जाता है।कविता में विस्तृत भावों को संक्षिप्त कर ध्वनि  तुकांत माध्यम से रसों के साथ बयां किया जाता है। भावों के साथ-साथ मधुर ध्वनि का भी मनोरंजन होता है, जो सीधा अंतर्मन की गहराई तक जाता है। कविता के माध्यम से जो भाव का अनुभव सूचना रूप में मिलता है। उस सूचित भावों को जीवन प्रेरित होकर जीवन में प्रमाणित कर जीने से, जीवन में समस्या से मुक्ति और भाव के साथ मुक्ति होकर सुखमय जिंदगी जिया जा सकता है। कविता मात्र प्रिय नहीं होता, कविता में लिखी भावों को समझ कर अपनी जिंदगी में आत्मसात करना होता है। यदि ऐसा मन में नकारात्मक का एहसास कर सकारात्मक सोच में परिवर्तन देखने के लिए मिलता है, तो यही कविता का उद्देश्य है। कविता सिर्फ लोगों का मनोरंजन नहीं ज्ञान वर्धन और प्रेरणादाई होता है। साथ-साथ कविता के माध्यम से कवि या कवित्री के भावों को भी पढ़ा जा सकता है। भावों को जनमानस तक सभी की हितार्थ हेतु कविता लिखा जाता है। विभिन्न घटाओं, मूल्यों, सौंदर्य, आदि के बारे में कविता लिखकर भावों को उकेरा जाता है। यही कविता लिखने का सार्थकता है।
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Thursday, June 10, 2021

कैफियत : उर्मिला सिदार

रचयिता - उर्मिला सिदार 
विधा - आलेख
विषय - कैफियत 
दिनांक - 10/06/2021
*************************
              *कैफियत*
कैफियत उर्दू शब्द है ।कैफियत का अर्थ ,घटना के आधार पर अनेक शब्दों में व्यवहृत किया जाता है। कैफियत शब्द का प्रयोग सूक्ष्म रूप से देखा जाए तो, कोई घटना सही होते हुए  उस पर विश्वास न कर ,उसे नकारात्मक उलाहना के रूप में व्यक्त करने पर वहां यह शब्द सुनने को मिलता है  कि इस बात की कैफियत आपको देना पड़ेगा या भुकतना पड़ेगा। इससे यह बात समझ में आती है  कि कैफियत से स्पष्टता व्यक्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। चाहे घटना सकारात्मक हो या नकारात्मक ,उस घटना की कैफियत से बयां की जाती है।चाहे कोई भी काल में घटित हो, घटना  उसका क्रम में विवरण स्पष्ट रूप से वर्णन करने की क्रिया या भाव का नाम कैफियत है।
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Wednesday, June 9, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- अकिंचन

रचयिता- उर्मिला सिदार
 विधा-कविता (छंद मुक्त) 
विषय -अकिंचन 
दिनांक -09/06/2021
*************************
 
     *अकिंचन*

माता तुम्हारे चरणों में ,
मैं शीश झुकाती हूँ।
तेरे ममता की आंचल में, 
मै दुनियाँ बसाती हूँ।

मै ऋणी अकिंचन माता।
तेरा ऋण कैसे मैं चुकाऊँ।
श्रम सेवा बलिदान देकर ,
तेरी फर्ज अदा कर पाऊँ।

माँ मान रहे सम्मान रहे,
मैं गीत तुम्हारी गाती हूँ ।
तेरे रज कण एहसान को, 
माँ मै भूल नही पाती हूँ। 

कर्ज तुम्हारे बहुत है माता, 
मै कर्ज कैसे चुका पाऊँ।
मै तुच्छ अकिंचन मानव हूँ,
तेरा उपकार कैसे कर पाऊँ।
**********************
उर्मिला सिदार रायगढ छत्तीसगढ़

Tuesday, June 8, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- व्यवहार

रचयिता -उर्मिला सिदार 
विधा-कविता (छंद मुक्त) 
विषय-"व्यवहार"
दिनांक-08/06/2021
@@@@@@@@@@@@
         
    *व्यवहार*

अचार व्यवहार जो करें ,
सो नर सुख समृद्धि पाय। 

भ्रमित मनुज भ्रम में डूब,
क्लेश पीर नेवता बुलाय।

भौतिकता से संतुष्टि न मिले,
संतुष्टि मिले नेक शिष्टाचार।

संबंध भावों में जी कर जन, 
स्नेह , सम्मान  पाय अपार ।

न्याय, धर्म अपना कर मनु, 
करो मानवीयता संग प्रीत ।

मनु में स्नेह निष्ठा बना रहे ,
यही है भव जगत की रीत ।

सुख- शांति में परिवार बसे ,
बसे मानव में प्रेम व्यवहार ।

नेक व्यवहार से संतुष्टि मिले,
जग,जन मानस पाएं सत्कार। 

*************************
उर्मिला सिदार रायगढ छत्तीसगढ़

Monday, June 7, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- तेजस

रचयिता -उर्मिला सिदार 
दिनांक-07/06/2021
विधा-कविता(छंद मुक्त)
विषय-"तेजस"
====================

            *तेजस*

धीरता ,वीरता ,उदारता से,
दया ,कृपा, करुँणा बहाइये। 
मन की आवेश खो कर मनु, 
जग में तेजस जीवन बनाइये।

तन,मन,धन सदुपयोग कर,
जीवन पथ सार्थक बनाइए।
संवेदनाएं संतुलित कर नर, 
तेजस  जिंदगी बिताआए।  

सुख ,शांति ,संतोष ,आनंद ,
अंतस मे ज्ञान मूल्य बनाइए।
प्रेम ,स्नेह भाव तेजस कर,
संस्कारीक समाज बनाइए। 

चित्त , बुद्धि  से अहंकार त्याग,
मन, वृत्ति सेअभिमान भगाइए।
आत्मा की ज्योति तेजस कर,
दिव्य ज्योति से परमानंद पाइए।
***********************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Thursday, June 3, 2021

उर्मिला सिदार कृत रेखाचित्र- अंधविश्वास

लेखिका - उर्मिला सिदार
दिनांक - 03/06/2021
विधा - रेखा चित्र
विषय - अंध विश्वास
*************************
      **//अंध विश्वास//**
मैं दरवाजे खड़ी मेरी पोती की आने का इंतजार कर रही थी।दूर से लड़खड़ाते चाल में आहिस्ता- आहिस्ता आगे बढ़ पांव चला रहा था। सामने आने से देखी मुकुंद था ।मेरी पड़ोसन का बेटा मै पास जाकर आवाज दी सुना, मगर उसका जवाब देने में मन नहीं बना। मै उसकी स्थिति देख भाँप गयी ,कि इसका तबीयत ठीक नहीं लग रहा है और मै तुरंत उस का बस्ता लेकर सहारा देकर घर पहुंचायी ।उसकी माँ को आवाज लगाई, आवाज सुनते ही झट से आई ।मुकुंद की हालत देख कर हकलाई, तुरंत खाट में लेटा कर मुकुंद से पूछने लगी और शरीर की तापमान चेक की तो आग की तरह उसका बदन जल रहा था। मुकुंद की माँ तेल लाकर हाथ पैर में तेल डाली और अपने गाँव की ओझा को बुलाने भेजी, मै उसे ओझा बुलाने के सिवाय डॉक्टर को दिखाने के लिए बोली वह प्राथमिकता नहीं दी, मै वही ठहरी रही, कुछ देर बाद मुकुंद को कप कपी आया और पानी -पानी चिल्लाने लगा, और ठंड लग रही है ।मुझे बिस्तर ओढ़ा दो बोला। उसकी माँ बिस्तर ओढ़ाई कुछ देर बाद पसीना आने से बुखार उतर गया ।तब तक ओझा आया सारी घटना सुन कर कहा। कुछ नज़र लगा है, नारियल लाओ मै फ़ूक झाग कर दूँगा कह कर बच्चे की शरीर छू कर बोलने लगा अभी बुखार नहीं है ।मेरे आते ही बुखार उतर गया  कह कर नारियल पकड़ कर भभूत से मंत्र पढ़ कर फ़ूक कर चला गया।मै स्थिति ठीक होने से घर आ गयी ।कुछ देर बाद मुकुंद को पुनः कपकपी से बुखार चढ़ने लगा ।मुझे उसकी बहन ने घर बुलाने गयी थी।वह। बुखार के बारे मे बतायी। मै तुरंत आई और मुकुंद की माँ से बोली जितनी जल्दी हो सके इसे डॉक्टर के पास ले जाओ ।यह मलेरिया है ।ओझा के चक्कर मे मत पड़ो ।यह सब अंध विश्वास है। इसके चक्कर में रहोगे तो और मुसीबत में पड़ जाओगे ।तब तक मुकुंद के पिता जी आ चुके थे।
 डॉक्टर के पास ले जाने का निर्णय लिए और और डॉक्टर के पास ले गए ।वहां अच्छे से मलेरिया का ईलाज हुआ। पांच दिन बाद मुकुंद स्वस्थ्य हो कर घर लौटा, मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था ।आंटी जी आपको बहुत- बहुत धन्यवाद, आपके वजह से आज मैं , जल्दी स्वस्थ हो कर घर  लौट, आया।
            अंध विश्वास हमेशा समस्या उत्पन्न करता है अतः सही समाधान क्या हो सकता है। इस पर अमल करने से अर्थात सही को जान कर उसी संदर्भ में कार्य किया जाता है, तो सफलता ज़रूर मिलती है।
                                    उर्मिला सिदार
                                रायगढ़, छत्तीसगढ़
*********************************

Wednesday, June 2, 2021

उर्मिला सिदार कृत लघुकथा- परामर्श

लेखिका -उर्मिला सिदार 
विधा-लघु कथा 
विषय-परामर्श
दिनांक -02/06/2021
*************************
              *परामर्श*

 आज सुबह 7:00 बजे मोबाइल से रिंकी की आवाज सुनकर मोबाइल उठाई।  महासमुंद वाले शिवकुमार भैया का  था। दुआ सलाम  के बाद भाई जी से रिंग करने का आयोजन पूछी। भाई जी  उत्साह  के साथ बोले दीदी  हम लोग 2 एकड़ जमीन खरीद रहे है ,तोआपसे  आर्थिक सहयोग और उसे कैसे उपयोगी बनाया जाए।  इस लिए आपकी परामर्श और प्रेरणा की आवश्यकता है।  इसीलिए आपको याद किया। मुझे यह खबर सुन बहुत अच्छा लगा। मैं उन्हें शुभकामनाएं देते हुए ,बोली- भैया आर्थिक सहयोग अपनी क्षमता के अनुसार जरूर करूंगी। आप क्या लगाना चाहते हैं ?जमीन की गुणवत्ता कैसी है ?उसी के आधार पर मैं आपको परामर्श  दे पाऊँगी।  भाई जी ने बोला दीदी  आप एक दिन हमारे यहां आइए ना। आप खुद देख लेते तो अच्छा होता है ।मैं ठीक है भाई जी बोलकर कुछ समय बाद, समय निकालकर एक दिन  पूर्व सूचना देकर मैं  महासमुंद पहुंच गई ।मुझे देखभाई जी का खुशी का ठिकाना न रहा ।आव भगत हुई और हम लोग प्लाट देखने चले गए ।रात में योजना के बारे में चर्चा किए। आर्थिक सहयोग भी की और उसका जमीन आज
बारह मास हरा भरा रहता है। भाई जी को जब भी बोलने का मौका मिलता  बोलता है -दीदी आपके  दुआ,  परामर्श  और प्रेरणा का परिणाम  है। आज मै अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर अन्य लोगों के लिए उपयोगी हो पा रहा हूं। आप सभी के  दुआ से मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूं।इसी तरह आप हमेशा उपकार भाव बनाए रखिएगा बोलता है।  आज वह शुकुन के साथ जी रहा है।
            सकारात्मक परामर्श लोगों की जिंदगी बदल देती है। अतः सकारात्मक  सोंचऔर परामर्श हमेशा सफलता की गंतव्य तक पहुंचा देती है ।अतः किसी भी अपेक्षित परामर्श पर जरूर ध्यान देना चाहिए क्योंकि सर्व सुख में मेरा सुख समाया हुआ है ।अर्थात सभी की सुखी होने से  संतुष्टि मिलती है। अत एव सकारात्मक  परामर्श  जरूर देना चाहिए।
      
*************************
 उर्मिला सिदार, रायगढ़ छत्तीसगढ़

Tuesday, June 1, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- विचार

रचयिता - उर्मिला सिदार
विधा-  आलेख 
विषय - विचार 
दिनांक - 01/06/2021
*************************
                *विचार*
विचार जीवन का एक वास्तविक वस्तु है ,जो सूक्ष्म भाव को प्रकट करती है। मानव दो वास्तविकता का बना है ।शरीर और मन, मन अर्थात जीवन, मन को ही जीवन नाम से अभिहित किया जाता है। शरीर+जीवन= मानव स्वरूप है। शरीर से कार्य और जीवन में समझ होती है। जिस तरह कई अंगों से मिलकर शरीर का स्वरूप बना है ।ठीक इसी तरह जीवन पांच अंशों का बना है ।जो उनेक क्रियाओं से पहचाना जाता है। दिखता नहीं शरीर से व्यक्त होने से एहसास किया जाता है। जिस तरह हवा दिखता नहीं एहसास किया जाता है। ठीक उसी तरह जीवन की अशों को देखा नहीं समझकर एहसास उनकी क्रियाओं से किया जाता है। जीवन का मध्यांस आत्मा, उसके प्रथम परिवेश में बुद्धि,द्वितीय में चित, तृतीय में वृत्ति और चतुर्थ में परिवेश में मन होता है। इस तर 5 अंशों से बना जीवन को शरीर से व्यस्त होने से पहचानते हैं। जीवन का अर्थ है जीव+न = न्याय ,हर मानव का जीवन न्याय पूर्वक जीना चाहता है और निरंतर जीना चाहता है, इसलिए परंपरा में जीवन का एक नाम अमर आत्मा है ।क्योंकि जीवन(आत्मा)कभी मरती नहीं है ,अमर है। उसी जीवन का एक अंश वृत्ति है ,जो हम सोच विचार करते हैं ।वह वृत्ति का कार्य है अतः हम सही गलत जो भी विचार करते हैं ।वह जीवन की वृत्ति है ।वृत्ति में 6 दृष्टि से विचार उद्भवित होते हैं। प्रिय, हित,लाभ विचार और दूसरा न्याय,धर्म,सत्य, विचार 6 विचारों को वृत्ति संचालित करता है। प्रिय, हित, लाभ विचार शरीर सापेक्ष होता है  और न्याय, धर्म, सत्य, विचार आत्म(जीवन) सापेक्ष होता है। वर्तमान समाज में वृत्ति का विचार ज्यादा तर प्रिय,हित, लाभ की तरफ उन्मुख है।अर्थात शरीर सापेक्ष है‌। वर्तमान में मानव जो भी व्यवहार कार्य कर रहा है, शरीर के लिए कर रहा है। शरीर भौतिक वस्तु है। और इसके पूर्ति के लिए कार्य करना भी भौतिक वस्तु है। वर्तमान में इन्ही भौतिक  वस्तुओं को श्रेष्ठमान कर ही  जी रहे हैं जो क्षणिक सुविधा से सुख भाषता है। हर पल सुविधा की निरंतरता नहीं है ।सुविधा सामायिक, मात्रात्मक है ।इसीलिए मानव साधन संपन्न होते हुए दुःखी है। दूसरा वृत्ति का कार्य न्याय, धर्म, सत्य है ।इसका तो वर्तमान समाज में अता पता ही नहीं है। सिर्फ भाषा रूप में सुनने के लिए मिलता है ,प्रमाण नहीं। न्याय पूर्ण व्यवहार, धर्मपूर्ण विचार, सत्यपूर्ण सहअस्तित्व होता है। मानव- मानव के साथ व्यवहार भावपूर्ण होता है।समाधान के लिए विचार होता है ।जब भी मानव कोई भी व्यवहार कार्य करता है ।तो समाधान के लिए करता है ,न की समस्या के लिए। क्रिया की उपयोगिता की समझ न होने से कार्य व्यवहार असफल हो जाता है। विचार के पूर्व अनुभव, अनुभव के पूर्व ज्ञान, संपन्न होना होता है। बिना ज्ञान का अनुभव, बिना अनुभव का विचार, बिना विचार का व्यवहार, बिना व्यवहार का कार्य, बिना कार्य का सफलता(उपलब्धि)नहीं मिलती है। अतः विचार हमेशा समाधान के लिए करना चाहिए। तभी सफलता मिलती है। समाधान पाना ही हमारी लक्ष्य है। समझ से समाधान, श्रम से समृद्धि, विश्वास से अभय, सर्वतोमुखी समाधान के साथ जीना ही मानव जाति का लक्ष्य है। जिसे जागृति भी कहा जाता है।इसे मोक्ष भी कहा जाता है। बिना जागृति का मोक्ष नहीं है।अतः हम मानव जाति जब भी विचार करें हमारा, विचार व्यवस्था के अर्थ में समाधानित हो न्यायिक  हो ,सर्वमान्य हो। बिना विचार का कार्य व्यवहार होता नहीं ,अतः अपना विचार को कहां लगना है  हर मानव तय कर सकता है।विचार को प्रिय, हित,लाभ में लगाना है ,कि न्याय, धर्म, सत्य में लगाना है। यह अधिकार हर मानव के पास विचार रूप में रखा है। अतएव अपने विचार को न्याय में लगाना है अन्याय में, धर्म में लगाना है, कि अधर्म में, सत्य में लगाना है या असत्य मे, हर मानव स्वयं निर्णय लेकर विचार को प्रमाणित कर सकता है।विचार व्यवहार कार्य से श्रेष्ठ है ।अतः अपने श्रेष्ठ विचार का सदुपयोग कर जीवन सार्थक बनाना है या दुरुपयोग कर निरर्थक बनाना है ।यह स्वयं निर्णय ले सकते हैं। धर्मपूर्ण  विचार के साथ सुख- समृद्धि पूर्वक सहअस्तित्व के साथ जी सकते हैं।
                              धन्यवाद              
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Monday, May 31, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- प्रहरी

रचयिता -उर्मिला सिदार 
दिनांक -31/05 /2021 
विधा -कविता 
विषय- प्रहरी (छंद मुक्त)
*************************
              *प्रहरी*

मन  तू प्रहरी है मेरी ,
हिफाजत करती है मेरी ।
जन्म -मृत्यु तक साथ रहती,
एक पल भी नहीं बिछड़ती।

जहां -जहां जाती हूंँ ।
वहां तू चली आती है ।
मुझे ठोकरें मिलती है ,
वहां तू संभाल लेती है ।

हर पल प्रहरी बनकर ,
तू ख्याल रखती है ।
जिस दिन मरती हूँ तू,
उसी दिन मुझे छोड़ती है ।

शरीर तेरा साधन है ,
तू उससे व्यक्त होती है।
उसे संचालित कर हमेशा ,
सदा उसे साथ देती है ।
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Saturday, May 29, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- इंसानियत

दिन-शनिवार
विधा-कविता(छंद मुक्त)
शीर्षक-"इंसानियत"
*************************
*इंसानियत*

इंसानियत उसे कहते हैं,
जो मानवीयता में जीते है।
मन-तन-धन समर्पित कर,
जो औरों के लिए जीते है। 
इंसानियत............ 
विषम परिस्थितियों से लड़ने की, 
अनुभव, क्षमता रखते है।
आचारित हो नित जिंदगी में, 
समाधनित हो जीते है।
इंसानियत ...........
अपना-पराया क्लेश मुक्त हो,
सभी को गले लगाते है।
जरूरतमंदों की सेवा कर,
स्वयं संतुष्टि पाते है।
इंसानियत .................
श्रम सेवा अपना कर वह, 
इंसानियत से जीते है।
संवेदनाएं नियंत्रित कर वह,
संयमित हो रहते है।
इंसानियत...............
************************  
              उर्मिला सिदार रायगढ़

Friday, May 28, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- मोह

रचयिता - उर्मिला सिदार
विधा - आलेख 
विषय - मोह
दिनांक - 28/05/2021
*************************
                   *मोह*
मोह का अर्थ आसक्ति - किसी भी वस्तु पर पूरी तरह डूब कर अपने लिए एक आहिस्ता-आहिस्ता मौत का वातावरण बना लेना। मोह मन की क्रिया का आवेशित गति का एक स्वरूप है। जो मन व्यक्त करती है। मन में छ: आवेशों में से एक आवेश मोह है। जो सम्मोहनात्मक आवेश के अंतर्गत आता है। मन में आवेश, काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मात्सर्य छः आवेश भ्रम वश पाए जाते है। जो मानव जीवन के लिए कष्टदायक होता है। स्वभाव गति से बाहर आवेश गति में रहकर व्यवस्था में जीने के लिए बाधाएं पहुंचाता है। मोह धीरे-धीरे मन को दीमक की तरह खोखला कर देता है ।चाहे वह भौतिक वस्तु हो या जीवन से संबंधिक संबंध दोनों वस्तु सफलता, निरंतर सुख पूर्वक जीने के लिए बाधाएं उत्पन्न करती है। आशक्ति मनुष्य की नकारात्मक सोच को पल्लवित और सकारात्मक सोच की ह्रास करती है। सम्मोहन आवेश होने के कारण हर पल हर क्षण उसी में लगा रहता है ,जिसको भ्रमित मन श्रेष्ठ मान चुका रहता है और उसी में जिंदगी जीना का हठ बना लेता है। जिसका अंतिम परिणाम मन, तन, धन का दुरुपयोग वश ह्रास के रूप में प्रकाशित होता है। जो मानव के लिए कलुषित क्षण और वेदना दायक जीवन शैली होता है। मोहिनी रूप में भ्रमित मानव की अनेक जीवन प्रवृत्तियां है। इन प्रवृत्तियों में ज्यादा भय, आस्था, प्रलोभन के रूप में मन संचालित कर क्षणिक सुख की एहसास कर ,उसी में आशक्ति हो डूब जाता है। अतः मानव को यह मन की विकार छः आवेश से मुक्ति पाने की आवश्यकता है। यही मन की बाधा है ,जो भय से लिफ्त हो भक्ति से वंचित रह, जीवन को निरर्थक बना लेता है। अतः मोह से बचने के लिए वास्तविकता को जानना जरूरी है। वास्तविक यथार्थ ज्ञान न होने के कारण मन भ्रमित हो भौतिकता में आशक्ति हो जाना है। इसे ही परंपरा में चंचल मन कहा जाता है। मन अज्ञानता वश कही एक जगह स्थिर नहीं होती। शोधरत होती है।वह संतुष्टि ढुंढता रहता है।
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Wednesday, May 26, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- दिवास्वप्न

रचयिता- उर्मिला सिदार
विधा -कविता
विषय-दिवास्वप्न
दिनांक-26/05/2021
*************************
           *दिवास्वप्न*

दिवास्वप्न यूँ देखा ना करो,
समय बहुमूल्य है इसे तुम ,
व्यर्थ में गवाँया मत करो।
जिंदगी की लम्हे बड़ी दूर ,
इस दूरियों को अकर्मण्यता में, 
निरर्थक बहाया न करो ।
यह मन-तन -धन कुदरत से ,
इसे तू मुफ्त में पाया है। 
यूं ही इसे बर्बाद मत कर ,
इसे श्रेष्ठता में लगाने का ,
शुभ अवसर दिन आया है।
कोरी कल्पनाओ से जीवन में,
कुछ हासिल नहीं होता है ।
कुछ कर्मठ इंसान संघर्ष कर ,
वह लक्ष्य को पा लेता है ।
बिना लक्ष्य चलने वाला ,
दिवास्वप्न देखने वाला ,
भावी समाज के लिए एक,
उदाहरण बन रह जाता है।  
तुम दिवास्वप्न छोड़ मनु,
जिंदगी को सार्थक बना।
आए काल्पनिक विचारों से ,
एक नई इतिहास बना।
*************************
उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़

Monday, May 24, 2021

उर्मिला सिदार के दोहे- जीवन

कवयित्री - उर्मिला सिदार 
ग्राम - बुलाकी 
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़ 
विधा - दोहा छंद
विषय - जीवन
दिनांक - 24/5/2021
*************************
जीवन बीते मान से, ले ईश्वर का ध्यान।
जो सुमिरन करें मन में, आत्म में बसे ज्ञान।। 

चार दिन की जिन्दगानी, न मिलही बारम्बार।
प्रेम जगत में बांट लो, छोड़ो माया द्वार।। 

धन कमा संतुष्टि न मिले, मन जिन्दगी व्यर्थ जाय।
नित आचरण जो ना करे, अनावश्यक दुख पाय।। 

ज्ञान में मन लगाई के, कर लो मन को साफ।
प्राण उड़ जाये तन से, आत्म कर लो उद्धार।। 

दुर्लभ कठिन आत्म जीवन,जग माया संसार।
देह कभी मिले न मिले, जगत में कर उपकार।। 
*************************

Saturday, May 22, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- प्रवाह

लेखिका - उर्मिला सिदार 
ग्राम-  बुलाँकी 
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़
विषय - प्रवाह 
विधा - आलेख 
दिनांक - 22/05/2021
*************************
                *प्रवाह*
प्रवाह का अर्थ बोल-चाल की भाषा में बहाव होता है ,जो अक्सर तरल पदार्थों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन सूक्ष्मता से देखते हैं ,तो क्रिया में बहाव गति होती है। जिस स्थिति में क्रियाएं होती हैं ।उस स्थिति से परिमार्जन से गुणात्मक विकास की ओर अपनी लक्ष्य की ओर गति करने की क्रिया को प्रवाह कहा जाता है। साधारण भाषा में प्रवाह को द्रव  या तरल वस्तु के लिए इस तरह प्रयोग करते हैं। जल का प्रवाह, रक्त का प्रवाह, वायु की प्रवाह, वायु विरल है। इसका भी बहाव को प्रवाह के रूप में भाषित किया जाता है।एक स्थान से दूसरे स्थान में संचारित होने का भाव को भी प्रवाह भाषा के रूप में बोल कर प्रयोग करते हैं। प्रकृति प्रदत्त जो वस्तु का प्रवाह दिशा बने हैं ।उनमें बदलाव नहीं आता ,वह अपने निश्चित आचरण के साथ प्रवाहित होते हुए ,अपनी गंतव्य, लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रवाहित होता है। लेकिन मानव की आचरण की गति या प्रवाह देखा जाए तो, कभी उत्थान की ओर तो कभी पतन की ओर जाना होता है। मानव का भी निश्चित आचरण है। लेकिन मानव अपने निश्चित आचरण की ज्ञान न होने के कारण उनका प्रवाह कभी दु:ख कभी सुख की तरफ उन्मुख है। हर वस्तु व्यवस्थित हो कर, व्यवस्था बनाने के लिए  गति या प्रवाहित होता है ,जो अस्तित्व में निरंतर यह घटना चक्र ह्रास विकास के स्वरूप में नित्य वर्तमान विद्यमान है। अतः हर मनुष्य को चिंतन करने की आवश्यकता समीचीन महसूस की जा रही है ,कि मानव किस ओर गति करें ताकि समग्रता की व्यवस्था बनी रहे। समग्रता के व्यवस्था के लिए ही प्रवाह किया जाता है। प्रवाह लक्ष्य की ओर है। तो सुख और लक्ष्य से भटक गया तो दु:ख होना तय है। अत: हर इंसान को अपना लक्ष्य तय करना स्वयं के अधिकार में होता है। लक्ष्य तय करने के लिए प्रवाह का वेग स्तर अनुसार गतित होता है।
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Friday, May 21, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- माँ

रचयिता -उर्मिला सिदार 
ग्राम-बुलाँकी 
जिला -रायगढ(छ.ग.)
विषय-  "मांँ "
विधा-आलेख
दिनांक-  21/05/2021
दिन - रविवार
*************************
          *मांँ का मातृत्व*
मांँ का मातृत्व का तात्पर्य है-  मांँ की ममता मूल्य आचरण।
ममता भाव पोषण के अर्थ में होता है। मांँ अपनी सपूतों को प्रतिरूप भाव से स्वस्थता का ध्यान रखकर शरीर पोषण के अर्थ में ममता मूल्य का निर्वहन करती है। साथ-साथ मानसिक स्वस्थता अर्थात संस्कारिक ज्ञान व्यवहार के लिए मन का पोषण कराती है। मन और तन दोनों की स्वस्थता के लिए मांँ ममता मूल्य का निर्वहन करती है। हर औलाद को मांँ से मुख्यतः तीन वस्तु (वास्तविकता) वरदान स्वरुप मिलती है:-(1) हर मनुष्य का शरीर मांँ और पिता दोनों की सह अस्तित्व से प्राप्त होता है ।औलाद का शरीर मांँ -पिता का दिया हुआ स्वरूप है। औलाद की शरीर में मुख्य रूप से माता-पिता का हक रहता है।
(2) माता अपनी औलाद की शरीर पोषण का ध्यान नि:स्वार्थ भाव से उसकी स्वस्थता की कामना के साथ निर्वहन करती है। (3) मांँ हर पल, हर क्षण अपनी औलाद के प्रति शुभकामना करती है। कि इस संसार में मेरा औलाद परिवार, समाज में विश्वास, सम्मान व निर्विरोध पूर्वक स्नेह भाव से जी सके। श्रेष्ठता के प्रति कृतज्ञता का भाव उनमें बना रहे, ताकि समाज में श्रद्धा पूर्वक सेवा भाव से गौरवान्वित हो जी पाए। माँं अपने पुत्र-पुत्रियों के प्रति स्नेह और ममता भाव से पोषण करते हुए उनसे अपेक्षा विहीन उनकी विकास और जागृति का कामना करती है। औलादों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढती है। हर मनुष्य का तीन अहम सर्वोपरि संबंध होता है, मांँ-पिता और गुरु । माता-पिता औलादों के पोषण संरक्षण के रूप में और गुरु जागृति के अर्थ में पूज्य माने जाते हैं। अत: हर इंसान को इन तीन संबंधों के प्रति हर पल हर क्षण अनुस्युयत कृतज्ञता भाव होनी चाहिए। यही तीनों संबंध हमारे सफल जिंदगी जीने का आधार है। अतः हमारे आधार स्तंभ का हमेशा विश्वास के साथ स्वीकार करते हुए ,उनका हमेशा सम्मान करें। इन प्रमुख आधार स्तंभों में हमारी मांँ भी एक स्तंभ है। जो एक साये की तरह जिंदगी भर एक पहरेदार की तरह हमारी रखवाली कर , हमारी विकास और जागृति में सहयोग कर, हमें संस्कारिक बनाती है। मांँ जब तक जीती है ,तब तक परिवार में सह अस्तित्व भाव से जीती हुई, परिवार की धूरी होती है। समाज का कर्णधार एक शिक्षक होता है। उसी तरह मांँ भी परिवार की कर्णधार होती है। अत: हमारी धुरी स्वरूप मांँ का सदैव सम्मान करें, उनकी कृतज्ञता स्वीकार कर, सफल जिंदगी की बुलंदियों को छू लें। मांँ का आशीर्वाद हमेशा अपने सपूतों के लिए न्यौछावर रहती है। अतः हर इंसान को मांँ पर विश्वास और सम्मान बना रहे ।ऐसा व्यवहार कार्य करना है। ताकि हम अपने मांँ से मिली संस्कार का परिचय समाज में मानवीय भाव से दे सके। साथ-साथ गौ मांँ और धरती मांँ का  भी ख्याल रखें। 
**मां तेरी ममत्व को प्रणाम** 
मांँ गम की  राहे, तन्हाई जिंदगी में,  तुझे याद करते हैं।
तेरी आशीर्वाद और प्रेरणा से, सुखी होने की चाहत रखते हैं।
*************************
उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़

Wednesday, May 19, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- इंसान

रचयिता-उर्मिला सिदार 
ग्राम-बुलाँकी ,रायगढ (छ. ग.) 
दिनांक -20/05/2021
दिन  -गुरूवार 
विधा -कविता
शीर्षक - "इंसान की करतूत"
*************************

        *इंसान की करतूत*

इंसान ने इंसान का ,
गला घोट डाला ।
सुविधा संग्रह के चक्कर में ,
अपनों को मार डाला ।

यह कैसे शिक्षा नीति है,
यह कैसे ज्ञान की प्रेरणा।
अपनों का पहचान नहीं है,
जी रहे हैं ,संवेदना ।

अपने पराए की काला दीवाल से,
तुम, कब तक निकल पाओगे।
नफरत की गर्त में डूब कर तुम,
कब तक जी पाओगे ।

कैसे मति है मानव की ,
पोषण ही स्वयं का भूल गये।
खुद का शोषण कर मानव ने ,
खुद का लुटेरा बन ये।

बेशुमार विलासिता से मानव,
मन तुम्हारा भरा नहीं ।
अपराध की प्रवृत्ति में डूबा ,
तुम स्वयं से क्यों डरा नहीं ।

 उम्र ढल रही है तुम्हारा ,
 तुम कब चलोगे प्रेम की राहें। 
 बिंदास जिंदगी जी लो तुम ,
 आगे जिंदगी मिले ना मिले।
*************************
 उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Friday, April 16, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- जहाज़

रचनाकार - उर्मिला सिदार 
ग्राम - बुलाकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़ 
विधा - कविता 
विषय - जहाज 
दिनांक - 16/04/2021
*************************
                 *जहाज*
मानव निर्मित जहाज देखो, 
टेक्नोलॉजी दुनिया में आज।
मानव निर्मित जहाज दो प्रकार,
एक उड़ने वाला एक तैरने वाला।
बिना सड़क के चलने वाला,
द्रुतगति से चलने वाला।
मिनटों में तय करने वाला,
फाइन पेट्रोल से चलने वाला।
माल, यात्री पहुंचाने वाला, 
एलुमिनियम से निर्मित यंत्र। 
उड़ता है अंतरिक्ष में स्वतंत्र,
अड्डे पर यात्री पहुंचाता है‌।
घंटों का काम मिनटों में करता,
समय का बचत कराता है।
संसार को परिवार बनाकर,
कम समय में सैर कराता है।
दुनिया को एक कुटुंब बनाकर, 
भाईचारे का एहसास कराता है। 
जहाज रानी बड़ी आकार,
चलती तेज गति गहरी सागर।
अधिक माल सुगमता से लाद, 
पहुंचाती है यात्री सैकड़ों हजार।
*************************
                          उर्मिला सिदार 
                     रायगढ़ छत्तीसगढ़

Monday, April 12, 2021

उर्मिला सिदार की रचना- गवेजा

रचनकार -उर्मिला सिदार  
विधा -कविता
विषय - गवेजा
*************************
               गवेजा 
संवाद से होता है समाधान,
विवाद से होता है समस्या ।
दो अजनबी की पहचान से ,
मैत्री भाव से होती है बया ।

सुख शांति वातावरण से ,
समस्या की जगह नहीं ।
परस्परता में मानव से गवेजा,
सुखद वातावरण होता सही ।

दो आत्माओं के मिलन से ,
व्यक्त होता है व्यवहार ।
कोई स्वीकार कर कोई नकारकर,
फिर भी जीते हैं लोग संसार। 

 गवेजा  से गवेजा ढूंढते चले,
 बने स्नेह व्यवहार ।
 जिंदगी सरल से बीत जाए,
 जीवन हो जाए बेड़ा पार।
***********************
 उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

Thursday, April 8, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- चार

रचनाकार -उर्मिला सिदार
 ग्राम -बुलाँकी
 जिला -रायगढ़(छत्तीसगढ़ )
विधा -आलेख 
विषय - चार चिरौंजी 
दिनांक- 08/04/2021

*************************
            *चार चिरौंजी*
  हमारा छत्तीसगढ़ धान के कटोरा के साथ का वन संपदा और खनिजों का विशाल भंडार है।  वन संपदा के अंतर्गत जंगलों में गर्मी ऋतु में मौसमी  फल चार,  चार के अलावा और अनेक  गर्मी स्थानीय  फल जंगल मे मिलते है। इन्ही गर्मी फलो मे चार एक पोषक और  उपयोगी फल है। जो प्रायः जंगली इलाका मे पाया जाता है।  चार का बड़ा वृक्ष होता है।चार गुच्छों  मे फलता है। कच्चा मे चार का फल हरा  पकनें  पर गहरा लाल और सुखने पर काला दिखता है।  इसका स्वाद मीठा होता है।  चार के गुदा को चूस कर खाते है।  उनके गुठली से चिरौंजी  निकाला  जाता है ।चरौंजी बाजार मे  बड़ी कीमत मे बिकता है । चिरौंजी  पोषक तत्व के साथ -साथ औषधि में भी उपयोगी है।  भारतीय मिष्ठान पकवानों में यह विशेष  प्रयोग किया जाता है।  अनेक रोगों में औषधि के रूप  मे प्रयोग किया जाता है। इसमें विटामिन की  मात्रा अधिक पाई  जाती  है।  यह जगली लोगों के लिए उपयोगी और बहुमूल्य  फल है।  अतः जंगली फल वाले वृक्षों की संरक्षण ,सुरक्षा  ,संवर्धन  मे विशेष  ध्यान  देने  की आवश्यकता है। 
*************************
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...