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Wednesday, January 22, 2020

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी *वज्रघन* की रचना- तिरंगे का दर्द

बजरंग लाल सैनी *वज्रघन*
राज्य - राजस्थान
संपर्क ८७६९७६४७८६

शीर्षक - - *तिरंगे का दर्द*



*तिरंगा* प्रतीक स्वाभिमान का है,
शहीदों की शहादत के सम्मान का है।
किंतु आज यह निःशब्द रो रहा है,
होकर भी आजाद, आजादी अपनी खो रहा है।
चक्र अब कुछ ऐसा चला है,
 हरा केसरिया इक दूजे को खला है।
केसरिया देखो लहू से लाल हुआ है,
 श्वेत शांति का काल हुआ है।
हरा है नित धमाल करता,
नीला भी नहीं कम कमाल करता।
सब के सब स्वार्थ में जुट गए हैं, एकता अखंडता के सब भाव छुट गए हैं।
सड़कें नित लाल हो रही हैं, अगणित माँ अपने लाल खो रही हैं।
मज़हबों के फसादों से परेशान,
तिरंगा है अपने लोगों से हैरान।
गुम हो गया सर्वधर्म समभाव का नारा,
मजहबी लपटों से झुलसा है भारत सारा।
गांधी के चरखें कहीं जल गए हैं।
पटेल-से पुरखे कहीं चले गए हैं।
सावरकर राजनीति के अखाड़ा बने हैं,
आजादी का श्रेय लेने सब के सब तने हैं।
ओ बिस्मिल! ओ तिलक! तुम वापस आओ,
हम सब एक हैं, इन सबको समझाओ।
*वज्रघन* कवि कहता है तुम सबसे,
तिरंगा प्यारा है मुझको उस रब से।
परस्पर लड़कर यूँ ना शीश कटाओ,
सब मिलकर तिरंगे का मान बढ़ाओ।


बजरंग लाल सैनी *वज्रघन*

Monday, January 13, 2020

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" जी की दोहा रचना

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान।
संपर्क - 8769764786 

विधा - मुक्तक

छंद - दोहा

प्रथम पूजूँ गणेश को, विघ्न-विनाशक जान।
दूजा सुमिरुँ आञ्जनेय,यशोबल बुद्धि मान।।

प्रथम बार दोहा लिखा, धरकर गुरु का ध्यान।
दोष मेरे निकालिए, ज्यों अंधकार भान।। 

निर्भया को न्याय मिला, हुआ न्याय सिरमौर। 
एक पापी छूट गया, यह पीड़ा है और।। 

स्वतंत्रता किससे मिले? चोर मचाए शोर। 
काश्मीर हिंद का सदा, चाहे लगालो जोर।।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

Monday, January 6, 2020

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- सोच

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान
संपर्क - 8769764786 
शीर्षक - सोच
विधा - वर्ण पिरामिड


मैं
फल
अपने
फैसलों का, 
प्रतिमान हूँ,
अच्छे-बुरे कर्मों का,
वही बन पाया हूँ जो
सोचा विचारा अपने मन में।

ये
बात
उतनी
ही सत्य है
जितना उदित
होता दिवाकर है
उदीचि में गगन के
जो जैसा सोचता है, बनता है।

तू
सोच
वैसा ही
जैसा चाहे
बनना जग में
मंतव्य सही हो तो
बन  जाता है मानव
महामानव निर्विवाद।


बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

Monday, December 23, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- हरि-स्मरण

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान
संपर्क - 8769764786
शीर्षक - - हरि-स्मरण

प्रातः वंदना 
हरि नाम स्मरण कर ले बंदे,
जीवन का कोई ठिकाना नहीं।
उस पिता से जोड़ ले नाता,
वह अपना है पराया नहीं।
ये भवसागर है काल का चक्र,
बचने का कोई ठिकाना नहीं।
माया मोह की नाव में बैठकर,
तू इसमें डूब जाना नहीं।
हरि नाम स्मरण कर ले बंदे,
जीवन का कोई ठिकाना नहीं।
यह तन विष की बेल है ,
अज्ञानी तू भूल जाना नहीं।
काम-क्रोध, मद-लोभ, मोह , 
स्वार्थ में तुम लग जाना नहीं। 
संसार एक जर्जर बेड़ा है, 
भवसागर में डूब जाना नहीं। 
हरि नाम स्मरण कर ले बंदे, 
जीवन का कोई ठिकाना नहीं। 
यह तेरा है यह मेरा है, 
इस भ्रम में पड़ जाना नहीं। 
सबसे मिलजुल कर चल, 
किसी को भी कभी सताना नहीं। 
छल-प्रपंच कपट में पड़कर, 
काल का बन जाना निशाना नहीं। 
हरि नाम स्मरण कर ले बंदे, 
जीवन का कोई ठिकाना नहीं। 
ये जग बस कुछ दिन का डेरा है, 
किसी का स्थायी ठिकाना नहीं। 
आया है तो जाना होगा, 
बचने का कोई बहाना नहीं। 
राम नाम से पार ना उतरा, 
ऐसा कोई दीवाना नहीं। 
हरि नाम स्मरण कर ले बंदे, 
जीवन का कोई ठिकाना नहीं।

Tuesday, December 17, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी वज्रघन की रचना- नागरिकता

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान 
 शीर्षक - - नागरिकता (CAB)
संपर्क 8769764786 
छंद - - हाइकु (जापानी)
वर्ण-विन्यास--5,7,5


मिला सम्मान ,
नागरिकता पाई, 
खुशी अपार। 
हर्षाया मन, 
सर्वांग प्रफुल्लित, 
मना त्योहार। 
दिया सम्मान, 
अपनाकर हमें, 
धन्य हो तुम। 
वर्षों की पीड़ा, 
आज मिट गई है, 
कृतज्ञ हम। 
देश निकाला, 
खूब भोग लिया है, 
मैं घर आया। 
कैसे कहूँ मैं, 
आनन्द कितना है, 
मन में छाया। 
निकला चाँद, 
राहू को पार कर, 
उज्ज्वल मुख। 
भारत देश, 
सबका है सहारा, 
मिलता कूल। 
सच्चा सहारा, 
"वज्रघन" कहता, 
तुमने दिया। 
वंचितों को है, 
देने न्याय तुमने, 
फैसला लिया। 

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

Monday, December 9, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान
संपर्क 8769764786 
शीर्षक - - अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।

ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
पल-पल घूरती अंखियों की सौगात ना दीजो।
कब तलक बचाऊँ मैं खुद को पिशाचों से,
पैशाचिक भेड़ियों का ऐसा समाज न दीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
चुभती है शलाका-सी हर निगाहें,
समाने को आतुर मुझे सबकी बाहें,
सहमी-सहमी सी ऐसी जिंदगी ना दीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
हर पल सिमटती हैं साँसें मेरी,
घुट-घुट सिसकती हैं आहे मेरी,
मरण-सी पीड़ा और दम तोड़ती कराहें ना दीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
खिलौना नहीं मैं कि खेलना चाहें सब,
नरक-सी जिंदगी में धकेलना चाहें सब,
नुचने का गिद्धों से अभिशाप ना दीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
कभी काटी जाती हूँ, कभी जाती जलाई,
कभी मारी जाती हूँ, बदन का फंदा लगाई,
दरिंदगी ऐसा घिनौना आलम ना दीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
राक्षस नहीं हैं ये कुछ और ही हैं,
शर्मिंदा इनसे दैत्य असुर घोर भी हैं,
नारी जन्म है मनुज जीवन का अपमान ना दीजो।
ओ बाबुल! मोहे ऐसो वर दीजो।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन *

Monday, December 2, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की कविता- नारी पर अत्याचार कब तक?

कवि - - बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
निवास - खंडेला जिला सीकर राजस्थान।
संपर्क - 8769764786 
शीर्षक - - नारी पर अत्याचार कब तक?

वर्तमान भारत की समष्टि के इस
यक्ष प्रश्न का उत्तर कौन देगा?
क्या समष्टि के दिलों में भड़कती आग, 
या गूंगे, बहरे, बेहया प्रशासन का मौन देगा? 
नारी पर ये अत्याचार कब तक? 
क्या सृष्टि भस्मीभूत न हो जब तक? 
या प्रलयंकर के ताण्डव की प्रतीक्षा है? 
या फिर भवानी के संयम की ले रहे परीक्षा है? 
क्या इसकी कोई काल-सीमा है? 
जिसने मनुजता का सुख-चैन छीना है। 
रे नराधम! क्या तुझे सिर्फ शरीर दिखाई देता है? 
दुःशासन की तरह द्रौपदी का चीर दिखाई देता है? 
क्यों चीरहरण पर उतरा तू, एक बार सोच ले? 
देख उसमें अक्स माँ-बहनों का, हाथ अपने रोक ले, 
"वज्रघन" नहीं है नारी केवल भोग्या, 
है वह वंदन, अभिनंदन के योग्या, 
नारी भक्षणीय नहीं, रक्षणीय है यह जान ले, 
साक्षात् चण्डी, काली, भवानी है तू जान ले। 
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

Monday, November 25, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- मैं क्रोध का कवि हूँ

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
शीर्षक - -
*मैं क्रोध का कवि हूँ*
राज्य - राजस्थान
संपर्क - 8769764786

मैं क्रोध का कवि हूँ।

शासन की निरंकुशता के विरोध का कवि हूँ,
मैं क्रोध का कवि हूँ।
व्यवस्था जब पथ से भटके,
काज मनुजता के हो अटके,
भटके जन पाने न्याय को,
राजनीति पोषित करे अन्याय को,
तब हर जन की पीड़ा की छवि हूँ।
मैं क्रोध का कवि हूँ।
शासन की निरंकुशता के विरोध का कवि हूँ,
भूखे को भोजन ना प्यासे को पानी,
बेकार ही बीत रही हो जब जवानी,
त्रस्त किसान, नष्ट हो रही किसानी,
मजदूर,कामगार,व्यापारी की यही कहानी,
तब शोषण के तम को तोड़ता रवि हूँ।
मैं क्रोध का कवि हूँ।
शासन की निरंकुशता के विरोध का कवि हूँ।
बच्चों का बचपन जब कोई छीनता हो,
हृदय होता विदीर्ण जब वह कचरा बीनता हो,
चौराहों की लाल हरी बत्ती पर भिखमंगे बच्चों की वो लाचारी,
ऐसा लगता है कि स्वयं महादेव करने लगे हो प्रलय की तैयारी।
तब उनके जीवन यज्ञ में जलता हवि हूँ,
मैं क्रोध का कवि हूँ।
शासन की निरंकुशता के विरोध का कवि हूँ।
जब तक शासन नहीं चेतेगा,
"वज्रघन" कवि चुपचाप नहीं बैठेगा,
कलम से क्रांति का एक सैलाब उठेगा,
सितम और सितमगर का वजूद मिटेगा,
प्रसुप्त चेतना को उद्दीप्त करती अग्नि हूँ,
मैं क्रोध का कवि हूँ।
शासन की निरंकुशता के विरोध का कवि हूँ।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
खंडेला जिला सीकर राजस्थान

Monday, November 18, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- मेरी जान लेगी ये किसानी

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य राजस्थान
8769764786
शीर्षक - - मेरी जान लेगी ये किसानी।
रचना - - - -
मेरी जान लेगी ये किसानी,
रोते सिसकते युग बीते, सुख गया आँखों का पानी।
कर्ज लेकर बीज थे बोये,
ना दिवस ना रैन में सोये,
सोचा था दाने चार लगेंगे,
डूबते दिन मेरे अबके फिरेंगें,
फेर गए ओले मेहनत पर पानी,
रोते सिसकते युग बीते, सूख गया आँखों का पानी।
पहले मौसम की रुसवाई,
काळ की छाया घनेरी छाई,
कुर्क हुई ब्याज में बरधों की जोड़ी,
किसको दूँ अब सानी-पानी,
रोते सिसकते युग बीते, सूख गया आँखों का पानी।
खेत - खलिहान, घर - आंगन बिक गए,
बच्चों के सब सपने चुक गए,
सांसों के जीर्ण तार फुँक गए,
कुंठा और अपमान की शेष कहानी,
रोते सिसकते युग बीते, सूख गया आँखों का पानी।
मेरी जान लेगी ये किसानी।
सजनी को ना सुख दे पाया, देकर खुशी बलायें ना ले पाया,
जेवर की छोड़, काँच का ना मुख देखी थी,
"वज्रघन" हर संकट में वो मेरी सखी थी,
सुख के पल ढूंढते-ढूंढते, बीत गई जवानी,
रोते सिसकते युग बीते, सूख गया आँखों का पानी,
मेरी जान लेगी ये किसानी।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

Monday, November 11, 2019

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- पिया का घर

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राजस्थान
शीर्षक - - पिया का घर


पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हूँ।
पल-पल सहनशीलता, समर्पण, क्षमा सिखलाती हूँ।
रंग-बिरंगे कांच के कंगन,
चीनी मिट्टी के वो छोटे छोटे बर्तन,
नीम की डाली पर छोटा-सा झूला,
सारे अधखिले सपने मोड़ आती हूँ।
पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हूँ।
वो सखियाँ, गांव, गली, आंगन,
भाई-भौजाई, माँ का आंचल,
मिट्टी का वो सजीला घर,
सुंदर गुड़िया औ उसका काना वर,
संभाला था जिन्हें, तोड़ आती हूँ।
पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हू।
तन के रक्त की बूंद बूंद से पोषित,
नव सृष्टि संसार में लाती हूँ।
वो कष्ट, पीड़ा और यंत्रणा सब,
ममत्व में भूल जाती हूँ।
संतति की बस एक स्निग्ध स्मित से,
आनन्द के उत्ताल सागर में झूम जाती हूँ।
पिता का घर छोड़, पिया का घर बसाती हूँ।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"

Monday, November 4, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- प्रेम का प्याला

कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य राजस्थान
संपर्क 8769764786


शीर्षक - - - प्रेम का प्याला
आज पी आया मैं प्रेम का प्याला,
प्रिया के रससिक्त रक्ताभ अधरों की हाला,
हाला के उन्माद में मदमस्त होकर,
मन-मयूर नाचे सुध-बुध खोकर,
हृद् तल में उत्ताल हिलोरें झूम रही,
मानों उत्तुंग श्रृंग उठकर गगन को चूम रही,
फीकी लगती है अब तो जग की हाला,
आज पी आया मैं प्रेम का प्याला,
प्रिया के रससिक्त रक्ताभ अधरों की हाला,
हाला से रोम-रोम में मादकता छाई,
आनंद की एक लहर-सी मन में आई,
मन-भ्रमर अधर-कलिका को चूम-चूम,
अति आनंद मग्न हो रहा झूम-झूम,
"वज्रघन" अब शीतल लगती जग की हर ज्वाला,
आज पी आया मैं प्रेम का प्याला,
प्रिया के रससिक्त रक्ताभ अधरों की हाला।
बजरंग लाल सैनी

Tuesday, October 29, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- भाई दूज


बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
शीर्षक - भाई दूज
राज्य - - राजस्थान
संपर्क - ८७६९७६४७८६

शाश्वत, सनातन, अनिवार,
है भाई-बहन का प्यार,
अखंड अपनापा, अनन्त दुलार,
है भाई बहन का प्यार,
ना भाव इसके सम कोई दूजा,
ना ही समकक्ष इसके कोई पूजा,
यह  पवित्रता का त्योहार,
है भाई-बहन का प्यार,
ना कामना, ना वासना,
सिर्फ अपनत्व की उपासना,
करता हर संकट पर वार,
है भाई - बहन का प्यार,
इसको क्यों एक दिन में बांटा जाए,
दिखावे में ना इसके महत्व को पाटा जाए,
हर पल, हर समय का हुलार,
है भाई - बहन का प्यार,
भाई दूज का पावन त्योहार,
है जिसमें भाई-बहन का प्यार।

Monday, October 14, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी"वज्रघन" की रचना- देशप्रेमी


नाम - बजरंग लाल सैनी"वज्रघन"
राज्य - राजस्थान
मोबाईल 8769764786
शीर्षक - - देशप्रेमी


आया लिपटकर जब वो तिरंगे में,
छूकर उसे तिरंगा भी रोया होगा,
सुनकर माँ ने खबर शहादत की,
बरसते आँसुओं से आँचल भिगोया होगा,
मातभौम ने रक्षक, माँ ने अपना लाल,
अबोध बच्चों ने पिता अपना खोया होगा,
देख प्राण प्यारे का चंद्रमुख निष्प्राण,
प्रियतमा ने अश्रुधारा से काजल अपना धोया होगा,
मातभौम हित उस बाँके वीर ने,
स्वतंत्रता-बलिवेदी पर प्राण-बीज बोया होगा,
करके हवाले सुलगती, दहकती आग के उसे,
सीने में आग लिए लौटता गाँव कैसे सोया होगा,
आया लिपटकर जब वो तिरंगे में,
छूकर उसे तिरंगा भी रोया होगा।
बजरंग लाल सैनी
खंडेला जिला सीकर राजस्थान 332709

Monday, October 7, 2019

राजस्थान से बजरंग सैनी की रचना- भीतर का रावण

नाम - बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान
संपर्क - 8769764786
शीर्षक - - भीतर का रावण

आओ, आज एक प्रण लें।
भीतर के रावण को मारने का,
पीड़ित सिसकती सीता को तारने का।
क्यों पुतले जलाते हैं उसके,
जो भीतर घर कर बैठा है,
जलाकर आदर्शों की होली,
आसुरी प्रवृत्ति से हेठा है,
भर रहा भाव जो तम का,
सत का कर रहा विनाश है,
मनुजता का प्रबल शत्रु,
संस्कृति का करता नाश है,
माता सम नारी पर डाल कुदृष्टि,
जो सबको रावण बनाने पर तुला है,
हर घर में आज एक पीड़ित सीता है,
तामसी इंसान मर्यादा अपनी भूला है,
पहले राम बनो, मर्यादा को धारण करो,
हर नारी को देकर मान, फिर रावण दहन करो,
"वज्रघन" आओ आज एक प्रण लें।
भीतर के रावण को मारने का,
पीड़ित सिसकती सीता को तारने का।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
8769764786

Monday, September 30, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- रिश्ते

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - - राजस्थान।
शीर्षक - - रिश्ते
मोबाईल 8769764786

अच्छे लगते हैं अपनेपन से महकते रिश्ते,
प्रेम, सहयोग, सद्भाव से चहकते रिश्ते,
निःस्वार्थ भाव मनुहार से लहकते रिश्ते,
संस्कारों की पावन छाया में पलते रिश्ते,
स्व-पर त्याग, हम के भाव में बढ़ते रिश्ते,
आज जाने किसकी नज़र लगी, लगे दरकने रिश्ते,
मोबाईल, सिनेमा ने आग लगा दी संस्कारों में,
संस्कारों की होली में दहक-दहक दहकते रिश्ते,
विश्वास, अपनापा मुख छुपाए कहीं खो गया,
शक, अविश्वास के फेर में, पल-पल बिखरते रिश्ते,
कहता वज्रघन यों, सुन लो बात हमारी,
बचाना है समाज तो, बचा लो पावन रिश्ते।

Monday, September 23, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- बेटियां

बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राजस्थान
9413086000
शीर्षक - - बेटियाँ

पिता का प्यार,
माँ का दुलार,
संस्कृति का हार, होती हैं बेटियां।
अपनेपन का भाव,
सबसे लगाव,
मायका ससुराल में समभाव, दिखाती हैं बेटियां।
विधना की अनमोल कृति,
निविड़तम विपदा में धृति,
परिवार है उसकी वृत्ति, बतलाती हैं बेटियां।
घर को करती चमन,
घर के चमन का सुमन,
पारिवारिक-झंझावातों में अमन, लाती हैं बेटियां।
माँ-बाप की बढ़ाती है इज्जत,
घर की होती हैं जीनत,
फिर क्यों हर कदम पर, ठुकराई जाती हैं बेटियां।
क्या कोख में कैंची उसका भाग है?
या उसके नसीब में सिर्फ आग है?
"वज्रघन" वह नहीं है दुर्भागी, भाग्य बनाती हैं बेटियां।
उसके बिना संसार नहीं,
जग का कोई भी सार नहीं,
बेटी हूँ कोई भार नहीं,
बार-बार जताती हैं बेटियां।

Tuesday, September 17, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की कविता- माँ

कवि--बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - -  राजस्थान
शीर्षक--माँ
संपर्क - - 8769764786

जिंदगी की धूप में शीतल छांव है माँ,
भगवान भी आदर करें वो भाव है माँ,
प्यार, ममता और वात्सल्य की भाषा है माँ,
बच्चों की पूरी करती हर अभिलाषा है माँ,
वह लय है, तान है, छंद है, कविता है,
यशोदा है, पन्ना भी है और सीता है,
वह प्रेम के झरने का निर्मल स्वर है,
बच्चों की हर बाधा में बनती ढाल प्रखर है,
सबसे मीठा बोल है माँ, दुनिया में अनमोल है माँ,
भावना है कामना है संवेदना है, अहसास है माँ,
जीवन बगिया के फूलों में खुशबू का आभास है माँ,
माँ संसार है, पृथ्वी है, और सबकी धूरी है,
माँ के बिना "वज्रघन" इस जीवन की कल्पना अधूरी है।

Monday, September 16, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की रचना- परिवार

कवि--बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - - राजस्थान
संपर्क - - 8769764786

शीर्षक - - परिवार

जीवन में रसधार है परिवार,
सुसंस्कृत सृष्टि का आधार है परिवार,
प्रेम आनंद का पारावार है परिवार,
सद्भाव सहयोग की अजस्र धार है परिवार,
जिम्मेदारी कर्तव्य का गुरु भार है परिवार,
अकूत वात्सल्य, निर्मल प्यार है परिवार,
सुख शांति, समृद्धि का त्योहार है परिवार,
समर्पण, त्याग, परार्थ का भाव है परिवार,
पुरातन परंपराओं का सूत्रधार है परिवार,
माँ की लोरी, दादी का दुलार है परिवार,
पिता का दायित्व, बहन का प्यार है परिवार,
अग्रज का साथ, अनुज का अधिकार है परिवार,
संस्कार और सभ्यता का आधार है परिवार,
जीवन में रसधार है परिवार।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राजस्थान।

Tuesday, September 10, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी"वज्रघन" की रचना - आत्मघात क्यों???

कवि. बजरंग लाल सैनी"वज्रघन"
शीर्षक - - आत्मघात क्यों?
संपर्क - -8769764786
खंडेला जिला सीकर
राज्य - राजस्थान

क्या जीवन इतना सस्ता है?
या फिर विवेक की हालत खस्ता है?
क्या भटक गई है विश्व की तरुणाई?
या अवसाद की हो गई गहरी खाई?
क्या तनाव, दबाव, कर्ज की बढ़ी फांस?
या सड़े रिश्तों की सड़ांध घोटती है सांस?
क्या कोई पाप अनहोना किया है?
या फिर प्रिय को असमय खो दिया है?
क्या अबके फिर मौसम रूठ गया है?
या साहुकारों का दमन चक्र टूट गया है?
क्या बिटिया के हो न सके पीले हाथ?
या संगी ने छोड़ दिया जीवन का साथ?
क्या वेतन पर ईएमआई भारी है?
या कोई अहम जंग तूने हारी है?
क्या परीक्षा में असफलता की चिंता व्यापी है?
या दुर्लभ्य महत्त्वाकांक्षा की आपाधापी है?
क्या इन सबका समाधान आत्मघात है?
या मिलकर करना अपनों से बात है?
क्या स्वयं को व्यवस्थित तुम कर सकते नहीं?
हो मार्ग जो सही, उस पर चल सकते नहीं?
आत्मघात एक पाप है, मनुष्य जीवन का शाप है।
यह समाधान नहीं है और विकट समस्या का द्वार है।
जो खुद से जीत गया "वज्रघन", वही हो सका इससे पार है।

Monday, September 9, 2019

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी "वज्रघन" की प्रकाशित कृति- तो ले चलूँ

कवि का नाम - बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
राज्य - राजस्थान
शीर्षक - - तो ले चलूँ।

सजल जीवन में संग धार बनकर बहे,
तो ले चलूँ।
जीवन समरांगण में असिधार बनकर बहे,
तो ले चलूँ।
निराश अंधियाली रात में दीप बनकर जले,
तो ले चलूँ।
मैं तुम पर छंद लिखूँ तू लय बनकर मिले,
तो ले चलूँ।
मेरे जीवन की हर उलझन, कर्तव्य पथ की भटकन,
भावी विपदा की सिहरन, हाथ में लेकर हाथ चले,
तो ले चलूँ।
जब हो राह रुकी सी, जीवन संध्या थकी सी,
उस राह की अंतिम वेला में, गलहार बनकर रहे,
तो ले चलूँ।
आसन्न मृत्यु काल से, सावित्री बनकर लड़े,
तो ले चलूँ।
तो ले चलूँ।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
खंडेला जिला सीकर राजस्थान।

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...