स्थान--रायगढ़
विधा--दोहा छन्द
शीर्षक--'गणेश-वन्दना'
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गौरी-सुत गणराज प्रभु , लम्बोदर गणनाथ ।
विघ्नहर्ता - सुखकर्ता , करो जग को सनाथ ।।
शंकर - सुवन वरदाता , हे रिद्धि-सिद्धि कन्त !
प्रथम पूज्य प्रभु दयाला , सोह मुख एक दन्त ।।
विद्या - बुद्धि के दाता , करते हरण अज्ञान ।
अन्तर्मन प्रकाश भरें , ज्योति करना प्रदान ।।
अन्धे को आँख देते , करके दया अपार ।
निर्धन को धन दिये तुम , कुबेर - सा भण्डार ।।
रहित सन्तान को दिये , सुता - सपूत ललाम ।।
अंग दिये दिव्यांग को , स्वामी करुणा धाम ।।
आज देश का हाल प्रभु , हुआ खूब बेहाल ।
त्रस्त किया है विश्व को , कोरोना बन काल ।।
नेता - मंत्री सभी को , जकड़ रखा है आज ।
त्राहि-त्राहि मचा जग में , सारा मनुज समाज ।।
नाथ देखते - देखते , लीला लाखों जान ।
इस रोग से बचने का , मिलते नहीं निदान ।।
बच्चे - बूढ़े किसी की , करे नहीं पहचान ।
नर-नारी-जवान सहित , सब की लेता जान ।।
भारी संकट आ पड़ा , ग्रसित आज संसार ।
करके दया उमा तनय , करो इससे उबार ।।
वरना मानव जाति का , हो जायेगा अन्त ।
फिर तेरे जन्मदिन का , होगा बन्द बसन्त ।।
मनुज बिन 'ठाकुर' तेरी , पूजा होगी बन्द ।
कोरोना का अन्त कर , नाथ आनन्दकन्द ।।
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व्याख्या-- रचना में गजानन स्वामी से देश हालत
एवं कोरोना से बचाने के लिए विनय
किया गया है ।
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