पेंड रवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
छंद - मुक्त छंद
कागज के फूल
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इस मायावी दुनिया में ,
बनावटी मुखड़े हैं ,
भावनाविहीन रिश्तों में ,
सबके अपने - अपने दुखड़े हैं,
नकली हँसी हँसते ,
दिल में छुपा शूल है ,
दिखावे के अपने है ,
मानो कागज के फूल है ,
रंग है , आकर्षण है ,
खुशबू है लापता ,
आत्मा भी मर चुका ,
तन से दिख रहा लता ,
कागज के फूल सा ,
अब जीवन भी हो चला ,
मीत में भी प्रीत नही ,
दूजे सा एहसास पला ,
पाने की लालसा है ,
दंभ है दिखावे का ,
अंतर्मन से दुखी है ,
पर रंग नही पछतावे का ,
कद्र नही भावनाओं का ,
दिल बना शमशान है ,
रिश्तें पड़े हैं बिखरे ,
ऊँचे - ऊँचे मकान है ,
खुशियों से भरी झोपड़ी ,
तभी सच्चों को कुबूल है ,
बाकी सब धोका है ,
बस कागज के फूल है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -