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Wednesday, June 16, 2021

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से कवि शैलेन्द्र चेलक की रचना- कागज के फूल

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंड रवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
छंद - मुक्त छंद

    कागज के फूल
----------------------------------------
इस मायावी दुनिया में ,
बनावटी मुखड़े हैं ,
भावनाविहीन रिश्तों में ,
सबके अपने - अपने दुखड़े हैं,
नकली हँसी हँसते ,
दिल में छुपा शूल है ,
दिखावे के अपने है ,
मानो कागज के फूल है ,
रंग है , आकर्षण है ,
खुशबू है लापता ,
आत्मा भी मर चुका ,
तन से दिख रहा लता ,
कागज के फूल सा ,
अब जीवन भी हो चला ,
मीत में भी प्रीत नही ,
दूजे सा एहसास पला ,
पाने की लालसा है ,
दंभ है दिखावे का ,
अंतर्मन से दुखी है ,
पर रंग नही पछतावे का ,
कद्र नही भावनाओं का ,
दिल बना शमशान है ,
रिश्तें पड़े हैं बिखरे ,
ऊँचे - ऊँचे मकान है ,
खुशियों से भरी झोपड़ी ,
तभी सच्चों को कुबूल है ,
बाकी सब धोका है ,
बस कागज के फूल है ,

              - - शैलेन्द्र चेलक - -

Thursday, June 10, 2021

कैफियत : शैलेन्द्र चेलक

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - कैफियत
विधा - आलेख 

            कैफ़ियत
      वर्तमान समय में हर कोई स्वयं तक ही सिमटते जा रहा है। किसी को , किसी की परवाह ही नही। पिता- पुत्र का मतांतर होना आम बात है। जिसे " जनरेशन गैप " के रूप में लोग स्वीकारने भी लगें हैं। यह "जनरेशन गैप " आज ही दिखाई दे रहा है ऐसी बात नहीं है। सदा से ही रहा है परंतु इन सबके बीच पीढ़ियों में अच्छे संस्कार के चलते कभी बंद न हुआ। वर्तमान पीढ़ी तकनीकी युग में आगे बढ़ रही है , डिग्रियों का अंबार है , अपनें बुद्धिबल से सुगम जीवन जीने में समर्थ है जो कि बहुत अच्छी बात है परंतु इसके चलते उनमें " ईगो " भी पहले से ज्यादा हो चला है। वे अपने आगे दूसरे तो दूर अपनों की भी कद्र नही करते। बुजुर्ग भी स्वीकार लिए है कि बच्चे हमारा एक भी सुनना नही चाहते , हमें पूछना तो दूर बताते तक नहीं , इसलिए उन्हें कुछ कहना बेकार है। कोई किसी का हाल चाल पूछते। बातचीत की कमी के चलते रिश्तों में , समाज में जो अपनापन या लगाव हुआ करता था अब नगण्य हो चला है। फलतः समय पर भावनात्मक मदद नही मिल पाता और लोग मानसिक तनाव व अवसाद से जकड़ने लगें है। हम यह भूल गए हैं कि आपकी सकारात्मक बातें , किसी से यूं ही हँसकर हाल पूछ लेना उस व्यक्ति के लिए संजीवनी हो सकता है। 
           आजकल मियां बीबी के झगड़े आम हो गया है। कोई किसी का सुनना पसंद नहीं करते। बस अपने को सही साबित करने में लगें हुए हैं। खुद को ज्यादा श्रेष्ठतम मानकर न झुकने की होड़ दिखाई देता है। इसमें भी बातचीत और आपसी समझ की कमी ही कारण के रूप में सामने आती है। जबकि रिश्तों को यथावसर समय देना , उनका हालचाल पूछ लेना , रिश्तों को अपनत्व की भावना में न केवल जोड़ता ही है बल्कि उन्हें तनावमुक्त और सम्बल बनाता है।  आपसी कैफ़ियत न होने से दूरी इस कदर बढ़ जाती है कि लोग तन्हा और जीवन से ही मायूस हो जाते हैं। और फिर दिलों में प्यार होते हुए भी बस कहते रहते हैं -
    रूबरू होना जरूरी नही ,
   कभी कैफ़ियत ही पूछ लो -
   इत्मीनान हो जाएगा 
 मेरे बगैर भी कैसे जी लेते हो तुम।
         –––––––
 तन्हाई मिटती है तेरी कैफ़ियत से,
 वरना मुकम्मल जिंदगी 
बेमकसद चला जा रहा है।

             - -  शैलेन्द्र चेलक - -

Monday, June 7, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- तेजस

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक 
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - तेजस
शीर्षक - आत्मा का तेज

         आत्मा का तेज
----------------------------------------
मन की चाल विचलित करना है ,
तू आत्मा की लौ में बह ,
सुनी - सुनाई बातें न कर ,
तेरा दर्द है , तू ही कह ,
दिव्यपुंज का एक कतरा तू ,
पहचान अपनी आभा में रह ,
कई जन्मों का विरह दग्ध ,
अब भी न बिछड़न को सह ,
लाखो सूर्य - नक्षत्र तेरे अंदर ,
उस दिव्यता से वंचित न रह ,
बुद्ध , कबीर , नानक ने समझा ,
जग की ठगनी माया में न बह ,
ईश्वर तेरा तुझमें मिलेगा ,
पाकर अंतर्मन की तह ,
रूह की चमक भी कम नही होती,
आखिर ईश्वर का अंश है वह ,
मन , माया -मोह का भ्रम फैलाता ,
काम - क्रोध के न आग में दह ,
सतगुण , सद्गुरु , सद्विचार ,
सदा संतो शरण को गह ,
करम करोगे फल भी मिलेगा ,
बस करनी का मारग है यह ,

           - -  शैलेन्द्र चेलक - -

Thursday, June 3, 2021

शैलेन्द्र चेलक कृत रेखाचित्र- अंधविश्वास

लेखक - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़ ।
विषय - अंधविश्वास
विधा - रेखाचित्र

         अंधविश्वास
----------------------------------------
           मनुष्य जब व्याधियों से घिर जाता है , तब उसके मन में किसी अदृश्य नकारात्मक शक्ति द्वारा सताए जाने का भ्रम इस तरह लिपट जाता है जैसे कोई परजीवी अपने पोषक जीव से लिपटा रहता है। इस दशा में समाज में फैली कई अंधविश्वासों को वह सच समझने लगता है।वैज्ञानिक शोधों , दवाइयों , इलाज के उन्नत पद्धति को भी धता बताने लगता है। शायद तभी सुशीला भाभी अपने माइग्रेन और अर्थराइटिस की बीमारी को पढ़ी - लिखी और ओहदे पर होते हुए भी जादू - टोना , तांत्रिक प्रभाव मानती थी। एक बार मदन भैया  (मेरे बुआ का बड़ा लड़का )अंधविश्वास पर अपना आपबीती सुनाए थे।
           मदन भैया के साथ दूरस्थ जंगल में बसे बावाडोंगरी गांव में ओझा के पास समस्या का समाधान ढूंढने जाते समय रास्ते पर ऊँचे - ऊँचे सागौन के पत्तो से टकराकर कानों को छू कर जाने वाली हवा का एक -एक  झोंका सुशीला भाभी को इस तरह का आभास करा रही थी मानो किसी तांत्रिक शक्ति उसे ओझा के पास जाने से रोक रहा हो । वनप्रांत पर सन्नाटे को चीरता अचानक सुनाई देने वाली चील की कर्कश ध्वनि मानो उसे अभी के अभी जमीदोज करने उतारू है। वह डरी सहमी मोटरसाइकिल पर बैठे मदन भैया को कसकर पकड़ ली।
मदन भैया - अरे सुशीला डॉक्टर साहब ने तुम्हें बहुत समझाया कि माइग्रेन और अर्थराइटिस है। इसी वजह से सिरदर्द , हाथ -पैर के जोड़ों में दर्द बना रहता है। कुछ महीने लगातार दवाई लेने से ठीक हो जाएगी।पर तुम उनकी भी नही सुनी।
सुशीला भाभी - (झल्लाकर )जब परेशानियों का सामना खुद करता है न तब इंसान समझता है कि कोई शारिरिक बीमारी है या किसी के जादू - टोने का भयंकर परिणाम है। तुम तो अभी मुझे बावाडोंगरी पहुँचाओ बस।
           जब किसी व्यक्ति के मन में अंधविश्वास का दीमक घर कर जाए तो वह उसके बौद्धिक धरातल को केवल चट नही कर जाता बल्कि किवदंतियों का काल्पनिक बाम्बी भी उसके आसपास निर्मित होने लगता है। मदन भैया इस बात को समझते हुए सुशीला भाभी के मन पर पड़े मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव को दूर करने बावा डोंगरी ओझा के पास ले जाना ही उचित समझा ।
       बेल और नीम के पेड़ से आच्छादित आँगन में बूढ़ादेव स्थापित है। धूप और अगरबत्ती के सुवासित गंध बिखरे पड़े हैं। बांस के अपरिपक्व और अनियमित आकर के ठूठ पर कुंकुम का लेप , देवी- देवताओं का तैल चित्र , मोटी बाती पर जलता दिया , ओझा के माथे पर उन्नत कुंकुम , अपने रोगों को दूर कराने आये लोगों का जमावड़ा से पूरा माहौल तांत्रिक स्थल का जान पड़ता था।
      अपनी बारी आने पर सुशीला  भाभी सारा हाल सुना दी। फिर ओझा की बातों में हां मिलाती चली गई। पंद्रह दिन बाद फिर आने कहते, हाथ मे कुछ पुड़िया थमाते उन्होंने कुछ सुने - अनसुने मंत्रो का धीमे आवाज में वाचन कर भभूत फूंका। दस दिन में इन उपायों को अपनाने से तेरी समस्या नही के बराबर रह जायेगा ।
        उनके तांत्रिक उपचार से प्रसन्न सुशीला भाभी घर लौटी। कुछ दिनों तक खुराक लेने से उसे समस्या कम होने का आभास हुआ। मदन भैया उस पर हुए बदलाव के चलते खुश तो था। पर वह जानता था कि यह सुशीला भाभी पर मनोवैज्ञानिक असर है। जैसे किसी को बुखार आने पर बिना सुई लगवाए ठीक नही होने की धारणा एक सुई लगवा देने से चली जाती है जबकि दवाई लेने से ही वह ठीक हो सकता था। ओझा ने पूड़ियों के साथ डॉक्टर की दवाई लेते रहने का सुझाव दिया था। पंद्रह दिन बाद फिर गए ओझा फिर पुड़िया थमा दी। सुशीला भाभी ओझा के उपचार को सही मानते हुए डॉक्टरी दवाइयों को खाना बंद कर दी। परिणामतः पखवाड़े भर में समस्या फिर बढ़ना शुरू हो गया। मदन भैया  बहुतेरे समझाया दवाइयां लेना बंद मत करो वह नही मानी थी ।
        दिसम्बर का माह ,ठंड अपने चरम पर आ गया था। लोग गरम कपड़े पहनकर भी काँपने लगें थे। उस ठंडे माहौल से भरे एक रात सुशीला भाभी की व्याधि भयंकर हो गया । वह रोने ,चिल्लाने लगी । वह कह रही थी मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है ,जो मेरे शरीर से खून चूस रहे हो ?आखिर क्यों इतना दर्द दे रहे हो? वह पागलों की तरह मदन भैया से लिपटकर ओझा के पास ले जाने की जिद करने लगी। गला सुख चुका था , वह बेहोश हो गई। जब होश आया तो वह अपने को अस्पताल में पाई। ड्रीप चढ़ी है ,मरीजों की अलमारी बिस्तर से सटी है जिस पर दवाइयां बिखरी पड़ी है , तेल से मालिश भी किया गया है। शाम को डॉक्टर आए उन्होंने बताया कि ऑटो न मिलना , फिर पड़ोसी की मदद से मोटरसाइकिल पर अस्पताल लाना , रातभर मालिश करना जैसे परेशानीयों के साथ आपकी पति ने उनींदा में रात कांटा है। अब आप ठीक हैं, दो दिन में छुट्टी दे दी जाएगी, लगातार कुछ दिन दवाई खाते रहने से आराम मिलेगा। बीच- बीच मे आते रहना बीमारी नियंत्रित रहेगी। सुशीला के मन मे अपने अंधविश्वासी कृत्यों पर मलाल स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। वह मदन भैया की ओर सजल अपलक देख रही थी ,मदन भैया के चेहरे पर सुकून भरे मुस्कान था। बरसों बाद आज भी सुशीला भाभी कहती है विश्वासी होना अच्छी बात है पर अंधविश्वास ठीक नही।

            - - शैलेन्द्र चेलक - -

Tuesday, June 1, 2021

शैलेन्द्र चेलक कृत आलेख- विचार

लेखक - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - विचार
विधा - आलेख
शीर्षक - विचार ही व्यक्तित्व दर्शाता है 

          विचार : अंतःकरण में किसी विषय पर तर्क - वितर्क ।मनुष्य समाज में अपने विचार प्रदर्शन से ही जाना जाता है , कि अमुक व्यक्ति अच्छा है या बुरा । किसी विषय को प्रमाणों के साथ सार्वभौमिकता के धरातल पर प्रस्तुत कर स्वयं को सिद्ध करना हमारी वैचारिक विशेषता होती है। हम समाज मे अपने अच्छे या बुरे विचारों से ही अपना आचरण प्रदर्शित करते हैं। हम स्वयं अपने विचारों से प्रभावित होते हैं।
              मनुष्य के मन मे प्रायः दो प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं - सकारात्मक और नकारात्मक। सकारात्मक विचार - सकारात्मक विचार असंभव में संभव , निराशा में आशा , नाउम्मीदी में उम्मीद की किरण तलाशता है। पिछले क्षण से बेहतर आने वाले क्षण को बनाता है। अथक निरंतर प्रयत्नशील रखता है। सकारात्मक व्यक्ति सदैव ऊर्जावान बने रहते हैं। कोई पूर्वाग्रह या धारणा ऐसे व्यक्ति का पग बाधा नही बन सकता ।   

तोड़ निराशा के बंधन प्रगति पथ पर बढ़ता है ,
प्रेम प्रवाह नदिया सा चट्टानों से लड़ता है , 
उलझी गुत्थियाँ सुलझे पल में ,
जब इंसान सकारात्मक हो चलता है ,

 नकारात्मक विचार - नकारात्मक विचार मनुष्य को यथास्थिति से और नीचे गिराता है। व्यक्ति की गतिशीलता समाप्त कर देता है, परिणामतः अवसाद जन्म लेता है। नकारात्मक विचार दूसरों में भी निराशा व असफलता फैलाता है। छोटी सी छोटी परेशानी  नकारात्मक व्यक्ति के लिए पहाड़ सा प्रतीत होता है। वो भूल जाता है कि हर समस्या का हल है या समस्या में ही हल छुपा है। ऐसे व्यक्ति पूर्वाग्रह एवं धारणाओं से ग्रस्त हो जाता है। उसे हर काम मे असफलता की आशंका रहता है।  वह "अकेला चना भांड नही फोड़ सकता " इसी सोच में चलता है। जबकि सकारात्मक व्यक्ति अपनी कुव्वत दुनिया बदलने के हिमायती होते हैं।
           प्रायः व्यक्ति की वैचारिक धरातल उसके वातावरण जिसमें घर -परिवार , उसका मित्र मंडल , शिक्षा का स्तर , सामाजिक स्थिति इत्यादि आता है से प्रभावित होता है। मनुष्य की मेधा का विस्तार व्यापक है। फिर भी वह सकारात्मक व नकारात्मक सोच के कारण ही उसका सदुपयोग या मूढ़ स्थिर बना रहता है। इंसान के बौद्धिक क्षमता ही उसे अन्य प्राणियों से भिन्न या श्रेष्ठ बनाता है। बाघ को आता देख हिरण जान बचाने दौड़ता है पर नकारात्मक व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों पर अकर्मण्य हो जाता है तो ऐसे में क्या वह मनुष्य भी है ? सकारात्मकता मनुष्य की वह शक्ति है जिससे वह मौत को मत देता है। इसलिए सदैव सकारात्मक रहे।

               - - शैलेन्द्र चेलक - -

Monday, May 31, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- प्रहरी

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - प्रहरी

              प्रहरी
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हिमालय सा अडिग खड़ा है ,
देश का हर सिपाही ,
बाँधे कफ़न सिर अग्निपथ पर ,
नित चलता वो राही ,
सिंधु सा तूफान लिए ,
चट्टानों से टकराने ,
मौजों की गर्दिश से लड़ते ,
बढ़ते आगे परवाने ,
क्षत -विक्षत हो छाती फिर भी ,
आत्म बल न कम होता ,
अपनी जान गंवाने तैयार ,
आँखें फिर भी न हम होता ,
वज्र का सीना लिए वीर ,
उत्साही बढ़ता है आगे ,
हुंकार सुने जब शेरों की ,
दुश्मन दुम दबाकर भागे ,
गंभीर घोष रणभेरी सा ,
नायक भरता जवानों में ,
भारतमाता की जयकारें ,
गूँजा करती हर कानों में ,
धड़ -धड़ ,धड़- धड़ चलती गोलियां,
पिंडली -पुट्ठे से टकराती ,
राष्ट्रभक्ति का नया सबब ,
जन-जन-जन को सिखलाती ,
अमरत्व प्रदान करता मरना उनका ,
जो बैरी पर तन जाता है ,
तोपों से , बम धमाकों से प्रहरी ,
चीर यौवन बन जाता है ,
इनके त्याग, परिश्रम- बल से ,
सजी हिन्द की गौरवगाथा ,
धन्य -धन्य है इन लालों से ,
जय -जय-जय हो भारतमाता ,

         - - शैलेन्द्र चेलक - -

Saturday, May 29, 2021

शैलेन्द्र चेलक की ग़ज़ल

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विधा - गज़ल
शीर्षक - बातों -बातों में

         बातों- बातों में 
चुप रहना नादानी है जब बात जरूरी हो ,
एक तेरे कह देने से जब मिट जाती दूरी हो ,
जलता है जज्बात लिए दिल अब तो दोनों की ,
मुहब्बत कैसे पूरी हो ? जब बात अधूरी हो ,

दरिया भी सुना लगता है, मौजों के महफ़िल बिन ,
चुप न रहो , तेरे कहने से जब शाम सिंदूरी हो ,

बातों -बातों में हम दिल के राज़ बता देते हैं ,
लब सील के रखते हैं वो , जाने क्या मजबूरी हो ?

चाहत छुपती है कब भला ? किसी के छुपाने से ,
पर बढ़ती है तब ही , जब दोनों की मंजूरी हो ,

मुहब्बत अहसासों से ही मुकम्मल जहाँ में है ,
मिलन की चाह में दौड़े न कोई कस्तूरी हो ,

बातों- बातों में कब हम ? उन्हें अपना दिल दे बैठें ,
चाँद को देखकर जगतें हैं ,कभी न रात ये पूरी हो ,

           - - शैलेन्द्र चेलक - -

Friday, May 28, 2021

शैलेन्द्र चेलक कृत आलेख- मोह

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - मोह 
 विधा - आलेख

         मोह 
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       मोह एक ऐसी मानवीय प्रवृत्ति है जिसमें पड़कर इंसान देना भूल जाता है। किसी व्यक्ति , वस्तु या भावना से वंचित नहीं रहना चाहता। उसी के इर्द - गिर्द एक ऐसा सुखद वातावरण पाना चाहता है जिससे उनकी निकटता बनी ही न रहे बल्कि उसमें निरंतर वृद्धि भी हो। इस तरह मोह एक ऐसी मानवीय दशा है जिसमें व्यक्ति अपने प्रिय व्यक्ति , वस्तु , भावना इत्यादि न छूटे ,जिसके उलझन भरे धागों में बांधकर उलझता ही चला जाए। 
                जहाँ लोभ में निरंतर पाने की लालशा होती है तो मोह में खो न देने का बंधन बनी रहती है। लोभ अतृप्त इच्छाओं के पीछे इस कदर भगाता है जिसमें पड़कर इंसान वर्तमान के सुख से वंचित हो जाता है जबकि मोह ऐसा बंधन बांध देता है जिसमें इंसान अपनी वर्तमान में उलझकर श्रम विहीन , आत्मकेंद्रित , लिप्सावश अंधा हो जाता है, न्याय व तर्क से दूर हो जाता है। लोभ इच्छा वश असीमित दिखाई पड़ता है जबकि  मोह में इंसान सिमटते जाता है।लोभ का सकारात्मक पहलू उसे श्रम या प्रयास करने के लिए प्रेरित करता है , मोह अज्ञानता व भ्रामक होता है।
            मोह यदि व्यक्ति के प्रति हो तो उसके उन्नति के मार्ग में बाधक हो जाता है जिससे उसका सर्वांगीण विकास नही हो पाता , वो विपरीत परिस्थितियों में लड़ने लायक नही रह जाता। यदि वस्तु के प्रति हो तो उस वस्तु का विछोह घातक तो नही पर कष्टकारी व निराशा से भर देने वाली होती है ,परंतु किसी भावना जैसे प्रेम या वासना  के रूप में सामने आए तो कभी - कभी प्राणघातक भी हो जाता है। 
            इंसान के अंदर पाँच मनोविकार काम , क्रोध , लोभ , मोह व अहंकार होते हैं। जो मानव को मानवीयता से दूर कर देता है जबकि दया ,प्रेम , विनम्रता ,परोपकार व क्षमा  वे मानवीय मूल्य हैं जिससे लोग आपस मे बंधकर रहते हैं ,दुनिया इन्हीं के कारण गतिमान है। ये सौहार्द व भाईचारे को बढ़ाता है।
              मानव विकारों से युक्त है परंतु भगवान ने उन्हें विवेक की ताकत दी है। जिसका सही उपयोग से , मानवीय मूल्यों को स्थापित कर सकता है। अपनी समझ से यह जान जाता है कि दुनिया जो बाहर दिख रहा है वह सब बांधकर रखने वाला है मोह है , और जो इस फेर में नही पड़ता वही सच्चे महात्मा है,परमात्मा है।  जब व्यक्ति को इस बात का आभास होना शुरू होता है, वह इस बंधन से परे , मोह से दूर चला जाता है। जो व्यक्ति महात्मा नही सांसारिक है वे जीवन मे इन विकारों का यथावसर प्रदर्शन करता ही है पर अपने मे मानवता भी बनी रहे इसलिए इन विकारों को नियंत्रण में रखकर आचरण भी करता है।

             - - शैलेन्द्र चेलक - -

Wednesday, May 26, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- दिवास्वप्न

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - दिवास्वप्न
शीर्षक - दिवास्वप्न ( मुक्त छंद)

           दिवास्वप्न
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दिवास्वप्न कल्पित जग है ,
        विचलित कर देता है मन ,
वर्तमान के आँगन में ,
       पैदा करता भावी उलझन ,
सुखद स्वप्न की अभिलाषा ,
        अकर्मण्यता से न हो पूरा ,
श्रम बिन केवल परछाई है ,
     भावी जीवन का स्वर्ण कंगूरा ,
कल्पित जग में विचरण करना,
     असफलता का परिचायक है ,
यथार्थ धरातल पर टूटे सपनें ,
           निराशा व पीड़ादायक है ,
पर दिवास्वप्न पग बाधा नहीं ,
           नये राह भी है दिखलाता ,
सपनों को साकार बनाने ,
        अनेक उपाय है सिखलाता ,
दिवास्वप्न सच -सुंदर करने ,
       दिन - रात जागना पड़ता है ,
लक्ष्य दिशा में अर्जुन जैसा ,
               श्रम साधना पड़ता है ,

            - - शैलेन्द्र चेलक - -

Tuesday, May 25, 2021

मानसून के शैलेन्द्र चेलक के दोहे

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - मानसून
विधा - दोहा छंद
          
                  दोहे
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1 बादल घिरकर दे रहा , धरती को संकेत।
  प्रेम अगन मिट जाएगा , झूमेंगे ये खेत।।

2 बरखा किसान मित्र हैं , चले हमेशा साथ।
  एक रूठे तो न उपजे , धान न हाथों हाथ।।

3 प्रेमी बादल धरा पर , बरसने को आये ।
 घुमड़ घुमड़ कर फिर वो, चहुंओर बरसाये।।

4 किसान सहता है सदा , मानसून की मार ।
  कभी सूखे से आँसू दे , या बारिश भरमार ।।

           - - शैलेन्द्र चेलक - -

Friday, May 21, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- माँ

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - माँ 
शीर्षक - ऐसी होती है माँ 

         ऐसी होती है माँ
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बच्चों की छोटी सी आह में 
जो कराह उठे ,
औलाद रूठे तो , जिनका जग रूठे ,
अपनी अनगिनत महत्वकांक्षाओं को ताक पर रखकर भी ,
जो कभी न टूटे ,
चूल्हा - चौका , झाड़ू - बर्तन में 
दिन - रात घिसे ,
पर इक पल को भी न
औलाद का खयाल छूटे ,
उनके लिए कई सपनें संजोती है माँ ,
ऐसी होती है माँ ,
किलकारियों का शोर ,
मन को विभोर कर दे ,
तो रोना बच्चे की ,
जिन्हें आतुर , व्याकुल ,झकझोर कर दे ,
अनिष्ट की आशंका ,
फिर कई रतजगे ,
रतजगों में कोई स्वार्थ नही ,
बस लाल का खयाल रहे ,
खुद का बुरा हाल सही ,
हिम्मत से भरी पर बात - बात में रोती है माँ ,
ऐसी होती है माँ ,
छोटी सी गलती में ,
कुछ भी कह जाते हैं बच्चें ,
उन्हें भूलकर ,
अपनी दुनिया में बह जातें हैं बच्चें ,
कुछ न कहती , चुपचाप सह जाती है माँ ,
बचपन की मीठी यादों में बह जाती है माँ ,
विधवा की जिंदगी , बुढ़ापे की लाचारी ,
छोड़ जातें हैं बच्चें , अकेली रह जाती है माँ ,
अपने , वो सपनें न जाने क्या ?क्या ? खोती है माँ ,
क्यूं ? आखिर क्यूं ? ऐसी होती है माँ ,

           - -  शैलेन्द्र चेलक - -

Wednesday, May 19, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- चिता की राह

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
शीर्षक - चिता की राह
विधा - गज़ल

       चिता की राह 
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चिता यूं तो एक दिन ,जिस्म को जलाती है ,
पर जिंदा कौन है यहाँ ? दिलों में राख लिए हुए ,

सुलगता है पल - पल तू अपनी साख बचाने को ,
साख की क्या औकात ? जब हो राख लिए हुए ,

यूं अश्क़ बहाना शख्सियत नही है तुम्हारा ,
पर न जाएगा तू भी हाथों में हजारों लाख लिए हुए ,

गुरुर तेरा न टूटे तो किसी का क्या जाता है ? 
मुहब्बत भी न मिलेगा तीखी आँख लिए हुए ,

चिता की राह में आख़िर जीते जी बढ़ रहा है तू ,
रब के पास न जाता है कोई जमीं का धाक लिए हुए ,

नेकी से गुज़र ज़माने में , हमराह बनाके चल ,
बख्शिशे भी होगी , तब चला जाये  शायद तू साख लिए हुए ,

     - -  शैलेन्द्र चेलक  - -

Friday, April 16, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- जहाज़

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - जहाज
शीर्षक - सतगुरु जहाज

           सतगुरु जहाज
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संसार सागर का ,
सतगुरु जहाज होते ,
जो राह चले मनमाने ,
खाते रहते गोते ,

सतगुरु सहारा ही ,
नदी का किनारा है ,
जो साथ नही उनका ,
जीवन बहती धारा है ,

पार जाने को बस ,
बैठ जाना पड़ता है ,
उतरता है उस पार ,
जो जहाज पर चढ़ता है ,

मौजों को सीने पर ,
जो झेला करता है ,
शागिर्दों की राह में ,
खुशियों का मेला करता है ,

श्रद्धा और विश्वास से ,
बस सुमिरन कर चल मन ,
पार करायेंगें इक वो ,
सफल हो जाएगा जीवन ,

अवतार लिए जिसने ,
भव पार कराने को ,
वो देखता है सबकुछ ,
तेरे हर एक बहाने को ,

बहाना अब न चलेगा बंदे ,
काल की मार जारी है ,
संगत करले सतगुरु की ,
हरि नाव की सवारी है ,

बक्श देंगें वो तेरे ,
हर गुनाहों को भी आज ,
खेवैया भी सद्गुरु ,
सतगुरु ही नाम जहाज ,

         - - शैलेन्द्र चेलक - -

Monday, March 8, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- निराकार

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - निराकार

        निराकार ईश्वर
----------------------------------------
निराकार उस ईश्वर का ,
ज्योत जले अंतर्मन में ,
ज्ञान प्रकाश प्रकाशित हो ,
हृदयतल के आंगन में ,
मिलन की चाह बस उसका ही ,
दिन-रैन रहें अब जीवन में ,
तन में आभा बिखर पड़े ,
प्रेम बरसाए जन -जन में ,
रूप उसी का आभास हो ,
जड़ - चेतन और कण -कण में ,
उसके कृपापात्र बनें हम ,
विचलित न हो मन क्षण -क्षण में ,
मनोविकार हो दूर सभी ,
मानवता फैले हर जन में ,
उस अविनाशी में विलीन हो ,
चरम ध्येय हो जीवन में ,
निराकार साकार मिले प्रभु ,
जीते जी इसी तन में ,

         - -  शैलेन्द्र चेलक - -

Tuesday, March 2, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- अंतर्मन की ज्वाला

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - पलास
शीर्षक - अंतर्मन की ज्वाला 

   अंतर्मन की ज्वाला
-----------------------------------
नई कोपलें पेड़ो पर ,
नव निर्माण सिरजाता है ,
पलास फूलों की लालिमा ,
फागुन में इठलाता है ,
वसुंधरा के आँचल में ,
मुखरित हुई लताएँ ,
सुरभित वन - उपवन में ,
कोयल , मिलन के गीत सुनाएं ,
बौर से लदे आम की डाली ,
पीली  सरसों , अलसी मतवाली ,
कलियों पर देखो बार- बार ,
गुंजन करते , रस चूसते आली ,
मन उद्विग्न हो जाता है ,
विरह में नीर बरसते हैं ,
प्रिय प्यासी चकवा ज्यों -
चाँद की चाह तरसतें हैं ,
प्रकृति यूं लगे जब ,
कोई मदमाता हो प्याला ,
लो चली देखो बसन्ती बयार ,
पतझड़ के आलम में ,
दहकते फूलों की कतार ,
ठूठ सी बेजान विरहनी की ,
मानो अंतर्मन की ज्वाला ,

            - - शैलेन्द्र चेलक  - -

Friday, February 19, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- खिलौना

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - खिलौना
शीर्षक - इंसान बना खिलौना है

        इंसान बना खिलौना है
----------------------------------------
इस यांत्रिकी युग में देखो ,
सामानों की भरमार है ,
यंत्रो से बढ़ रहा मोह है ,
संबंधों में घट रहा प्यार है ,
भावशून्य हो चले हैं जन -जन,
यंत्रो से अटा हर कोना है ,
इन खिलौनों के हाथों अब ,
इंसान बना खिलौना है ,

दिखता न देवर -भाभी के किस्से ,
न ननद - भौजाई के तकरार ही ,
न कहते कोई परियों की कहानी ,
रही न दादी - पोती की प्यार ही ,
क्या ? समझदार हो चलें हैं अब सब ,
जो मिठाई को न रोना - धोना है ,
इन खिलौनों के ...

सच है तकनीकों से उन्नति मिली ,
जगह -जगह ये हथियार बने ,
हर जेब मे पड़ा मोबाइल है अब ,
वाट्सएप-फेसबुक ही परिवार बने,
जिनके साथ बिताते घंटों ,
संग उसी के जगना - सोना है ,
इन खिलौनों के ......

रत रहते दिन - रात इसी में ,
अब नींद कम ही आता है , 
खीझ - खीझकर अपनों से ,
हर कोई चीखता है , चिल्लाता है,
रिश्ते अब देखो दूर हो चले ,
इस बात का ही तो रोना है ,
इन खिलौनों के हाथों अब ,
इंसान बना खिलौना है ,

            - - शैलेन्द्र चेलक - -

Monday, February 15, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- बसंत

रचनाकार -शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
शीर्षक - सखि बसंत आयो रे

          सखि बसंत आयो रे
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सखि बसंत आयो रे ,
मन भौरा भरमायो रे ,
विरह में नयनजल छलके ,
पिय की राह निहारती पलकें ,
कोयल की गाने ,
विरह में लगती ताने ,
मधुर गीत न सहायो रे ,

ले गया बैरी अधरों की हँसी ,
मन बैरी क्यों जा फसी ,
न जाने उस निष्ठुर की जाल में ,
दुख न होता , वो न होता ,
रहती अपने हाल में ,
ऋतुराज छेड़े मुझको ,
अब कसक न भायो रे ,

वह धुंधला चेहरा सामने आया ,
हिलोर उठा मन हर्षाया ,
मन को मिला मनमोहन प्यारे ,
खिली कलियाँ , गूंजे गलियारे ,
अधरों की हँसी फिर लौट उठी ,
विरह के पल , अब जा के टूटी ,
पिय की प्यारी , राजदुलारी ,
बरबस ही यह गायो रे ,
सखि बसंत आयो रे ,

        - -  शैलेन्द्र चेलक - -

Wednesday, February 10, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- बेटी बचाओ

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
शीर्षक -  बेटी बचाओ
विधा - कविता

           बेटी बचाओ
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कहीं बेटी , कहीं पर माँ ,
कहीं बहु रूप में तो कहीं सास क्यों ?
सभी रूपों में पीसती नारी ,
फिर भी बेटा ख़ास क्यों ?
लड़का शानो शौकत में पले ,
लड़की पैरों के तले क्यों ?
कहीं सबला बन आगे आए ,
कहीं दहेज के नाम से जले क्यों?
हर नर की जननी नारी है ,
फिर भी शोषण करे क्यों ?
गर्भस्त बेटी आज भी,
गर्भ में ही मरे क्यों ?
नारी बिना कल्पना नहीं कर सकते ?
इस पुरूष प्रधान समाज की ,
कल की कौन सोचें ?
क्या होगा? सोचें आज की ,
सबला बनने दो उन्हें ,
बेटी को भी आगे लाओ ,
मरने न दो गर्भ में ही ,
बेटी बचाओ , बेटी बचाओ ,
एक बेटी झांसी की रानी ,
जो अंग्रेजों के आगे तनी ,
एक बेटी प्रतिभा पाटिल ,
जो राष्ट्रपति बनी ,
एक बेटी कल्पना चावला ,
जो अंतरिक्ष पर चढ़ी ,
एक बेटी किरण बेदी ,
जो शोषकों से लड़ी ,
पढ़े लिखे दोष देते हैं 
जब पुत्री हो संतान ,
कहते हैं कैसे चलेगा पीढ़ी ?
कैसे चलेगा खानदान ?
पर क्या ? बेटा –
सभी जिम्मेदारीयों को निभाता है ,
बेटा के साथ क्या –
हर माँ- बाप सुख पाता है ?

           - - शैलेन्द्र चेलक - -

Monday, February 8, 2021

शैलेन्द्र चेलक की रचना- प्रस्तर

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - प्रस्तर
शीर्षक - मानव क्यों पाषाण हो चला

हे मानव ! तू छोड़ देवत्व ,
आखिर क्यों ?पाषाण हो चला ,
भावनाओं की अज्रस धारा तुममें,
पर अपनों में मेहमान हो चला ,
मानव क्यों पाषाण हो चला ?

घुल-मिल करते हँसी - ठिठोली ,
सुगंधित रिश्ते चंदन - रोली ,
' डिग्रियां ' तो खूब बटोरे ,
छूट गए अपनों से बोली ,
भवनों की शिलाएं कहती -
नातें क्यों ? सामान हो चला ,
मानव ........

बोली में, मिठास नही अब ,
मानवता का आभास नही अब ,
भाई कराहे दुख - दर्द से अपने ,
है पास खड़ा पर पास नही अब ,
तब प्रस्तर क्यों ? प्रस्तर कहलाए ,
आँसू से बड़ा अभिमान हो चला ,
मानव ......

दया,क्षमा ,विनम्रता मानवता का मूल है ,
इन्हें छोड़ पाना विलासिता, मानव तेरी भूल है ,
भई ! साथ न जाएगा , धन , मान - बड़ाई ,
प्रेमरहित जीवन बंजर , आँधी मिश्रित धूल है ,
पिघला चट्टान कहता पल- पल ,
तू क्यों ? मूर्ति बन भगवान हो चला ,
मानव .....

         - -  शैलेन्द्र चेलक - -

Wednesday, February 3, 2021

बालोद से शैलेन्द्र चेलक की रचना- इम्तिहान

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद ,छत्तीसगढ़
विषय - इम्तिहान
शीर्षक - इम्तिहान जारी है ...

        इम्तिहान जारी है .....
जीवन में हर पल इम्तिहान है ,
खरा उतरना मुश्किल है ,
खरों का नियोजित खुला आसमान है ,
पर खोटों का भी तो जहान है ,
क्योंकि असफलता एक ओर परिश्रम को बढ़ाता है ,
तो दूसरी ओर निराशा घर कर जाता है ,
निराशाओं का भी अपना अलग महत्व है ,
जो हमें ' एंटीबॉडी ' की तरह और मजबूत बनाता है ,
सीखाता है कि कोमल कलियां 
तपिश में सुख तो जाता है पर 
ठूठ से दृढ़ता को पता है ,
दृढ़ता भी तो जीवन का सार है ,
जो बाधाओं पर डिगने नही देता ,
थपेड़ो की चोट से उबार लेता है ,
यह ही असफलता को सफलता में परिणित करता है ,
फिर सफलता का रीत करता है ,
सीख जाए तो नया इम्तिहान ,
न सीखे तो संघर्ष भारी है ,
सुख - दुख , पाना - खोना ,
न जाने कई रूपों में अनवरत !
हर किसी का इम्तिहान जारी है ....

          
          - -  शैलेन्द्र चेलक  - -

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...