रचनाकार -गिरधारी लाल चौहान
स्थान--नवापाराखुर्द /सक्ती
जिला ---जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा ---कविता
विषय -श्रृगार पर आधारित
शीर्षक-देख रही श्रृंगार
आइना देख श्रृंगार मुस्कुराने लगी है ।
पूछ रही किसके लिए खुद बताने लगी है।
मन भी जानती है बात सत्य मानती है
उनके नाम से हीअब इतराने लगी है ।
कुछ तो और नहीं बचा मन ने मन से पूछा।
डाली निगाह बार बार मन गई सकुंचा।
प्यास बुझी मन की निराश गई तन की ।
सब कुछ अब मुझे बहुत बहुत भाने लगी है
माथ पर गई नजर देखा उनका बिन्दी ।
कान को मैं छुई पाई उनका ही झुमका ।
बालों में उनका गजरा नैनों में कजरा ।
तेरा कुछ भी नहीं कह चिढ़ाने लगी है ।
श्रृंगार से मुझे इतनी ज्यादा स्नेह क्यों ।
श्रृंगार बिना मैं क्यों नहीं थी सकती ।
आदत क्यो नही मेरी बन रही सोच रही ।
मुझे भी श्रृंगार सब त्यागने की पड़ी है ।