Showing posts with label दूजराम साहू. Show all posts
Showing posts with label दूजराम साहू. Show all posts

Tuesday, December 1, 2020

राजनांदगांव से दूजराम साहू "अनन्य" की रचना-

रचनाकार - दूजराम साहू "अनन्य"
निवास - भरदाकला
तहसील - खैरागढ़ 
जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.) 
       
      भाग जागे मोर भुंईया के 
---------------------------------------

भाग जागे मोर भुंईया के , सरग बरोबर लागत हे ! 
पिऊरा लुगरा पहिरे  दाई, झुमर - झुमर के नाचत हे !! 

पड़की परेवना मैना मिट्ठू , गोड़ेला गुलछर्रा  उड़ावत हे ! 
फांफा झिंगरा टेटका  मेचका ,खुशी के गीत गावत हे !! 

फुरूर - फुरूर पुरवईया चले, दाई के अंचरा   डोलावत हे ! 
पबरीत माटी ये भुंईया के, महर - महर ममहावत हे !! 

जनम के अड़हा बेटा "अनन्य " , सेवा गजब बजावत हे !
सोन बरोबर धान देखके,  मन में खुशी मनावत हे !! 



शब्दार्थ :- गोड़ेला = गौरैया
            पबरीत = पावन/पवित्र 
            महर - महर = सुगंध 
            ममहाना = महकना !

Thursday, November 12, 2020

राजनांदगांव से दूजराम साहू "अनन्य" की रचना- धनतेरस

रचनाकार :- दूजराम साहू "अनन्य"
निवास :- भरदाकला (खैरागढ़) 
जिला: - राजनांदगाँव( छ. ग.) 
विषय :- धनतेरस 
विधा :- कविता ( मुक्त) 

धन लक्ष्मी घर आये राम जी, 
सुख शांति संग लाये राम जी, 
धनहीन न उदास हो, 
दिन-रात न उपवास हो, 
निर्बल के बल बनो राम जी! 

 
लक्ष्मी - गणेश आये राम जी, 
सरस्वती साथ आये राम जी, 
मिलता रहे कृपा विशेष, 
सुधर जाये दीन का परिवेश, 
निर्धन के धन बनो राम जी! 

निर्धन को निहारो राम जी , 
दीनन का दुख हरो राम जी ,  
न कोई अब भुखे सोये, 
मृदुल नयन अब न रोये, 
कृपा इतना करो राम जी  !

Sunday, November 1, 2020

दूजराम साहू “अनन्य “ की रचना- छत्तीसगढ़ महतारी

दूजराम साहू  “अनन्य “
निवास- भरदाकला
तहसील -खैरागढ़
जिला -राजनांदगाँव (छ ग)
छत्तीसगढ़ महतारी
    

मोर छत्तीसगढ़ महतारी,
तोर अलग हे चिनहारी!
देवता धामी ऋषि मुनि मन,
तप करीन इहाँ भारी!!

आनी बानी के रतन भरे हे ,
इहाँ के पावन माटी म !
मया पिरती बढ़त रहिथे ,
गिल्ली डंडा अऊ बांटी म !!
नांगमुरी करधनिया संग म ,
दाई गोड़ म पहिरे सांटी …..

भिलाई कोरबा बैलाडीला म,
बड़़े – बड़े कारखाना हे !
कटकट – कटकट डोंगरी दिखे,
महानदी गावए गाना हे !!
मैना कोयली के गूरतूर बोली ,
मंजूर ठूमके इहाँ भारी……

 

बिकट बिटामिन भरे हावे,
रतिहा के बोरे बासी म !
सोना बरोबर धान दिखत हे ,
धनहा खेत मटासी म !!
महर- महर ममहावत हावे 
चंदन पबरीत माटी…… 

भोरमदेव माँ बमलाई,
शिवरीनरायन धाम हे !
राजिमलोचन दंतेश्वरी,
गिरोधपुरी पावन धाम हे !!
दूजराम तोर गुन ल गावए …
किरपा कर महतारी


Monday, October 19, 2020

राजनांदगांव से दूजराम साहू "अनन्य" की रचना- ओस की बूँद

रचनाकार :-दूजराम  साहू "अनन्य"
निवास :-भरदाकला(खैरागढ़) 
जिला:- राजनांदगाँव( छ .ग.) 
विधा:- छंद मुक्त कविता
विषय :- ओस की बूंद! 

ये क्या ? 
मेरे आते ही
दहशत में आ गए , 
मुझे देख छटपटाने लगे 
कुछ पल और रूकते ! 
सुधा शांत नहीं
हुआ है अभी मेरी! 
जी भर कर
मुझे देख लेने दो , 
कुछ पल साथ बिताते, 
प्रेम की गीत गाते ! 
अंगड़ाई लेते 
नयनों से नयन मिलाते! 
मेरी एक झलक से ही
तुम इतने दमकते हो ! 
लगता है खुदा ने
हम दोनों की 
मिलन लिखा ही नहीं है! 
तभी तुम
ईद की चांद 
हो जाते हो ! 
पर एक-दूसरे 
दूर होकर भी 
कितने पास- पास न? 
तभी तो मेरी नूर से
ही तुम मोती 
बन जाती हो! 
और चौमास 
की बूंदों से भी
अधिक दर्जा पाती हो ! 

           उपरोक्त कविता में कवि ने सूर्य  की प्रकाश और ओस की बूंद के बीच वार्तालाप का कुछ अंश प्रस्तुत कर मानकीकरण करने का प्रयास किया है !

Tuesday, October 13, 2020

राजनांदगांव से दूजराम साहू"अनन्य " कृत आलेख- चिड़िया

रचनाकार :-दूजराम साहू"अनन्य "
जिला :-राजनांदगाँव
विधा :-आलेख 
विषय :- चिड़िया की घोंसला 
       

       रोज -रोज तिनके उठाने की समस्या से अच्छा है कि समस्या को एक ही बार में जड़ से समाप्त कर देता हूँ! ये कहते हुए नेगी जी चिड़िया की घोंसला को निकाल कर बाहर फेक दिया और आफिस चला गया! आफिस में दोपहर को लंच के वक्त सभी साथी आपस में गप्पे मार रहे थे! तभी एक साथी ने पुछा की मुझे  सुबह उठने में रोज देर हो जाते हैं क्या करे? तुरंत दूसरे साथी ने जवाब दिया कि घड़ी में अलार्म भर दिया करें, अलार्म के बजते ही उठ जाओगे, मैं ऐसा ही करता हूँ! तभी त तीसरे ने कहा कि मैं तो रोज सुबह समय पर उठ जाता हूँ मुझे अलार्म की जरूरत नहीं होती! तुरंत चौथे साथी ने पुछा तो आप समय पर कैसे उठ जाते हो जरूर कोई उठाते होंगे ? नहीं मुझे कोई नहीं उठाते ! मेरी सुबह तो घर में घोंसले  पर रात गुजारने वाली प्यारी-प्यारी  चिड़ियों की चीं -चीं की आवाज से होती है  ! तभी नेगी जी से किसी साथी ने पुछा कि क्यों भई आप सुबह समय पर कैसे उठाते हैं? नेगी जी उत्तर दिया कि मैं भी चिड़ियों के चहकने  की आवाज सुनकर सुबह समय पर उठ जाता हूँ ये कहते हुए उनका मुह से अरे! मैनें ये क्या कर दिया !जो मुझे रोज सुबह समय पर उठाते हैं ,मैने आज उसका आशियाना उजाड़ दिया ! ये कहकर पश्चाताप की आग में जलने लगा! और घर आकर देखा तो चिड़िया की दो नन्ही -नन्ही बच्ची को सुबह फेके हुए घोंसले में फुदकते देखा तो मन में थोड़ा सुकून हुआ !और उस घोंसले को वापस वही पर रख दिया!

Wednesday, September 30, 2020

दूजराम साहू की रचना- धर्म

रचनाकार :- दूजराम साहू "अनन्य"
जिला :- राजनांदगाँव (छ. ग.) 
विधा :- कविता
शीर्षक:-"धर्मों में एकता हो"

एक बूंद से उपजे जहान
एक खुदा की सब संतान, 
मानव मानव एक समान, 
सबके मन में ये बात हो, 
धर्मों में एकता हो, 
भाईचारा साथ हो !

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई , 
दिवाली ईद में बांटे मिठाई , 
आपस में रहें भाई -भाई 
मजहब पर न दंगा फसाद हो, 
धर्मों में एकता हो , 
भाईचारा साथ हो !

धर्म के नाम पर न लड़े, 
विरोधी बनकर न खड़े, 
भाई बनकर पीड़ा हरे, 
आपस में न कोई घात हो , 
धर्मों में एकता हो, 
भाईचारा साथ हो!

Saturday, August 22, 2020

राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- गणेश वंदना

रचनाकार -दूजराम साहू
निवास भरदाकला (खैरागढ़) 
जिला- राजनांदगाँव (छ. ग.) 
विषय - गणेश वंदना 
विधा - मुक्त
शीर्षक - हे गजाननं महाराज 


हे गजाननं महाराज , 
घर पधारे हो आज ! 
विघ्नहर्ता विघ्न हरो , 
संवारो बिगड़े काज !! 

रिद्धि-सिद्धि के तुम हो स्वामी , 
सारे जगत के अंतरयामी ! 
गण के पति हे गणपति , 
हर दो क्लेश हमारे आज  !! 

"अंधे की लाठी" तुम हो , 
गुंगे गाते हैं फाग ! 
पंगु चढ़े गीरी गगन , 
बहरे की हो आवाज  !! 

"माला जपूँ"मै तुम्हारे नाम की , 
न लय है न राग ! 
मै अज्ञानी भाव भक्ति न जानूँ, 
लगा है "चोला में दाग" !! 

                  दूजराम साहू

Tuesday, July 7, 2020

राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- अंगना में रे चहकती हे चिरईया

रचनाकार - दूजराम साहू
जिला - राजनांदगाँव
शीर्षक - अंगना म रे चहकत हे चिरईया! 


भईया उठ ग किसान ! 
चल बोए बर धान ! 
अंगना म रे चहकत हे चिरईया !!


अब सोये के बेरा नईहे भईया! 
बेरा पंग पंगागे ! 
कोठा में बांधे जोड़ी बईला! 
ऐती ओती झांके! 
भईया अब होगे नवा बिहान ! 
चल बोए बर धान ! 
अंगना म रे चहकत हे चिरईया !! 

झिमिर -झिमिर पानी बरसे ! 
झुमके नाचे मैना रानी ! 
कड़कत बिजली गरजत बादर! 
चुहे ओईरछा झानी ! 
गरीब गुरुवा के मितान ! 
रखथस सबो के धियान ! 
अंगना म रे चहकत हे चिरईया !!

Saturday, June 27, 2020

राजनांदगाँव से दूजराम साहू की रचना- अब की बरस

रचनाकार- दूजराम साहू 
जिला -राजनांदगाँव(छ.ग.) 
शीर्षक-अब की बरस बरखा 
      

       !!अर्जी- विनती!! 
-----------------------------------------
अब की बरस बरखा, कृपा कर देना !    
उजड़े चमन को ,गुलजार कर देना !! 

कर्ज के बोझ में दब गया हूँ  , 
और भार सहा नहीं जाता ! 
साहूकार रोज आते हैं , 
लेकर खाता !! 
खेतों की फसल को ,हरियाली कर देना ! 
अब की बरस बरखा,  कृपा कर देना !! 

अकाल की मार लगातार पड़ रहे है, 
कर्मठ किसान लाचार हो रहे है !! 
घर में भोजन की किल्लत हो रहे हैं ! 
बच्चें भूखे -प्यासे सो रहे हैं !! 
बेबस किसान के पीड़ा हर देना ! 
अब की बरस बरखा, कृपा कर देना !!  

कलियाँ  खिल नहीं रही हैं, 
नदी -नाले सुख गई है ! 
लताएँ उदास बैठी है, 
जलधाराएं टूट गई है !! 
दूजराम के जीवन में ,खुशियाँ भर देना! 
अब की बरस बरखा, कृपा कर देना !!

Tuesday, June 16, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- दीवारों के कान

रचनाकार -दूजराम साहू
जिला- राजनांदगाँव
विधा -कविता 
शीर्षक- दीवार के घला कान होथे! 

समझ नई आए मनखे
कईसे अब भयरा  होगे हे ! 
सियान मन कहीथे कि
दीवार के घला  कान होथे !! 

लखटा म बईठे आदमी 
घेरी भेरी चिल्लात हे, 
फेर का कहिबे नई सुनत हे , 
तभो ले काकर संग गिजगीजात हे !
समझ नई आए कईसे अनजान होगे !! 

फोन के तार घुसारे हे कान म
कहीं गोठियाले नई धरे धियान म , 
अकेल्ला बईठे बईठे पगला हो जथे 
चिल्ला चिल्ला के मनखे खुद बईहा गेहे! 
तीर म आदमी दुरहीयाके बिरान होगे !! 


दूजराम साहू

Wednesday, June 10, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से दूजराम साहू की रचना- गाँव बदल रहा

रचनाकार -दूजराम साहू
जिला - राजनांदगाँव
विषय- शहरीकरण
शीर्षक - गाँव बदल रहा है! 

शहरीकरण के चक्कर में , 
रिस्ते -नाते बदल रहे है ! 
देखों  मेरा गाँव बदल रहा है! 

ना अब इंसान, इंसान रहा, 
विश्वास के लोग मिलतें हैं कहाँ? 
देखों अब इंसान बदल रहा है! 

गाँव और शहर में कहीं नहीं है मेल!
गाँव में प्रेम की सागर बहती है! 
और शहर में प्रेम का परिभाषा बदल रहा है! 

गाँव अब गाँव नहीं लगता ! 
ढ़ूढ़ने पर कहीं गाँव नहीं मिलता  ! 
क्योंकि आज मुकाम बदल रहा है! 

क्या? यह गाँव का विकास है , 
या शहरीकरण एक दिखावा है ! 
या केवल लोगों का पहिचान बदल रहा है! 

दूजराम साहू

Thursday, June 4, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- मोर छत्तीसगढ़

रचनाकार -दूजराम साहू
जिला -राजनांदगाँव
शीर्षक -मोर छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक विरासत ! 



मोर छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक विरासत 
बड़  समृद्ध अउ आपार हे  ! 
लोकसंस्कृति, लोकनाटक के भरमार हे !! 

कथक नृत्य अउ शास्त्रीय संगीत, 
पंडवानी ,पंथी ,राउत नाचा, 
साज नाच के  भरमार हे ! 


सूता बहुंटा नांगमुरी रूपिया , 
फूली बारी खूंटी  बिछीया , 
मोर महतारी मन के सिंगार हे! 


अकती हरेली तीजा पोरा , 
सुरहोती देवरी गऊरी गउरा, 
अनी बानी के इहाँ तिहार हे ! 

करमा ददरिया सुवा खेतिहारिन गाथे , 
गउँ चरईया राउत भईया बांस गीत बजाथे , 
पड़की नचईया के भरमार हे! 

डुबड़ी कड़ही, चाऊर चीला, 
बफोरी खाये सबो माई पीला , 
चटनी भाजी के भरमार हे ! 

उत्ती म राजिम दाई,बुड़ती म बमलाई,
रकसहू म दंतेसरी बुड़ती म शबरी दाई, 
वीरनारायण घासीदास के महिमा आपार ! 

                     दूजराम साहू

Saturday, May 30, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- पेट की आग

रचनाकार -दूजराम साहू 
जिला -राजनांदगाँव  (छ. ग.) 
शीर्षक - "पेट की आग " ! 
विधा - कविता (मुक्त) 
           
             
              पेट की आग बुझाने , 
             किये रोटी की तलाश ! 
            दिन गुजारें पानी पी कर, 
               रात रखें उपवास !! 
          
           छोड़े सारे सुख सुविधा , 
           छोड़ दिया आशियाना ! 
         मातृभूमि का आंचल छोड़े, 
          अब हो गयें हम बेगाना !! 
      
          याद आती है कई बार घर, 
            आँखें नम हो जाती है ! 
         रोने का भी अधिकार नहीं है, 
           मन व्याकुल हो जाती है !! 
         
            ये कैसी विपदा आई है, 
           न हम घर में है न घाट में ! 
          मौत का साया पग-पग चले, 
             डर रहता दिन रात में !! 
                           
                           दूजराम साहू

Friday, May 29, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- सड़क

रचनाकार दूजराम साहू 
जिला- राजनांदगाँव (छ ग) 
विधा- कविता (मुक्त) 
शीर्षक - मैं सड़क हूँ! 

            मै सड़क हूँ! 
    मेरी पहुँच बहुत दूर तक है ! 
   जहाँ वी.आई .पी . की नहीं ! 

      मैं साफ -सफाई रहूँ! 
       हर समय नया रहूँ ! 
      ऊबड़ -खाबड़ न रहूँ!
     पथिक को चोट न लगे ! 
     कोई मेरे कारण न मरे ! 
    सदैव मेरी प्रयास रहता है!
        जी हाँ मैं सड़क हूँ! 
मैं सेवा में सदैव तत्पर रहता हूँ! 
  जीतना वी.आई. पी. नहीं! 

  मैं कच्चे -पक्के ,टेढ़े - सीधे 
   नरम-कठोर , मोटे- पतले! 
    भूरे- लाल, काले - पीले ! 
  गिट्टी -मुर्म, कांक्रीट सिमेंट 
     पत्थर -सरिया डामर 
    मैं कई रूपों में बना हूँ! 
      जी हाँ मैं सड़क हूँ ! 
      मेरी मजबूती जैसा 
  वी.आई. पी. का घर नहीं! 

       गाँव शहर कस्बे 
  सभी जगह मेरी जाल है ! 
मेरे से होकर कही भी चले जा! 
    लाखों आगे बढ़ गये ! 
     मैं वही का वही हूँ ! 
          मैं खडा़ हूँ! 
      जी हाँ मैं सड़क हूँ ! 
  मैं तीनों काल को देखा हूँ! 
 जो वी.आई. पी. देखा नहीं ! 

           मैं सेवक हूँ! 
    सेवा करना मेरा धर्म है ! 
       पर मै बहुत दुखी हूँ! 
 लोगों की अमानवीय कृत्यो से ! 
मैं जितनी जिम्मेदारी निभा रहा हूँ! 
    उतने मानव भी निभाये !
         जी हाँ मैं सड़क हूँ! 
मैं अपार दुख की सागर में डूबा हूँ ! 
    जितना वी.आई. पी. नहीं  ! 

Wednesday, May 27, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- पर्यावरण और जीवन

रचनाकार - दूजराम साहू
जिला- राजनांदगाँव(छ.ग.) 
शीर्षक- पर्यावरण और जीवन! 
विधा -कविता


          चंद स्वार्थ के चक्कर में , 
         हम भूल गए निज कर्म को ! 
         प्रकृति में जहर घोल रहे हैं , 
         हम भूल गए निज धर्म को !! 

       प्रकृति के अनुपम भेंट से ही , 
       हरा -भरा जीवन रहता है ! 
       सांसों की अमुल्य खजाना, 
       पर्यावरण से नित्य बढ़ता है  ! 
  
     जल, थल ,अग्नि,वायु, नभ 
     सभी दूषित हो रही हैं देखें ! 
      इन्हीं तत्वों से देह बना है , 
       इनको भी हम  समझें !! 

      रोज हमने पेड़ों को काटा, 
       जिससे मिट्टी कट रही! 
    कारखानों की दूषित धुँआ से , 
     रोज ऑक्सीजन घट रही! 

     लाखों टन कचरे और रंजक , 
       नदियों में हम बहाते हैं ! 
    पिने की पानी दूषित कर हम, 
   पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ाते है ! 

   जब कम करेंगे विलासिता को  , 
      तब प्रकृति बच पायेगी ! 
    जब अभाव में जीना सीखेंगे , 
      तब खुशहाली आयेगी !! 


व्याख्या - प्रस्तुत कविता में हमारे द्वारा  पर्यावरण के लगातार किये जा रहे दोहन की बातें कहीं गयी है! हम जानते हैं कि  पर्यावरण की अनुपम भेंट  ऑक्सीजन से ही हमारी जीवन की सांसें चलती है ! जल, थल, अग्नि, वायु, नभ से हमारा शरीर बना है! अगर इसको हम हानि पहुचायेंगे तो खुद का नुकसान है! क्योंकि इससे पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ रहा हैं, जो संपुर्ण जीव के लिए हानिकारक है! 
      अंत में अभाव में जीने की आदत हमें अपनाने की बात पर जोर दिया गया है! जिससे  पर्यावरण को नुकसान होने से बचाया जा सकता है , और प्रकृति हरा -भरा हो जायेगी तथा जीवन  में खुशहाली आ जायेगी! 
                   दूजराम साहू

Wednesday, May 20, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- कुर्सी का रोल

रचनाकार-दूजराम साहू
जिला- राजनांदगाँव (छ.ग.) 
शीर्षक - कुर्सी का रोल 

   आओ संगी तुम्हे बताऊँ
  कुर्सी का कितना रोल है ! 
      कुर्सी ही बताता है, 
   किसमें कितना पोल है !! 

सब लगा है देखों संगी
    कुर्सी के दौड़ में ! 
 चोर उचक्के आगे भागे , 
 इस कुर्सी के दौड़ में !! 
कुर्सी के चक्कर में देखों, 
 रिश्ते- नाते न जाने !
जैसा भी हो मिल जाए , 
कुर्सी को खुदा माने !! 
कुर्सी सब कुछ जानता है 
किसका कितना मोल है !! 
    
   इसे पाने के चाहत में
जनता से करते हैं हाय -हाय ! 
एकबार कुर्सी मिल गई  तो फिर 
   जनता को बाय- बाय !! 
   नेता हो या बाबू  देखों
कैसे बने हैं इसके पुजारी ! 
  कुर्सी के नीचे से लेते , 
  नहीं चलतीं है उधारी !!
हर व्यक्ति के बारे में जाने कुर्सी
  किसका कितना बोल है ! 
----------
दूजराम साहू
 

Friday, May 15, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से दूजराम साहू की रचना- जीवन

रचनाकार -दूजराम साहू
पता- भरदाकला (खैरागढ़) 
जिला- राजनांदगाँव(छ.ग.) 
विधा - भजन! 
शिर्षक -"क्या रखा है इस जीवन में "

    
क्या रखा है इस जीवन में , थोड़ा तो विचार कर ! 
दिन-रात क्यों दौड़ा करता, थोड़ा सा आराम कर !! 

कमा - कमा कर भरा खजाना , अंत काम न आएगा ! 
कुटुबं परिवार बंधु सखा , साथ कोई न जाएगा !! 

हीरे मोती रह जाएंगे, देखना जड़ें के जड़ें यहाँ! 
कोठी बंगला छूट जाएगी , देखना खड़े के खड़े यहाँ !! 

जीस तन का गुमान किया तु,चोवा चंदन लगाए! 
अंत समय तेरे साथ न जाये, हंस अकेला जाए !!

छड़ भंगुर जीवन हे पगले, पल भर में मिट जायेगा! 
चलती के नाम गाड़ी  है रे, थोड़े में रूक जायेगा !! 

व्याख्या --
      प्रस्तुत भजन में जीवन की छड़ भंगुरता की बात कही गई है! इंसान पूरे जीवन को धन -दौलत, माल -खजाना, परिवार आदि को जोड़ने में लगा देता है ! पर जब इस जीवन का अंत होता है तो कुछ साथ नहीं जाता, सब यही रह जाता है! और यहाँ तक जिस शरीर को सजा संवार कर रखते हैं पूरे जीवन भर वो भी साथ नहीं जाता है! जैसे गाड़ी में बैठा सवारी चलती गाड़ी में तब तक बैठ रहता है जब तक गाड़ी चलती रहती है पर जिस जगह गाड़ी खराब हो जाती है उसे वही छोड़कर मुसाफ़िर दूसरी गाड़ी में सवार होकर आगे चला जाता है! ठीक ऐसा ही शरीर जब तक ठीक रहता है तब तक जीवात्मा यहाँ  वाश करता है, पर जैसे ही  जीर्ण हो जाता है तो वह इसे छोड़ देता है! 
     इसलिए इंसान को ज्यादा -धनदौत, माल -खजाना, परिवार के पिछे नहीं भागना चाहिए! समय निकाल कर थोड़ा आराम करे और आत्म- चिंतन करना चाहिए ! 
            दूजराम साहू

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...