Thursday, May 20, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- मन की कल्पना

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान - दुर्ग छ.ग.
विधा- कविता छंदमुक्त
शीर्षक- मन की कल्पना


      मन की कल्पना

क्या बताऊँ मेरे मन की कल्पना,
         बसा लेती हूं एक अलग ही दुनिया।

हँसती रहूं खुशियाँ मनाती रहूँ,
       तितलियों की भाँति मचलती फिरुँ।

दृढ़ता से मनचाही राह पर चलूँ,
      रुढिवादी दिवारों के अवरोध हटाऊँ।

जकड़ते हैं, रोकते हैं कुछ रिवाज मुझे,
      क्यों ना उन नियमों को ताक में रख दूँ।

वो ऊँचे गगन का बादल पुकारता है मुझे,
       नहीं तेरा वो बसेरा..भरमाता है मुझे ।

है आभास, छलावा है,अब ना होंगे ये सच,
   फिर भी कुछ पल के लिये रुह में उतारुँ ।

लगाकर पंछियों सा पंख स्वच्छंद मैं उडूँ ,
      तोड सारे बंधन गगन के संग ही हो लूं...।।

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