स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा - गजल
काफिया (तुकान्त)- आरा
रदीफ(पदान्त)- नहीं
शीर्षक-
कोई हमारा नहीं
इस जालिम दुनिया में कोई हमारा नहीं,
मगर हमने अपनों से किया किनारा नहीं ।
बात- बेबात लोग कभी रुठ जाया करते हैं,
मगर ये नहीं कह सकते, हमने पुकारा नहीं ।
जज्बात् हमारे सस्ते लगते तो लगने दो,
हमने किसी को कभी दिल से उतारा नहीं ।
जुड़कर भी दूर हुये जाते हैं लोग हमसे,
कैसे कह दूँ इस जहाँ में मिलेंगे दुबारा नहीं ।
सहते रहे लोगों की बदजुबानी सदा,मगर
तल्ख़ जुबां का तीर हमने मारा नहीं ।
ये दुनिया जाने किस बात पर गुमां करती है,
यहाँ सब बराबर ,खुदा का कोई बँटवारा नहीं।
हो जायेंगे रुखसत कौन यहाँ ठहरा है, अनु,
मीठे लब्ज़ रह जायेंगे, भाया किसी को खारा नहीं।
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