स्थान- दुर्ग(छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- बोलते पलाश
सुर्ख रंग की चुनरी जैसे
ओढ़े तरु सड़क किनारे,
खेतों की मेड़ों पर
सुकून भरी छांव है,
देखो फाग के रंगो से
सजने लगी है प्रकृति,
चेहरों को रंगने जैसे
आतुर है होली सी,
जंगल में अग्नि दिखती
आँखो को करते भ्रमित
खिलने लगी हैं कलियाँ,जैसे
जवान हो गई डालियाँ
धड़कनें लगी है बढ़ने
चेहरे हया से लाल हुये,
इंतजार करती नायिका को जैसे
प्रिय के आने की हो आस,सच में...
लगता है जैसे कुछ बोलते हैं ये पलाश....।
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