स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- ठिहार
ठनी हुई है आज जीवन-मृत्यु में
मगर..
जीजीविषा भी अड़ी हुई है ।
ऐ प्रभु तुम से ही है ठिहार
कभी तो..
प्रार्थना हमारी स्वीकार होगी ।
माना निराशाओं के बादल हैं आज
कल यही...
आशाओं की बूंद बनकर बरसेंगी ।
प्रकृति फिर उल्लास मनायेगी
हर तरफ...
हरियाली ही नज़र आयेगी।
रहते नहीं दिन सदा एक जैसे
है ठिहार...
फिर दुनिया मुस्कुराने लगेगी ।।
......................................
No comments:
Post a Comment