स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- *व्रीहि*
फूलों से लदी लताये ,मन को बहुत लुभाती,
हरी-हरी हरियाली उपवन की शोभा है बढ़ाती,
ऊँचे-ऊँचे वृक्ष झूमकर छूते
जैसे आसमान,
प्रकृति की इस सजावट से
ऊर आनंद समाती,
मगर लहलहाते व्रीहि देख
खुशियाँ धरा मनाती,
अन्नदाता के चेहरों में जैसे
रौनकें यह ले आती,
भूख मिटाये पेट की, खेत
जब लहलहाये
सोना रुपी अन्न उपजाती धरती,सबको सम्पन्न बनाती ।
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