Monday, March 8, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- निराकार

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा-कविता
शीर्षक - *निराकार शक्ति*


विस्तृत है  विशाल है
        दृश्य है सारे जहाँ में
धुंधली सी रेखाएं बनती
        विस्मृत हुई यादों की
स्मृति पटल को झिंझोड़ती 
      उठती बादलों में फिर
 छुप सी जाती आकृति            
     जोर देती मस्तिष्क पर
कुछ समझ नहीं पाती 
   कुछ तो बनती बिगड़ती          
खोजती हूं कुछ खोयी सी
    दो आँखे शक्ति से भरी                                                                    निहारती शक्तिदायिनी सी
    जीवन देने वाली देवी ही
मुझे बल देती, रक्षा करती 
    फिर चल पड़ती मैं नये पथ
संघर्ष की नई शुरुआत में
      और साथ मेरे शीश पर 
वही दो आँखे संबल देती
          हैं ना दोनों निराकार
आसमान और वह ईश्वर ।।

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