स्थान -दुर्ग छ.ग.
विधा- कविता
शीर्षक- खिलौने
गये जब दुनिया के बाजा़र में
देखे खिलौने रंग-बिरंगे,
हँसते मुस्कुराते चेहरे
गुड्डे-गुड़ियों के लगे थे मेले
दौड़ती मोटर गाड़ीयाँ थी,
घोड़े हाथी चाबी से चलते,
मन को मोहने वाले लगे
चुल्हे-चौंको के बर्तन सजे,
बिकती खुशियाँ मोल में
चंद सिक्कों का खेल ये
मासूम बचपन कितना निश्छल,
पल में हँसना पल में रोना,
मिल जाये जब कोई खिलौना
मन बहलाने के साधन प्यारे
बच्चों को लुभाने वाले
अब ढुंढती हूं कोई खिलौना
बहलाकर फिर से हँसा दे
संघर्ष भरे लम्हों में,
खुशियाँ मुझे अपार दे,
क्यूं अब हम समझदार हुये,
रौनक लाने चेहरों मे सबके,
खिलौने बनकर स्वयं रह गये ।।
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