स्थान- दुर्ग ( छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- ईत्र
मुझे नहीं भाती....वो खुश्बू जो तन को महका दे,
किसी स्थिर शांत चित्त को बहका दे,
जानती हूं....
ईत्र जब घुलती है हवाओं में हवा भी बहक जाती है,
वो ईठलाती हुई जाने कहाँ तक जाती है,
तीक्ष्णता मन मस्तिष्क में छा जाती है,
मगर वह खुश्बू ही क्या जो शीशियों में बंद हो...
मुझे भाती है मिट्टी की सौंधी सी महक, जो
पानी की बूंदें पड़ते ही फिजाओं को महकाती है,
प्रकृति भी स्वच्छ निखरी नजर आती है जैसे...
बरसों से प्यासी धरा प्यास बुझने की खुशियाँ मनाती हो ।।
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