स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता(छंद मुक्त)
शीर्षक-
*बसाहट दिलों की*
इन वीरानियाँ में कुछ तो शोर
किया जाए,
रौंनके उत्सवों की मोहताज ना होने पाये,
रहते थे कभी जिन बस्तियों में शरमाये से,
क्यों ना अब खुलकर ठहाके लगाया जाये ।
एक वक्त था वो भी, जब घरों में थी दूरियाँ ,
मगर पास थे दिल और सांझा थी रसोईयां,
बढ़ने लगी भीड़ और बसाहट घनी हुई,
पास रहकर भी दरवाजों में देखो लगी है कुंडियां ।
थोड़े पैसे ही कम ना थे खुशियों के बाजार में,
छोटी सी मीठी गोली ही बाँट लेते थे प्यार में,
माँ के आँचल में बंधी वो चवन्नी मिलने की खुशी,
लाखो रु भी कम पड़ेंगे ऐसा दुलार पाने में ।।
चलो फिर वहीं चलते हैं खोया हुआ वक्त खोज लेते हैं,
बैठकर संग सबके ,फिर वही मीठे दिन जी लेते है,
इन तन्हाइयों को देकर उल्लास की बसाहट,
जीने की खूबसूरत सी वजह दे देते हैं ।।
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