Tuesday, February 9, 2021

अनुरमा शुक्ला की रचना- चेतना

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक-
        *चेतना*

श्रम रुपी पूँजी ना सहेज,
हाथों पर भरोसा रख,
ऐ मानव जाग ज़रा,
अपनी पहचान तो कर।

यूँ ना गंवा जिंदगी निर्रथक,
अपनी ताकत देख आज़मा,
चट्टानों से राह बना सकता है,
तू एक बार कोशिश तो कर ।

दिया है सब कुछ प्रभु ने,
शिकायत अब ना कर,
बुद्धि मिली है सबसे बढ़कर,
अच्छे बुरे में अंतर तो कर ।

है सजीव,अचेतन नहीं,
निर्जीव नहीं, ये तो जता,
मोल अपनी तू समझ,
कर्म की गठरी खोलकर।

सोना उगा सकता है धरा पर,
अनमोल है यह मानुष काया,
वजूद पहचान ले खुद की,
चेतना अपनी जागृत तो कर ।।

                   अनुरमा शुक्ला
                    दुर्ग (छ.ग.)

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