रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
शीर्षक :- तू भी काश समझ जाती।
विधा :- छंद मुक्त कविता
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बड़े जतन से लिखकर यारा,
भेजी थी मैंने पाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को,
तू भी काश समझ जाती।
बाल हृदय में नया नया जब,
प्रेम पुष्प नव फूटा था।
रातों की नींदें खोई थी,
चैन हृदय से छूटा था।
मैंने तुझको अपना माना,
तू ना समझी संगाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को,
तू भी काश समझ जाती।
कोरे कागज में मैंने तब,
प्रेम भाव लिख डाला था।
प्रथम प्रेम का नशा चढ़ा था,
बन बैठा मतवाला था।
मेरी प्रेम कहानी को तुम,
अपने हिय को समझाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को,
तू भी काश समझ जाती।
भले नहीं मालूम सुनो पर,
खिड़की से मैंने झांका।
जाने कितनी बारी मैंने,
भरी सभा में है ताका।
मेरे उर के मधुरिम गाने,
खुले हृदय से सुन पाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को,
तू भी काश समझ जाती।
निष्ठूर बनकर बिन पढ़े ही,
खत को तूने फेंका था।
चुपके से खिड़की से छिपकर,
मैंने तुझको देखा था।
काश उसे पढ़कर के तू भी,
ढांढ़स झूठी बँधवाती।
मेरे दिल के जज़्बातों को,
तू भी काश समझ जाती।
नेह निमंत्रण को मेरे तुम,
काश नहीं तब ठुकराती।
मेरे दिल के जज़्बातों को,
तू भी काश समझ जाती।
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व्याख्या :- रचनाकार ने अपनी कविता के माध्यम से वियोग रस से सराबोर, अपनी प्रेयसी को संबोधित करते हुए कहा है कि आखिर क्यों उसने प्रेम पत्र को बिना पढ़े फाड़ दिया।
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