जिला :- महासमुंद
विषय :- व्रीहि
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जोगी के दोहे "व्रीहि"
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बड़े जतन से पालते, व्रीहि भरे खलिहान।
तब जाकर पाता सखा, ऊर्जा नित इंसान।।१।।
हरे उदर की भूख को, बढ़े जीभ का स्वाद।
अन्न देव कहते सभी, इसमें नहीं विवाद।।२।।
भिक्षुक आएं द्वार में, करो व्रीहि का दान।
घर से निज दुत्कार कर, मत करना अपमान।।३।।
रैन - दिवस देखे नहीं, करे नित्य वे काम।
हलधर हरदम श्रम करे, करे नहीं आराम।।४।।
उनके श्रमफल रूप में, मिलता सदा अनाज।
फिर जाने क्यों बावला, करता उनपर राज।।५।।
पाप - पुण्य करता मनुज, लिए व्रीहि की चाह।
कई बार पड़ मोह में, चुने गलत वह राह।।६।।
व्रीहि जहां भरपूर है, है लक्ष्मी का वास।
दान व्रीहि का जो करे, कभी न हो धन हास।।७।।
देव व्रीहि को मानकर, करो नित्य सम्मान।
जीवन दायी हैं यही, नहीं सिर्फ सामान।।८।।
जोगी जग से बोलता, अन्न बड़े अनमोल।
बेमतलब नहिँ फेंकिए, कमतर कभी न तोल।।९।।
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